भारत की करेंसी /रुपये का मूल्य इतना गिरते क्यों जा रहा है?
मित्रों, क्या आपने कभी सोचा है कि हमारे देश की नोट दुनियां में इतनी जल्दी जल्दी अपने मूल्यों को कैसे कमजोर करने से रोक पाने में असमर्थता जता रही है।आज भारत चाहे जितना अपना बखान कर ले,सब झूठा साबित हो रहा है।अब इसके लिए कोई अर्थशास्त्री चाहे कुछ भी घोषणा कर दे।इस कारण से ऐसा होता है या उस कारण से।बस सुनते जाइये।ये अर्थशास्त्री भी देश की जनता को खूब गुमराह करते हैं और खासकर हमारे देश में जहाँ सिर्फ सभी नेता, सभी राजनीतिक पार्टियाँ स्वांतः सुखाय वाली राजनीति कर रही हैं।
अब हम आपको कुछ राजनीति के धुरंधरों के बारे में बताते चलें कि किस तरह से ये विभिन्न दल सिर्फ एक पार्टी विशेष को सत्ता से बाहर करने के लिए किस तरह से अपने उसूलों के साथ समझौता करने को मजबूर हो जाती हैं।उनका सिर्फ एक ही उद्देश्य रह गया कि वर्तमान में सत्ता रूढ़ पार्टी को कैसे पदमुक्त करके सत्ता को छीनी जा सके।लेकिन जब उसे हटालिया जाता है तो नया प्रधानमंत्री कौनसा व्यक्ति होगा, इस सभी लोग एक जुट नहीं हैं। सब मिलकर अपनी सल्तनत कायम करनेवाले दिखाई दे रहे हैं।अब जनता उसे कैसे लेती है, यह जनता को निश्चित करना है। भाजपा की नीति को भी बहुत अच्छा नहीं कह सकते हैं।बस इतना जरूर हुआ है कि इसने भारत की विदेशनीति को सुदृढ़ बनाया है।भारत का खोया हुआ सम्मान जरूर वापस दिलाने में कामयाबी हासिल किया है।लेकिन सोलह आने यह पार्टी भी कुशल प्रशासक सिद्ध नहीं हो सकी।यहाँ भी लोग अन्य दलों से निकल कर आते गये और ये लोग खुद को मजबूत करने के लिहाज से सबको अपने साथ जोड़ते गये।दूसरे दलों को तोड़कर अपनी पकड़ मजबूत करने वाले यह भूल गए हैं कि जिस दिन ये सत्ता में नहीं होंगे ,ये दलबदलू नेता पुनः उनके साथ जा मिलेंगे जो सत्ता में बैठे होंगे।ऐसे ही मौकापरस्त लोगों की वजह से आज पार्टी की छवि खराब हो रही है।
भाजपा सत्ता में आने के लिए देश की जनता से बहुत बड़ा झूठ बोला था।कहा था कि जब भाजपा केन्द्र में शासन सम्हालने लगी तो विदेश में जमा सभी काले धन को वह भारत लाकर रहेगी।जनता ने विश्वास किया और भारी बहुमत से जिताकर सरकार बना दिया।लेकिन सत्ता में आते ही सरकार ने जनता को किये अपने सारे वादे भूल गई।कालाधन वापस लाना तो दूर ,उसने आजतक यह नहीं पता लगापायी किसके किसके पैसा कितने करोड़ रुपये विदेश में जमा है।जब आज दस साल में उसने कोई आंकड़ा ही नहीं दिया तो कालाधन भला कैसे ला सकती है।
हाँ इस सरकार ने इतना जरूर किया कि गरीब जनता ने अपने मेहनत की जो कमाई अपने बच्चों के शादीव्याह के लिए, भविष्य के लिए ,घरद्वार बनवाने के लिए अपने पेट काटकर बचाया था और उसे सहारा जैसी रीयल स्टेट या चिटफंड कंपनियों के पास भारत में ही जमा किया था, उसी पर रोक लगाने में सफल हो गई।करोड़ों परिवार के साथ इतना बड़ा छलावा इस सरकार ने कर दिया।फिर भी जनता कहती है कि अभी भी वे मोदीजी को ही प्रधानमंत्री बनाना चाहते हैं लेकिन मोदीजी बस आप उनके पैसों को लौटा दीजिए।जो दोषी कम्पनी के मालिक हैं और जो लोग नियम तोड़कर देश को ठग रहे थे उन्हें सजा देते।लेकिन वे ठहरे अमीर लोग, इसलिए सरकार उनके ऊपर मेहरवान है और उसका सीधा जनता के साथ धोखा किया जा रहा है।
