शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2023

सप्तर्षि कौन थे

 सप्तर्षि कौन थे?


  प्राचीन काल में जब ब्रह्मा जी  श्रृष्टि की रचना कर रहे थे तो उनके मन में विचार आया कि क्यों न मानव श्रृष्टि को विस्तृत किया जाय।तब उन्होंने अपने मानस पुत्रों को उत्पन्न किया।जब उन्हें श्रृष्टि के विस्तार के लिए उनसे संतान उत्पन्न करने हेतु विवाह करने और वंश चलाने की बात करते तो वे यह कहते हुए अपना पल्ला झाड़ कर निकल लेते कि भगवान के भक्ति भजन से ज्यादा कुछ नहीं करेंगे।तब उन्होंने अपने मानस पुत्र दक्ष प्रजापति को उत्पन्न किया।जब उनसे यह बात की तो उन्होंने हाँ कहते हुए ब्रह्मा जी को उनकी श्रृष्टि के विस्तार करने में अपने यथा संभव योगदान देने में अपनी अनुमति प्रदान कर दिया।
    


उसी समय कुछ ब्रह्मा जी के मानस पुत्रों में से एवं कुछ दूसरे मनुष्य अपने अथक परिश्रम और तपस्या के बलबूते एक ऐसा स्थान प्राप्त कर लिया जिससे संसार में उनका काफी नाम और सम्मान प्राप्त किया।ऐसा कहा जाता है कि उन्हीं में से सात ऐसे महान ऋषि और मुनि हो गये जिनमें से कुछ सात ऋषियों ने अपने तपोबल से सबको सकते में डाल दिया।आइये आज हम एक एक करके उनके बारे में बताते हैं।सप्तर्षि सात ऋषियों का एक समूह था,जिनके शाप से तो देवताओं के राजा इन्द्र भी सदा भयभीत रहते।

सप्तर्षियों के नाम

      सप्तर्षि उन सात महान ऋषियों का एक ऐसा समूह था जिससे मनुष्य तो क्या स्वयं देवताओं के राजा इंद्र भी डरते थे।आइये पहले उनके नाम से परिचित हो जायें।फिर एक एक करके उनके बारे में और जानकारी देने का प्रयास हम यहाँ करेंगे।
१-अगत्स्य मुनि
२- भृगु ऋषि
३- भरद्वाज ऋषि
४- कश्यप ऋषि
५- महर्षि दुर्वासा
६- वशिष्ठ मुनि
७- विश्वामित्र

1- अगत्स्य  

       अगस्त्य मुनि को तो आपने जरूर कहीं न कहीं पढ़ा होगा।अगर नहीं पढ़ा है और नहीं सुना है तो चलिये हम उनकी कथा  आपको बता देते हैं।
 

वशिष्ठ मुनि के बड़े भाई  थे, अगत्स्य मुनि


  अगस्त्य मुनि वशिष्ठ मुनि के बड़े भाई कहे जाते हैं ।इनकी तपस्या से देवता सब बड़े प्रभावित थे।देवताओं के विनम्रतापूर्वक निवेदन करने से अगस्त्य मुनि काशी छोड़कर दक्षिण भारत की ओर चले गये।और उधर ही जाकर रहने लगे।उसी समय समुद्र में छिपे हुए राक्षसों का इतना आतंक फैला हुआ था जिससे सभी देवताओं में भय ब्याप्त हो गया था यहां तक कि देवताओं के राजा इन्द्र को भी चिंता होने लगी थी।जिससे देवताओं ने मिलकर अगस्त्य मुनि से विनती किया तो अगस्त्य मुनि ने पूरा समुद्र का जल अपनी तपोबल से पीकर सुखा दिया था। समुद्र के भीतर जितने भी जीवजन्तु थे सभी व्याकुल हो उठे।तब समुद्र देव ने आग्रह करके उनसे समुद्र में जल छोड़ने की विनम्र भाव से विनती की और यह समुद्र पुनःअपने स्वरूप को प्राप्त किया।

