मंगलवार, 5 सितंबर 2023

मंदोदरी की जीवनगाथा

 मंदोदरी  की जीवनगाथा✍️


       👏जय श्रीराम। 🙏🚩



        मंदोदरी रामायण के सबसे प्रमुख पात्रों में से एक है। मय दानव और हेमा नामक अप्सरा की पुत्री और रावण की पट्टमहिषी थी। इन्हे पञ्चसतियों में से एक माना जाता है। मय और हेमा के दो पुत्र भी थे - दुदुम्भी और मायावी। मंदोदरी के ये दोनों पुत्र वानरराज बाली के हाथों मारे गए।

           कई ग्रंथों का कहना है कि मय दानव केवल इनके दत्तक पिता थे और मय और हेमा ने केवल मंदोदरी का पालन पोषण किया। इस विषय में मंदोदरी के पूर्वजन्म की एक बड़ी अनोखी कथा है।
          एक कथा के अनुसार मधुरा नामक एकअप्सरा थी जो एक बार भगवान शंकरजी के दर्शन के लिए कैलाश पहुँची। भोलेनाथ उस समय समाधि में थे। मधुरा शिव जी काअलौकिक रूप देख कर मोहित हो जाती है। माता पार्वती को कहीं आस पास ना देख कर मधुरा नाचने लगती है और अपनेआलिंगन द्वारा महादेव को रिझाने का प्रयास करने लगी। बहुत प्रयत्न के पश्चात भी जब वो महादेव का तप भंग ना कर पायी थी तभी माता पार्वती वहाँ पहुंच जाती हैं।मधुरा के शरीर पर महादेव की भस्म लगी देख कर वे बड़ी क्रोधित हुई। उन्होंने मधुरा को मेढ़की बनने का श्राप दे दिया।

            जब भगवान शंकर जागे तो उन्होंने पार्वतीजी से कहा कि ये कन्या भूलवश मुझपर आकर्षित हो गयी थी।अतः इसकी गलती को एक बालिका की गलती समझ कर क्षमा कर दो।
तब पार्वती जी ने अपने श्राप को सीमित करते हुए कहा कि वो केवल 12 वर्षों तक मेढ़की के रूप में रहेगी और अगर इसने उन१२ वर्षों तक घोर तप किया तब उसे उस योनि से मुक्ति भी मिल जाएगी।

        श्राप के कारण मधुरा मेढ़की बनकर एक कुँए में गिर पड़ी। वहीं उसने भगवान शंकर की १२ वर्षों तक घोर तपस्या की। उसने अपने मन ही मन में महादेव से ये कामना की कि उसका विवाह संसार के सबसे शक्तिशाली और विद्वान व्यक्ति से हो।भगवान शंकर उसकी तपस्या से अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने उसे श्रेष्ठ पति को प्राप्त करने का वरदान दिया। साथ ही उन्होंने मधुरा को चिरकुमारी रहने का भी वरदान दे दिया, जिसके कारण उसका यौवन कभी क्षीण नहीं होता था।

           महादेव से मिले वरदान से मधुरा पुनः अपने असली स्वरुप में आ गयी और स्वयं को उस कुँए से बाहर निकलने हेतु सहायता के लिए चिल्लाने लगी। उसी कुँए के पास मय दानव अपनी पत्नी हेमा के साथ विचरण कर रहा था। एक स्त्री की पुकार सुनकर दोनों वहाँ आये और कुँयें के अंदर पड़ी स्त्री को देखा तो तुरन्त उसको कुँए से बाहर निकला। उसे देख कर दोनों के मन में स्वतः ही वात्सल्य जाग उठा और दोनों ने उसे अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया और उसकी छरहरी काया के कारण उन्होंने उसका नाम मंदोदरी (कम उदर (पेट) वाली) रखा।
   


