रविवार, 24 सितंबर 2023

रिश्वतखोर के बा

 रिश्वतखोर के बा  (कविता)

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रिश्वत रिश्वत सब चिल्लात बा
दुनियां हो गइल रिश्वतखोर
बिन मंगले खुद पहुँचावत बाड़
लेहले में अब के बा कमजोर।।

बिन मंगले सब देत हौ भइया
तो मंगले पर के ना देई?
हमहीं तूँहीं राह देखवलीं त
अब का हँसीं का रोईं।।

आसमान पर पहुंच गइलबा रिश्वतखोरी
आसानी से नीचे अब ना उतरी
अन्ना एइसन गन्ना पेरिहैं फिरभी
कवनो रस अब ना निकरी।।

ठगी दलाली रिश्वतखोरी
भारत के इहे शान भयल
रिश्वत देके मडर कराला
पइसा माईबाप भयल।।

दउरत दउरत तूँ थक जइबा
केहू तोहार ना सूनी
बिना पइसा के बाहर भीतर
केहू कुछ में ना गूनी।।

नेता अधिकारी सब भयल व्यभिचारी
जेके चाही ऊ ओके नचाई
उनकर केहू काव उखारी
बोला रामराज का असहीं आयी।।
        🥀 🦋 मालचन्द कन्नौजिया बेपनाह

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