विन्ध्याचल को ऊँचा उठने से रोक दिया

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महर्षि अगस्त्य को लेकर एक और कथा सुनने को मिलती है।कहा जाता है कि किसी समय विन्ध्याचल पर्वत जब अपने पूरे यौवन पर था तो वह बहुत ऊँचाई तक पहुंच गया था और हमेशा अपना विस्तार करते जा रहा था।और फिर एक समय तो ऐसा आ गया था कि सूरज की किरणें पूरब से पश्चिम अब पहुंच ही नहीं सकती थीं।मानों पृथ्वी का पश्चिमी भूभाग सूरज की किरणों को बिना देखे अंधकार में डूबने के कगार पर पहुंच गया है।तब तो पश्चिमी दिशा में सिर्फ रात ही रात रह जायेगी।दिन का उजाला किसी को देखने को मिलेगा ही नहीं।फिर देवताओं ने अगत्स्य जी के पास जाकर उनसे मदद करने का आवाहन किया।लोगों ने बताया कि महाराज!त्राहिमाम त्राहिमाम प्रभू।कुछ करिये गुरुदेव।अन्यथा यह धरती आधा तो बिना सूर्य के प्रकाश की हो जायेगी।ये विन्ध्याचल तो इतना बड़ा होता जा रहा है कि इसने हम सभी को अंधकार में डूबाने जा रहा है।उसे रोकना होगा प्रभु।हमारी मदद करें । अगत्स्य जी मान भी गये।वे विन्ध्याचल के पास गए और आवाज लगाकर विंध्याचल को बुलाया और कहा कि हम दक्षिण दिशा की ओर जा रहे हैं ,हमें रास्ता तो दो।ये क्या हुआ तुम इस तरह तनकर हमारा मार्ग अवरुद्ध किये खड़े हो।
बस , इतना कहना भारी था।विन्ध्याचल उनका शिष्य था और गुरु की बात टालना उसके लिए उचित नहीं था।उसने तत्काल अपने गुरु कोअपने समक्ष खड़ा देखकर साष्टांग प्रणाम किया(साष्टांग = पूरा लेटकर किया जाने वाला प्रणाम)और उन्हें जाने के लिए रास्ता साफ कर दिया। जब उन्होंने विन्ध्याचल को पार कर लिया तब मुड़कर विन्ध्याचल से कहे कि जबतक  हम लौटकर नहीं आते, तुम इसी हालत में पड़े रहना।क्योंकि हम बारबार तुम्हारी प्रतिक्षा नहीं कर सकते और न तो हम तुमसे निवेदन करेंगे कि हमें मार्ग चाहिए।आज्ञाकारी शिष्य विंध्याचल उसी प्रकार से लेटा रहा और उनके आने की बाट देखने लगा।लेकिन वेकभी भी उधर लौटकर आये ही नहीं।तबसे आजतक विंध्याचल उसी तरह से लेटा हुआ है।
  ऐसा कहा जाता है कि भगवान श्री राम भी विंध्याचल गये थे,और अपने वनवास के समय अगस्त्य मुनि के आश्रम पर भी पधार कर उन्हें दर्शन दिया था।








२-महर्षि भृगु

     
        महर्षि भृगु जी महराज के जन्म के संबंध में अनेक मत हैं। कुछ विद्वानों द्वारा इन्हें अग्नि से उत्पन्न बताया गया है, तो कुछ ने इन्हें ब्रह्मा की त्वचा एवं हृदय से उत्पन्न बताया है। कुछ विद्वान इनके पिता को वरुण बताते हैं। कुछ कवि तथा मनु को इनका जनक मानते हैं। कुछ का मानना है कि ब्रह्मा के बाद 7500 ईसा पूर्व प्रचेता नाम से एक ब्रह्मा हुए थे जिनके यहां भृगु का जन्म हुआ।अब चाहे जो भी सच्चाई हो,उसे बहुत ही गहन अध्ययन करने से ही सही निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है।



