आजादी के बाद का हमारा भारत
आजादी के बाद का हमारा भारत
आजाद भारत गांधी एवं नेहरू का क्यों और कैसे बना
एक थी कांग्रेस, फिर हुआ कांग्रेस का पूरा देश।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद जो हालात उभरकर सामने आए ,उसका यही हाल रहा, यही इतिहास रहा । आजादी के बाद के भारत में कांग्रेस और गांधी एवं नेहरू का जो वर्चस्व कायम हुआ, उसी कांग्रेस ने मोहनदास करमचंद गांधी को राष्ट्रपिता घोषित कर लिया।मोहनदास करमचंद महात्मा कहलाने लगे थे और नेहरू को राष्ट्र का चाचा । कितना अजीब खेल शुरू हो गया अँग्रेजों के भारत छोड़ते ही।प्रधानमंत्री पद के दावेदारों ने अपने आप को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर स्थापित करने में जी जान से लग गये।पहले मैं, पहले मैं के आपसी संघर्ष में दो नेताओं ने कुर्सी से लिपट कर पकड़ लिया और कोई उसे छोड़ने को राजी ही नहीं हो रहा था।भारत को बाँट कर दो हिस्से कर दिया गया और दोनों को दे दिया गया।लो जाओ दोनों खुश रहो।किसे और कैसे उन्हें रोके कौन? रोकने का काम करने वाले तब थे भी नहीं।वेतो देश की आजादी की जंग लड़ते लड़ते या तो मर गये थे या मरवा दिये गये थे और जो थोड़े बहुत थे भी तो उनकी आवाज नक्कारखाने में बजने वाली शहनाई की आवाज जैसी रही।
अब दूसरी बात आजादी के पहले का भारत और आजादी के बाद का भारत और इसी अंतराल के मध्य कहीं पिता के रूप में गांधी और चाचा के रूप में नेहरू बैठा दिये गये और ढिढोरा पीटने के लिए कांग्रेसियों को काम पर लगा दिया गया। क्रांतिकारियों की सहादत और उनके कार्यों को आतंकवादी कार्य का जामा पहनाने वाले गांधी नेहरू ने इतिहास पटल से उन्हें ऐसा लापता करवा दिया कि बहुत से लोग उनके नाम और काम दोनों को भूल गए।और बाद की कांग्रेस सरकारों ने ढोल पीट पीट कर इन दोनों को राष्ट्रपिता महात्मा गांधी और चाचा के रूप में नेहरू को स्थापित करवा दिया। धन और पद लोलुप बामपंथी इतिहास कारों से इसे प्रमाणित भी करवा लिया गया क्योंकि सत्ता पर काबिज कांग्रेस के लिए ये कोई दुस्तर काम नहीं था। आजादी के साथ ही भारत के कुछ खास रिश्तेदार निकल कर सामने आये ।उनमें से बापू यानी राष्ट्रपिता, चाचा नेहरूतो थे ही तबतक अम्मा भी आगयीं,फिर एक बहन जी ने भी राजनीति के गलियारों में अपनी झलक दिखाई।बहनजी के बाद एक दीदी को लोगों ने ढूंढ निकाला।वह भी भारत की राजनीति में खूब चर्चित हुईं। कहा गया है कि अगर सत्ता हाथ में हो तो रोज कानून बनाया जा सकता है और उसे रोज तोड़ा भी जा सकता है। एक कहावत चरितार्थ हो गई यहाँ पर--
'' सइयाँ भये कोतवाल, अब डर काहे का।यह कहावत इसपर सटीक बैठती है। ''
अब बात आती है कांग्रेस की चौथी पीढ़ी के कांग्रेस के प्रभुओं की अर्थात राहुल और सोनिया की जिन्होंने भारत को अपनी बपौती समझते रहे ।देश की अर्थव्यवस्था गिरती जा रही थी और इन्हें सबकुछ तबतक ठीक लगता रहा, जबतक उनकी केन्द्र में सरकार थी।जैसे ही उनकी सरकार गई तो उन्हें देश की गरीबी, बेरोजगारी, मँहगाई सबकुछ साफ साफ दिखाई देने लगी। आजादी के बाद कश्मीर के लिए दोहरी नीति लेकर आ गये।वहां के लिए अलग से नियम बनाया गया था धारा 370 नाम से एक संविधान में अलग ही अनुच्छेद जोड़ा गया था।जिससे भारत का किसी भी अन्य राज्य का नागरिक जम्मू कश्मीर में जाकर नहीं बस सकता था।ऐसा क्यों किया गया, उसके पीछे काँग्रेस की क्या मंशा रही होगी, उसे तो वो ही लोग जानते थे।भारत कभी इतना विस्तृत भूभाग पर फैला हुआ था, उस अखंड भारत को तोड़ते तोड़ते पता ही नहीं चला कब इतना सीमित हो गया।आजभी इसे और छोटा करनेवाले कुछ गैंग साँसें ले रहे हैं।
