रविवार, 3 सितंबर 2023

हिरण और हिरणी का शाप

 हिरण और हिरनी का शाप 

  

महाराज शान्तनु की कहानी

   ये कथा महाभारत से हमने लिया है, यहाँ जैसा कि सभी को मालूम है कि महाराजा पांडु को शिकार खेलने का बहुत शौक था। जैसा कि सभी राजा महराजाओं को शिकार का शौक होता था।एक बार वे (महाराजा पांडु)अपनी दोनों पत्नियों कुंती और माद्री के साथ शिकार खेलने गए। उन्होंने देखा कि जंगल में एक हिरण और हिरणी का एक जोड़ा प्रेम कर रहा है।महाराजा पांडु में बाण निकाले और हिरण-हिरणी की ओर छोड़ दिए। बाण लगते ही हिरण-हिरणी दोनों छटपटाने लगे और वहीं गिर गए। उस समय हिरण के मुंह से एक पुरुष की आवाज निकली। वह हिरण एक ऋषि पुत्र थे, जिनका नाम किंदम था। किंदम ऋषि और उनकी पत्नी हिरण-हिरणी बनकर प्रेम कर रहे थे और पांडु ने उन्हें बाण मार दिए।


     राजा को गलती की मिली सजा


      हिरण ने पुरुष की आवाज में कहा, हे राजन!'तुम धर्म में रुचि लेने वाले राजा हो।आज तुमने ये क्या कर दिया। जब हम प्रेम कर रहे थे, तब तुमने हम पर बाण छोड़ दिए।बहुत घोर पाप कर दिया है तुमने।इसलिये मैं तुमको शाप देता हूं कि तुम्हारे जीवन का समापन भी ऐसी ही अवस्था में होगा। तुमने हमारा एकांत भंग किया है, एक दिन ऐसा ही एकांत तुम्हारी मृत्यु का कारण बनेगा।'

हिरन के मुख से मनुष्य की आवाज़

         हिरण के मुख से मनुष्य की आवाज में बिल्कुल स्पष्ट ध्वनि सुनकर महाराज पाण्डु समझ गए कि ये ऋषि का शाप है तो सत्य होकर ही रहेगा। उन्होंने विचार किया कि अब से वे आगे का जीवन जंगल में ही बिताएंगे, राजपाठ छोड़ देंगे। ये बात उनकी पत्नियों को मालूम हुई तो कुंती ने कहा, 'हम भी आपके साथ जंगल में ही रहेंगे, हमभी हस्तिनापुर नहीं जाएंगे। संन्यास के अलावा और भी तो आश्रम हैं, जहां आप पत्नियों के साथ रहकर तपस्या कर सकते हैं।'ये बात पांडु ने मान ली और जंगल में ही वानप्रस्थ जीवन बिताने लगे और अपने अपराध का प्रायश्चित करने लगे। उन्होंने साथ लायी हुई अपनी सारी संपत्तियां और सैनिकों को हस्तिनापुर के लिए रवाना कर दिया। जहाँ कुछ ही दिनों के बाद उनका स्वर्ग वास हो गया।और उसके उपरान्त उनके बड़े भाई धृतराष्ट्र जो कि जन्मांध थे,उन्हें अंधा होते हुए भी राजसिंहासन पर आसीन होना पड़ा।

   आपको ज्ञात होगा कि महाभारत में धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों का वर्णन मिलता है। सभी बड़े पराक्रमी योद्धा थे।दुर्योधन सबसे श्रेष्ठ थे।और दुर्योधन के मामा जिनका नाम शकुनि था, भला उन्हें कौन नहीं जानता।उनकी कूटनीतिक चाल से आप सभी लोग भलीभांति परिचित हैं।उसकी दुर्योधन से खूब जमती थी।