माता-पिता :
वरुण और चार्षिणी को कुछ विद्वान लोग भृगु ऋषि का माता पिता मानते हैं।उनके मतानुसार उनकी भृगु ऋषि की दो पत्नियाँ दिव्या और पुलोमा थीं।दिव्या से दो पुत्र जन्म लिए जिसमें शुक्राचार्य जो कि बड़े (ज्येष्ठ पुत्र)थे।उनके दूसरे पुत्र त्वष्टा थे जिन्हें आज हम भगवान विश्वकर्मा के नाम से जानते हैं।ये दोनों शुक्राचार्य और विश्वकर्मा भृगु ऋषि के पुत्र कहे जाते हैं।
   भृगु ऋषि की दूसरी पत्नी जिनका नाम पुलोमा था, उसे लोग पौलवी भी कहते हैं।उसके गर्भ से दो पुत्र और एक पुत्री ने जन्म लिया। पुत्रों के नाम थे ऋचीक और च्यवन तथा पुत्री का नाम रेणुका बताया गया है।अब थोड़ा और विस्तार से आइये जानते हैं।ं

भृगु की दो पत्नियां : महर्षि भृगु के भी दो विवाह हुए थे। इनकी पहली पत्नी जिनका नाम दिव्या था वह दैत्यराज हिरण्यकश्यप की पुत्री थीं। अब जो भृगु जी की दूसरी पत्नी पुलोमा थीं वह दानवराज पुलोम की पुत्री थीं जिसे लोग पौलमी कहकर बुलाते थे वे थीं।

पहली पत्नी : पहली पत्नी दैत्यराज हिरण्यकश्यप की पुत्री दिव्या देवी से भृगु मुनि के दो पुत्र हुए जिनके नाम शुक्र और त्वष्टा रखे गए। आचार्य बनने के बाद शुक्र को शुक्राचार्य के नाम से और त्वष्टा को शिल्पकार बनने के बाद विश्वकर्मा के नाम से जाना गया। इन्हीं भृगु मुनि के पुत्रों को उनके मातृवंश अर्थात दैत्यकुल में शुक्र को काव्य एवं त्वष्टा को मय के नाम से जाना गया है
पत्नी : दिव्या और पुलोमा
दिव्या के पुत्र : शुक्राचार्य और त्वष्टा (विश्वकर्मा)।
पौलमी के पुत्र : ऋचीक व च्यवन और पुत्री रेणुका।
प्रपौत्र : परशुराम



वरुण के भृगु : भागवत के अनुसार वरुणदेव की पत्नी चार्षिणी के गर्भ से भृगु, वाल्मीकि और अगस्त्य नामक 3 पुत्रों का जन्म हुआ। इस मान से भृगु ब्रह्मा के पुत्र न होकर असुरदेव वरुण के पुत्र थे। वरुण का निवास स्थान अरब माना गया है, हालांकि विद्वान मानते हैं कि इन भृगु का जन्म ईरान में 7500 ईसा पूर्व के आसपास हुआ था।


नोट : ऋग्वेद की अनुक्रमणिका से ज्ञात होता है कि असुरों के पुरोहित भृगु के पौत्र और कवि ऋषि के सुपुत्र थे।
परसुराम
   महर्षि भृगु के प्रपौत्र, वैदिक ऋषि ऋचीक के पौत्र, जमदग्नि के पुत्र परशुराम थे। भृगु ने उस समय अपनी पुत्री रेणुका का विवाह विष्णु पद पर आसीन विवस्वान (सूर्य) से किया।

दूसरी पत्नी पौलमी : पौलमी असुरों के पुलोम वंश की कन्या थी। पुलोम की कन्या की सगाई पहले अपने ही वंश के एक पुरुष से, जिसका नाम महाभारत शांतिपर्व अध्याय 13 के अनुसार दंस था, से हुई थी। परंतु उसके पिता ने यह संबंध छोड़कर उसका विवाह महर्षि भृगु से कर दिया।

जब महर्षि च्यवन उसके गर्भ में थे, तब भृगु की अनुपस्थिति में एक दिन अवसर पाकर दंस (पुलोमासर) पौलमी का हरण करके ले गया। शोक और दुख के कारण पौलमी का गर्भपात हो गया और शिशु पृथ्वी पर गिर पड़ा, इस कारण यह च्यवन (गिरा हुआ) कहलाया। इस घटना से दंस पौलमी को छोड़कर चला गया, तत्पश्चात पौलमी दुख से रोती हुई शिशु (च्यवन) को गोद में उठाकर पुन: आश्रम को लौटी। पौलमी के गर्भ से 5 और पुत्र बताए गए हैं।

