बुधवार, 27 सितंबर 2023

महिला नागा संयासियों की स्थिति

    महिला नागा संयासियों की जीवन गाथा ही कुछ अलग होती है।

        

          जब बात सनातन धर्म की हो और नागा साधुओं का जिक्र न किया जाय तो सनातन अधूरा ही समझा जाता है।कौन होते हैं ये नागा साधू?उनके रहन सहन खानपान कैसे होते हैं।तमाम जानकारी के साथ आज हम कुछ खास चरित्र का वर्णन करेंगे।जैसा कि मन में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या नागा लोग नंगे बदन निर्वस्त्र होकर रहते हैं तो उसका उत्तर होगा कि हाँ।उनके नग्नता के कारण ही शायद उन्हें नागा कहा जाता है।उनके निर्वस्त्र होकर रहने के कारण उन्हें दिगम्बर भी कहते हैं।आकाश ही उनके वस्त्र हैं,ऐसा उनका मानना होता है।कुछ बच्चे बचपन में ही इनके साथ घर से निकल जाते हैं तो कुछ लोग कुछ बड़े होने के बाद।जिसके भीतर जब वैराग्य उत्पन्न हो जाय।वैरागी जीवन बिताने के लिए निकल पढ़ते हैं।पुरुषों की भाँति कुछ महिलाओं को भी नागा संयासी के रूप में देखा गया है।


  महिलाओं से भी अधिक श्रृंगार करते हैं नागा

               नागाओं के सत्रह श्रृंगार के बारे में पूछे जाने पर यह जानकारी प्राप्त हुई , उन्होंने बताया कि नागा साधू लंगोट, भभूत, चंदन, पैरों में लोहे या फिर चांदी का कड़ा, अंगूठी, पंचकेश, कमर में फूलों की माला, माथे पर रोली का लेप, कुंडल, हाथों में चिमटा, डमरू या कमंडल, गुथी हुई जटाएं और तिलक, काजल, हाथों में कड़ा, बदन में विभूति का लेप और बाहों पर रूद्राक्ष की माला जो कि 17 श्रृंगार में शामिल होते हैं,जिनसे नागा सजधजकर शाही स्नान के लिए निकलते हैं। नागा संत लोग नित्य क्रिया करने के बाद खुद को शुद्घ करने के लिए गंगा स्नान करते हैं, लेकिन नागा संन्यासी शुद्घीकरण के बाद ही शाही स्नान के लिए निकलते हैं।

महाकुम्भ में देखने को मिला जिससे नागा सन्यासियों की एक खासियत थी  जोकि इनका मन बच्चों के समान निर्मल होता है। ये अपने अखाड़ों में हमेशा धमा-चौकड़ी मचाते रहते हैं। इनका मठ इनकी अठखेलियों से गूंजता रहता है।लेकिन सभी नागा सरल स्वभाव वाले नहीं होते।यह भी कोई मिथ्या नहीं है।महानिर्वाणी, जूना अखाड़ाऔर निरंजनी अखाड़ों में सबसे अधिक नागा साधुओं की तादाद बतायी जाती है।

महिलाएं कठिन तपस्‍या के बाद नागा साधु बनती हैं. इसके लिए उन्‍हें सालों तक कठिन तपस्‍या करनी पड़ती है, जीते जी अपना पिंडदान करना पड़ता है, सिर मुंडवाना पड़ता है और तब कहीं जाकर महिला नागा साधु बनती है. ये महिला नागा साधु दुनिया से दूर जंगलों, गुफाओं और पहाड़ों पर रहती हैं और भगवान की भक्ति में लीन रहती हैं. हालांकि पुरुषों की तरह महिला नागा साधु निर्वस्‍त्र नहीं रहती हैं, बल्कि वे कपड़े पहनती हैं. 


क्‍या पहनती हैं महिला नागा साधु? 

     जैसा कि हम सभी को मालुम ही है कि महिलाओं में उनके बाल (केस) रखने का बड़ा महत्व होता है।कोई भी महिला चाहे वह छोटी बच्ची हो या युवती लम्बे लम्बे केस रखती हैं।इससे उनकी सुन्दरता में निखार आ जाती है अब महिला नागा साधु भी तो आखिर में महिलाएं ही होती हैं  ।इसलिए उनके केस तो लम्बे होते ही हैं अब उसे महिला नागा साधू जटाएं बना कर रखती हैं, माथे पर तिलक लगाती हैं और शरीर पर राख लपेटती हैं। यानी कि बाकी नागा साधुओं की तरह ही रहती हैं ।लेकिन बिना कपड़ों के रहने की बजाय गेरुए रंग का एक वस्‍त्र भी धारण करती हैं. महिला नागा साधु का ये वस्‍त्र बिना सिला हुआ होता है, जिससे वे अपने तन को ढंकती हैं.  

कब दर्शन देती हैं महिला नागा साधु 


 
        महिला नागा साधु कुंभ, महाकुंभ जैसे खास मौकों पर ही  लोगों के सामने आती हैं।जिससे लोग उन्हें देख पाते हैं।गंगा जैसी पवित्र नदियों के संगम में स्‍नान के बाद वे जल्‍द ही गायब भी हो जाती हैं।यही वजह है कि बहुत कम लोग ही महिला नागा साधुओं के दर्शन कर पाते हैं। यहां तक कि इंटरनेट पर महिला नागा साधुओं के फोटो भी बहुत कम मिल पाते हैं।



महिला नागा साधु (Female Naga Sadhu) बनने के लिए शरीर में भी कई तरह के बदलाव करने पड़ते हैं. पुरुष नागाओं की तरह इन्हें भी मुंडन करवाना पड़ता है. इसके अलावा उन्हें अपने गुरु को विश्वास दिलाना पड़ता है कि वे अपने परिवार से दूर हो चुकी हैं और अब उन्हें किसी भी बात का मोह नहीं है. नागाओं की दुनिया में किसी भी तरह के मोह-माया की इजाजत नहीं होती है. ये खुद को भगवान के चरणों में समर्पित कर चुके होते हैं. कई वर्षों की कठिन परीक्षाओं के बाद कोई महिला नागा साधु बन पाती है. 

चलो कहीं घूम कर आते हैं (कविता)

चलो, कहीं घूमकर आते हैं



एक दिन बैठे बिठाये

खयाल आया मेरे मन में

दिल को कुछ समझाना था

हँसना और हँसाना था

निकड़ पड़ा कुछ यूं ही घर से

न कोई खास लक्ष्य था 

ना कोई थी   अड़चन

चला जा रहा था, बस यूं ही

नजर पड़ी घासों के ऊपर

छोटी छोटी मोती जैसी

चमक रही थीं मोतियों सी

सतरंगी सूरज की किरणों को

पाकर।

नव बधू हो कोई जैसे

अभी सँवर कर आयी है

करके सिंगार कुछ बेहिसाब

गहनों से खुद को दबाई है।

सारी रात सोयी ना थी

वो सुहागन  खुले आसमां के तले

बिस्तर अपने बिछाकर

चाँद और सितारों के संग

हँसहँस कर बतियाईं है।

प्रकृति का ऐसा दृष्य

मनोहारी ,मन को मोह रहा था

मानों अपनी भाषा में कुछ

मुझसे कहे जा रहा था।

जो देख रहे हो तुम प्यारे

सबको नहीं सूझती हैं

मेरे हरेभरे जंगलों को

जो काटकर मुझसे 

मेरी खुशियां छीन रहे हैं।

मेरे पास बहुत संसाधन थे

मैं सबको मुफ्त लुटाती थी

मेरे खुद के जंगल होते

पहाड़ों पर भी बस जाती थी

समयानुसार मैं बादलों से

कहकर खुद बारिश बन जाती थी

मैं प्रकृति हूँ,

सबको जीवन देती हूं

फिर भी ना समझ मानव

खुद को विद्वान समझता है

मेरे हाथ पाँव को तोड़ताड़कर

मुझे मिटाने चला है

अरे बता दो मत मुझको

इतना बर्बाद करें वो

अगर रूठ गई मैं किसी एक दिन

समझो प्रलय मचा दूँगी

देखते फिर रह जायेंगे

मेरी तरफ से तुम

समझा देना।

नदियां हैं, पर्वत हैं, और

सुहाने झरने भी

हरियाली ही हरियाली

मेरे अंंगों पर मेरी साड़ी बनकर

लिपटती हैं।

मैं माँ हूँ ,धरती माँ

मैं रत्नों का भंडार समेटे

अपनी कोख में बैठी हूँ।


स्वच्छ हवा अगर चाहिए

साँसें लेने के लिए

खुली हवा में घूमकर

आकर मिल लेना मुझसे

तुम्हारी एसी में वो दम

कहाँ है जो मेरे फव्वारे में है

कुछ देर मेरी गोंद में

बैठकर जो शुकून तुम पाओगे

भला बताओ कौनसा

बना हुआ स्थान है

 कुछ देर में भूल गया मैं

कौन और कहाँ पर हूँ।

ना कोई  गम  था 

बस मन प्रसन्न था

मैं एक राहगीर

चुपचाप प्रकृति को घूर रहा था।

   ✍️ मालचन्द कन्नौजिया बेपनाह

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मंगलवार, 26 सितंबर 2023

गीत

 भगवान किस कुसूर की देदी मुझे सजा

भगवान किस कुसूर की दे दी मुझे सजा
मेरे प्यार को मुझसे जुदा कर दिया
कमी क्या हुई तेरी पूजा में मुझसे
मेरी पूजा को मुझसे  जुदा कर दिया
बहुत था भरोसा मेरे भोलेबाबा
झोली भरने से पहले क्यों खाली कर दिया।।जयजय शंभू.. जयजय शंभू।

चाहत की बगिया को दोनों सींचते थे
तेरी चौखट पर दोनों ही माथा टेकते थे
उसने भी दिल से मुझे माँगी तुमसे
मैंने भी उसको ही माँगा था तुमसे
अगर मेरी अर्जी मंजूर ना थी
इबादत में मेरी कोई गर खता थी
मेरे दिल में प्यार की जगह तुमनें क्यों दी।जयजय शंभू

बहुत दुख सहा हूँ,
अब और मत रुलाओ
मेरी आँखों सेअश्कों को 
और ना बहाओ.
दिल को क्या पता था
इन आँखों की मस्तियाँ
इकदिन कलेजे को
घायल कर देंगी।
मेरे उन गुनाहों की इतनी सजा मिलेगी
बिखरी हुई मोहब्बत, टूटा हुआ ये दिल
लेकर कहाँ जाऊं
कुछ तो बता के जा
कब तक जीयें इस हाल में
मर्जी तेरी है क्या? जयजयशंभू.......


