रूठा न कर ऐ जिंदगी
रूठा न कर ऐ जिंदगी
रूठा न कर ऐ जिंदगी, मै तो खुद मजबूर हूँ
बचपन रूठकर चला गया, यौवन से भी दूर हूँ
कदम कदम पर ठोकरें चीर देती हैं हौसले
क्या करूँ अब तूँ ही बता, पा सकूँ फिर मंजिलें
ऐ मेरे भगवन बता, क्यों खफा मुझसे है तूँ
क्या गुनाह मैंने किया जिसकी सजा देता है तूँ
पैदा किया दुनियां में तूने, जब हर किसी इंसान को
फिर ये मजहब क्यों बनाया वो कहे अल्ला मैं कहूँ भगवान है तूँ
आज इस जमाने में गरीब होना भी पाप है
दौलत है पास जिसके, कत्ल भी माफ है
यहां की छोड़ो सुना है, स्वर्ग में भीलक्ष्मी का वास है
पास पैसा नहीं अगर हो तो जिंदगी दुशवार है
करके बड़ा परिश्रम रोटी नसीब नहीं होती
रातभर तड़पती जान सारी दुनियां जब सोती
किस्मत में जो लिख गया हरगिज मिटा सकते नहीं
अफसोस क्यों रे मालचन्द, तेरा कुछ बिगड़ सकता नहीं
बनाना और बनाकर बिगाड़ देना
सब उसके हाथ है
चलता है खोटा सिक्का भी तबतक
जबतक किस्मत साथ है
मेरे चाहने न चाहने से जबतक तेरी मर्जी न हो
कौन भला पहचानता हैजबतक तेरी मर्जी न हो



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