शुक्राचार्य : शुक्र के दो विवाह हुए थे। इनकी पहली स्त्री इन्द्र की पुत्री जयंती थी जिसके गर्भ से देवयानी ने जन्म लिया था। देवयानी का विवाह चन्द्रवंशीय क्षत्रिय राजा ययाति से हुआ था और उसके पुत्र यदु और मर्क तुर्वसु थे। दूसरी स्त्री का नाम गोधा (शर्मिष्ठा) था जिसके गर्भ से त्वष्ट्र, वतुर्ण शंड और मक उत्पन्न हुए थे।

च्यवन ऋषि : च्यवन का विवाह मुनिवर ने गुजरात के भड़ौंच (खम्भात की खाड़ी) के राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या से किया। भार्गव च्यवन और सुकन्या के विवाह के साथ ही भार्गवों का हिमालय के दक्षिण में पदार्पण हुआ। च्यवन ऋषि खम्भात की खाड़ी के राजा बने और इस क्षेत्र को भृगुकच्छ-भृगु क्षेत्र के नाम से जाना जाने लगा।

सुकन्या से च्यवन को अप्नुवान नाम का पुत्र मिला। द‍धीच इन्हीं के भाई थे। इनका दूसरा नाम आत्मवान भी था। इनकी पत्नी नाहुषी से और्व का जन्म हुआ। और्व कुल का वर्णन ब्राह्मण ग्रंथों में ऋग्वेद में 8-10-2-4 पर, तैत्तरेय संहिता 7-1-8-1, पंच ब्राह्मण 21-10-6, विष्णुधर्म 1-32 तथा महाभारत अनु. 56 आदि में प्राप्त है।

ऋचीक : पुराणों के अनुसार महर्षि ऋचीक, जिनका विवाह राजा गाधि की पुत्री सत्यवती के साथ हुआ था, के पुत्र जमदग्नि ऋषि हुए। जमदग्नि का विवाह अयोध्या की राजकुमारी रेणुका से हुआ जिनसे परशुराम का जन्म हुआ।

उल्लेखनीय है कि गाधि के एक विश्वविख्‍यात पुत्र हुए जिनका नाम विश्वामित्र था जिनकी गुरु वशिष्ठ से प्रतिद्वंद्विता थी। परशुराम को शास्त्रों की शिक्षा दादा ऋचीक, पिता जमदग्नि तथा शस्त्र चलाने की शिक्षा अपने पिता के मामा राजर्षि विश्वामित्र और भगवान शंकर से प्राप्त हुई। च्यवन ने राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या से विवाह किया।
     
      सप्त ऋषियों में भृगु ऋषि भी एक महान ऋषि माने जाते हैं।जिनसे देवराज इन्द्र भी भयभीत रहा करते थे।

विरोधाभाष : 
      पुराणों में विरोधाभाषिक उल्लेख के कारण यह फर्क कर पाना कठिन है कि कितने भृगु थे या कि एक ही भृगु थे। माना जाता है कि प्रचेता ब्रह्मा की पत्नी वीरणी के गर्भ से भृगु का जन्म हुआ था।
        मरीचि कुल में एक और भृगु हुए जिनकी ख्याति ज्यादा थी। इनका जन्म 5000 ईसा पूर्व ब्रह्मलोक-सुषा नगर (वर्तमान ईरान) में हुआ था। इनके परदादा का नाम मरीचि, दादाजी का नाम कश्यप ऋषि, दादी का नाम अदिति था।