जहाँ तक मेरा मानना है कि जो लोग इसे पढ़ रहे हों, हो सकता है कि उनमें से कोई आपभी हो सकते हैं जिनका पैसा सहारा के पास निवेश किया गया रहा हो।या आपके परिवार के ही किसी सदस्य ने जमा किया हो,लेकिन आजतक भुगतान नहीं मिला हो। यह बात सदन में हमारे जनप्रतिनिधियों को उठाना चाहिए था लेकिन कभी किसी ने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया।

आज देश को स्वतंत्र हुए पूरे छिहत्तर साल बीत जाने के बाद भी यहां की अर्थ व्यवस्था नहीं सुधरी।उसका कारण परोक्ष रूप से यहाँ की जनता खुद है।सभी राजनेता अपने जीवन को सार्थक और सुखमय बनाने के लिए भारत की राजनीति में उतरते हैं।जनता के बीच जाकर सत्ता पक्ष को खूब भला बुरा कहते हैं।उसके ऊपर ढेरों ठगी, बेइमानी भ्रष्टाचार आदि का दोषारोपण करते हैं और जनता मुर्खों की भाँति उनके बहकावे में आकर उनकी प्रशंसा गली,गांव, चट्टी,चौराहों पर खड़े होकर खूब बतियाते हैं।सब अपने अपने नेताओं की, अपने दलों की खूब प्रशंसा करते हुए अपने आप को तीसमार खाँ समझने लगते हैं। अब यहां पर हमारे कहने का तात्पर्य यह है कि जो नेता अपनी पार्टीसार्टी खड़ी किये हैं और वे जनता के सामने सफेद झूठ बोल रहे हैं तो उस झूठ से उनके दल को लाभ मिल रहा है।अपनी पार्टी को जिताने के लिए कुछ झूठ बोलते हैं, यहभी समझ में आता है।जो नेता चुनाव लड़ रहे होते हैं और जनता के बीच झूठ बोल बोलकर अपना प्रचार प्रसार करने में लगे हैं, येबात भी समझ में आती है।अगर कोई बात समझ में नहीं आती है तो वह यह कि हम सब लोग किसी भी नेता के प्रचार में खड़े होजाते हैं और अपने उन तमाम हितमित रिश्तेदार आदि को भ्रमित करने वाले बयान देने लगते हैं।देश को पीछे करने मे सभी आम मतदाता का विशेष महत्व है।और ये आम मतदाता ही देश की अर्थ व्यवस्था को खराब करने के पूरे जिम्मेदार हैं।
अब सबसे पहले मैं आपको यह बताने की कोशिश करता हूँ कि पहले तो आप ये समझ लीजिये कि मैं भी एक आम आदमी ही हूँ।मुझे किसी दल में कोई दिलचस्पी नहीं है।मैं कोई अर्थ शास्त्री भी नहीं हूँ, जो इतना बड़ा ज्ञान बाँट सकूँ।लेकिन दिमाग में एक बात तो जरूर गूँजती है कि हमारे देश के वे क्रांतिकारी वीर सपूतों ने भारत को आजादी दिलाने की इतनी सारी यातनाओं को क्यों झेलते गये।उन्हें अपने घरपरिवार की चिंता क्यों नहीं हुई।जो उन लोगों ने लाठियां खायीं, गोलियां खायीं या फिर फाँसी पर झूल गये।माँ,बाप,भाई,बहनों के आँसू उन्हें विचलित नहीं कर सके।क्योंकि उनके अंदर एक जुनून था कि हमें मौत मंजूर है लेकिन हमें गोरों की गुलामी कभी स्वीकार नहीं है।बस यही उनका जुनून उन्हें आजादी की जंग में खींच ले रहा था।आज उनकी कुर्बानी हमें विचलित कर देती है लेकिन हम उनकी सहादत को सिर्फ दिखाने के लिए याद करते हैं।