सोमवार, 25 सितंबर 2023

आजादी के बाद का हमारा भारत

 आजादी के बाद का हमारा भारत


आजाद भारत गांधी एवं नेहरू का क्यों और कैसे बना           

  एक थी कांग्रेस, फिर हुआ कांग्रेस का पूरा देश।


        स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जो हालात उभरकर सामने आए ,उसका यही हाल रहा, यही इतिहास रहा । आजादी के बाद के भारत में कांग्रेस और गांधी एवं नेहरू का जो वर्चस्व कायम हुआ, उसी कांग्रेस ने मोहनदास करमचंद गांधी को राष्ट्रपिता घोषित कर लिया।मोहनदास करमचंद महात्मा कहलाने लगे थे और नेहरू को राष्ट्र का चाचा । कितना अजीब खेल शुरू हो गया अँग्रेजों के भारत छोड़ते ही।प्रधानमंत्री पद के दावेदारों ने अपने आप को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर स्थापित करने में जी जान से लग गये।पहले मैं, पहले मैं के आपसी संघर्ष में दो नेताओं ने कुर्सी से लिपट कर पकड़ लिया और कोई उसे छोड़ने को राजी ही नहीं हो रहा था।भारत को बाँट कर दो हिस्से कर दिया गया और दोनों को दे दिया गया।लो जाओ दोनों खुश रहो।किसे और कैसे उन्हें रोके कौन? रोकने का काम करने वाले तब थे भी नहीं।वेतो देश की आजादी की जंग लड़ते लड़ते या तो मर गये थे या मरवा दिये गये थे और जो थोड़े बहुत थे भी तो उनकी आवाज नक्कारखाने में बजने वाली शहनाई की आवाज जैसी रही।

         अब दूसरी बात आजादी के पहले का भारत और आजादी के बाद का भारत और इसी अंतराल के मध्य कहीं पिता के रूप में गांधी और चाचा के रूप में नेहरू बैठा दिये गये और ढिढोरा पीटने के लिए कांग्रेसियों को काम पर लगा दिया गया। क्रांतिकारियों की सहादत और उनके कार्यों को आतंकवादी कार्य का जामा पहनाने वाले गांधी नेहरू ने इतिहास पटल से उन्हें ऐसा लापता करवा दिया कि बहुत से लोग उनके नाम और काम दोनों को भूल गए।और बाद की कांग्रेस सरकारों ने ढोल पीट पीट कर इन दोनों को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और चाचा के रूप में नेहरू को स्थापित करवा दिया। धन और पद लोलुप बामपंथी इतिहास कारों से इसे प्रमाणित भी करवा लिया गया क्योंकि सत्ता पर काबिज कांग्रेस के लिए ये कोई दुस्तर काम नहीं था। आजादी के साथ ही भारत के कुछ खास रिश्तेदार निकल कर सामने आये ।उनमें से बापू यानी राष्ट्रपिता, चाचा नेहरूतो थे ही तबतक अम्मा भी आगयीं,फिर एक बहन जी ने भी राजनीति के गलियारों में अपनी झलक दिखाई।बहनजी के बाद एक दीदी को लोगों ने ढूंढ निकाला।वह भी भारत की राजनीति में खूब चर्चित हुईं। कहा गया है कि अगर सत्ता हाथ में हो तो रोज कानून  बनाया जा सकता है और उसे रोज तोड़ा भी जा सकता है। एक कहावत चरितार्थ हो गई यहाँ पर--
          '' सइयाँ भये कोतवाल, अब डर काहे का।यह कहावत इसपर सटीक बैठती है। ''


                 अब बात आती है कांग्रेस की चौथी पीढ़ी के कांग्रेस के प्रभुओं की अर्थात राहुल और सोनिया की जिन्होंने भारत को अपनी बपौती समझते रहे ।देश की अर्थव्यवस्था गिरती जा रही थी और इन्हें सबकुछ तबतक ठीक लगता रहा, जबतक उनकी केन्द्र में सरकार थी।जैसे ही उनकी सरकार गई तो उन्हें देश की गरीबी, बेरोजगारी, मँहगाई सबकुछ साफ साफ दिखाई देने लगी। आजादी के बाद कश्मीर के लिए दोहरी नीति लेकर आ गये।वहां के लिए अलग से नियम बनाया गया था धारा 370 नाम से एक संविधान में अलग ही अनुच्छेद जोड़ा गया था।जिससे  भारत का किसी भी अन्य राज्य का नागरिक जम्मू कश्मीर में जाकर नहीं बस सकता था।ऐसा क्यों किया गया, उसके पीछे काँग्रेस की क्या मंशा रही होगी, उसे तो वो ही लोग जानते थे।भारत कभी इतना विस्तृत भूभाग पर फैला हुआ था, उस अखंड भारत को तोड़ते तोड़ते पता ही नहीं चला कब इतना सीमित हो गया।आजभी इसे और छोटा करनेवाले कुछ गैंग साँसें ले रहे हैं।

       
           आज एक बार फिर से भारत एक राष्ट्र के रूप में देखा जा रहा है। यह तो निश्चित है कि देश और राष्ट्र दोनों अपने अपने मायने रखते हैं। स्वतंत्रता के साथ ही भारत राष्ट्र घोषित तो हुआ लेकिन वास्तव में वह तब वह सिर्फ लिखा और पढ़ा जाता रहा।कब एक देश मात्र एक देश बनकर आगे बढ़ता है और कब वही देश एक उन्नत विचार धारा और नयी चेतना से युक्त प्रखर भाव में राष्ट्र बन कर आगे बढ़ता है जहाँ सबकी ऊर्जा का सदुपयोग व समरस हित और न्याय अपेक्षित हो जाते हैं। यह सरकार की नीतियों और जनता के समर्थन और सहयोग को देखकर जाना जा सकता है। जिस राष्ट्रवाद ने गांधी को राष्ट्रपिता बनाया उसके बाद से यह अभिनव राष्ट्रवाद है जो वर्तमान में भारत को ऊर्जावान किया है और सबकी निगाहें भारत पर आकर टिक जाती हैं। यह राष्ट्रवाद कांग्रेस को पसंद नहीं क्योंकि इस राष्ट्रवाद ने अभी तक सोनिया राहुल को न तो भारत रत्न प्रदान किया न भारतीय समाज के किसी खास वर्ग के लिए अर्थव्यवस्था को प्रवाहित किया। इस अभिनव राष्ट्रवाद ने समूचे भारत के हर वर्ग, हर समाज को उसकी सारी ऊर्जा के साथ आत्मसात किया है, किसी वर्ग अथवा धर्म को किसी समाज वर्ग अथवा धर्म के शव पर  विकसित नहीं किया है।आज हमारे देश के वैज्ञानिकों ने चन्दयान3 के सफल प्रक्षेपण से पूरे विश्व को अपनी ओर आकर्षित कर लिया।अब तक पिछली सरकार की गलत नीतियों के कारण यहाँ वही पुराने ढर्रे पर सारी व्यवस्थाएं चल रही थीं इसलिए उतना विकास नहीं हो सकता था।जैसे ही देश को नयी उर्जा मिली, उसने सभी बड़ी ताकतों से उनके घर में जाकर उनसे मिलकर भारत में निवेश करने का न्योता दिया।उन तमाम विकसित देशों से भारत में अपने कारोबार शुरू करने के लिए सलाह मशविरा किया।आज तमाम विदेशी कंपनियों द्वारा भारत में अपने कारोबार शुरू करने की तैयारियां जोरों पर है।कुछ समय बाद यहां भी तमाम रोजगार के अवसर मिलने शुरू हो जायेंगे।

वर्तमान का राष्ट्रवाद कांग्रेस की असफल और अयोग्य नीतियों का सारांश है जो जनता उद्भूत है।यह सब राजनीति का एक दोष है लोग सत्ता हथियाने के नयेनये तरीकों से जनता को गुमराह करने में लगे हुए हैं।ऐसा नहीं है कि जबसे बीजेपी  केंद्र की बागडोर संभाली है , सबकुछ दुरुस्त हो गया है।जी ऐसा बिल्कुल नहीं।इन्होंने ने भी सत्ता में आने के लिए बहुत पापड़ बेले हैं।बहुत दिनों तक हिंदू मुस्लिम किया था।राम मंदिर और बाबरी मस्जिद का मुद्दा उठाया और अब जाकर सफलता हासिल हुई।इन्हें हर काम जब चुनाव करीब होता है तभी नयीनयी योजनाओं को लाने का खयाल आता है। कालाधन को मुद्दा बना कर चुनाव में उतरने वाली भाजपा ने सबको दिलासा दिया था कि यदि वे केन्द्र में अपनी सरकार बनाने में कामयाब हो जाते हैं तो उनके एजेंडे में विदेशों में जमा कालाधन वापस लाना उनकी पहली प्राथमिकता होगी और जब यह कालाधन देश में आ जायेगा तो हर नागरिक को पन्द्रह पन्द्रह लाख रूपये उनके खाते में भेजा जाएगा।यह तो उनकी घोषणा थी।लेकिन जब वे सत्ता में आ गये तो उन्होंने सहारा या सहारा जैसी तमाम चिटफंड और रीयल स्टेट कंपनियों में ताला लगवाकर जनता के निवेश किये धन को ही मानो कालाधन समझ लिया और सब गरीब लोगों के पैसे इन कंपनियों ने हड़प लिया।जनता चिल्ला रही है लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है।हर क्षेत्र से अपना एक विधायक और एक चुनकर जनता सदन में जब भेजती है तो उसका यही काम है कि वे अपने विधानसभा और लोकसभा क्षेत्रों की आम जन समस्याओं को सदन में उठाकर उसपर चर्चा शुरू करें गे।लेकिन यहां तो उसका सीधा उलटा होता है।लोग जीतने के बाद क्षेत्र और उसकी समस्याओं को भूल जाते हैं और उन्हें याद रहता है सिर्फ अपना घर बार,रिश्तेदार।उनका विकास कैसे हो, कोई ठेका है तो उसे किसको दिया जाय,बस।

रविवार, 24 सितंबर 2023

हया का परदा

 नफरत नहीं दिलों से प्यार मांगते हैं।।

नफरत नहीं दिलों से प्यार मांगते हैं,
चेहरे की मुस्कुराहटों का राज माँगते हैं।।
अनमोल जिंदगी है, मत यूं ही गुजार दो।
मिले जहाँ खुशी, वो बाजार माँगते हैं।।
रिश्वत का दौर है, मंजिलें तलाश लो
क्या भरोसा वक्त का, इंसाफ माँगते हैं।।



चम्मच बिना निवाला भी अबतो
जब मुँह में जा नहीं सकता।
ये तो दुनियाँ है मेरे दोस्तों, 
सबको समझा नहीं सकता।।
बड़े जालिम हैं, यहाँ पर लोग
अपना किसे समझते हो?
अकेले अभी तलक हैं साथ चाहते हैं।।
इंसानों के शहर में इंसाफ माँगते हैं।।
आज अभी अकेले हैं
कल कोई तो साथ देगा
ये अगर साथ होंगे तो
वो भी साथ देंगे
गूंज उठेगा आसमां आवाज जब उठायेंगे
भरोसा दिला रहे  हैं कलम हम चलायेंगे
काटनी है दीवार जुल्म की,फरियाद डालते हैं
हथियार आप हैं, आपके जज्बात मांगते हैं।।



इसे भी पढ़ते चलें
 

     हया का पर्दा



नजर से हया का पर्दा हटा चुके हो
क्या असमतें अब  बचा सकोगे
नाजुक से बदन यूं दिखा रहे हो
पता नहीं अभी क्या क्या करोगे
खुले जिशम को ही फैसन बता रहे हो
जो पहने हैं कपड़े,उन्हें क्या कहोगे



मगर के आँसू यू बहा बहाकर
पता नहीं क्या जता रहे हो
तेरी आबरू के दुश्मन खुद तुम्हीं हो
जमाने को इल्जाम क्या दे सकोगे
हया का परदा हटा चुके हो
क्या असमतें अब बचा सकोगे



जिनके तराने तुम आज गा रहे हो
उनके दिलों से नफरतें क्या मिटा सकोगे
कागज की कश्तियाँ चला रहे हो
क्या कोई दरिया उतर सकोगे



जिसने न समझा अपना किसी को
उसे क्यों गले से लगा रहे हो
दगा के बदले वफा चाहते हो
गद्दारी की नीयत क्या छुपा सकोगे?
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       🥀 मालचन्द कन्नौजिया बेपनाह

रिश्वतखोर के बा

 रिश्वतखोर के बा  (कविता)

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रिश्वत रिश्वत सब चिल्लात बा
दुनियां हो गइल रिश्वतखोर
बिन मंगले खुद पहुँचावत बाड़
लेहले में अब के बा कमजोर।।

बिन मंगले सब देत हौ भइया
तो मंगले पर के ना देई?
हमहीं तूँहीं राह देखवलीं त
अब का हँसीं का रोईं।।

आसमान पर पहुंच गइलबा रिश्वतखोरी
आसानी से नीचे अब ना उतरी
अन्ना एइसन गन्ना पेरिहैं फिरभी
कवनो रस अब ना निकरी।।