इनके पिता प्रचेता-विधाता जो ब्रह्मलोक के राजा बनने के बाद प्रजापिता ब्रह्मा कहलाए, अपने माता-पिता अदिति-कश्यप के ज्येष्ठ पुत्र थे। महर्षि भृगुजी की माता का नाम वीरणी देवी था। अपने माता-पिता से सहोदर दो भाई थे। आपके बड़े भाई का नाम अंगिरा ऋषि था। इनके पुत्र बृहस्पतिजी हुए, जो देवगणों के पुरोहित-देव गुरु के रूप में जाने जाते हैं।

यदि दोनों ही भृगु मुनि ही है तो फिर उनकी तीन पत्नियां थीं- ख्या‍ति, दिव्या और पौलमी ।
    
निष्कर्ष
  अब मेरे प्रिय पाठक बंधुओं,आपको जानकारी के लिए हमारी सबसे बड़ी चुनौती हमारे सनातन धर्म और संस्कृति के साथ यही एक सबसे बड़ा धोखा किया गया है जिससे सनातन संस्कृति को लोग बड़ी ही आसानी से तोड़ताड़कर शुद्ध को अशुद्ध कर दिया गया है।हम यहीं पर झेंपने लगते हैं।हमारे कुछ इतिहासकारों एवं पौराणिक कथा वाचकों ने पता नहीं कहाँ से उलटफेर करदिया।जो आज क्या सही और क्या गलत है में भेद कर पाना कठिन बना दिया।


३-भरद्वाज


     सप्तर्षियों में से एक नाम महर्षि भरद्वाज जी का भी नाम है।ये भी कोई साधारण नहीं थे।इनकी भी ख्याति से इंद्रासन डोलने लगता था। तो चलिये जानकारी जुटाते हैं भरद्वाज जी के विषय में।
भारद्वाज ऋषि प्राचीन भारतीय ऋषि थे। चरक संहिता (Charaka Samhita) के अनुसार भारद्वाज ने इन्द्र से आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त किया था। ऋक्तंत्र के अनुसार वे ब्रह्मा, बृहस्पति एवं इन्द्र के बाद वे चौथे व्याकरण-प्रवक्ता थे। उन्होंने व्याकरण का ज्ञान इन्द्र से प्राप्त किया था। महर्षि भृगु ने उन्हें धर्मशास्त्र का उपदेश दिया।

महर्षि वाल्मीकि के शिष्य

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तमसा-तट पर क्रौंचवध के समय भारद्वाज महर्षि वाल्मीकि के साथ थे, वाल्मीकि रामायण के अनुसार भारद्वाज महर्षि वाल्मीकि के शिष्य थे।

वैदिक ऋषियों में भारद्वाज ऋषि (bhardwaj rishi) का उच्च स्थान है। अंगिरावंशी भारद्वाज के पिता बृहस्पति और माता ममता थीं। बृहस्पति ऋषि का अंगिरा के पुत्र होने के कारण ये अंगिरा वंशीय कहलाए। ऋषि भारद्वाज ने अनेक ग्रंथों की रचना की उनमें से यंत्र सर्वस्व और विमानशास्त्र की आज भी चर्चा होती है।

  भरद्वाज जी के माता पिता कौन थे


     भारद्वाज-ऋषि का अति उच्च स्थान है। भारद्वाज के पिता बृहस्पति और माता ममता थीं।



ऋषि भरद्वाज के पुत्रों में 10 ऋषि ऋग्वेद के मन्त्र द्रष्टा हैं और एक पुत्री जिसका नाम 'रात्रि' था, वह भी रात्रि सूक्त की मन्त्रद्रष्टा मानी गयी है। भारद्वाज के दस ऐसे पुत्र थे जिन्हें मंत्रद्रष्टा कहा जाता है।मन्त्रद्रष्टा पुत्रों के नाम क्रमशः इसप्रकार हैं-
1-ऋजिष्वा,
2- गर्ग,
3-नर,
4-पायु,
5-वसु,
6-शास,
7- शिराम्बिठ,
8- शुनहोत्र,
9- सप्रथ
10- सुहोत्र।
  
    ऋग्वेद की सर्वानुक्रमणी के अनुसार 'कशिपा' भारद्वाज की पुत्री कही गयी है। इस प्रकार ऋषि भारद्वाज की 12 संतानें मन्त्रद्रष्टा ऋषियों की कोटि में सम्मानित थीं। भारद्वाज ऋषि ने बड़े गहन अनुभव किये थे। उनकी शिक्षा के आयाम अतिव्यापक थे।

