ग्रामीण शिक्षा बनाम सरकारी विद्यालय
भोजपुरी काव्य रचना
ग्रामीण शिक्षा- सरकारी विद्यालय की
एक दिन प्राइमरी स्कूल के मास्टर से पूछलीं
एहमें कवनों लइका तोहरो बाय।।
आँख तरेर के मास्टर जी तकलैं
का, हमरै पउवा हल्लुक बाय ।।
बारह व्यंजन हमरा घरे पाके
आ लइका हमार खिचड़ी खाय ।।
साठ हजार हम खुद पाईला
मलकिनियों बा आँगनबाड़ी ।।
अब तोहसे ज्यादा का बतियाईं
का नइखे समझत दुनियाँदारी।।
सबकुछ पइसा से मोल बिकात बाय
तूँ झाँकत हया, योजना सरकारी।।
पढ़ै लिखे में का रखल बाय
खिचड़ी हौ सबपर भारी।।
इहै स्थिति बाय यूपी के गाँवन में
मीडिल प्राइमरी सरकारी स्कूलन के।।
जहाँ के मास्टर खुद कतरालैं
आपन लइका इहाँ पढ़वले में ।।
सरकार निकम्मी आन्हर बनके
जुटल हौ तनखाह बढ़उले में।।
दाम के बदले काम भी चाही
का मतलब एइसन स्कूल चलउले के।।
कुछ जने बढ़ियां एहुवों हँउवें
जे ड्यूटी आपन निभावेलन।।
कुछ त आपन फर्ज करा
खुद दुसरो के समझावेलन।।
गेहूं के संगे घुनों पिसाला
झूठहीं मालचन्द का चिल्लाला।।
जइसन जे हौ,वोइसै रहेदा
चला तूँ आपन रस्ता नापा।।
जवन हाल बा इनके स्कूलन के
सेतियो में सब मँहगँ बाटे
ठाट से बइठके कुर्सी तोरे ।।
लइका बइठल खूब चिल्लालै
गुरुवाइन जी सुइटर जब बीनै।।
कुल महगाई इनहीं लोग के
जब चाहैं धरना पर बइठै
हारमान के सरकार बेचारी
वेतन भत्ता रोज बढ़ावैं।।
बेरोजगारन के भीड़ लगल बा
डिग्री ले ले लोग रोवत बा
ये बाबू हम खेत नाखनबैं
काहे एइसन स्कूल बनलबा।।
जहाँ से पढ़के रोजगार न मिले
रोजीरोटी के काम न सूझे
अनपढ़वा सब खूब कमालन
इनसे अच्छा ऊहे सब बाड़न।।
अरे मालचन्द चुप रहा अब
प्याज क बोकला लगे उघारै
शिक्षा से सब ज्ञान मिलेला
शिक्षा के बदनाम करा जन।।
👉 मालचन्द कन्नौजिया बेपनाह ✍️


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