ठगी दलाली रिश्वतखोरी
भारत के इहे शान भयल
रिश्वत देके मडर कराला
पइसा माईबाप भयल।।

दउरत दउरत तूँ थक जइबा
केहू तोहार ना सूनी
बिना पइसा के बाहर भीतर
केहू कुछ में ना गूनी।।

नेता अधिकारी सब भयल व्यभिचारी
जेके चाही ऊ ओके नचाई
उनकर केहू काव उखारी
बोला रामराज का असहीं आयी।।
        🥀 🦋 मालचन्द कन्नौजिया बेपनाह

शनिवार, 23 सितंबर 2023

भारत की नारी सम्मान नीति

 भारत की नारियों को मिल रहा सम्मान


(एक कवि की काव्य रचना) भोजपुरी भाषा में लिखी गई यह कविता अपने पाठकों के लिए समर्पित कर रहे हैं।


खाली कहला से नारी के सम्मान ना मिली

जबले दिलवा में सबके ऊ स्थान ना मिली

बार बार मंच से एलान रउवाँ होला
बेटी बचावा सभे बिटियो के पढ़ावा
अबहिन ले कउनो परिणाम ना देखाला
काहे रोज बिटियन के इज्जत लुटाला
बड़ेबड़े कानून संविधान में लिखाला
मिले नाहीं न्याय, कानून जब बिकाला
चाहे केतनो राउर भाषण रोज दिहिब
नारी शक्ति के जबले उपहास ना रुकी
खाली कहला से नारी के सम्मान ना मिली
बड़े बड़े वादा रोज करेला बिरनवां
नोचल जालीं नारी रोज सबके सम्हनवां
कबले कृष्ण बनके अइबा द्रोपदी के गोहनवाँ





सगरी समाज भइल जाता ब्यभिचारी
फारफार आँख झाँके सोचे ना बिचारी
घरवा में जेकरे होनी बिटिया कुँवारी
खींचेले दुपट्टा मारे मुसुकी हृजाई
कबले कनियाँ लड़िहैं गुंडई बेमान हो गइल
खाली कहले से नारी के सम्मान ना मिली
थाना  पुलुस जेल बनल कचहरिया
बिक जाला सबही जहाँ दिन दुपहरिया
बिकेला इमान होले खुलके गुंडइया
कइसे डेरइहैं जुल्मी साथे जेकरे मुदइया
बहुत मेहनत से लिखाला केस जहवाँ
गिरफ्तारी से पहिले दियाले बेल जहवाँ
एइसन नीति से  डेराई केहू केतना
रोज लूटल जाई इज्जत इंसाफ ना मिली
खाली कहला से नारी के सम्मान ना मिली





बहुत होला देर काहे केस चले लम्मा
खेत गहना बेच कबले केस लड़िहैंअम्मा
फीस लागी ढेर ,कहीं से करजा ना मिली
देखी जवानी वकीलो भी घूरी
बहस में बार बार बलत्कार  कइल जाला
कहाँ कहाँ हाथ धइलस सबके सम्हनवैं पूछाला
मुकरी गवाह जे तो खिलवाड़ होई इजतिया
हँसत हँसत छूट जालै काहे निरदइया

शुक्रवार, 22 सितंबर 2023

एक नजर इधर भी

एक नजर इधर भी डाल दो सरकार

( यहाँ पर हमनें अपनी भोजपुरी और गंवईं भाषा में यह छोटीसी कविता प्रेसित किया है।हमारे यहाँ सरकार द्वारा चलाये जाने वाले सभी प्राथमिक और जुनियर हाईस्कूल तक हालात कुछ ऐसे हैं कि देखकर सोचना पढ़ता है कि सरकार बच्चों को पढ़ाने के लिए स्कूल भवन से लगाये भारी भरकम वेतनभोगी शिक्षक को भर्ती करके इन स्कूलों को चला रही है लेकिन उनमें बच्चे कितने हैं।आखिर क्या कारण है कि जिस नीजी विद्यालय में छोटे बच्चों को पढ़ाने वाले अधिकांश लोग बिना किसी डिग्री के होते हैं और उन्हें मुश्किल से आठ दस हजार रुपये ही नीजी स्कूल सेलरी देते हैं और वहाँ इतने सारे बच्चे क्यों होते हैं।कुछ ही साल बाद स्कूल प्रबंधन उन गरीब बच्चों की फीस उगाही से स्कूल के नाम पर अनेकों बसें खरीद ले रहे हैं।जबकि सरकार द्वारा चलाये जा रहे स्कूल की फीस लगाकर देखा जाय तो जिस स्कूल में पाँ  छ अध्यापक हैं वे एक भी अध्यापक के लिए सेलरी नहीं जुटा पायेंगे। हमारी कविता में सामान्य तौर पर देखी गई परिस्थितियों को अपनी भाषा में वर्णन करते हुए लिखने का प्रयास किया है।)





एक हाथ से अँगूरी पकड़े, एक हाथ से कच्छा

का पढ़बा स्कूल में जाके, तोंहसे भारी हौ बस्ता

सब जानत हौ,केहू बोलत नइखे
केतना होले पढ़ाई इहाँ अच्छा
पढ़ै लिखे के सबके बाटै,का भतीजा या चच्चा।।

बरसाती मेढक के जइसे,सगरी ओर स्कूल भइल
दस पास के डिग्री लेके लइकन के ऊहे गुरु भगल
सरकारी स्कूलन में भइया, अब केहुके लइका ना पढ़िहैं
नरसरिया के सनक समागल,लइका खिचड़ी खाये ना जइहें।

अब मौका के फायदा केना उठाई
मालचन्द कहदा तूँ समझाई
कलम दवात काँपी किताब सब स्कुलवै में बेचल जाई
दू चार गो रुपिया एसहूँ आई,फीस भी दुन्ना लिहलजाई
अब सात बेर जेकरा चुर्राई,आपन लइका इहाँ पढ़ाई


जेकर लइका सरकारी में पढ़िहैं
सरकारी लाभ उहे सब पइहैं
किताब के साथे ड्रेस भी पइहैं
पढ़लिख के पारंगत होइहैं
खिचड़ी खाये भले रोज जइहैं
लेके कटोरा लाइन में लगिहैं
दस बजी गुरूजी अइहैं
मास्टरनी से हँसहँस बतियइहैं



गुरुवाइन जी सुइटर बुनिहैं
जोरजोर लइका चिल्लइहैं
मेज के उप्पर टाँग पसारके
मास्टर जी कहीं सुत्तल होइहैं
खिचड़ी खिलाके सरकार भुलवावत
नइखे जोर पढ़ाई पर
नरसरिया के भरमार भइल बा
उनकर निगाह कमाई पर



पढ़ाई होले अब ट्यूशन मा
आ स्कूल से डिग्री मिलेला
होले जरूरत जब ट्यूशन के
केहूसे ना जूरेला।
साँच कहिला त जहर अस लागे
एहिसे न सब जरत बा
मालचन्द अब का बतियइहैं
कहाँ केहू अब समझेला।।
एही से हम कहत बानी
आपन दीदा मूनत बानी
एक नजर इधर भीआपन
डाल देइत सरकार
शिक्षा के मान बढ़ी इहवाँ भी
जब निगरानी रखिहैं आप।।
                    ,🥀 मालचन्द कन्नौजिया बेपनाह✍️

ग्रामीण शिक्षा बनाम सरकारी विद्यालय

 भोजपुरी काव्य रचना

 ग्रामीण शिक्षा- सरकारी विद्यालय की





क दिन प्राइमरी स्कूल के मास्टर से पूछलीं
एहमें कवनों लइका तोहरो बाय।।
आँख तरेर के मास्टर जी तकलैं
का, हमरै पउवा हल्लुक बाय  ।।
बारह व्यंजन हमरा घरे पाके
आ लइका हमार खिचड़ी खाय ।।

साठ हजार हम खुद पाईला
मलकिनियों बा आँगनबाड़ी ।।
अब तोहसे ज्यादा का बतियाईं
का नइखे समझत दुनियाँदारी।।

सबकुछ पइसा से मोल बिकात बाय
तूँ झाँकत हया, योजना सरकारी।।
पढ़ै लिखे में का रखल बाय
खिचड़ी हौ सबपर भारी।।

इहै स्थिति बाय यूपी के गाँवन में
मीडिल प्राइमरी सरकारी स्कूलन के।।
जहाँ के मास्टर खुद कतरालैं
आपन लइका इहाँ पढ़वले में ।।

सरकार निकम्मी आन्हर बनके
जुटल हौ तनखाह बढ़उले में।।
दाम के बदले काम भी चाही
का मतलब एइसन स्कूल चलउले के।।

कुछ जने बढ़ियां एहुवों हँउवें
जे ड्यूटी आपन निभावेलन।।
कुछ त आपन फर्ज करा
खुद दुसरो के समझावेलन।।

गेहूं के संगे घुनों पिसाला
झूठहीं मालचन्द का चिल्लाला।।
जइसन जे हौ,वोइसै रहेदा
चला तूँ आपन रस्ता नापा।।

जवन हाल बा इनके स्कूलन के
सेतियो में  सब मँहगँ बाटे
ठाट से बइठके कुर्सी तोरे ।।
लइका बइठल खूब चिल्लालै
गुरुवाइन जी सुइटर जब बीनै।।

कुल महगाई इनहीं लोग के
जब चाहैं धरना पर बइठै
हारमान के सरकार बेचारी
वेतन भत्ता रोज बढ़ावैं।।

बेरोजगारन के भीड़ लगल बा
डिग्री ले ले लोग रोवत बा
ये बाबू हम खेत नाखनबैं
काहे एइसन स्कूल बनलबा।।

जहाँ से पढ़के  रोजगार न मिले
रोजीरोटी के काम न सूझे
अनपढ़वा सब खूब कमालन
इनसे अच्छा ऊहे सब बाड़न।।

अरे मालचन्द चुप रहा अब
प्याज क बोकला लगे उघारै
शिक्षा से सब ज्ञान मिलेला
शिक्षा के बदनाम करा जन।।
           👉 मालचन्द कन्नौजिया बेपनाह ✍️ 

बुधवार, 20 सितंबर 2023

सीता स्वयंवर और धनुष यज्ञ

        सीता स्वयंवर के लिए धनुष यज्ञ

  
 भारत भूमि को नमन करते हुए आज मैं श्री राम कथा का कुछ भाग लेकर आप सभी के बीच आ रहा हूँ।यह रामकथा चाहे जितनी बार आप सुनेंगे, पढ़ेंगे या किसी को सुनायेंगे।हमेशा इसमें कुछ नया मोड़ देखने सुनने को मिलता है और इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि चाहे कितनी बार भी सुनो,कभी रामकथा से मन नहीं भरता।आँखें नहीं थकतीं।सुनते जाओ..सुनते जाओ  और सुनते जाओ।अगर आवश्यकता है तो वह श्रद्धा भाव की है, विश्वास की है और आस्था की है।दिल में लगन मन में भाव.. बस यही है लगाव।