भारद्वाज की शिक्षा

• भारद्वाज ने इन्द्र से व्याकरण-शास्त्र का अध्ययन किया था और उसे व्याख्या सहित अनेक ऋषियों को पढ़ाया था। 'ऋक्तन्त्र' और 'ऐतरेय ब्राह्मण' दोनों में इसका वर्णन है।

• भारद्वाज ने इन्द्र से आयुर्वेद पढ़ा था, ऐसा चरक ऋषि ने लिखा है। अपने इस आयुर्वेद के गहन अध्ययन के आधार पर भारद्वाज ने आयुर्वेद-संहिता की रचना भी की थी।

• भारद्वाज ने महर्षि भृगु से धर्मशास्त्र का उपदेश प्राप्त किया और 'भारद्वाज-स्मृति' की रचना की।पांचरात्र-भक्ति-सम्प्रदाय में प्रचलित है कि सम्प्रदाय की एक संहिता 'भारद्वाज-संहिता' के रचनाकार भी ऋषि भारद्वाज ही थे।

• महाभारत, शान्तिपर्व के अनुसार ऋषि भारद्वाज ने 'धनुर्वेद'- पर प्रवचन किया था।वहाँ यह भी कहा गया है कि ऋषि भारद्वाज ने 'राजशास्त्र' का प्रणयन किया था।कौटिल्य ने अपने पूर्व में हुए अर्थशास्त्र के रचनाकारों में ऋषि भारद्वाज को सम्मान से स्वीकारा है।ऋषि भारद्वाज ने 'यन्त्र-सर्वस्व' नामक बृहद् ग्रन्थ की रचना की थी। इस ग्रन्थ का कुछ भाग स्वामी ब्रह्ममुनि ने 'विमान-शास्त्र' के नाम से प्रकाशित कराया है। इस ग्रन्थ में उच्च और निम्न स्तर पर विचरने वाले विमानों के लिये विविध धातुओं के निर्माण का वर्णन है। इस प्रकार एक साथ व्याकरणशास्त्र, धर्मशास्त्र,शिक्षा-शास्त्र, राजशास्त्र, अर्थशास्त्र, धनुर्वेद, आयुर्वेद और भौतिक विज्ञानवेत्ता ऋषि भारद्वाज थे- इसे उनके ग्रन्थ और अन्य ग्रन्थों में दिये उनके ग्रन्थों के उद्धरण ही प्रमाणित करते हैं।

• इंद्र का वरदान

       भारद्वाज ने सम्पूर्ण वेदों के अध्ययन का यत्न किया। दृढ़ इच्छा-शक्ति और कठोर तपस्या से इन्द्र को प्रसन्न किया। भारद्वाज ने प्रसन्न हुए इन्द्र से अध्ययन हेतु सौ वर्ष की आयु माँगी। भारद्वाज अध्ययन करते रहे। सौ वर्ष पूरे हो गये। अध्ययन की लगन से प्रसन्न होकर दुबारा इन्द्र ने फिर वर माँगने को कहा, तो भारद्वाज ने पुन: सौ वर्ष अध्ययन के लिये और माँगा। इन्द्र ने सौ वर्ष प्रदान किये। इस प्रकार अध्ययन और वरदान का क्रम चलता रहा। भारद्वाज ने तीन सौ वर्षों तक अध्ययन किया। इसके बाद पुन: इन्द्र ने उपस्थित होकर कहा-'हे भारद्वाज! यदि मैं तुम्हें सौ वर्ष और दे दूँ तो तुम उनसे क्या करोगे?' भारद्वाज ने सरलता से उत्तर दिया, 'मैं वेदों का अध्ययन करूँगा।' इन्द्र ने तत्काल बालू के तीन पहाड़ खड़े कर दिये, फिर उनमें से एक मुट्ठी रेत हाथों में लेकर कहा-'भारद्वाज, समझो ये तीन वेद हैं और तुम्हारा तीन सौ वर्षों का अध्ययन यह मुट्ठी भर रेत है। वेद अनन्त हैं। तुमने आयु के तीन सौ वर्षों में जितना जाना है, उससे न जाना हुआ अत्यधिक है।' अत: मेरी बात पर ध्यान दो- 'अग्नि है सब विद्याओं का स्वरूप। अत: अग्नि को ही जानो। उसे जान लेने पर सब विद्याओं का ज्ञान स्वत: हो जायगा, इसके बाद इन्द्र ने भारद्वाज को सावित्र्य-अग्नि-विद्या का विधिवत ज्ञान कराया। भारद्वाज ने उस अग्नि को जानकर उससे अमृत-तत्त्व प्राप्त किया।