गोरे इस देश को लूटते रहे।क्योंकि ये भारत उनका अपना देश तो था नहीं।मुगलों और तुर्कों ने भारत को लूटा ,ये भी बात समझ में आती है।लेकिन जब देश स्वतंत्र हो गया तो फिर कौन देश को लूट रहा है?क्या कभी किसी ने इसपर गौर किया? भारत को आजादी दिलाने वाले तो यह देश छोड़कर एक अज्ञात दुनियां में चले गए और तभी से इस देश को यहाँ के लूटरे सफेद पोशाकों में बारी बारी से लूटने लगे ।चुनाव की व्यवस्था की गई कि हर पाँच साल में जनता के पास विकल्प होगा सरकार बदलने की।जो अच्छा करेगा, ठीक से देश चलायेगा, जनता का खयाल रखेगा, उनके शिक्षा, रोजगार ,दवा इलाज के साथ देश को प्रगति के मार्ग पर ले जायेगा,जनता उसके हाथ में देश की बागडोर सौंपने का कार्य करेगी।अगर जनता को ऐसा लगता है कि इनसे देश की अर्थव्यवस्था सम्हालने में यहां की आर्थिक स्थिति कमजोर हो रही है तो शासक बदल देना चाहिए।व्यवस्था तो अच्छी लगती है लेकिन ये क्या?सत्ता के लोभियों ने जनता को गुमराह करने का ऐसा तरीका निकल लिया कि एक बार सत्ता हाथ में आ जाये तो उससे कुर्सी खाली कराना बहुत मुश्किल काम होगा।
शामदाम दंडभेद सब चलने लग गया।और सन 1947 से आजतक सिर्फ सत्ता से खेल ही हुआ है।चाहे जिसकी सरकार बनी, चाहे जब बनी है, चाहे कोई कितने दिन भी सत्ता में रहा हो,सबने देश को लूटने के सिवा किया कुछ नहीं।मैं अभी आगे इस बात को बताऊंगा कि मैं ऐसा क्यों कह रहा हूँ।मैं बहुत कम पढ़ा लिखा इंसान हूँ और मेरी उतनी समझ भी नहीं है,ना लालच है।इसलिए लिख रहा हूँ।ये राजनीति न लोगों को लुभाने के लिए बनी है।राजनीति में उतरने के लिए न तो राजनीति शास्त्र की पढ़ाई जरूरी है और न कोई डिग्री या डिप्लोमा चाहिए।बस जनता के बीच खड़े होकर लम्बी लम्बी, झूठी कहानी सुनाने के गुण विद्यमान होने चाहिए।किसी पर आरोप लगाना हो तो ऐसे लगा सकें कि वह सरासर झूठ होकर भी सत्य लगे। दो पक्षों को लड़ाकर एक पक्ष के बचाव में थाना पुलिस को सम्हाल सके।जहाँ बैठ जाये वहीं पर लोग उनके चायपानी की व्यवस्था कर दें।अगर कोई भी साधारण सा आदमी इतने में से थोड़ा गुण जानता हो, तो उसे बड़ा नेता बनने से कोई रोक नहीं सकता।अब ऐसे लोग जब पार्टी बना सकते हैं तो देश को कैसे चलायेंगे।सीधेपन से सरकार नहीं चलती है।तिकड़म से सरकार चलानी पड़ती है।एक चपरासी के लिए भी कोई न कोई डिग्री हासिल करना पड़ता है।क्लर्क बनने के लिए डिग्री चाहिए।जिला और तहसील चलाने के लिए डिग्री चाहिए।लेकिन देश चलाने के लिए, प्रदेश चलाने के लिए या किसी क्षेत्र का बिधायक और सांसद बनने के लिए कोई डिग्री या डिप्लोमा नहीं चाहिए।एक अनपढ़,गंवार को भी अगर चुनाव में टिकट और सिम्बल मिल जाता है तो जनता उसे जिताकर विधानसभा और लोकसभा में भेजने का काम कर देती है।