 ऐसा कहा जाता है कि मिथिला के राजा जनक एक प्रतापी राजा थे।जनता के परम हितैषी।वे जनता पर शासन नहीं करते थे।बल्कि देश कैसे चलेगा, उनके राज्य में कोई दुखी न हो,इस उद्देश्य से वे राजपाट देखते थे।उनके पास कोई संतान सुख प्राप्त नहीं था।जिससे वे काफी चिंचित रहते थे।एक बार उनके राज्य में भारी सूखा पड़ा था और जनता त्राहि त्राहि कर रही थी।सूखा के कारण फसलें नष्ट हो रही थीं और जब फसल नहीं होगी तो पैदावार नहीं होगी फिर लोग खायेंगे क्या।इसी चिंता में डूबे हुए राजा जनक राज्य के श्रेष्ठ ज्योतिष विद्वानों को दरबार में उपस्थित होने का आदेश जारी किया।सभी ज्योतिष विद्वान महापंडित दरबार में उपस्थित हो गये।राजा ने उनसे गणना करने को कहा कि देखिये क्या कोई ऐसा उपाय दिखता है जिससे इन्द्रदेव को प्रसन्न किया जा सके ताकि बरसात हो। प्राचीन काल से ही हमारे यहाँ बहुत ही निपुण ज्योतिष शास्त्र के ज्ञाता रहे हैं तो उन्होंने तुरन्त गणना करके राजा जनक को एक सुझाव दिया कि राजन यदि आप अपनी रानी के साथ मिलकर एक साथ खेत में सोने का हल चला दें पानी बरसात हो सकता है।
    राजा ने सिर हिलाया और मंत्रियों को आदेश जारी कर कहा कि हमारे हल जोतने की व्यवस्था की जाय।दरबारी हतप्रभ थे।क्या वास्तव मे राजा और रानी खेतों में हल चलायेंगे?
       राजा तो प्रजापालक होता है।और जो राजा अपने ऐशो आराम में लीन होता है वह प्रजा को कभी सुखी नहीं रखता है।सोने का हल तैयार करने में देरी नहीं हुई और सुंदर सुंदर हृष्टपुष्ट दो बैलों की जोड़ी तैयार कर लादी गयीं।राजा जनक जी अपनी महारानी सुनैना जी के साथ हल चलाने खेतों की ओर निकल पड़े।जैसे ही उन्होंने हल चलाना शुरू किया तो  एक आश्चर्यजनक घटना घटित होती है।आसमान में काले बादलों की आवाजाही शुरू होने लगती है और देखते ही देखते भारी बरसात होने लगती है और तभी पृथ्वी से हल के सीत से एक घड़ा निकलता है जिसके भीतर एक सुकोमल कन्या पड़ी होती हैं।राजा रानी उसे घड़े से बाहर निकाल कर राजमहल में ले आते हैं और उसे अपनी पुत्री बनाकर अपने साथ रख लेते हैं।राजा रानी बहुत प्रसन्न थे।उस कन्या का नाम सीत से उत्पन्न होने के कारण सीता रखा जाता है।जनक जी उसे अपना नाम देते हैं तो लोग उन्हें जानकी भी कहते हैं।पूरे राजमहल में खुशहाली छा जाती है।समय बीतता गया और जब सीताजी  युवती वती होचुकी तो राजा जनक जी उनके लिए वर की तलाश कर ही रहे थे कि अचानक एक दिन एक ऐसा अद्भुत दृश्य देखकर वह आश्चर्य चकित हो जाते हैं।जनक जी के यहां शिव जी का रावण को दिया गया पुराना जिर्णशिर्ण धनुष पड़ा था।जबसे वह वहाँ रखा गया था कभी किसी ने उसे उसकी जगह से हिला भी नहीं सकाथा।जिसके कारण वहां काफी मात्रा में घासफूस उग आयी थीं तो एक दिन सीता जी को वह दिखाई दिया तो उसने उसे हटाकर वहां खूब अच्छी तरह से साफ सफाई कर दींथी।जैसे ही राजा जनक जी को उस स्थान पर साफ सफाई दिखाई दिया तो वे सोच में पड़ गये कि आखिर इसे उसके स्थान से हटाकर किसने इतने अच्छे ढंग से सफाई किया होगा!वह तो कोई मामूली इंसान नहीं हो सकता।आखिर वह भला हमारे राजमहल में ऐसा कौन वीर है जिसके विषय में हमें कुछ भी ज्ञात नहीं है।



   पता चला कि वह कोई और नहीं, बल्कि यह सब सफाई तो सीता ने स्वयं और बिना किसी सहयोग के संपूर्ण किया है तो जनक जी को आश्चर्य होने लगा कि क्या सीता इतनी वीर और शक्तिशाली कन्या है?अगर यह सत्य है तो उसका विवाह तो किसी ऐसे योद्धा से होना चाहिये जो इस धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा सके।
      अब यह संदेश नगर में फैलता गया और राजा ने देशदेशके राजाओं के यहाँ सीता के स्वयंवर की चिट्ठी (पाती)भेजकर स्वयंवर की शर्तों से सबको अवगत करा दिया। जो कोई शिव के धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा देगा,सीता का उसके साथ विवाह कर दिया जायेगा।यह स्वयंवर का निमंत्रण ऋषियों, मुनियों को भी ससम्मान बुलाने के लिए  गया था तो विश्वामित्र जी जब जनकपुर जाने लगे तो वे राम लक्ष्मण को भी साथ लेते गये।क्योंकि उस समय रामलक्ष्मण उन्हीं के यहाँ रह रहे थे और उनके पूजा पाठ में बाधक बनने वाले शत्रुओं का संहार करने के लिए संकल्प बद्ध थे।अब राम लक्ष्मण दोनों भाई भी सीता का स्वयंवर देखने जनकपुर पधार ही रहे थे।तो मार्ग में उन्हें अहिल्या के आश्रम भी दिखाते हुए जा रहे थे तो पाषाण मूर्ति को आश्रम के बाहर देखकर रामजी ने वशिष्ठ जी महाराज से पूछा मुनि श्रेष्ठ !ये क्या है और इसके पीछे भी कोई कहानी है क्या?
 विश्वामित्र जी रास्ते में जो कुछ भी दिखता उसके बारे में विस्तार से बताया करते थे।राम के पूछने पर मुनि श्रेष्ठ ने अहिल्या के एक स्त्री से पाषाण में बदलने की पूरी वृत्तांत कह डाला।और यह भी कहा कि राम अब वह समय आ गया है।इसलिए तुम बिना समय गँवाये इनका उद्धार कर दो। राम के पैरों की चरणधूलि का स्पर्श मिलते ही  नारी पति के शापों से मुक्त हो गई और राम को प्रणाम करते हुए स्वगर्लोक चली गईं।
          जनकपुर पहुँचने पर महाराज जनक ने विश्वामित्र जी स्वागत करने के उपरांत साथ में आये दोनों सुकुमारों का भी परिचय जाना ।
राम और लक्ष्मण जनकपुर पहुंच कर नगर में भी घूमते फिरते पूरा स्वयंवर और वहाँ की सजावट देखते हुए विश्वामित्र जी के संध्या करने के लिए फूलों की व्यवस्था में लगे थे।उसी फुलवारी में सीताजी भी अपनी सखियों के साथ फूल चुनकर माँ गौरी के पूजन करने के लिए जा रही थीं।दोनों लोगों की नजरें मिलती हैं तो एकटक दोनों एक दूसरे को निहारते रह जाते हैं।बहुत ही मनोरम और अद्भुत दृष्य होता है।जब गौरी पूजन कर सीता जी माँ गौरी को शीश झुकाते हुए नमन करती हैं तो मां के गले का हार सीताजी के गले में आ गिरता है और इसे सीताजी माँँ का आशीर्वाद मिल जाना जानते हुए अति प्रसन्न होती हैं।


   नगर की महिलाएं, सीता की सखियाँ यहाँ वहाँ आपस में चर्चा करने लगती हैं कि सीता के लिए यही यही जोड़ी अच्छी रहेगी। ये जो दोनों राजकुमार मुनि के साथ पधारे हैं सीता के लिए उत्तम वर हो सकते हैं। कोई कहता कि राजा ने तो झूठ में ही अपनी जग हंसाई करवा रहे हैं।इतने सुन्दर वर इनके सामने उपस्थित होते हुए भी यह धनुष बाण का खेल खेल रहे हैं।यानी जितने मुँह उतनी बातें




 हो रही थीं दरबार में।रानी सुनयना के भी मन में यह बात उठ रही थी कि राजा को अपने प्रण तोड़कर सीधे राम के साथ सीता का विवाह कर देना चाहिए।
       जब स्वयंवर शुरू हुआ तो एक बार फिर से स्वयंवर की शर्त से लोगों को अवगत कराते हुए सबको बारीबारी से अपने जोर आजमाइश की घोषणा कर दिया गया।एक एक राजा अपने आसन से उठकर धनुष को  उठाने लगे।लेकिन किसी से भी वह धनुष हिला तक नहीं। यह देखकर राजा जनक का धैर्य भी टूटने लगा था कि क्या होगा, अब तो कोई वीर इसधरती पर दिखाई ही नहीं दे रहा है तो क्या सीता कुँवारी ही रहेगी। राजा जनक मन में ऐसा विचार कर ही रहे थे कि एक साथ कई राजा मिलकर धनुष उठाने के लिए धनुष की ओर लपके।जनकजी अपने सिंहासन से उठ खड़े हुए और दहाड़ते हुए बोले , " रुक जाओ।बस, बहुत हो गया।अब और परिहास सहा नहीं जाता।लगता है कि यह धरती वीरों से खाली हो चुकी है।अगर मुझे पहले से ज्ञात होता तो यह जगहँसाई नहीं करता।बस इतना सुनते ही राम के पास बैठे हुए लक्ष्मण जी तमतमा कर खड़े हो गये।उन्होंने जनकजी की ओर देखकर बोले कि जिस सभा में मेरे भ्राता राम उपस्थित हों ,वहां कोई ऐसी बात बोले यह असहनीय है।आपने यह कैसे मानलिया कि यह धरती वीरों से खाली है।
तब जनकजी ने लक्ष्मण को समझाते हुए कहा कि मेरा उद्देश्य किसी को अपमानित करने का नहीं है।आप मेरी पीड़ा को समझ सकते हैं लेकिन मैं हाथ जोड़कर विनती करता हूँ कि यदि मेरे शब्दों से किसी को दुख हुआ हो तो कृपया मुझे माफ कर दें।ऋषि विश्वामित्र जी ने इशारे से लक्ष्मण को बैठ जाने को कहा और राम की ओर इशारा करते हुए आदेश दिया कि जाओ राम,अब तुम्हारी बारी।
            
              श्री राम चंद्र भगवान की जय

राम उठ खड़े हुए।पहले गुरु को प्रणाम किया।फिर वहां उपस्थित सभी राजाओं को प्रणाम किया और धनुष को शिव जी का प्रतीक मानते हुए उसे भी मन ही मन प्रणाम करके उसे एकदम से उठा लिया और जैसे ही उसकी डोर को धनुष में लगानी चाही तो वह धनुष ही टूट गया। सारे नगर वासी आनंदित हो गये।चारोओर श्री राम की जयजयकार होने लगी। 
       धनुष टूटते ही इतनी जोर से आवाज हुई कि वहाँ से दूर महेन्द्र गिरि पर तपस्या कर रहे भगवान परशुराम जी का ध्यान भंग हो गया और वे बिना समय गंवाए जनकजी के दरबार में धनुष यज्ञ  में धमके।आते ही क्रोध में आँखें लाल किये हुए सभी राजाओं को अपना फरसा दिखाकर भयभीत कर दिया।बारी बारी से सभी राजा अपना परिचय दिये जा रहे थे।राम लक्ष्मण की ओर इशारा करते हुए गुस्से में बोले कि तुमने अपना परिचय नहीं दिया।क्या तुम मेरे क्रोध से परिचित नहीं हो उद्दंड बालक! 
      राम और लक्ष्मण ने भी अपना परिचय बताया।लेकिन अपने क्रोध के कारण वे उन्हें पहचान नहीं पा रहे थे।राम ने मुस्कुराते हुए कहा भी कि आप तो मुझे पहचानते होंगे यही सोचकर मैंने अपना परिचय देना उचित नहीं समझा ।कुछ देर लक्ष्मण और राम के साथ परशुराम जी का संवाद चला फिर जब उनका गुस्सा शांत हो गया तो वे लौट कर फिर वापस चले गए।
  राम के गले में सीताजी ने और सीताजी के गले में श्री राम ने जयमाला पहना दिया।तब विश्वामित्र जी ने राजा जनक जी को आदेश दिया कि अयोध्या में राम के विवाह की संदेश भेजकर वहां सूचना दी जाय ताकि वे अपने पुत्र के विवाह में उपस्थित होने के लिए अयोध्या से बारात लेकर आने की तैयारी करें।
जनकपुर से अयोध्या दूत भेजदिया गया और जैसे ही ही सूचना महल में रानियों को मिली मानो उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा।बरात चलने की तैयारी होने लगी।राजा रानी सभी खुशी से दान लुटाये जा रहे, लुटाये जा रहे।हाथी, घोड़े, रथ और पैदल  जैसे भी हो सकता था अयोध्या से जनकपुर के लिए बहुत भारी संख्या में बाराती चल दिये।रास्ते में बारातियों, उनके हाथी, घोड़ों, सबके खाने का व्यापक प्रबंध किया गया था।जब बारात जनकपुर पहुंच गई तो राजा जनक ने उनका खूब स्वागत सत्कार किया।और राम एवं सीता के विवाह के साथ ही राम के बाकी शेष तीनों भाइयों का भी उसी साथ उसी मंडप में जनक जी ने अपने भतीजियों के साथ कर दिया।महीनों तक बारात जनवासा रह गई।जब राजा दशरथ विदा माँगते जनकजी किसी न किसी बहाने रोक लेते।तब कहीं जाकर राजा जनक जी बेटियों की विदाई किया।