शकुनि की कूटनीतिक चाल


शकुनि ने दुर्योधन को खूब भड़काता रहता पांडवों के खिलाफ।और उन्हें राज्य से बाहर निकलवाने में कोई कसर नहीं छोड़ा।बारह साल का वनवास तो तेरहवां साल अज्ञात वास में बिताने की शर्त।बार बार जुये खेलने के लिए उकसाना, ये सब शकुनि की महाचाल थी।दोनों कुलों को आपस में लड़ाकर मार डालने की उसकी मंशा आखिर में सफल हो गई।एक से बढ़कर एक महारथी जो युद्ध में शामिल हुए थे सब किसी न किसी नीजी स्वार्थ में युद्ध में लड़ रहे थे।यहाँ तक कि कौरवों एवं पांडवों के जो गुरु थे,  " आचार्य द्रोणाचार्य।वे स्वयं अपने नीजी स्वारथवश युद्ध में प्रतिदिन दस हजार सैनिकों को मौत के घाट उतारने में लगे रहे।उनका केवल एक ही उद्देश्य था और वह कि वे अपने पुत्र अश्वस्थामा को हस्तिनापुर का राजा देखना चाहते थे।

महाभारत में द्रोणाचार्य की योजना

   आचार्य द्रोणाचार्य की इस चाल को भगवान श्रीकृष्ण जी खूब अच्छी तरह से समझ रहे थे।एक दिन अर्जुन जब बहुत उदास थे तो माधव से रहा नहीं गया और अर्जुन से इस उदासी का कारण जानना चाहा।अर्जुन कहने लगे, "पार्थ, गुरुदेव ऐसे ही प्रतिदिन दस हजार हमारे सैनिकों को मारते रहे तो हमारी विजय कैसे होगी।उनके रहते तो विजय मिलना मुश्किल है और तुम कहते हो कि धर्म और सत्य की हमेशा विजय होती है।मुझे तो यह सम्भव नहीं लगता। हे केशव कोई उपाय बताओ जिससे आचार्य का सामना किया जा सके, उन्हें रोका जा सके।"

भगवान श्रीकृष्ण ने खोला द्रोणाचार्य का राज

      तब भगवान श्रीकृष्ण जी ने अर्जुन से कहा था कि आचार्य तो अपने पुत्र अश्वत्थामा के लिए लड़ रहे हैं और जैसे ही उनके कानों में अश्वत्थामा के मृत्यु का समाचार सुनाई देगा, वे तुरंत धनुष बाण नीचे रख देंगे और उसी समय तुम उन्हें लक्ष्य करके बाण चला देना।उसके लिए तुम्हें पहलेअपने हाथी अश्वत्थामा को मारना होगा।उसके मरते ही यह बात द्रोणाचार्य तक पहुँचानी होगी।ताकि सत्य का पता चलने से पहले ही उन्हें युद्ध में मारा जा सके।अर्जुन अवाक हो गये।बोले "प्रभु, वे हमारे गुरु हैं और हम गुरू की हत्या कैसे कर सकते हैं?" भगवान श्रीकृष्ण जी ने अर्जुन को समझाया कि "हे अर्जुन,तुम भूल रहे हो।चक्रव्यूह में अभिमन्यु अकेले था और निहत्था भी।गुरु द्रोणाचार्य, भीष्म पितामह सभी लोग उपस्थित थे जब तुम्हारे निहत्थे पुत्र को घेरकर मार दिया गया और किसी ने किसी को रोका तक नहीं।तुम किस धर्म की बात कर रहे हो अर्जुन!तुम्हें आचार्य को मारना ही होगा... तुम्हें आचार्य को मारना ही होगा..हाँ अर्जुन हाँ।तुम्हें मारना ही होगा।"

कहानी से यह शिक्षा मिलती है।

   सीख - गलती या अपराध किसी से भी हो सकते हैं। अपराध को मिटाया नहीं जा सकता, लेकिन उसका प्रायश्चित किया जा सकता है, ताकि अपराध का बोझ मन से उतर जाए और आगे का जीवन अच्छा हो जाए। तपस्या और भक्ति करने के लिए घर छोड़ने की जरूरत नहीं है। घर-परिवार में अनुशासन के साथ रहकर भी तपस्या की जा सकती है। इसे ही वानप्रस्थ कहा जाता है।

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