उसका मुख्य कारण यह होता है कि वह प्रत्याशी किसी बड़ी पार्टी का होता है, किसी जाति विशेष का होता है और जनता भैंस की भाँति मुँह हिलाते रहती है।बिना सोचे विचारे दो घंटे धूप में खड़ी रहती है और जैसे ही उसकी बारी आती है , अपनी जाति बिरादरी या फिर पार्टी के चुनाव निशान पर वोट डालकर चली आती है और जिसे सबसे अधिक वोट मिला वह विजयी हो गया।अब ऐसे लोग जब सत्ता में हम चुनकर भेजेंगे तो हमारे देश का नुकसान तय है।आज भारत में जितनी भी पार्टियां फलफूल रही हैं, सब निजी जिंदगी को सुदृढ़ बनाने के सिवा किया क्या है।राजनीति में उतरना मतलब अपनी तिजोरी भरना।बस यही मकसद रह गया है सभी राजनीतिक दलों का।
एक बार सिर्फ चुनाव जीतने की जरूरत है ताउम्र पेंशन का लाभ इन्हें मिलता रहता है।बस यही क्या कम है? बड़ेबड़े नेताओं के राज तब खुलते हैं जब देश में कोई चुनाव आता है।वो सत्ता से बाहर होते हैं तब जाकर इन नेताओं के राज खुलते हैं।तबतक बहुत देर होचुकी होती है।और हमारे देश की कानून व्यवस्था तो मानों सरकार के इशारे पर ही चलती हैं।एक दम से लंगड़ी हो चुकी है।बैशाखी के सहारे ही अदालत में प्रवेश करती हैं।और अगर अपराधी कोई बाहुबली या बहुत पैसे वाला हुआ तो न्याय की गुहार लगाने वाले अदालत की चौखट पर माथा पटकते हुए मर जायेंगे लेकिन उन्हें तारीख से ज्यादा कुछ भी हासिल नहीं होने दिया जायेगा।अब जो लोग कभी किसी लफड़े में फँसे हों तो उन्हें इसका एहसास भी होगा।बाकी लोगों को यह तो सिर्फ बकवास ही लगेगा।आज कुछ लोग रामराज्य लाने की बात कर रहे हैं तो।स्वागत करते हैं ऐसी सोच रखने वाले लोगों का।लेकिन पहले अपनी न्याय व्यवस्था तो बदलिये।एक साल के भीतर न्याय देने और दिलाने की व्यवस्था करिये तो पहले।
आप रामराज्य की बात करनेवाले कितना जानते हैं उस राम राज्य के बारे में,जिसे आपने स्थापित करने की बात की है।उस राम के राज्य में जब एक दुखियारी स्त्री सभा समाप्त होने के बाद राजदरबार में न्याय माँगने के लिए आती है और द्वारपाल उसे राम से मिलने नहीं देते हैं और उसका परिचय तक नहीं पूछा, उसके दुखी होकर इतनी देर से आने का कारण भी नहीं पूछा था और उसे खाली हाथ वापस लौटा दिया था।जैसे ही अगले दिन राजा रामचंद्रजी को यह पता चला कि दरबार उठने के बाद एक दुखियारी स्त्री न्याय के लिए आयी थी और वह बिना मिले चली गई।तो जानते हैं राम को बहुत चिंता हुई कि आखिर क्या दुख रहा होगा उसका जो वह सुबह तक का इंतजार नहीं कर सकी और रात में ही न्याय माँगने चली आयी।और मैं उसके साथ न्याय नहीं कर सका।मित्रों जानते हैं क्या हुआ?भगवान राम ने अपने लोगों को उसका पता लगाकर उसे ले आने टा आदेश जारी कर दिया।लेकिन वह स्त्री उन्हें नहीं मिली।तब राम खुद भेष बदल बदल कर अपने नगर में घूमघूम कर जनता की बातों को सुनते।थे।ये राम राज की विशेषता होती है।क्या आप ऐसा करने में सक्षम हैं?क्यों किसी केस को इतना जटिल बना दिया जाता है कि उसपर फैसला सुनाने में सदियां गुजर जा रही हैं।है किसी के पास इसका जवाब?