मंगलवार, 19 सितंबर 2023

रूठा न कर ऐ जिंदगी

 रूठा न कर ऐ जिंदगी




रूठा न कर ऐ जिंदगी, मै तो खुद मजबूर हूँ
बचपन रूठकर चला गया, यौवन से भी दूर हूँ

कदम कदम पर ठोकरें चीर देती हैं हौसले
क्या करूँ अब तूँ ही बता, पा सकूँ फिर मंजिलें

ऐ मेरे भगवन बता, क्यों खफा मुझसे है तूँ
क्या गुनाह मैंने किया जिसकी सजा देता है तूँ
पैदा किया दुनियां में तूने, जब हर किसी इंसान को
फिर ये मजहब क्यों बनाया वो कहे अल्ला मैं कहूँ भगवान है तूँ

आज इस जमाने में गरीब होना भी पाप है
दौलत है पास जिसके, कत्ल भी माफ है

यहां की छोड़ो सुना है, स्वर्ग में भीलक्ष्मी का वास है
पास पैसा नहीं अगर हो तो जिंदगी दुशवार है

करके बड़ा परिश्रम रोटी नसीब नहीं होती
रातभर तड़पती जान सारी दुनियां जब सोती

किस्मत में जो लिख गया हरगिज मिटा सकते नहीं
अफसोस क्यों रे मालचन्द, तेरा कुछ बिगड़ सकता नहीं

बनाना और बनाकर बिगाड़ देना
सब उसके हाथ है
चलता है खोटा सिक्का भी तबतक
जबतक किस्मत साथ है

मेरे चाहने न चाहने से जबतक तेरी मर्जी न हो
कौन भला पहचानता हैजबतक तेरी मर्जी न हो





सोमवार, 18 सितंबर 2023

कबतक इंसाफ मिलेगा?

               कब तक इंसाफ मिलेगा?

 

आज दिन ब दिन बढ़ते जा रहे अपराध को देखकर ऐसा लगता है कि यह सिलसिला शायद ही कभी रुके।यूपी, राजस्थान, मणिपुर, पश्चिम बंगाल, बिहार, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र किस किस राज्य के नाम गिनायें ,जहाँ अपराध ना होते हैं।कहीं किसी आदिवासी समाज के यूवक पर हिंदू समाज का ब्राह्मण वहभी ब्राह्मण महासभा का पदाधिकारी आदिवासी युवक के चेहरे पर पेशाब करते हुए वीडियो सामने आया था।तो हल्की फुल्की कार्वाई या खानापूर्ति की जाती है।गिरफ्तारी के बाद जमानत।वह ब्राह्मण कैसा जो मदिरा और मांस भक्षण करता है।लेकिन फिर भी वह आदिवासी युवक ने उसे माफ कर दिया।कितना महान था लेकिन सरकार ने उसके इस महान हृदय सम्राट को कोई सम्मान नहीं दे सकी।शायद वह गरीब था इसलिए।
मणिपुर की घटना भी सभी लोग अखबार में पढ़े होंगे।टी.वी. पर मोबाइल पर देखे होंगे।महिलाओं को नंगी करके सरेआम घुमाया जा रहा था।वहाँ के लोगों का जमीर यदि जिंदा होता तो शायद ऐसा नहीं होता।लेकिन विरोध तो गरीब सहते हैं।अमीरों का विरोध तो सरकार भी नहीं करते।समाज के लोग खड़े होकर उन नंगी महिलाओं के जिश्म को निहारते रहे।कुछ लोग शर्मा रहे थे तो हटालिया नजर खुद की।पर शायद उन जालिम वहशी दरिंदों का विरोध करने की स्थिति में कोई नहीं था।अगर रहता तो जरूर विरोध किया गया होता।लेकिन वे मनबड़ रहे हों और उनके आगे सभी कमजोर दिख रहे थे।फिर दूसरों के लिए अपनी जान जोखिम में सभी लोग डाल तो सकते नहीं।

राजस्थान में भी ऐसी ही घटना घटित होती है।यहाँ भी राजनीति के पुरोधा हो हल्ला मचा हंगामा किया।जो कि नेताओं की एक सीधी चाल होती है।अपनी राजनीति चमकाने के लिए वे मौका तलाश करने में निपुण होते हैं।हमारे राजनेताओं की गहरी साजिश रहती है कि किसी मामले में खबरों को मसालेदार बना कर दिखाया जाय।

कुछ अपराध तो नेताओं के द्वारा भी कराया जाता है।अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए।ऐसा हर राज्य में होता है।हर पार्टियां करती हैं।अंतर बस केवल इतना होता है कि जो जहाँ सत्ता में बैठे हुए होते हैं, वो दल वहाँ चुप रहते हैं।बाकी सभी चिल्ला रहे होते हैं।

यूपी में थोड़ा स्थिति कुछ कुछ अन्य राज्यों की तुलना में ठीक दिखाई दे रही थी लेकिन पूरी तरह से अपराध मुक्त समाज कोई सरकार नहीं दे सकती हैं।

अभी हालही में रक्षाबंधन के पावन त्योहार पर एक महिला पुलिसकर्मी अपनी ड्यूटी से वापस लौटते समय ट्रेन की बोगी में सवार होकर जा रही थी और उसकी खून से लथपथ वर्दी में घायलावस्था में बेहोश पड़ी मिलती है।घटना अयोध्या की है।देश के गृहमंत्री मंच से चिल्ला रहे होते हैं कि यूपी में अब कोई महिला रात के बारह बजे भी अगर अकेले निकलती है तो उसे पिकेट ड्यूटी वाले घर तक सुरक्षित पहुँचाते हैं।और उसी रात एक महिला पुलिसकर्मी के साथ ही ऐसा वाकिया हो जाता है और किसी ने देखा तक नहीं। जिस ट्रेन में भूसे की तरह यात्री भरे होते हैं और उसी ट्रेन में किसी के ऊपर इतना बड़ा हमला किया जाता है और किसी को कुछ दिखाई नहीं दिया।यह भी कोई मामूली घटना नहीं थी और अभी तक(लिखे जाने तक)वह कुछ भी बता पाने में सक्षम नहीं थी और जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रही है।
अभी हाल ही में बनारस से एक खबर निकल कर आयी ।कोई लड़का एक लड़की को पिछले एक साल से परेशान किये जा रहा था।लड़की के पिता ने दोबार उन्हें समझाने का प्रयास भी किया था और नहीं मानने पर पुलिस को सूचना दी थी लेकिन पुलिस ने कोई कार्यवाही नहीं किया।बार बार तंग करने की उस मनचले की कोशिशें जारी रहती हैं।अब आरोपी मोबाइल पर धमकी भी देने लगे थे लेकिन फिर भी पुलिस विभाग शायद इस इंतज़ार में बैठा रहा कि जबतक लड़की या उसके परिवार के साथ कुछ हो नहीं जाता, तबतक वह सोती रही।और एक दिन इस लड़की ने परेशान होकर खुद के गले में फंदा लगाकर आत्महत्या कर लेती है।मौत को गले लगाने के बाद उस लक्सा थाने के थानाध्यक्ष की नींद खुलती है।आननफानन में उस शोकाकुल परिवार के घर पहुँचती है।लोगों के बयान लेती है और लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी जाती है।
इधर विगत शुक्रवार की दोपहरमें दिनांक 15सितंबर 2023 की हृदय विदारक घटना सामने आ गई। हुआ कुछ यूं कि हसवर थाना क्षेत्र जनपद अंबेडकर नगर के एक विद्यालय से छुट्टी होने के बाद एक सोलह साल की बच्ची जैसे ही सड़क पर साइकिल से पहुँचती है।दो मनचले मुस्लिम समुदाय के लड़कों ने उसका दुपट्टा खींच दिया और वह उनसे बचने के लिए साइकिल दूसरे ओर मोड़ने के प्रयास में अनियंत्रित होकर सड़क पर गिर जाती है और पीछे से आ रही दूसरी मोटर साइकिल उसे रौंद देती है और लड़की वहीं दम तोड़ देती है।पता चलता है कि स्कूल के आसपास कुछ आवारा लड़के घूमते रहते हैं और छूट्टी होते ही लड़कियों पर फब्तियां कसते हैं।स्कूल प्रशासन भी कभी कोई शिकायत नहीं किया।

    पुलिस पहुचती है और इसे मात्र सड़क दुर्घटना बता कर मामले को दबाना चाहती है लेकिन तभी किसी के यहाँ लगा सीसीटीवी फुटेज में लड़की का दुपट्टा खींचते हुए वीडियो दिखाई दे जाता है और फिर जनता आक्रोशित हो जाती है।मामला गर्माजाता है।फिर से आननफानन में पुलिस हरकत में आती है।उन शोहदों को गिरफ्तार किया जाता हैलेकिन वहां से भागने की कोशिशें करते हैं जिसे पुलिस ने उनके पैरों में गोली मारकर घायल कर पुनः पकड़ लिया।
बात अब यह है कि खासकर यूपी में जिस तरह से गुंडे माफियाओं के घर पर बुलडोजर चलाया जाता है, उनके इनकाउंटर कियेजा रहे हैं फिर भी उनके हौसले बुलंद क्यों हैं?तो जाहिर सी बात है कि कहीं न कहीं कुछ भेदभाव या मामलों में कुछ गड़बड़ी जरूर है।या तो बदमाशों को उनके जातिबिरादरी देखकर या उनकी पहुंच कहाँ पर कितनी मजबूत है या कहीं वह सत्ता पक्ष के बड़े रसूखदारों तक उनकी पहुंच तो नहीं?ऐसी ही कुछ खास वजहों के कारण एनकाउन्टर या बुलडोजर का कोई खास डर नहीं लगता है।और अपराध उसी तरह बढ़ते जा रहे हैं।

अपराध न रुकने और अपराधियों के हौसला बुलंद कर निडरता पूर्वक किसी भी घटना को अंजाम देने में पुलिस की भी सहभागिता उतनी ही होती है जितनी कानून के वकालत करने वाले वकीलों की होती है।दबी जुबान से ही सही लेकिन यह सच्चाई किसी से छुपी नहीं है।



