सोमवार, 18 सितंबर 2023

कबतक इंसाफ मिलेगा?

               कब तक इंसाफ मिलेगा?

 

आज दिन ब दिन बढ़ते जा रहे अपराध को देखकर ऐसा लगता है कि यह सिलसिला शायद ही कभी रुके।यूपी, राजस्थान, मणिपुर, पश्चिम बंगाल, बिहार, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र किस किस राज्य के नाम गिनायें ,जहाँ अपराध ना होते हैं।कहीं किसी आदिवासी समाज के यूवक पर हिंदू समाज का ब्राह्मण वहभी ब्राह्मण महासभा का पदाधिकारी आदिवासी युवक के चेहरे पर पेशाब करते हुए वीडियो सामने आया था।तो हल्की फुल्की कार्वाई या खानापूर्ति की जाती है।गिरफ्तारी के बाद जमानत।वह ब्राह्मण कैसा जो मदिरा और मांस भक्षण करता है।लेकिन फिर भी वह आदिवासी युवक ने उसे माफ कर दिया।कितना महान था लेकिन सरकार ने उसके इस महान हृदय सम्राट को कोई सम्मान नहीं दे सकी।शायद वह गरीब था इसलिए।
मणिपुर की घटना भी सभी लोग अखबार में पढ़े होंगे।टी.वी. पर मोबाइल पर देखे होंगे।महिलाओं को नंगी करके सरेआम घुमाया जा रहा था।वहाँ के लोगों का जमीर यदि जिंदा होता तो शायद ऐसा नहीं होता।लेकिन विरोध तो गरीब सहते हैं।अमीरों का विरोध तो सरकार भी नहीं करते।समाज के लोग खड़े होकर उन नंगी महिलाओं के जिश्म को निहारते रहे।कुछ लोग शर्मा रहे थे तो हटालिया नजर खुद की।पर शायद उन जालिम वहशी दरिंदों का विरोध करने की स्थिति में कोई नहीं था।अगर रहता तो जरूर विरोध किया गया होता।लेकिन वे मनबड़ रहे हों और उनके आगे सभी कमजोर दिख रहे थे।फिर दूसरों के लिए अपनी जान जोखिम में सभी लोग डाल तो सकते नहीं।

राजस्थान में भी ऐसी ही घटना घटित होती है।यहाँ भी राजनीति के पुरोधा हो हल्ला मचा हंगामा किया।जो कि नेताओं की एक सीधी चाल होती है।अपनी राजनीति चमकाने के लिए वे मौका तलाश करने में निपुण होते हैं।हमारे राजनेताओं की गहरी साजिश रहती है कि किसी मामले में खबरों को मसालेदार बना कर दिखाया जाय।

कुछ अपराध तो नेताओं के द्वारा भी कराया जाता है।अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए।ऐसा हर राज्य में होता है।हर पार्टियां करती हैं।अंतर बस केवल इतना होता है कि जो जहाँ सत्ता में बैठे हुए होते हैं, वो दल वहाँ चुप रहते हैं।बाकी सभी चिल्ला रहे होते हैं।

यूपी में थोड़ा स्थिति कुछ कुछ अन्य राज्यों की तुलना में ठीक दिखाई दे रही थी लेकिन पूरी तरह से अपराध मुक्त समाज कोई सरकार नहीं दे सकती हैं।