जनता जब अपना प्रतिनिधि विधायक, सांसद चुन कर सदन में भेजती है तो उसकी जिम्मेदारी होती है कि वह अपने क्षेत्र की समस्याओं को सदन के सामने रखे।बहुत भारी खर्च आता है जब सदन चलता है लेकिन लोग कभी क्षेत्र की समस्या और उसके समाधान की बात नहीं करते।बल्कि एक दूजे पर आरोप लगाते हैं।सदन छोड़कर भाग जाते हैं लेकिन लेकिन किसी समस्या के पीछे क्या कारण है?उसे दूर कैसे करें? किसी को मुकदमों में फँसाकर, उलझाकर क्यों रखा जाता है? ये तमाम बातें लोग पूछ सकते हैं।देर से मिलने वाले न्याय का औचित्य क्या है।जब घाव मिट गया हो तब मरहम लगाने से क्या लाभ? अगर देश में न्यायाधीश लोगों की कमी है तो उसे और बढ़ाया जाए।ये तमाम चर्चाएं होनी चाहिये लेकिन नहीं होती।भ्रष्टाचार इतना क्यों बढ़ता जा रहा है, इसे रोकने का अबतक कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाया गया।सवाल तो इसपर होना चाहिए ताकि देश आगे बढ़े।लेकिन सदन में चर्चा होती है अपने स्वार्थ की।सभी लोग अपनी जुगत में दल बदलते रहते हैं कि कहाँ जाने से उन्हें मंत्रालय मिल सकता है।लोग पाँचसाल के लिए चुन कर जाते हैं लेकिन साल दो साल में सीटें छोड़ देते हैं और वहाँ पर पुनः चुनाव करना पड़ता है जिससे काफी धन खर्च हो जाता है और उस उप चुनाव में भी वे पुनः उतर आते हैं तो कोई ये नहीं पूछता कि फिर बीच में आपने सीट क्यों छोड़ी।आपके ही वजह से यहाँ दुबारा चुनाव कराना पड़ रहा है।बल्कि होना तो ये चाहिए कि जो भी नेता किसी सीट से चुनाव जीतने के बाद अगर अधूरे कार्यकाल में ही सीट छोड़ता है तो आजीवन उसे चुनाव लड़ने से बंचित कर दिया जाना चाहिए।और यह काम चुनाव आयोग कर सकता है लेकिन यहाँ तो किसी को भी देश से कोई सरोकार नहीं है।बस अपनी झोली भरती रहे।
अब चलते हैं हमारे लिखने का मुख्य मुद्दा जो था उसपर एक नजर डालते हैं। बात आती है कि हमारे देश की करेंसी का वैल्यू/ मूल्य इतना गिरता क्यों जा रहा है।शायद इसपर अभी तक किसी नेता ने अपनी बात नहीं रखा हो।कभी सदन में इसपर खुलकर चर्चा न हुई हो।लेकिन आज हम इसपर चर्चा शुरू करने की कोशिश करते हैं।कितने लोगों की प्रतिक्रिया आती है, यह हमें कमेंट बॉक्स में देखने को मिल सकता है।तो आपको बताना चाहूँगा कि जब हम भारतीय लोग पराधीन थे उस दौर में हमारे देश की मुद्रा इतनी मजबूत थी, इतनी बड़ी थी कि हमारा भारतीय एक रुपया पूरे सत्रह डालर के बराबर होता था।
१ ₹ = १७ $ आकड़े १९१७ के
1₹ = 17 $
जी हाँ यही सत्य है और आजतक किसी ने इसपर चर्चा नहीं की।
जब भारत स्वतंत्र भारत बना और भारत को हिंदू और मुसलमान दोनों धर्म के नाम पर बाँटा गया तो भारत पूर्ण रूप से हिंदू राष्ट्र होना चाहिए था।पाकिस्तान से हिन्दुओं को खदेड़ कर भगाया गया लेकिन भारत का हिंदुस्तान मुरौवत दिखाई और यहां रहने वाले मुसलमानों को भारत में रहने की छूट दे दिया और कहा कि जो यहां अपनी मर्जी से रहना चाहते हैं वो रह सकते हैं।