      अपराधी अपराध करते हैं तो पुलिस पकड़ती है।मुकदमा होता है और वकील साहब बड़ी आसानी से उसका बेल ले लेते हैं।अपराधी बाहर आकर पुनःअपने उसी धंधे में लग जाते हैं जो उनका पेशा होता है।बारबार अंदर बाहर आना जाना लगा रहता है।थाने की पुलिस हो जेल के कर्मचारी सबकी इनसे मेल जोल हो जाती है तो अपराध अपने आप चलते रहते हैं।वकीलों की पैरवी करने का तरीका जजों की कलम को जजमेंट करने से रोक देता है और मुजरिम जमानत पर बाहर आ जाता है।
जब अपराधी नहीं होंगे तो अपराध नहीं होंगे, अपराध नहीं होगा तो पुलिस किसको पकड़कर थाने में लायेगी।जब कोई अपराध नहीं होगा तो वकीलों को कोई केस नहीं मिलेगा।जब उनके पास कोई मुकदमा ही नहीं रहेगा तो वे किसका केस लड़ेंगे।उन्हें फीस कौन देगा।जब उन्हें कोई  फीस नहीं मिलेगी तो उनका खर्च कहाँ से चलेगा।और वकालत एक जमा जमाया भारी लाभ देनेवाला विजनेस है तो भला चाहेगा कि देश अपराध मुक्त बने। यह तो सरकार अपनी पीठ थपथपाने के लिए अपराध मुक्त देश बनाने का एक जुमला बोलती है और जनता उसे सच समझ लेती है।कचहरियों में जाइये तो आप देखेंगे कि यहां तो चालीस चालीस साठसाठ सालों से, दोदो ,तीनतीन पीढ़ियों से भी अधिक समय से लोगों के मुकदमे पेंडिंग में सिर्फ तारीख देकर सरकाया जाता रहा है।कैसे न्याय मिलेगा?आजतक क्या कभी नेता ने इसपर चुनाव जीतने के बाद सदन में चर्चा करी।क्यों करेंगे।हमतो खुद ऐसे ही लोगों को चुनाव करके सदन में भेजते रहते हैं जो हमारा नहीं, हमारे देश का नहीं बल्कि अपने विकास के लिए मैदान में आते हैं।
    पुलिस वाले भी अपराध को बढ़ावा देने में काफी हद तक अपनी भूमिका निभा लेते हैं।अब हर अपराध को ये दबाना चाहते हैं।पुलिस चाहती ही नहीं कि उसके थाने में कोई मुकदमा दायर हो।इसलिए वे पैसे लेकर मुकदमा को ही खत्म करने पर ज्यादा जोर देते हैं।अब अगर सुलह कराते हैं तो दोनों पक्षों से मोटी रकम ऐंठते हैं।जो लोग नहीं मानते हैं और अपराधी को सजा दिलाने की जोर आजमाइश करते हैं तो पुलिस उनके केस को या तो हल्के में लिखकर अपनी छुट्टी कर लेती है या उसे भी फँसा देती है या अगर आरोपी पार्टी अधिक मजबूत हो तो उसके खिलाफ कोई केस ही नहीं लिखना चाहता है और अपराध नहीं थमता।बस ऐसे ही कुछ खास खास कारण होते हैं जिसके कारण बदमाशों के हौसले पस्त नहीं होते।
       सरकार और सरकार में बैठे हुए हमारे सांसद, विधायक, मंत्री अगर सदन में चर्चा करते, सवाल पूछें कि किसी भी हालत में एक साल के भीतर ही न्याय देने की व्यवस्था होनी चाहिये तो ऐसा कानून बनाया जाय जिससे देश में कानून व्यवस्था मजबूत और सुदृढ़ हो सकती है और अपराध के बढ़ते हुए ग्राफ को रोका जा सकता है।
 वैसे इसमें आपकी क्या राय है, आप कमेंट करके लिख सकते हैं।

शुक्रवार, 15 सितंबर 2023

बलि का बकरा

 कविता  :-     🐐 बलि का बकरा 🐐



क्या कुसूर है मेरा,

क्या कुसूर है मेरा
मेरे मालिक मुझे बता दो।
हो भूल खता गर कोई,
मत इतनी बड़ी सजा दो।।




अबतक था मैं, प्रिय तुम्हारा,
जैसे हो जन्मों जन्मों का नाता।
क्या इसी दिन की खातिर
मुझको बेटों के जैसे था पाला।।



चंद रूपयों की खातिर ही,
मेरे प्राणों का सौदा करते हो।
क्या ऐसा करने से पहले
तुम ईश्वर से नहीं डरते हो?



विश्वास किया था मैंने तुझपर
ना समझ सका,तेरे झूठे प्यार को।
चलवा दिया आज,छूरी गर्दन पर
अब खाओगे  तुम मेरे माँस  को।।



बड़े क्रूर हो,नासमझ हो,
कब समझोगे अपने आप को?
कर दिये दगा विश्वास संग मेरे
क्या लौटा सकते हो, मेरे प्राण को?



गर तेरे जैसा मैं भी होता,
तेरे झाँसे में मैं ना आता।
हमनें समझा दयावान तुझे
शैतान ही पहले समझा होता।।



मैं तो हूँ, एक बलि का बकरा,
भला कबतक खैर मनाऊंगा।
एक ना एक दिन, मरना ही है
यूँ कबतक जश्न मनाऊंगा।।



पर तुम भी मत भूलो,ऐ इंसानों
ईश्वर के घर अंधेर नहीं।
आना जाना तो लगा रहेगा
कबतक चलेगा यूँ खेल यही।।



सोच लिया मेरी किस्मत में
ऐसा ही कुछ लिक्खा था।
वह दम कहाँ इंसानों में मालचन्द
मरना तो एक दिन पक्का था।।
 
है सोच तेरी बहत गंदी
तूँ छलकपट से है भरा
तेरा प्रेम दिखावा है बस
तू पैसों पर बिकता है।


तू लेकर पैसा सौदा करता है
मेरी जान से प्यारा तुझे पैसा है
इंसान नहीं हैवान है तूँ
आज मैंने तुझे पहचान लिया।।

           --   मालचन्द कन्नौजिया  बेपनाह


आप अपने विचारों से हमें अवगत कराते रहें।
हमारी इस कविता पर आपकी क्या राय है, हमसे हमारे इमेल पर बता सकते हैं।धन्यवाद।।

 

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बुधवार, 13 सितंबर 2023

जिसे अपना समझा

 जिसे अपना समझा था

जिसे अपना समझा था अपने भुलाकर
दुनिया भुला दी मैंने सबकुछ लुटाकर
वही आज मुझको ठुकरा गई है
मेरे दिल पर गहरा जखम दे गई है।।

जिसके सपनों में अक्सर मैं आता रहा
जिसकी साँसों में हरदम समाया रहा
उसकी नगरी में आकर मैं पछता रहा हूँ
फेर ली निगाहें उसने, पलट कर ना देखा
अब किस तरह दिल को अपने समझाऊँ
राहें बिछुड़ गईं,अब कहाँ जाऊँ
मंजिलें भी अब मुझसे यही कह रही हैं
ये दुनियां नहीं तेरे काबिल बची हैं।
जीना सकूंगा मैं तो जीवन से हारा
माझी भी छोड़ गया मिला किनारा
डूबती नइया का नहीं है सहारा
चाहा था जिसको वही जब नहीं है
मेरे खातिर दुनियां कुछ भी नहीं है

अगर जानता मैं कि तूँ बेवफा है
निगाहों में तेरी जादू भरा है
होठों पे तेरे जो मुस्कान रहती है
उसमें भी नागिन का ज़हर भरा है
ना दिल को लगाता न ये

अंजाम होता

टूटा हुआ ये दिल मेरा किसी काम का नहीं है

मंगलवार, 12 सितंबर 2023

भारत की करेंसी /रुपये का मूल्य इतना गिरता क्यों चला गया




 भारत की करेंसी /रुपये का मूल्य इतना गिरते क्यों जा रहा है?

                मित्रों, क्या आपने कभी सोचा है कि हमारे देश की नोट दुनियां में इतनी जल्दी जल्दी अपने मूल्यों को कैसे कमजोर करने से रोक पाने में असमर्थता जता रही है।आज भारत चाहे जितना अपना बखान कर ले,सब झूठा साबित हो रहा है।अब इसके लिए कोई अर्थशास्त्री चाहे कुछ भी घोषणा कर दे।इस कारण से ऐसा होता है या उस कारण से।बस सुनते जाइये।ये अर्थशास्त्री भी देश की जनता को खूब गुमराह करते हैं और खासकर हमारे देश में जहाँ सिर्फ सभी नेता, सभी राजनीतिक पार्टियाँ स्वांतः सुखाय वाली राजनीति कर रही हैं।
         
        अब हम आपको कुछ राजनीति के धुरंधरों के बारे में बताते चलें कि किस तरह से ये विभिन्न दल सिर्फ एक पार्टी विशेष को सत्ता से बाहर करने के लिए किस तरह से अपने उसूलों के साथ समझौता करने को मजबूर हो जाती हैं।उनका सिर्फ एक ही उद्देश्य रह गया कि वर्तमान में सत्ता रूढ़ पार्टी को कैसे पदमुक्त करके सत्ता को छीनी जा सके।लेकिन जब उसे हटालिया जाता है तो नया प्रधानमंत्री कौनसा व्यक्ति होगा, इस सभी लोग एक जुट  नहीं हैं। सब मिलकर अपनी सल्तनत कायम करनेवाले दिखाई दे रहे हैं।अब जनता उसे कैसे लेती है, यह जनता को निश्चित करना है। भाजपा की नीति को भी बहुत अच्छा नहीं कह सकते हैं।बस इतना जरूर हुआ है कि इसने भारत की विदेशनीति को सुदृढ़ बनाया है।भारत का खोया हुआ सम्मान जरूर वापस दिलाने में कामयाबी हासिल किया है।लेकिन सोलह आने यह पार्टी भी कुशल प्रशासक सिद्ध नहीं हो सकी।यहाँ भी लोग अन्य दलों से निकल कर आते गये और ये लोग खुद को मजबूत करने के लिहाज से सबको अपने साथ जोड़ते गये।दूसरे दलों को तोड़कर अपनी पकड़ मजबूत करने वाले यह भूल गए हैं कि जिस दिन ये सत्ता में नहीं होंगे ,ये दलबदलू नेता पुनः उनके साथ जा मिलेंगे जो सत्ता में बैठे होंगे।ऐसे ही मौकापरस्त लोगों की वजह से आज पार्टी की छवि खराब हो रही है।
भाजपा सत्ता में आने के लिए देश की जनता से बहुत बड़ा झूठ बोला था।कहा था कि जब भाजपा केन्द्र में शासन सम्हालने लगी तो विदेश में जमा सभी काले धन को वह भारत लाकर रहेगी।जनता ने विश्वास किया और भारी बहुमत से जिताकर  सरकार बना दिया।लेकिन सत्ता में आते ही सरकार ने जनता को किये अपने सारे वादे भूल गई।कालाधन वापस लाना तो दूर ,उसने आजतक यह नहीं पता लगापायी किसके किसके पैसा कितने करोड़ रुपये विदेश में जमा है।जब आज दस साल में उसने कोई आंकड़ा ही नहीं दिया तो कालाधन भला कैसे ला सकती है।
    हाँ इस सरकार ने इतना जरूर किया कि गरीब जनता ने अपने मेहनत की जो कमाई अपने बच्चों के शादीव्याह के लिए, भविष्य के लिए ,घरद्वार बनवाने के लिए अपने पेट काटकर बचाया था और उसे सहारा जैसी रीयल स्टेट या चिटफंड कंपनियों के पास भारत में ही जमा किया था, उसी पर रोक लगाने में सफल हो गई।करोड़ों परिवार के साथ इतना बड़ा छलावा इस सरकार ने कर दिया।फिर भी जनता कहती है कि अभी भी वे मोदीजी को ही प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं लेकिन मोदीजी बस आप उनके पैसों को लौटा दीजिए।जो दोषी कम्पनी के मालिक हैं और जो लोग नियम तोड़कर देश को ठग रहे थे उन्हें सजा देते।लेकिन वे ठहरे अमीर लोग, इसलिए सरकार उनके ऊपर मेहरवान है और उसका सीधा जनता के साथ धोखा किया जा रहा है।
       जहाँ तक मेरा मानना है कि जो लोग इसे पढ़ रहे हों, हो सकता है कि उनमें से कोई आपभी हो सकते हैं जिनका पैसा सहारा के पास निवेश किया गया रहा हो।या आपके परिवार के ही किसी सदस्य ने जमा किया हो,लेकिन आजतक भुगतान नहीं मिला हो। यह बात सदन में हमारे जनप्रतिनिधियों को उठाना चाहिए था लेकिन कभी किसी ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया।
 