        मंदोदरी के युवा होने पर मय दानव पूरे विश्व में उसके लिए योग्य वर ढूंढता रहा किन्तु कोई भी योग्य वर उसे मंदोदरी के लिए नहीं दिखा।मय को बेटी के ब्याह की चिंता खाये जा रही थी
उस समय रावण का पराक्रम विश्व में कहा सुना जाता था जिसने अपने प्रचंड पराक्रम से मनुष्यों, नाग, गन्धर्व, यक्ष, दैत्य, दानव और देवताओं तक पर अपना अधिपत्य जमा लियाथा।
            रावण , ब्रह्मा का प्रपौत्र, महर्षि पुलत्स्य का पौत्र और विश्रवा मुनि का पुत्र था। उसे चारो वेद कंठस्थ थे और उस युग में उससे विद्वान कोई और नहीं था। रावण के गुण महादेव के दोनों वरदानों को संतुष्ट करते थे। और वह स्वयं महादेव का भी कृपा पात्र था।महादेव जी के परम भक्त कहलाने वाले रावण जिसके दस शीश और बीस भुजाएं थीं,बहुत ही बलशाली था रावण। शिवजी की पूजा में रावण ने अपने शीश तक काटकर अर्पित कर दिया था। रावण एक एक करके सभी राजाओं को जीतते जा रहा था।और उसके भय से लोग काँपने लगे थे।एक दिन उसने मय दानव के राज्य पर भी आक्रमण कर दिया।बहुत ही भयंकर युद्ध शुरू हुआ।दोनों तरफ से ढेरों सैनिक मरते जा रहे थे।मय दानव अपनी मायावी शक्तियों से कुशलतापूर्वक युद्ध कर रहा था और जैसे तैसे उसने रावण को बंधक बना लिया।

        रावण को बंधक बनाकर उसने उसकी बलि देनी चाही।लेकिन ऐसा कहा जाता है कि जबजब उसने रावण की गर्दन पर वार किया, गर्दन भी कटी लेकिन वह बार बार जुड़ जाती रही।मंदोदरी छुपछुपाकर यह दृष्य देख रही थी।जब उसके पिता रावण की गर्दन पर वार करते, मंदोदरी भगवान शंकर को मन ही मन याद कर रावण के प्राण रक्षा की मिन्नतें मागती रहती।जैसे गर्दन कटती वह आँखें भींच लेती और जब उसकी आँखें खुलतीं तो रावण के सभी सिर मौजूद रहते।इस तरह रावण को बार बार मरते और पुनः जीवित होते देखकर मंदोदरी मुस्कुराने लगती। रावण भी मंदोदरी को देखकर मानों मोहित हुआ जा रहा था।अब उसके मन में भी प्रणय वेदना जागृत होने लगी। मन ही मन रावण भी मंदोदरी से प्यार करने लगा।उसे अपनी महारानी बनाने की इच्छा होने लगी।पिता की नजर जब पुत्री की ओर गई और उसे रावण को बेवश निगाहों से निहारते हुए पाया तो थकान से चूर मय ने रावण से अपनी पुत्री ब्याहने की बात कहकर उसे मुक्त कर दिया।मय ने रावण को समझाते हुए कहा कि मैं तुम्हें मुक्त करता हूँ, लेकिन उसके लिए तुम्हें हमारी पुत्री से विवाह करना होगा।रावण सहर्ष स्वीकार कर लिया।इस प्रकार से रावण और मंदोदरी दोनों एक दूसरे के हो गए।

  

              उस समय   पूरे विश्व में मंदोदरी के समान सुन्दर स्त्री  कोई नहीं थी इसीलिए रावण ने उस प्रस्ताव को सहर्ष स्वीकार कर लिया। रावण से विवाह के बाद मंदोदरी लंका की महारानी बनी जिसे रावण ने अपने सौतेले भाई कुबेर से युद्ध में छीना था। मंदोदरी स्वयं विदुषी थी और कहा जाता है कि वो प्रायः राज-काज चलाने में रावण की सहायता करती थी। रावण को मंदोदरी से मेघनाद, प्रहस्त और अक्षयकुमार नामक तेजस्वी पुत्र प्राप्त हुए।

रावण ने त्रिकूट पर्वत के ऊपर अपना भव्य विलास भवन बना रखा था जहाँ रावण के साथ बैठने की अनुमति केवल मंदोदरी को ही थी। ऐसी मान्यता है कि रावण के साथ मनोरंजनार्थ मंदोदरी ने ही सर्वप्रथम शतरंज के खेल का आरम्भ किया था। उसी खेल से चतुरंगिणी और अक्षौहिणी सेना के सन्दर्भ का आरम्भ हुआ। आज राजस्थान के जोधपुर जिले में "मंडोर" नामक एक स्थान है जिसका नाम मंदोदरी पर ही पड़ा है और मंदोदरी वहाँ की कुलदेवी मानी जाती है। उनकी मान्यता है कि इसी स्थान पर रावण और मंदोदरी का विवाह हुआ था।