और भारी मात्रा में यहाँ मुस्लिम समुदाय के लोग आज भी उतने ही स्वतंत्र खयालों में जी रहे हैं जितने हिंदू।अब यहाँ अगर कुछ राजनीति के पुरोधा अपने स्वार्थ में आकर वैमनस्यता फैला रहे हैं तो यह उनकी बात है।देश ने सबको सम्मान दिया।उनके लिए वक्फ़बोर्ड भी यहां बना दिया जो नहीं चाहिए था।क्योंकि धर्म के नाम पर ही देश का बंटवारा हुआ था तो उन्हें जो चाहिए उसे वे अपने हिस्से के देश पाकिस्तान से लेते।हिन्दुस्तान ने उन्हें रहने के लिए पनाह दिया, वही क्या कम था।लेकिन नहीं फिर भी हिन्दुस्तान ने उनके लिए वो सबकुछ किया जो पाकिस्तान भी अपने नागरिकों के लिए आजतक न कर सका।सवाल यह है भारत को दो हिस्सों में बाँटा ही क्यों गया।जब यहाँ भी मुसलमान हैं और पाकिस्तान में भी कुछ नाम मात्र के हिन्दू रह गये।यह सवाल खड़ा होता है और हमेशा यह सवाल रहेगा कि जिस देश को सिर्फ धर्म जाति के आधार पर तोड़ा गया हो तो भारत के एक हिस्से में हिंदू और दूसरे हिस्से में मुसलमान होने चाहिए थे।लेकिन दोनों देशों में कम या ज्यादा हिन्दू भी हैं और मुसलमान भी हैं।
बात साफ है लेकिन कोई इसपर बोलना नहीं चाहता।भारत में दो बड़े राजनयिक परिवार के लोग थे जिन्हें अँग्रेजों की चापलूसी खूब पसंद थी।दोनों अपने जीवन काल में अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए जाने जाते हैं लेकिन दबी जुबान। कोईखुलकर कभी आरोप लगाने का साहस नहीं कर सकता था।क्योंकि तब उनकी सरकार बन चुकी थी और वे जिसे चाहते फँसा कर कानून के सिकंजे में आजीवन रौंदने का तजुर्बा था उनका।बस यही कारण रहा कि वे जैसा चाहते करते गये।एक ही साथ दो लोग प्रधानमंत्री बनने के लिए लालायित थे।लेकिन एक राष्ट्र का एक ही प्रधानमंत्री बन सकता था।ऐसी व्यवस्था होनी थी।तो दो लोग प्रधानमंत्री कैसे बनेंगे।इसलिए हिन्दू, मुस्लिम के नाम पर भारत को दो हिस्सों में बाँट दिया गया और किसी ने विरोध करने की हिम्मत नहीं दिखाई।अब जबकि दो स्वतंत्र देश बन गए तो दो दो प्रधानमंत्री, दो दो राष्ट्रपति बनाया जा सकता था।सारा खेल यही से शुरू होता है।ऐसा भी सुनने को आता है कि पंडित जवाहरलाल नेहरू जी से ज्यादा बहुमत सरदार बल्लभ भाई पटेल जी के पास था लेकिन नेहरू जी किसी भी हालत में प्रधानमंत्री पद से कम पर मानने को तैयार ही नहीं थे।इसलिए पटेल जी खुद इस लड़ाई से बाहर हो गये।
अब फिर भारत की उसी करेंसी की बात पर आते हैं।
अभी हमनें बताया कि सन 1917 में भारतीय मुद्दा एक रुपया 17 डालर के बराबर जो था, वो स्वतंत्रता संग्राम के कारण लड़ाई झगड़े में फँसकर सन 1947 में आते आते एक रुपया एक डालर के बराबर आकर बैठ गया।
₹ 1/- = 1 $ सन् 1947 में
जी हाँ।जब भारत को आजादी मिली तो डालर मजबूत होते होते 1917 से 1947 तक आते आते भारत का गिरेबान पकड़ लिया।और उसके बराबर तराजू के पलड़े पर आसानी से अपना वर्चस्व कायम करने में कामयाब हो गया।