अभी हालही में रक्षाबंधन के पावन त्योहार पर एक महिला पुलिसकर्मी अपनी ड्यूटी से वापस लौटते समय ट्रेन की बोगी में सवार होकर जा रही थी और उसकी खून से लथपथ वर्दी में घायलावस्था में बेहोश पड़ी मिलती है।घटना अयोध्या की है।देश के गृहमंत्री मंच से चिल्ला रहे होते हैं कि यूपी में अब कोई महिला रात के बारह बजे भी अगर अकेले निकलती है तो उसे पिकेट ड्यूटी वाले घर तक सुरक्षित पहुँचाते हैं।और उसी रात एक महिला पुलिसकर्मी के साथ ही ऐसा वाकिया हो जाता है और किसी ने देखा तक नहीं। जिस ट्रेन में भूसे की तरह यात्री भरे होते हैं और उसी ट्रेन में किसी के ऊपर इतना बड़ा हमला किया जाता है और किसी को कुछ दिखाई नहीं दिया।यह भी कोई मामूली घटना नहीं थी और अभी तक(लिखे जाने तक)वह कुछ भी बता पाने में सक्षम नहीं थी और जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रही है।
अभी हाल ही में बनारस से एक खबर निकल कर आयी ।कोई लड़का एक लड़की को पिछले एक साल से परेशान किये जा रहा था।लड़की के पिता ने दोबार उन्हें समझाने का प्रयास भी किया था और नहीं मानने पर पुलिस को सूचना दी थी लेकिन पुलिस ने कोई कार्यवाही नहीं किया।बार बार तंग करने की उस मनचले की कोशिशें जारी रहती हैं।अब आरोपी मोबाइल पर धमकी भी देने लगे थे लेकिन फिर भी पुलिस विभाग शायद इस इंतज़ार में बैठा रहा कि जबतक लड़की या उसके परिवार के साथ कुछ हो नहीं जाता, तबतक वह सोती रही।और एक दिन इस लड़की ने परेशान होकर खुद के गले में फंदा लगाकर आत्महत्या कर लेती है।मौत को गले लगाने के बाद उस लक्सा थाने के थानाध्यक्ष की नींद खुलती है।आननफानन में उस शोकाकुल परिवार के घर पहुँचती है।लोगों के बयान लेती है और लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी जाती है।
इधर विगत शुक्रवार की दोपहरमें दिनांक 15सितंबर 2023 की हृदय विदारक घटना सामने आ गई। हुआ कुछ यूं कि हसवर थाना क्षेत्र जनपद अंबेडकर नगर के एक विद्यालय से छुट्टी होने के बाद एक सोलह साल की बच्ची जैसे ही सड़क पर साइकिल से पहुँचती है।दो मनचले मुस्लिम समुदाय के लड़कों ने उसका दुपट्टा खींच दिया और वह उनसे बचने के लिए साइकिल दूसरे ओर मोड़ने के प्रयास में अनियंत्रित होकर सड़क पर गिर जाती है और पीछे से आ रही दूसरी मोटर साइकिल उसे रौंद देती है और लड़की वहीं दम तोड़ देती है।पता चलता है कि स्कूल के आसपास कुछ आवारा लड़के घूमते रहते हैं और छूट्टी होते ही लड़कियों पर फब्तियां कसते हैं।स्कूल प्रशासन भी कभी कोई शिकायत नहीं किया।

    पुलिस पहुचती है और इसे मात्र सड़क दुर्घटना बता कर मामले को दबाना चाहती है लेकिन तभी किसी के यहाँ लगा सीसीटीवी फुटेज में लड़की का दुपट्टा खींचते हुए वीडियो दिखाई दे जाता है और फिर जनता आक्रोशित हो जाती है।मामला गर्माजाता है।फिर से आननफानन में पुलिस हरकत में आती है।उन शोहदों को गिरफ्तार किया जाता हैलेकिन वहां से भागने की कोशिशें करते हैं जिसे पुलिस ने उनके पैरों में गोली मारकर घायल कर पुनः पकड़ लिया।
बात अब यह है कि खासकर यूपी में जिस तरह से गुंडे माफियाओं के घर पर बुलडोजर चलाया जाता है, उनके इनकाउंटर कियेजा रहे हैं फिर भी उनके हौसले बुलंद क्यों हैं?तो जाहिर सी बात है कि कहीं न कहीं कुछ भेदभाव या मामलों में कुछ गड़बड़ी जरूर है।या तो बदमाशों को उनके जातिबिरादरी देखकर या उनकी पहुंच कहाँ पर कितनी मजबूत है या कहीं वह सत्ता पक्ष के बड़े रसूखदारों तक उनकी पहुंच तो नहीं?ऐसी ही कुछ खास वजहों के कारण एनकाउन्टर या बुलडोजर का कोई खास डर नहीं लगता है।और अपराध उसी तरह बढ़ते जा रहे हैं।

