बलि का बकरा
कविता :- 🐐 बलि का बकरा 🐐
क्या कुसूर है मेरा,
क्या कुसूर है मेरा
मेरे मालिक मुझे बता दो।
हो भूल खता गर कोई,
मत इतनी बड़ी सजा दो।।
अबतक था मैं, प्रिय तुम्हारा,
जैसे हो जन्मों जन्मों का नाता।
क्या इसी दिन की खातिर
मुझको बेटों के जैसे था पाला।।
चंद रूपयों की खातिर ही,
मेरे प्राणों का सौदा करते हो।
क्या ऐसा करने से पहले
तुम ईश्वर से नहीं डरते हो?
विश्वास किया था मैंने तुझपर
ना समझ सका,तेरे झूठे प्यार को।
चलवा दिया आज,छूरी गर्दन पर
अब खाओगे तुम मेरे माँस को।।
बड़े क्रूर हो,नासमझ हो,
कब समझोगे अपने आप को?
कर दिये दगा विश्वास संग मेरे
क्या लौटा सकते हो, मेरे प्राण को?
गर तेरे जैसा मैं भी होता,
तेरे झाँसे में मैं ना आता।
हमनें समझा दयावान तुझे
शैतान ही पहले समझा होता।।
मैं तो हूँ, एक बलि का बकरा,
भला कबतक खैर मनाऊंगा।
एक ना एक दिन, मरना ही है
यूँ कबतक जश्न मनाऊंगा।।
पर तुम भी मत भूलो,ऐ इंसानों
ईश्वर के घर अंधेर नहीं।
आना जाना तो लगा रहेगा
कबतक चलेगा यूँ खेल यही।।
सोच लिया मेरी किस्मत में
ऐसा ही कुछ लिक्खा था।
वह दम कहाँ इंसानों में मालचन्द
मरना तो एक दिन पक्का था।।
आप अपने विचारों से हमें अवगत कराते रहें।
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