शुक्रवार, 22 सितंबर 2023

एक नजर इधर भी

एक नजर इधर भी डाल दो सरकार

( यहाँ पर हमनें अपनी भोजपुरी और गंवईं भाषा में यह छोटीसी कविता प्रेसित किया है।हमारे यहाँ सरकार द्वारा चलाये जाने वाले सभी प्राथमिक और जुनियर हाईस्कूल तक हालात कुछ ऐसे हैं कि देखकर सोचना पढ़ता है कि सरकार बच्चों को पढ़ाने के लिए स्कूल भवन से लगाये भारी भरकम वेतनभोगी शिक्षक को भर्ती करके इन स्कूलों को चला रही है लेकिन उनमें बच्चे कितने हैं।आखिर क्या कारण है कि जिस नीजी विद्यालय में छोटे बच्चों को पढ़ाने वाले अधिकांश लोग बिना किसी डिग्री के होते हैं और उन्हें मुश्किल से आठ दस हजार रुपये ही नीजी स्कूल सेलरी देते हैं और वहाँ इतने सारे बच्चे क्यों होते हैं।कुछ ही साल बाद स्कूल प्रबंधन उन गरीब बच्चों की फीस उगाही से स्कूल के नाम पर अनेकों बसें खरीद ले रहे हैं।जबकि सरकार द्वारा चलाये जा रहे स्कूल की फीस लगाकर देखा जाय तो जिस स्कूल में पाँ  छ अध्यापक हैं वे एक भी अध्यापक के लिए सेलरी नहीं जुटा पायेंगे। हमारी कविता में सामान्य तौर पर देखी गई परिस्थितियों को अपनी भाषा में वर्णन करते हुए लिखने का प्रयास किया है।)





एक हाथ से अँगूरी पकड़े, एक हाथ से कच्छा

का पढ़बा स्कूल में जाके, तोंहसे भारी हौ बस्ता

सब जानत हौ,केहू बोलत नइखे
केतना होले पढ़ाई इहाँ अच्छा
पढ़ै लिखे के सबके बाटै,का भतीजा या चच्चा।।

बरसाती मेढक के जइसे,सगरी ओर स्कूल भइल
दस पास के डिग्री लेके लइकन के ऊहे गुरु भगल
सरकारी स्कूलन में भइया, अब केहुके लइका ना पढ़िहैं
नरसरिया के सनक समागल,लइका खिचड़ी खाये ना जइहें।

अब मौका के फायदा केना उठाई
मालचन्द कहदा तूँ समझाई
कलम दवात काँपी किताब सब स्कुलवै में बेचल जाई
दू चार गो रुपिया एसहूँ आई,फीस भी दुन्ना लिहलजाई
अब सात बेर जेकरा चुर्राई,आपन लइका इहाँ पढ़ाई


जेकर लइका सरकारी में पढ़िहैं
सरकारी लाभ उहे सब पइहैं
किताब के साथे ड्रेस भी पइहैं
पढ़लिख के पारंगत होइहैं
खिचड़ी खाये भले रोज जइहैं
लेके कटोरा लाइन में लगिहैं
दस बजी गुरूजी अइहैं
मास्टरनी से हँसहँस बतियइहैं



गुरुवाइन जी सुइटर बुनिहैं
जोरजोर लइका चिल्लइहैं
मेज के उप्पर टाँग पसारके
मास्टर जी कहीं सुत्तल होइहैं
खिचड़ी खिलाके सरकार भुलवावत
नइखे जोर पढ़ाई पर
नरसरिया के भरमार भइल बा
उनकर निगाह कमाई पर



पढ़ाई होले अब ट्यूशन मा
आ स्कूल से डिग्री मिलेला
होले जरूरत जब ट्यूशन के
केहूसे ना जूरेला।
साँच कहिला त जहर अस लागे
एहिसे न सब जरत बा
मालचन्द अब का बतियइहैं
कहाँ केहू अब समझेला।।
एही से हम कहत बानी
आपन दीदा मूनत बानी
एक नजर इधर भीआपन
डाल देइत सरकार
शिक्षा के मान बढ़ी इहवाँ भी
जब निगरानी रखिहैं आप।।
                    ,🥀 मालचन्द कन्नौजिया बेपनाह✍️

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