• इन्द्र द्वारा अग्नि-तत्त्व का साक्षात्कार किया, ज्ञान से तादात्म्य किया और तन्मय होकर रचनाएँ कीं।

• आयुर्वेद के प्रयोगों में ये परम निपुण थे। इसीलिये उन्होंने ऋषियों में सबसे अधिक आयु प्राप्त की थी। वे ब्राह्मणग्रन्थों में 'दीर्घजीवितम' पद से सबसे अधिक लम्बी आयु वाले ऋषि गिने गये हैं।

• चरक ऋषि ने भारद्वाज को 'अपरिमित' आयु वाला कहा।

• भारद्वाज ऋषि काशीराज दिवोदास के पुरोहित थे। वे दिवोदास के पुत्र प्रतर्दन के पुरोहित थे और फिर प्रतर्दन के पुत्र क्षत्र का भी उन्हीं मन्त्रद्रष्टा ऋषि ने यज्ञ सम्पन्न कराया था। 

• वनवास के समय श्री राम इनके आश्रम में गये थे, जो ऐतिहासिक दृष्टि से त्रेता-द्वापर का सन्धिकाल था। उक्त प्रमाणों से भारद्वाज ऋषि को 'अनूचानतम' और 'दीर्घजीवितम' भी कहा गया है।

महर्षि भारद्वाज व्याकरण, आयुर्वेद संहित, धनुर्वेद, राजनीतिशास्त्र, यंत्रसर्वस्व, अर्थशास्त्र, पुराण, शिक्षा आदि पर अनेक ग्रंथों के रचयिता हैं। वायुपुराण के अनुसार उन्होंने एक पुस्तक आयुर्वेद संहिता लिखी थी, जिसके आठ भाग करके अपने शिष्यों को सिखाया था। चरक संहिता के अनुसार उन्होंने आत्रेय पुनर्वसु को कायचिकित्सा का ज्ञान प्रदान किया था।

ऋषि भारद्वाज को प्रयाग का प्रथम वासी माना जाता है अर्थात ऋषि भारद्वाज ने ही प्रयाग को बसाया था। प्रयाग में ही उन्होंने घरती के सबसे बड़े गुरूकुल(विश्वविद्यालय) की स्थापना की थी और हजारों वर्षों तक विद्या दान करते रहे। वे शिक्षाशास्त्री, राजतंत्र मर्मज्ञ, अर्थशास्त्री, शस्त्रविद्या विशारद, आयुर्वेेद विशारद,विधि वेत्ता, अभियाँत्रिकी विशेषज्ञ, विज्ञानवेत्ता और मँत्र द्रष्टा थे। ऋग्वेेद के छठे मंडल के द्रष्टाऋषि भारद्वाज ही हैं। इस मंडल में 765 मंत्र हैं। अथर्ववेद में भी ऋषि भारद्वाज के 23 मंत्र हैं। वैदिक ऋषियों में इनका ऊँचा स्थान है। आपके पिता वृहस्पति और माता ममता थीं।

ऋषि भारद्वाज को इंद्र देव ने आयुर्वेद और सावित्र्य अग्नि विद्या का विधिवत ज्ञान कराया। भारद्वाज ने उस अग्नि को जानकर उससे अमृत-तत्त्व प्राप्त किया।