जब देश आजाद हो गया तब भी हमारा भारत अपनी मजबूत पैठ कभी भी स्थापित नहीं किया। हर साल नीचे की ओर लुढ़कते चला गया।कभी किसी राजनीतिज्ञ ने भारत के रुपये को मजबूत बनाने की कोई कोशिश नहीं किया।अगर किसी ने इस पर ध्यान दिया होता तो कम से कम वह वहीं पर रुक तो गया होता।लेकिन सभी दल आते रहे ,देश को आजमाते रहे।जिससे जितना बन पड़ा, देश को लूटकर विदेशों में अपने पैसे जमा करने में लगे रहे।सभी बड़े राजनीति के योद्धा अपने काली कमाई का भारी हिस्सा विदेशों में जाकर ठूँस दिया।भारत की मुद्रा दिन प्रतिदिन कमजोर होती जा रही थी और उसका कारण था कि यहां का खजाना खाली होता जा रहा था।बहुत ही तेजी से लोग भारत को लूटलूटकर विदेशों में जमा कर रहे थे।उसी समय बाबू जगजीवनराम का भी नाम चर्चा में आया था और भारत की प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी जी बन चुकी थीं।लेकिन बाबू जगजीवन राम को अपने जमा पैसे भारत में वापस लेने के लिए प्रधानमंत्री के हस्ताक्षर की आवश्यकता आ पड़ी लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री ने हस्ताक्षर करने से साफ इनकार कर दिया था और वह पैसा वहीं पर रह गया।सभी प्रमुख दलों के लोग जिनके पास ज्यादा पैसे हो जाते थे तो वह उसे भारत में जमा न करके विदेशों में ही जमा करता था।
कारण यह था कि यहां रहेगा तो जवाब देही बन सकती है।ईडी के छापे में आदमी फंस सकता है।बस इसी को छुपाने के लिए लोग विदेशों में भारत के रुपये जमा कर आते थे।और भारत की मुद्रा लगातार घटती जा रही थी।आज आजादी के छिहत्तर साल हो चुके हैं और जो भारत की मुद्रा आजादी मिलने के समय में डालर के बराबर थी आज छिहत्तर साल में एक डालर भारत के लगभग 83 ₹ के बराबर आ चुका है।
$1 = ₹ 82.92
आज का आंकड़ा यही दर्शाता है।लेकिन कभी किसी ने देश से सवाल नहीं पूछा कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?हमारे देश की अर्थव्यवस्था इतनी कमजोर हालत में कैसे पहुंच गई।कौन पूछेगा उस दरबार में तो सिर्फ चोर ही चोर बैठे हों तो सवाल भला पूछे कौन?अगर कोई पूछता भी है तो जवाब कौन देगा।
थबजब सरकार बदलती है तो राजनेताओं की पोल खुलती है।बड़ेबड़े घोटाले के सिवा कुछ भी नहीं मिलता।आजीवन मुकदमा चल सकता है लेकिन सजा नहीं दी जाती है।कुछ लोग कुछ दिनों में बरी भी कर दिये जाते हैं।और जो लोग बरी नहीं हो पाते वे पैरोल पर बाहर आकर जश्न में डूब जाते हैं।अब किसकी मजाल कोई उंगली उठा दे।कुछ बड़े लोग भारत को लूटकर विदेश में बस जाते हैं और उन्हें भगाने में भी सरकार ही सहायता प्रदान करती है।आपको मालूम होगा कि नीरव मोदी, विजयमाल्या जैसे रइसों ने कितना धन गबन करके विदेशों में चैन से मजे लूट रहे हैं और तो और देश में ही बैठकर सहारा श्री के नाम से मशहूर सुब्रत राय सहारा देश के राजनेताओं के संग बैठकर मजे कर रहा है।देश की जनता चिल्ला रही है, बिलख रही है, रो रही है लेकिन सरकार को उसकंपनी के खिलाफ मुकदमा चलाने की ओर लोगों के पैसे दिलाने की कोई व्यवस्था नहीं है।बल्कि जनता के साथ सरकार खुद धोखा करती दिख रही है।
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