आज एक बार फिर से भारत एक राष्ट्र के रूप में देखा जा रहा है। यह तो निश्चित है कि देश और राष्ट्र दोनों अपने अपने मायने रखते हैं। स्वतंत्रता के साथ ही भारत राष्ट्र घोषित तो हुआ लेकिन वास्तव में वह तब वह सिर्फ लिखा और पढ़ा जाता रहा।कब एक देश मात्र एक देश बनकर आगे बढ़ता है और कब वही देश एक उन्नत विचार धारा और नयी चेतना से युक्त प्रखर भाव में राष्ट्र बन कर आगे बढ़ता है जहाँ सबकी ऊर्जा का सदुपयोग व समरस हित और न्याय अपेक्षित हो जाते हैं। यह सरकार की नीतियों और जनता के समर्थन और सहयोग को देखकर जाना जा सकता है। जिस राष्ट्रवाद ने गांधी को राष्ट्रपिता बनाया उसके बाद से यह अभिनव राष्ट्रवाद है जो वर्तमान में भारत को ऊर्जावान किया है और सबकी निगाहें भारत पर आकर टिक जाती हैं। यह राष्ट्रवाद कांग्रेस को पसंद नहीं क्योंकि इस राष्ट्रवाद ने अभी तक सोनिया राहुल को न तो भारत रत्न प्रदान किया न भारतीय समाज के किसी खास वर्ग के लिए अर्थव्यवस्था को प्रवाहित किया। इस अभिनव राष्ट्रवाद ने समूचे भारत के हर वर्ग, हर समाज को उसकी सारी ऊर्जा के साथ आत्मसात किया है, किसी वर्ग अथवा धर्म को किसी समाज वर्ग अथवा धर्म के शव पर विकसित नहीं किया है।आज हमारे देश के वैज्ञानिकों ने चन्दयान3 के सफल प्रक्षेपण से पूरे विश्व को अपनी ओर आकर्षित कर लिया।अब तक पिछली सरकार की गलत नीतियों के कारण यहाँ वही पुराने ढर्रे पर सारी व्यवस्थाएं चल रही थीं इसलिए उतना विकास नहीं हो सकता था।जैसे ही देश को नयी उर्जा मिली, उसने सभी बड़ी ताकतों से उनके घर में जाकर उनसे मिलकर भारत में निवेश करने का न्योता दिया।उन तमाम विकसित देशों से भारत में अपने कारोबार शुरू करने के लिए सलाह मशविरा किया।आज तमाम विदेशी कंपनियों द्वारा भारत में अपने कारोबार शुरू करने की तैयारियां जोरों पर है।कुछ समय बाद यहां भी तमाम रोजगार के अवसर मिलने शुरू हो जायेंगे।
वर्तमान का राष्ट्रवाद कांग्रेस की असफल और अयोग्य नीतियों का सारांश है जो जनता उद्भूत है।यह सब राजनीति का एक दोष है लोग सत्ता हथियाने के नयेनये तरीकों से जनता को गुमराह करने में लगे हुए हैं।ऐसा नहीं है कि जबसे बीजेपी केंद्र की बागडोर संभाली है , सबकुछ दुरुस्त हो गया है।जी ऐसा बिल्कुल नहीं।इन्होंने ने भी सत्ता में आने के लिए बहुत पापड़ बेले हैं।बहुत दिनों तक हिंदू मुस्लिम किया था।राम मंदिर और बाबरी मस्जिद का मुद्दा उठाया और अब जाकर सफलता हासिल हुई।इन्हें हर काम जब चुनाव करीब होता है तभी नयीनयी योजनाओं को लाने का खयाल आता है। कालाधन को मुद्दा बना कर चुनाव में उतरने वाली भाजपा ने सबको दिलासा दिया था कि यदि वे केन्द्र में अपनी सरकार बनाने में कामयाब हो जाते हैं तो उनके एजेंडे में विदेशों में जमा कालाधन वापस लाना उनकी पहली प्राथमिकता होगी और जब यह कालाधन देश में आ जायेगा तो हर नागरिक को पन्द्रह पन्द्रह लाख रूपये उनके खाते में भेजा जाएगा।यह तो उनकी घोषणा थी।लेकिन जब वे सत्ता में आ गये तो उन्होंने सहारा या सहारा जैसी तमाम चिटफंड और रीयल स्टेट कंपनियों में ताला लगवाकर जनता के निवेश किये धन को ही मानो कालाधन समझ लिया और सब गरीब लोगों के पैसे इन कंपनियों ने हड़प लिया।जनता चिल्ला रही है लेकिन कोई सुनने वाला नहीं है।हर क्षेत्र से अपना एक विधायक और एक चुनकर जनता सदन में जब भेजती है तो उसका यही काम है कि वे अपने विधानसभा और लोकसभा क्षेत्रों की आम जन समस्याओं को सदन में उठाकर उसपर चर्चा शुरू करें गे।लेकिन यहां तो उसका सीधा उलटा होता है।लोग जीतने के बाद क्षेत्र और उसकी समस्याओं को भूल जाते हैं और उन्हें याद रहता है सिर्फ अपना घर बार,रिश्तेदार।उनका विकास कैसे हो, कोई ठेका है तो उसे किसको दिया जाय,बस।


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