अपराध न रुकने और अपराधियों के हौसला बुलंद कर निडरता पूर्वक किसी भी घटना को अंजाम देने में पुलिस की भी सहभागिता उतनी ही होती है जितनी कानून के वकालत करने वाले वकीलों की होती है।दबी जुबान से ही सही लेकिन यह सच्चाई किसी से छुपी नहीं है।



      अपराधी अपराध करते हैं तो पुलिस पकड़ती है।मुकदमा होता है और वकील साहब बड़ी आसानी से उसका बेल ले लेते हैं।अपराधी बाहर आकर पुनःअपने उसी धंधे में लग जाते हैं जो उनका पेशा होता है।बारबार अंदर बाहर आना जाना लगा रहता है।थाने की पुलिस हो जेल के कर्मचारी सबकी इनसे मेल जोल हो जाती है तो अपराध अपने आप चलते रहते हैं।वकीलों की पैरवी करने का तरीका जजों की कलम को जजमेंट करने से रोक देता है और मुजरिम जमानत पर बाहर आ जाता है।
जब अपराधी नहीं होंगे तो अपराध नहीं होंगे, अपराध नहीं होगा तो पुलिस किसको पकड़कर थाने में लायेगी।जब कोई अपराध नहीं होगा तो वकीलों को कोई केस नहीं मिलेगा।जब उनके पास कोई मुकदमा ही नहीं रहेगा तो वे किसका केस लड़ेंगे।उन्हें फीस कौन देगा।जब उन्हें कोई  फीस नहीं मिलेगी तो उनका खर्च कहाँ से चलेगा।और वकालत एक जमा जमाया भारी लाभ देनेवाला विजनेस है तो भला चाहेगा कि देश अपराध मुक्त बने। यह तो सरकार अपनी पीठ थपथपाने के लिए अपराध मुक्त देश बनाने का एक जुमला बोलती है और जनता उसे सच समझ लेती है।कचहरियों में जाइये तो आप देखेंगे कि यहां तो चालीस चालीस साठसाठ सालों से, दोदो ,तीनतीन पीढ़ियों से भी अधिक समय से लोगों के मुकदमे पेंडिंग में सिर्फ तारीख देकर सरकाया जाता रहा है।कैसे न्याय मिलेगा?आजतक क्या कभी नेता ने इसपर चुनाव जीतने के बाद सदन में चर्चा करी।क्यों करेंगे।हमतो खुद ऐसे ही लोगों को चुनाव करके सदन में भेजते रहते हैं जो हमारा नहीं, हमारे देश का नहीं बल्कि अपने विकास के लिए मैदान में आते हैं।
    पुलिस वाले भी अपराध को बढ़ावा देने में काफी हद तक अपनी भूमिका निभा लेते हैं।अब हर अपराध को ये दबाना चाहते हैं।पुलिस चाहती ही नहीं कि उसके थाने में कोई मुकदमा दायर हो।इसलिए वे पैसे लेकर मुकदमा को ही खत्म करने पर ज्यादा जोर देते हैं।अब अगर सुलह कराते हैं तो दोनों पक्षों से मोटी रकम ऐंठते हैं।जो लोग नहीं मानते हैं और अपराधी को सजा दिलाने की जोर आजमाइश करते हैं तो पुलिस उनके केस को या तो हल्के में लिखकर अपनी छुट्टी कर लेती है या उसे भी फँसा देती है या अगर आरोपी पार्टी अधिक मजबूत हो तो उसके खिलाफ कोई केस ही नहीं लिखना चाहता है और अपराध नहीं थमता।बस ऐसे ही कुछ खास खास कारण होते हैं जिसके कारण बदमाशों के हौसले पस्त नहीं होते।
       सरकार और सरकार में बैठे हुए हमारे सांसद, विधायक, मंत्री अगर सदन में चर्चा करते, सवाल पूछें कि किसी भी हालत में एक साल के भीतर ही न्याय देने की व्यवस्था होनी चाहिये तो ऐसा कानून बनाया जाय जिससे देश में कानून व्यवस्था मजबूत और सुदृढ़ हो सकती है और अपराध के बढ़ते हुए ग्राफ को रोका जा सकता है।
 वैसे इसमें आपकी क्या राय है, आप कमेंट करके लिख सकते हैं।

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