बुधवार, 27 सितंबर 2023

चलो कहीं घूम कर आते हैं (कविता)

चलो, कहीं घूमकर आते हैं



एक दिन बैठे बिठाये

खयाल आया मेरे मन में

दिल को कुछ समझाना था

हँसना और हँसाना था

निकड़ पड़ा कुछ यूं ही घर से

न कोई खास लक्ष्य था 

ना कोई थी   अड़चन

चला जा रहा था, बस यूं ही

नजर पड़ी घासों के ऊपर

छोटी छोटी मोती जैसी

चमक रही थीं मोतियों सी

सतरंगी सूरज की किरणों को

पाकर।

नव बधू हो कोई जैसे

अभी सँवर कर आयी है

करके सिंगार कुछ बेहिसाब

गहनों से खुद को दबाई है।

सारी रात सोयी ना थी

वो सुहागन  खुले आसमां के तले

बिस्तर अपने बिछाकर

चाँद और सितारों के संग

हँसहँस कर बतियाईं है।

प्रकृति का ऐसा दृष्य

मनोहारी ,मन को मोह रहा था

मानों अपनी भाषा में कुछ

मुझसे कहे जा रहा था।

जो देख रहे हो तुम प्यारे

सबको नहीं सूझती हैं

मेरे हरेभरे जंगलों को

जो काटकर मुझसे 

मेरी खुशियां छीन रहे हैं।

मेरे पास बहुत संसाधन थे

मैं सबको मुफ्त लुटाती थी

मेरे खुद के जंगल होते

पहाड़ों पर भी बस जाती थी

समयानुसार मैं बादलों से

कहकर खुद बारिश बन जाती थी

मैं प्रकृति हूँ,

सबको जीवन देती हूं

फिर भी ना समझ मानव

खुद को विद्वान समझता है

मेरे हाथ पाँव को तोड़ताड़कर

मुझे मिटाने चला है

अरे बता दो मत मुझको

इतना बर्बाद करें वो

अगर रूठ गई मैं किसी एक दिन

समझो प्रलय मचा दूँगी

देखते फिर रह जायेंगे

मेरी तरफ से तुम

समझा देना।

नदियां हैं, पर्वत हैं, और

सुहाने झरने भी

हरियाली ही हरियाली

मेरे अंंगों पर मेरी साड़ी बनकर

लिपटती हैं।

मैं माँ हूँ ,धरती माँ

मैं रत्नों का भंडार समेटे

अपनी कोख में बैठी हूँ।


स्वच्छ हवा अगर चाहिए

साँसें लेने के लिए

खुली हवा में घूमकर

आकर मिल लेना मुझसे

तुम्हारी एसी में वो दम

कहाँ है जो मेरे फव्वारे में है

कुछ देर मेरी गोंद में

बैठकर जो शुकून तुम पाओगे

भला बताओ कौनसा

बना हुआ स्थान है

 कुछ देर में भूल गया मैं

कौन और कहाँ पर हूँ।

ना कोई  गम  था 

बस मन प्रसन्न था

मैं एक राहगीर

चुपचाप प्रकृति को घूर रहा था।

   ✍️ मालचन्द कन्नौजिया बेपनाह

🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀🥀




0 टिप्पणियाँ:

एक टिप्पणी भेजें

सदस्यता लें टिप्पणियाँ भेजें [Atom]

<< मुख्यपृष्ठ