सीता स्वयंवर के लिए धनुष यज्ञ
भारत भूमि को नमन करते हुए आज मैं श्री राम कथा का कुछ भाग लेकर आप सभी के बीच आ रहा हूँ।यह रामकथा चाहे जितनी बार आप सुनेंगे, पढ़ेंगे या किसी को सुनायेंगे।हमेशा इसमें कुछ नया मोड़ देखने सुनने को मिलता है और इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि चाहे कितनी बार भी सुनो,कभी रामकथा से मन नहीं भरता।आँखें नहीं थकतीं।सुनते जाओ..सुनते जाओ और सुनते जाओ।अगर आवश्यकता है तो वह श्रद्धा भाव की है, विश्वास की है और आस्था की है।दिल में लगन मन में भाव.. बस यही है लगाव।

ऐसा कहा जाता है कि मिथिला के राजा जनक एक प्रतापी राजा थे।जनता के परम हितैषी।वे जनता पर शासन नहीं करते थे।बल्कि देश कैसे चलेगा, उनके राज्य में कोई दुखी न हो,इस उद्देश्य से वे राजपाट देखते थे।उनके पास कोई संतान सुख प्राप्त नहीं था।जिससे वे काफी चिंचित रहते थे।एक बार उनके राज्य में भारी सूखा पड़ा था और जनता त्राहि त्राहि कर रही थी।सूखा के कारण फसलें नष्ट हो रही थीं और जब फसल नहीं होगी तो पैदावार नहीं होगी फिर लोग खायेंगे क्या।इसी चिंता में डूबे हुए राजा जनक राज्य के श्रेष्ठ ज्योतिष विद्वानों को दरबार में उपस्थित होने का आदेश जारी किया।सभी ज्योतिष विद्वान महापंडित दरबार में उपस्थित हो गये।राजा ने उनसे गणना करने को कहा कि देखिये क्या कोई ऐसा उपाय दिखता है जिससे इन्द्रदेव को प्रसन्न किया जा सके ताकि बरसात हो। प्राचीन काल से ही हमारे यहाँ बहुत ही निपुण ज्योतिष शास्त्र के ज्ञाता रहे हैं तो उन्होंने तुरन्त गणना करके राजा जनक को एक सुझाव दिया कि राजन यदि आप अपनी रानी के साथ मिलकर एक साथ खेत में सोने का हल चला दें पानी बरसात हो सकता है।
राजा ने सिर हिलाया और मंत्रियों को आदेश जारी कर कहा कि हमारे हल जोतने की व्यवस्था की जाय।दरबारी हतप्रभ थे।क्या वास्तव मे राजा और रानी खेतों में हल चलायेंगे?
राजा तो प्रजापालक होता है।और जो राजा अपने ऐशो आराम में लीन होता है वह प्रजा को कभी सुखी नहीं रखता है।सोने का हल तैयार करने में देरी नहीं हुई और सुंदर सुंदर हृष्टपुष्ट दो बैलों की जोड़ी तैयार कर लादी गयीं।राजा जनक जी अपनी महारानी सुनैना जी के साथ हल चलाने खेतों की ओर निकल पड़े।जैसे ही उन्होंने हल चलाना शुरू किया तो एक आश्चर्यजनक घटना घटित होती है।आसमान में काले बादलों की आवाजाही शुरू होने लगती है और देखते ही देखते भारी बरसात होने लगती है और तभी पृथ्वी से हल के सीत से एक घड़ा निकलता है जिसके भीतर एक सुकोमल कन्या पड़ी होती हैं।राजा रानी उसे घड़े से बाहर निकाल कर राजमहल में ले आते हैं और उसे अपनी पुत्री बनाकर अपने साथ रख लेते हैं।राजा रानी बहुत प्रसन्न थे।उस कन्या का नाम सीत से उत्पन्न होने के कारण सीता रखा जाता है।जनक जी उसे अपना नाम देते हैं तो लोग उन्हें जानकी भी कहते हैं।पूरे राजमहल में खुशहाली छा जाती है।समय बीतता गया और जब सीताजी युवती वती होचुकी तो राजा जनक जी उनके लिए वर की तलाश कर ही रहे थे कि अचानक एक दिन एक ऐसा अद्भुत दृश्य देखकर वह आश्चर्य चकित हो जाते हैं।जनक जी के यहां शिव जी का रावण को दिया गया पुराना जिर्णशिर्ण धनुष पड़ा था।जबसे वह वहाँ रखा गया था कभी किसी ने उसे उसकी जगह से हिला भी नहीं सकाथा।जिसके कारण वहां काफी मात्रा में घासफूस उग आयी थीं तो एक दिन सीता जी को वह दिखाई दिया तो उसने उसे हटाकर वहां खूब अच्छी तरह से साफ सफाई कर दींथी।जैसे ही राजा जनक जी को उस स्थान पर साफ सफाई दिखाई दिया तो वे सोच में पड़ गये कि आखिर इसे उसके स्थान से हटाकर किसने इतने अच्छे ढंग से सफाई किया होगा!वह तो कोई मामूली इंसान नहीं हो सकता।आखिर वह भला हमारे राजमहल में ऐसा कौन वीर है जिसके विषय में हमें कुछ भी ज्ञात नहीं है।