मंदोदरी को पता था रावण की सभी बुराई

मंदोदरी को सदा से पता था कि रावण में कितनी बुराई है किन्तु फिर भी उसने सदा उससे प्रेम किया। किन्तु उसके बाद भी वो सदा रावण को सही मार्ग पर लाने का प्रयास करती रही। ऐसा वर्णन है कि मंदोदरी ने रावण को नवग्रहों को बंदी बनाने से रोका था। जब रावण वेदवती पर मुग्ध  हो गया था तब भी मंदोदरी ने उसे ऐसा करने से मना किया था किन्तु रावण नहीं माना और उससे उसका अनिष्ट भी हुआ। रावण को मंदोदरी की दी गई सीख कभी पसंद नहीं आती थी, फिरभी उसके लिए रावण के मन में कभी सम्मान कम नहीं हुआ।

जब शूर्पणखा लक्ष्मण से अपमानित होकर लंका आई तब मंदोदरी ने उसे सांत्वना दी,समझाया बुझाया; किन्तु जब सूपनखा ने रावण को सीता हरण का सुझाव दिया तब मंदोदरी ने उसका काफी विरोध किया। जब रावण सीता का हरण कर लाया तब मंदोदरी ने ही रावण को सुझाव दिया कि उन्हें राजमहल के बजाय अशोक वाटिका में रखें। मंदोदरी सीता से बड़ी थी और सदा उन्होंने उनके प्रति सहानुभूति रखी। जब सीता अशोक वाटिका में थीं, तब मंदोदरी उन्हें अपने उत्तम वस्त्र ये कहते हुए भेजी थीं कि ये एक रानी की ओर से एक अन्य रानी के लिए उपहार है। हालाँकि माँ सीता उन वस्त्रों को ये कहते हुए नहीं लीं क्योंकि उनके पास माता अनुसूया के दिए हुए दिव्य वस्त्र हैं।

जब रावण सीता को किसी प्रकार का प्रलोभन ना दे पाया तो वो उनकी हत्या करने का मन बनाया। तब मंदोदरी ने रावण का हाथ पकड़ लिया और समझा बुझा कर ऐसा करने से मना कर दिया। मंदोदरी ने ही मेघनाद और अपने अन्य पुत्रों को ये आज्ञा दी थीं कि वो कभी सीता के सामने ना पड़ें।

           भगवान शिव के दिये वरदान के कारण मंदोदरी सदा युवती बनी रहती थी। वो इतनी सुन्दर थी कि जब हनुमान सीताजी को खोजते हुए लंका आये और उन्होंने मंदोदरी को देखा तो उनका तेज देख कर उन्हें लगा कि यही माँ सीता हैं। वे मंदोदरी को प्रणाम करते हैं। किन्तु जब उन्होंने रावण को उनके साथ सोता देखा तब उन्हें विश्वास हुआ कि ये माता सीता नहीं हो सकतीं क्योंकि वे ऐसा कभी नहीं कर सकतीं।

       मंदोदरी अपने पति के साथ एक बार सीताजी  से मिलने अशोक वाटिका भी गयीं थीं किन्तु अकेले उन दोनों के मिलने का वर्णन नहीं है। ऐसा माना जाता है कि मंदोदरी ने ही त्रिजटा को ये आज्ञा दी थीं कि वो सीताजी का उचित ध्यान रखे और उनके मनोबल को बढाती रहे।

         समय आने पर मंदोदरी ने रावण की खुलकर विरोधऔर विभीषण का समर्थन भी कियाथा  ताकि सीता को श्रीराम को लौटा दिया जाये।

   (आज बस इतना ही.. आगे की कथा फिर कभी।इसी तरह की कथा कहानियों को लेकर हम आते रहेंगे।तो बने रहिये हमारे साथ।)
   आपका साभार 
            --  मालचन्द कन्नौजिया बेपनाह

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