    आज देश को स्वतंत्र हुए पूरे छिहत्तर साल बीत जाने के बाद भी यहां की अर्थ व्यवस्था नहीं सुधरी।उसका कारण परोक्ष रूप से यहाँ की जनता खुद है।सभी राजनेता अपने जीवन को सार्थक और सुखमय बनाने के लिए भारत की राजनीति में उतरते हैं।जनता के बीच जाकर सत्ता पक्ष को खूब भला बुरा कहते हैं।उसके ऊपर ढेरों ठगी, बेइमानी भ्रष्टाचार आदि का दोषारोपण करते हैं और जनता मुर्खों की भाँति उनके बहकावे में आकर उनकी प्रशंसा गली,गांव, चट्टी,चौराहों पर खड़े होकर खूब बतियाते हैं।सब अपने अपने नेताओं की, अपने दलों की खूब प्रशंसा करते हुए अपने आप को तीसमार खाँ समझने लगते हैं। अब यहां पर हमारे कहने का तात्पर्य यह है कि जो नेता अपनी पार्टीसार्टी खड़ी किये हैं और वे जनता के सामने सफेद झूठ बोल रहे हैं तो उस झूठ से उनके दल को लाभ मिल रहा है।अपनी पार्टी को जिताने के लिए कुछ झूठ बोलते हैं, यहभी समझ में आता है।जो नेता चुनाव लड़ रहे होते हैं और जनता के बीच झूठ बोल बोलकर अपना प्रचार प्रसार करने में लगे हैं, येबात भी समझ में आती है।अगर कोई बात समझ में नहीं आती है तो वह यह कि हम सब लोग किसी भी नेता के प्रचार में खड़े होजाते हैं और अपने उन तमाम हितमित रिश्तेदार आदि को भ्रमित करने वाले बयान देने लगते हैं।देश को पीछे करने मे सभी आम मतदाता का विशेष महत्व है।और ये आम मतदाता ही देश की अर्थ व्यवस्था को खराब करने के पूरे जिम्मेदार हैं।
           अब सबसे पहले मैं आपको यह बताने की कोशिश करता हूँ कि पहले तो आप ये समझ लीजिये कि मैं भी एक आम आदमी ही हूँ।मुझे किसी दल में कोई दिलचस्पी नहीं है।मैं कोई अर्थ शास्त्री भी नहीं हूँ, जो इतना बड़ा ज्ञान बाँट सकूँ।लेकिन दिमाग में एक बात तो जरूर गूँजती है कि हमारे देश के वे क्रांतिकारी वीर सपूतों ने भारत को आजादी दिलाने की इतनी सारी यातनाओं को क्यों झेलते गये।उन्हें अपने घरपरिवार की चिंता क्यों नहीं हुई।जो उन लोगों ने लाठियां खायीं, गोलियां खायीं या फिर फाँसी पर झूल गये।माँ,बाप,भाई,बहनों के आँसू उन्हें विचलित नहीं कर सके।क्योंकि उनके अंदर एक जुनून था कि हमें मौत मंजूर है लेकिन हमें गोरों की गुलामी कभी स्वीकार नहीं है।बस यही उनका जुनून उन्हें आजादी की जंग में खींच ले रहा था।आज उनकी कुर्बानी हमें विचलित कर देती है लेकिन हम उनकी सहादत को सिर्फ दिखाने के लिए याद करते हैं।
                               गोरे इस देश को लूटते रहे।क्योंकि ये भारत उनका अपना देश तो था नहीं।मुगलों और तुर्कों ने भारत को लूटा ,ये भी बात समझ में आती है।लेकिन जब देश स्वतंत्र हो गया तो फिर कौन देश को लूट रहा है?क्या कभी किसी ने इसपर गौर किया? भारत को आजादी दिलाने वाले तो यह देश छोड़कर एक अज्ञात दुनियां में चले गए और तभी से इस देश को यहाँ के लूटरे सफेद पोशाकों में बारी बारी से लूटने लगे ।चुनाव की व्यवस्था की गई कि हर पाँच साल में जनता के पास विकल्प होगा सरकार बदलने की।जो अच्छा करेगा, ठीक से देश चलायेगा, जनता का खयाल रखेगा, उनके शिक्षा, रोजगार ,दवा इलाज के साथ देश को प्रगति के मार्ग पर ले जायेगा,जनता उसके हाथ में देश की बागडोर सौंपने का कार्य करेगी।अगर जनता को ऐसा लगता है कि इनसे देश की अर्थव्यवस्था सम्हालने में यहां की आर्थिक स्थिति कमजोर हो रही है तो शासक बदल देना चाहिए।व्यवस्था तो अच्छी लगती है लेकिन ये क्या?सत्ता के लोभियों ने जनता को गुमराह करने का ऐसा तरीका निकल लिया कि एक बार सत्ता हाथ में आ जाये तो उससे कुर्सी खाली कराना बहुत मुश्किल काम होगा।

           शामदाम दंडभेद सब चलने लग गया।और सन 1947 से आजतक सिर्फ सत्ता से खेल ही हुआ है।चाहे जिसकी सरकार बनी, चाहे जब बनी है, चाहे कोई कितने दिन भी सत्ता में रहा हो,सबने देश को लूटने के सिवा किया कुछ नहीं।मैं अभी आगे इस बात को बताऊंगा कि मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ।मैं बहुत कम पढ़ा लिखा इंसान हूँ और मेरी उतनी समझ भी नहीं है,ना लालच है।इसलिए लिख रहा हूँ।ये राजनीति न लोगों को लुभाने के लिए बनी है।राजनीति में उतरने के लिए न तो राजनीति शास्त्र की पढ़ाई जरूरी है और न कोई डिग्री या डिप्लोमा चाहिए।बस जनता के बीच खड़े होकर लम्बी लम्बी, झूठी कहानी सुनाने के गुण विद्यमान होने चाहिए।किसी पर आरोप लगाना हो तो ऐसे लगा सकें कि वह सरासर झूठ होकर भी सत्य लगे। दो पक्षों को लड़ाकर एक पक्ष के बचाव में थाना पुलिस को सम्हाल सके।जहाँ बैठ जाये वहीं पर लोग उनके चायपानी की व्यवस्था कर दें।अगर कोई भी साधारण सा आदमी इतने में से थोड़ा गुण जानता हो, तो उसे बड़ा नेता बनने से कोई रोक नहीं सकता।अब ऐसे लोग जब पार्टी बना सकते हैं तो देश को कैसे चलायेंगे।सीधेपन से सरकार नहीं चलती है।तिकड़म से सरकार चलानी पड़ती है।एक चपरासी के लिए भी कोई न कोई डिग्री हासिल करना पड़ता है।क्लर्क बनने के लिए डिग्री चाहिए।जिला और तहसील चलाने के लिए डिग्री चाहिए।लेकिन देश चलाने के लिए, प्रदेश चलाने के लिए या किसी क्षेत्र का बिधायक और सांसद बनने के लिए कोई डिग्री या डिप्लोमा नहीं चाहिए।एक अनपढ़,गंवार को भी अगर चुनाव में टिकट और सिम्बल मिल जाता है तो जनता उसे जिताकर विधानसभा और लोकसभा में भेजने का काम कर देती है।उसका मुख्य कारण यह होता है कि वह प्रत्याशी किसी बड़ी पार्टी का होता है, किसी जाति विशेष का होता है और जनता भैंस की भाँति मुँह हिलाते रहती है।बिना सोचे विचारे दो घंटे धूप में खड़ी रहती है और जैसे ही उसकी बारी आती है , अपनी जाति बिरादरी या फिर पार्टी के चुनाव निशान पर वोट डालकर चली आती है और जिसे सबसे अधिक वोट मिला वह विजयी हो गया।अब ऐसे लोग जब सत्ता में हम चुनकर भेजेंगे तो हमारे देश का नुकसान तय है।आज भारत में जितनी भी पार्टियां फलफूल रही हैं, सब निजी जिंदगी को सुदृढ़ बनाने के सिवा किया क्या है।राजनीति में उतरना मतलब अपनी तिजोरी भरना।बस यही मकसद रह गया है सभी राजनीतिक दलों का।


          एक बार सिर्फ चुनाव जीतने की जरूरत है ताउम्र पेंशन का लाभ इन्हें मिलता रहता है।बस यही क्या कम है? बड़ेबड़े नेताओं के राज तब खुलते हैं जब देश में कोई चुनाव आता है।वो सत्ता से बाहर होते हैं तब जाकर इन नेताओं के राज खुलते हैं।तबतक बहुत देर होचुकी होती है।और हमारे देश की कानून व्यवस्था तो मानों सरकार के इशारे पर ही चलती हैं।एक दम से लंगड़ी हो चुकी है।बैशाखी के सहारे ही अदालत में प्रवेश करती हैं।और अगर अपराधी कोई बाहुबली या बहुत पैसे वाला हुआ तो न्याय की गुहार लगाने वाले अदालत की चौखट पर माथा पटकते हुए मर जायेंगे लेकिन उन्हें तारीख से ज्यादा कुछ भी हासिल नहीं होने दिया जायेगा।अब जो लोग कभी किसी लफड़े में फँसे हों तो उन्हें इसका एहसास भी होगा।बाकी लोगों को यह तो सिर्फ बकवास ही लगेगा।आज कुछ लोग रामराज्य लाने की बात कर रहे हैं तो।स्वागत करते हैं ऐसी सोच रखने वाले लोगों का।लेकिन पहले अपनी न्याय व्यवस्था तो बदलिये।एक साल के भीतर न्याय देने और दिलाने की व्यवस्था करिये तो पहले।


        आप रामराज्य की बात करनेवाले कितना जानते हैं उस राम राज्य के बारे में,जिसे आपने स्थापित करने की बात की है।उस राम के राज्य में जब एक दुखियारी स्त्री सभा समाप्त होने के बाद राजदरबार में न्याय माँगने के लिए आती है और द्वारपाल उसे राम से मिलने नहीं देते हैं और उसका परिचय तक नहीं पूछा, उसके दुखी होकर इतनी देर से आने का कारण भी नहीं पूछा था और उसे खाली हाथ वापस लौटा दिया था।जैसे ही अगले दिन राजा रामचंद्रजी को यह पता चला कि दरबार उठने के बाद एक दुखियारी स्त्री न्याय के लिए आयी थी और वह बिना मिले चली गई।तो जानते हैं राम को बहुत चिंता हुई कि आखिर क्या दुख रहा होगा उसका जो वह सुबह तक का इंतजार नहीं कर सकी और रात में ही न्याय माँगने चली आयी।और मैं उसके साथ न्याय नहीं कर सका।मित्रों जानते हैं क्या हुआ?भगवान राम ने अपने लोगों को उसका पता लगाकर उसे ले आने टा आदेश जारी कर दिया।लेकिन वह स्त्री उन्हें नहीं मिली।तब राम खुद भेष बदल बदल कर अपने नगर में घूमघूम कर जनता की बातों को सुनते।थे।ये राम राज की विशेषता होती है।क्या आप ऐसा करने में सक्षम हैं?क्यों किसी केस को इतना जटिल बना दिया जाता है कि उसपर फैसला सुनाने में सदियां गुजर जा रही हैं।है किसी के पास इसका जवाब? 