पता चला कि वह कोई और नहीं, बल्कि यह सब सफाई तो सीता ने स्वयं और बिना किसी सहयोग के संपूर्ण किया है तो जनक जी को आश्चर्य होने लगा कि क्या सीता इतनी वीर और शक्तिशाली कन्या है?अगर यह सत्य है तो उसका विवाह तो किसी ऐसे योद्धा से होना चाहिये जो इस धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा सके।
अब यह संदेश नगर में फैलता गया और राजा ने देशदेशके राजाओं के यहाँ सीता के स्वयंवर की चिट्ठी (पाती)भेजकर स्वयंवर की शर्तों से सबको अवगत करा दिया। जो कोई शिव के धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ा देगा,सीता का उसके साथ विवाह कर दिया जायेगा।यह स्वयंवर का निमंत्रण ऋषियों, मुनियों को भी ससम्मान बुलाने के लिए गया था तो विश्वामित्र जी जब जनकपुर जाने लगे तो वे राम लक्ष्मण को भी साथ लेते गये।क्योंकि उस समय रामलक्ष्मण उन्हीं के यहाँ रह रहे थे और उनके पूजा पाठ में बाधक बनने वाले शत्रुओं का संहार करने के लिए संकल्प बद्ध थे।अब राम लक्ष्मण दोनों भाई भी सीता का स्वयंवर देखने जनकपुर पधार ही रहे थे।तो मार्ग में उन्हें अहिल्या के आश्रम भी दिखाते हुए जा रहे थे तो पाषाण मूर्ति को आश्रम के बाहर देखकर रामजी ने वशिष्ठ जी महाराज से पूछा मुनि श्रेष्ठ !ये क्या है और इसके पीछे भी कोई कहानी है क्या?
विश्वामित्र जी रास्ते में जो कुछ भी दिखता उसके बारे में विस्तार से बताया करते थे।राम के पूछने पर मुनि श्रेष्ठ ने अहिल्या के एक स्त्री से पाषाण में बदलने की पूरी वृत्तांत कह डाला।और यह भी कहा कि राम अब वह समय आ गया है।इसलिए तुम बिना समय गँवाये इनका उद्धार कर दो। राम के पैरों की चरणधूलि का स्पर्श मिलते ही नारी पति के शापों से मुक्त हो गई और राम को प्रणाम करते हुए स्वगर्लोक चली गईं।
जनकपुर पहुँचने पर महाराज जनक ने विश्वामित्र जी स्वागत करने के उपरांत साथ में आये दोनों सुकुमारों का भी परिचय जाना ।
राम और लक्ष्मण जनकपुर पहुंच कर नगर में भी घूमते फिरते पूरा स्वयंवर और वहाँ की सजावट देखते हुए विश्वामित्र जी के संध्या करने के लिए फूलों की व्यवस्था में लगे थे।उसी फुलवारी में सीताजी भी अपनी सखियों के साथ फूल चुनकर माँ गौरी के पूजन करने के लिए जा रही थीं।दोनों लोगों की नजरें मिलती हैं तो एकटक दोनों एक दूसरे को निहारते रह जाते हैं।बहुत ही मनोरम और अद्भुत दृष्य होता है।जब गौरी पूजन कर सीता जी माँ गौरी को शीश झुकाते हुए नमन करती हैं तो मां के गले का हार सीताजी के गले में आ गिरता है और इसे सीताजी माँँ का आशीर्वाद मिल जाना जानते हुए अति प्रसन्न होती हैं।
नगर की महिलाएं, सीता की सखियाँ यहाँ वहाँ आपस में चर्चा करने लगती हैं कि सीता के लिए यही यही जोड़ी अच्छी रहेगी। ये जो दोनों राजकुमार मुनि के साथ पधारे हैं सीता के लिए उत्तम वर हो सकते हैं। कोई कहता कि राजा ने तो झूठ में ही अपनी जग हंसाई करवा रहे हैं।इतने सुन्दर वर इनके सामने उपस्थित होते हुए भी यह धनुष बाण का खेल खेल रहे हैं।यानी जितने मुँह उतनी बातें
हो रही थीं दरबार में।रानी सुनयना के भी मन में यह बात उठ रही थी कि राजा को अपने प्रण तोड़कर सीधे राम के साथ सीता का विवाह कर देना चाहिए।