              जनता जब अपना प्रतिनिधि विधायक, सांसद चुन कर सदन में भेजती है तो उसकी जिम्मेदारी होती है कि वह अपने क्षेत्र की समस्याओं को सदन के सामने रखे।बहुत भारी खर्च आता है जब सदन चलता है लेकिन लोग कभी क्षेत्र की समस्या और उसके समाधान की बात नहीं करते।बल्कि एक दूजे पर आरोप लगाते हैं।सदन छोड़कर भाग जाते हैं लेकिन लेकिन किसी समस्या के पीछे क्या कारण है?उसे दूर कैसे करें? किसी को मुकदमों में फँसाकर, उलझाकर क्यों रखा जाता है? ये तमाम बातें लोग पूछ सकते हैं।देर से मिलने वाले न्याय का औचित्य क्या है।जब घाव मिट गया हो तब मरहम लगाने से क्या लाभ? अगर देश में न्यायाधीश लोगों की कमी है तो उसे और बढ़ाया जाए।ये तमाम चर्चाएं होनी चाहिये लेकिन नहीं होती।भ्रष्टाचार इतना क्यों बढ़ता जा रहा है, इसे रोकने का अबतक कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाया गया।सवाल तो इसपर होना चाहिए ताकि देश आगे बढ़े।लेकिन सदन में चर्चा होती है अपने स्वार्थ की।सभी लोग अपनी जुगत में दल बदलते रहते हैं कि कहाँ जाने से उन्हें मंत्रालय मिल सकता है।लोग पाँचसाल के लिए चुन कर जाते हैं लेकिन साल दो साल में  सीटें छोड़ देते हैं और वहाँ पर पुनः चुनाव करना पड़ता है जिससे काफी धन खर्च हो जाता है और उस उप चुनाव में भी वे पुनः उतर आते हैं तो कोई ये नहीं पूछता कि फिर बीच में आपने सीट क्यों छोड़ी।आपके ही वजह से यहाँ दुबारा चुनाव कराना पड़ रहा है।बल्कि होना तो ये चाहिए कि जो भी नेता किसी सीट से चुनाव जीतने के बाद अगर अधूरे कार्यकाल में ही सीट छोड़ता है तो आजीवन उसे चुनाव लड़ने से बंचित कर दिया जाना चाहिए।और यह काम चुनाव आयोग कर सकता है लेकिन यहाँ तो किसी को भी देश से कोई सरोकार नहीं है।बस अपनी झोली भरती रहे।



                      अब चलते हैं हमारे लिखने का मुख्य मुद्दा जो था उसपर एक नजर डालते हैं। बात आती है कि हमारे देश की करेंसी का वैल्यू/ मूल्य इतना गिरता क्यों जा रहा है।शायद इसपर अभी तक किसी नेता ने अपनी बात नहीं रखा हो।कभी सदन में इसपर खुलकर चर्चा न हुई हो।लेकिन आज हम इसपर चर्चा शुरू करने की कोशिश करते हैं।कितने लोगों की प्रतिक्रिया आती है, यह हमें कमेंट बॉक्स में देखने को मिल सकता है।तो आपको बताना चाहूँगा कि जब हम भारतीय लोग पराधीन थे उस दौर में हमारे देश की मुद्रा इतनी मजबूत थी, इतनी बड़ी थी कि हमारा भारतीय एक रुपया पूरे सत्रह डालर के बराबर होता था।

                  १ ₹ = १७ $      आकड़े १९१७ के 
                    1₹ = 17 $  

     जी हाँ यही सत्य है और आजतक किसी ने इसपर चर्चा नहीं की।

            जब भारत स्वतंत्र भारत बना और भारत को हिंदू और मुसलमान दोनों धर्म के नाम पर बाँटा गया तो भारत पूर्ण रूप से हिंदू राष्ट्र होना चाहिए था।पाकिस्तान से हिन्दुओं को खदेड़ कर भगाया गया लेकिन भारत का हिंदुस्तान मुरौवत दिखाई और यहां रहने वाले मुसलमानों को भारत में रहने की छूट दे दिया और कहा कि जो यहां अपनी मर्जी से रहना चाहते हैं वो रह सकते हैं।और भारी मात्रा में यहाँ मुस्लिम समुदाय के लोग आज भी उतने ही स्वतंत्र खयालों में जी रहे हैं जितने हिंदू।अब यहाँ अगर कुछ राजनीति के पुरोधा अपने स्वार्थ में आकर वैमनस्यता फैला रहे हैं तो यह उनकी बात है।देश ने सबको सम्मान दिया।उनके लिए वक्फ़बोर्ड भी यहां बना दिया जो नहीं चाहिए था।क्योंकि धर्म के नाम पर ही देश का बंटवारा हुआ था तो उन्हें जो चाहिए उसे वे अपने हिस्से के देश पाकिस्तान से लेते।हिन्दुस्तान ने उन्हें रहने के लिए पनाह दिया, वही क्या कम था।लेकिन नहीं फिर भी हिन्दुस्तान ने उनके लिए वो सबकुछ किया जो पाकिस्तान भी अपने नागरिकों के लिए आजतक न कर सका।सवाल यह है भारत को दो हिस्सों में बाँटा ही क्यों गया।जब यहाँ भी मुसलमान हैं और पाकिस्तान में भी कुछ नाम मात्र के हिन्दू  रह गये।यह सवाल खड़ा होता है और हमेशा यह सवाल रहेगा कि जिस देश को सिर्फ धर्म जाति के आधार पर तोड़ा गया हो तो भारत के एक हिस्से में हिंदू और दूसरे हिस्से में मुसलमान होने चाहिए थे।लेकिन दोनों देशों में कम या ज्यादा हिन्दू भी हैं और मुसलमान भी हैं।


 बात साफ है लेकिन कोई इसपर बोलना नहीं चाहता।भारत में दो बड़े राजनयिक परिवार के लोग थे जिन्हें अँग्रेजों की चापलूसी खूब पसंद थी।दोनों  अपने जीवन काल में अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए जाने जाते हैं लेकिन दबी जुबान। कोईखुलकर कभी आरोप लगाने का साहस नहीं कर सकता था।क्योंकि तब उनकी सरकार बन चुकी थी और वे जिसे चाहते फँसा कर कानून के सिकंजे में आजीवन रौंदने का तजुर्बा था उनका।बस यही कारण रहा कि वे जैसा चाहते करते गये।एक ही साथ दो लोग प्रधानमंत्री बनने के लिए लालायित थे।लेकिन एक राष्ट्र का एक ही प्रधानमंत्री बन सकता था।ऐसी व्यवस्था होनी थी।तो दो लोग प्रधानमंत्री कैसे बनेंगे।इसलिए हिन्दू, मुस्लिम के नाम पर भारत को दो हिस्सों में बाँट दिया गया और किसी ने विरोध करने की हिम्मत नहीं दिखाई।अब जबकि दो स्वतंत्र देश बन गए तो दो दो प्रधानमंत्री, दो दो राष्ट्रपति बनाया जा सकता था।सारा खेल यही से शुरू होता है।ऐसा भी सुनने को आता है कि पंडित जवाहरलाल नेहरू जी से ज्यादा बहुमत सरदार बल्लभ भाई पटेल जी के पास था लेकिन नेहरू जी किसी भी हालत में प्रधानमंत्री पद से कम पर मानने को तैयार ही नहीं थे।इसलिए पटेल जी खुद इस लड़ाई से बाहर हो गये। 
अब फिर भारत की उसी करेंसी की बात पर आते हैं।
अभी हमनें बताया कि सन 1917  में भारतीय मुद्दा एक रुपया 17 डालर के बराबर जो था, वो स्वतंत्रता संग्राम के कारण लड़ाई झगड़े में फँसकर सन 1947 में आते आते  एक रुपया एक डालर के बराबर आकर बैठ गया।
              ₹ 1/-      =  1 $   सन् 1947 में
 जी हाँ।जब भारत को आजादी मिली तो  डालर मजबूत होते होते 1917 से 1947 तक आते आते भारत का गिरेबान पकड़ लिया।और उसके बराबर तराजू के पलड़े पर आसानी से  अपना वर्चस्व कायम करने में कामयाब हो गया।
जब देश आजाद हो गया तब भी हमारा भारत अपनी मजबूत पैठ कभी भी स्थापित नहीं किया। हर साल नीचे की ओर लुढ़कते चला गया।कभी किसी राजनीतिज्ञ ने भारत के रुपये को मजबूत बनाने की कोई कोशिश नहीं किया।अगर किसी ने इस पर ध्यान दिया होता तो कम से कम वह वहीं पर रुक तो गया होता।लेकिन सभी दल आते रहे ,देश को आजमाते रहे।जिससे जितना बन पड़ा, देश को लूटकर विदेशों में अपने पैसे जमा करने में लगे रहे।सभी बड़े राजनीति के योद्धा अपने काली कमाई का भारी हिस्सा विदेशों में जाकर ठूँस दिया।भारत की मुद्रा दिन प्रतिदिन कमजोर होती जा रही थी और उसका कारण था कि यहां का खजाना खाली होता जा रहा था।बहुत ही तेजी से लोग भारत को लूटलूटकर  विदेशों में जमा कर रहे थे।उसी समय बाबू जगजीवनराम का भी नाम चर्चा में आया था और भारत की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी जी बन चुकी थीं।लेकिन बाबू जगजीवन राम को अपने जमा पैसे भारत में वापस लेने के लिए प्रधानमंत्री के हस्ताक्षर की आवश्यकता आ पड़ी लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री ने हस्ताक्षर करने से साफ इनकार कर दिया था और वह पैसा वहीं पर रह गया।सभी प्रमुख दलों के लोग जिनके पास ज्यादा पैसे हो जाते थे तो वह उसे भारत में जमा न करके विदेशों में ही जमा करता था।


कारण यह था कि यहां रहेगा तो जवाब देही बन सकती है।ईडी के छापे में आदमी फंस सकता है।बस इसी को छुपाने के लिए लोग विदेशों में भारत के रुपये जमा कर आते थे।और भारत की मुद्रा लगातार घटती जा रही थी।आज आजादी के छिहत्तर साल हो चुके हैं और जो भारत की मुद्रा आजादी मिलने के समय में डालर के बराबर थी आज छिहत्तर साल में एक डालर भारत के लगभग 83 ₹ के बराबर आ चुका है।   
           $1 = ₹ 82.92 
 
आज का आंकड़ा यही दर्शाता है।लेकिन कभी किसी ने देश से सवाल नहीं पूछा कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?हमारे देश की अर्थव्यवस्था इतनी कमजोर हालत में कैसे पहुंच गई।कौन पूछेगा उस दरबार में तो सिर्फ चोर ही चोर बैठे हों तो सवाल भला पूछे कौन?अगर कोई पूछता भी है तो जवाब कौन देगा।
    थबजब सरकार बदलती है तो राजनेताओं की पोल खुलती है।बड़ेबड़े घोटाले के सिवा कुछ भी नहीं मिलता।आजीवन मुकदमा चल सकता है लेकिन सजा नहीं दी जाती है।कुछ लोग कुछ दिनों में बरी भी कर दिये जाते हैं।और जो लोग बरी नहीं हो पाते वे पैरोल पर बाहर आकर जश्न में डूब जाते हैं।अब किसकी मजाल कोई उंगली उठा दे।कुछ बड़े लोग भारत को लूटकर विदेश में बस जाते हैं और उन्हें भगाने में भी सरकार ही सहायता प्रदान करती है।आपको मालूम होगा कि नीरव मोदी, विजयमाल्या जैसे रइसों ने कितना धन गबन करके विदेशों में चैन से मजे लूट रहे हैं और तो और देश में ही बैठकर सहारा श्री के नाम से मशहूर सुब्रत राय सहारा देश के राजनेताओं के संग बैठकर मजे कर रहा है।देश की जनता चिल्ला रही है, बिलख रही है, रो रही है लेकिन सरकार को उसकंपनी के खिलाफ मुकदमा चलाने की ओर लोगों के पैसे दिलाने की कोई व्यवस्था नहीं है।बल्कि जनता के साथ सरकार खुद धोखा करती दिख रही है।