जब स्वयंवर शुरू हुआ तो एक बार फिर से स्वयंवर की शर्त से लोगों को अवगत कराते हुए सबको बारीबारी से अपने जोर आजमाइश की घोषणा कर दिया गया।एक एक राजा अपने आसन से उठकर धनुष को उठाने लगे।लेकिन किसी से भी वह धनुष हिला तक नहीं। यह देखकर राजा जनक का धैर्य भी टूटने लगा था कि क्या होगा, अब तो कोई वीर इसधरती पर दिखाई ही नहीं दे रहा है तो क्या सीता कुँवारी ही रहेगी। राजा जनक मन में ऐसा विचार कर ही रहे थे कि एक साथ कई राजा मिलकर धनुष उठाने के लिए धनुष की ओर लपके।जनकजी अपने सिंहासन से उठ खड़े हुए और दहाड़ते हुए बोले , " रुक जाओ।बस, बहुत हो गया।अब और परिहास सहा नहीं जाता।लगता है कि यह धरती वीरों से खाली हो चुकी है।अगर मुझे पहले से ज्ञात होता तो यह जगहँसाई नहीं करता।बस इतना सुनते ही राम के पास बैठे हुए लक्ष्मण जी तमतमा कर खड़े हो गये।उन्होंने जनकजी की ओर देखकर बोले कि जिस सभा में मेरे भ्राता राम उपस्थित हों ,वहां कोई ऐसी बात बोले यह असहनीय है।आपने यह कैसे मानलिया कि यह धरती वीरों से खाली है।
तब जनकजी ने लक्ष्मण को समझाते हुए कहा कि मेरा उद्देश्य किसी को अपमानित करने का नहीं है।आप मेरी पीड़ा को समझ सकते हैं लेकिन मैं हाथ जोड़कर विनती करता हूँ कि यदि मेरे शब्दों से किसी को दुख हुआ हो तो कृपया मुझे माफ कर दें।ऋषि विश्वामित्र जी ने इशारे से लक्ष्मण को बैठ जाने को कहा और राम की ओर इशारा करते हुए आदेश दिया कि जाओ राम,अब तुम्हारी बारी।
श्री राम चंद्र भगवान की जय
राम उठ खड़े हुए।पहले गुरु को प्रणाम किया।फिर वहां उपस्थित सभी राजाओं को प्रणाम किया और धनुष को शिव जी का प्रतीक मानते हुए उसे भी मन ही मन प्रणाम करके उसे एकदम से उठा लिया और जैसे ही उसकी डोर को धनुष में लगानी चाही तो वह धनुष ही टूट गया। सारे नगर वासी आनंदित हो गये।चारोओर श्री राम की जयजयकार होने लगी।
धनुष टूटते ही इतनी जोर से आवाज हुई कि वहाँ से दूर महेन्द्र गिरि पर तपस्या कर रहे भगवान परशुराम जी का ध्यान भंग हो गया और वे बिना समय गंवाए जनकजी के दरबार में धनुष यज्ञ में धमके।आते ही क्रोध में आँखें लाल किये हुए सभी राजाओं को अपना फरसा दिखाकर भयभीत कर दिया।बारी बारी से सभी राजा अपना परिचय दिये जा रहे थे।राम लक्ष्मण की ओर इशारा करते हुए गुस्से में बोले कि तुमने अपना परिचय नहीं दिया।क्या तुम मेरे क्रोध से परिचित नहीं हो उद्दंड बालक!
राम और लक्ष्मण ने भी अपना परिचय बताया।लेकिन अपने क्रोध के कारण वे उन्हें पहचान नहीं पा रहे थे।राम ने मुस्कुराते हुए कहा भी कि आप तो मुझे पहचानते होंगे यही सोचकर मैंने अपना परिचय देना उचित नहीं समझा ।कुछ देर लक्ष्मण और राम के साथ परशुराम जी का संवाद चला फिर जब उनका गुस्सा शांत हो गया तो वे लौट कर फिर वापस चले गए।
राम के गले में सीताजी ने और सीताजी के गले में श्री राम ने जयमाला पहना दिया।तब विश्वामित्र जी ने राजा जनक जी को आदेश दिया कि अयोध्या में राम के विवाह की संदेश भेजकर वहां सूचना दी जाय ताकि वे अपने पुत्र के विवाह में उपस्थित होने के लिए अयोध्या से बारात लेकर आने की तैयारी करें।
जनकपुर से अयोध्या दूत भेजदिया गया और जैसे ही ही सूचना महल में रानियों को मिली मानो उनकी खुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा।बरात चलने की तैयारी होने लगी।राजा रानी सभी खुशी से दान लुटाये जा रहे, लुटाये जा रहे।हाथी, घोड़े, रथ और पैदल जैसे भी हो सकता था अयोध्या से जनकपुर के लिए बहुत भारी संख्या में बाराती चल दिये।रास्ते में बारातियों, उनके हाथी, घोड़ों, सबके खाने का व्यापक प्रबंध किया गया था।जब बारात जनकपुर पहुंच गई तो राजा जनक ने उनका खूब स्वागत सत्कार किया।और राम एवं सीता के विवाह के साथ ही राम के बाकी शेष तीनों भाइयों का भी उसी साथ उसी मंडप में जनक जी ने अपने भतीजियों के साथ कर दिया।महीनों तक बारात जनवासा रह गई।जब राजा दशरथ विदा माँगते जनकजी किसी न किसी बहाने रोक लेते।तब कहीं जाकर राजा जनक जी बेटियों की विदाई किया।
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