• इन्द्र द्वारा अग्नि-तत्त्व का साक्षात्कार किया, ज्ञान से तादात्म्य किया और तन्मय होकर रचनाएँ कीं।

• आयुर्वेद के प्रयोगों में ये परम निपुण थे। इसीलिये उन्होंने ऋषियों में सबसे अधिक आयु प्राप्त की थी। वे ब्राह्मणग्रन्थों में 'दीर्घजीवितम' पद से सबसे अधिक लम्बी आयु वाले ऋषि गिने गये हैं।

• चरक ऋषि ने भारद्वाज को 'अपरिमित' आयु वाला कहा।

• भारद्वाज ऋषि काशीराज दिवोदास के पुरोहित थे। वे दिवोदास के पुत्र प्रतर्दन के पुरोहित थे और फिर प्रतर्दन के पुत्र क्षत्र का भी उन्हीं मन्त्रद्रष्टा ऋषि ने यज्ञ सम्पन्न कराया था। 

• वनवास के समय श्री राम इनके आश्रम में गये थे, जो ऐतिहासिक दृष्टि से त्रेता-द्वापर का सन्धिकाल था। उक्त प्रमाणों से भारद्वाज ऋषि को 'अनूचानतम' और 'दीर्घजीवितम' भी कहा गया है।

महर्षि भारद्वाज व्याकरण, आयुर्वेद संहित, धनुर्वेद, राजनीतिशास्त्र, यंत्रसर्वस्व, अर्थशास्त्र, पुराण, शिक्षा आदि पर अनेक ग्रंथों के रचयिता हैं। वायुपुराण के अनुसार उन्होंने एक पुस्तक आयुर्वेद संहिता लिखी थी, जिसके आठ भाग करके अपने शिष्यों को सिखाया था। चरक संहिता के अनुसार उन्होंने आत्रेय पुनर्वसु को कायचिकित्सा का ज्ञान प्रदान किया था।

ऋषि भारद्वाज को प्रयाग का प्रथम वासी माना जाता है अर्थात ऋषि भारद्वाज ने ही प्रयाग को बसाया था। प्रयाग में ही उन्होंने घरती के सबसे बड़े गुरूकुल(विश्वविद्यालय) की स्थापना की थी और हजारों वर्षों तक विद्या दान करते रहे। वे शिक्षाशास्त्री, राजतंत्र मर्मज्ञ, अर्थशास्त्री, शस्त्रविद्या विशारद, आयुर्वेेद विशारद,विधि वेत्ता, अभियाँत्रिकी विशेषज्ञ, विज्ञानवेत्ता और मँत्र द्रष्टा थे। ऋग्वेेद के छठे मंडल के द्रष्टाऋषि भारद्वाज ही हैं। इस मंडल में 765 मंत्र हैं। अथर्ववेद में भी ऋषि भारद्वाज के 23 मंत्र हैं। वैदिक ऋषियों में इनका ऊँचा स्थान है। आपके पिता वृहस्पति और माता ममता थीं।

ऋषि भारद्वाज को आयुर्वेद और सावित्र्य अग्नि विद्या का ज्ञान इन्द्र और कालान्तर में भगवान श्री ब्रह्मा जी द्वारा प्राप्त हुआ था। अग्नि के सामर्थ्य को आत्मसात कर ऋषि ने अमृत तत्व प्राप्त किया था और स्वर्ग लोक जाकर आदित्य से सायुज्य प्राप्त किया था।

सम्भवतः इसी कारण ऋषि भारद्वाज सर्वाधिक आयु प्राप्त करने वाले ऋषियों में से एक थे।ऋषि भारद्वाज ने प्रयाग के अधिष्ठाता भगवान श्री माधव जोकि साक्षात श्री हरि विष्णु ही हैं, की पावन परिक्रमा की स्थापना भगवान श्री शिव जी के आशीर्वाद से की थी। ऐसा माना जाता है कि भगवान श्री द्वादश माधव परिक्रमा सँसार की पहली परिक्रमा है। ऋषि भारद्वाज ने इस परिक्रमा की तीन स्थापनाएं दी हैं।

आयुर्वेद सँहिता, भारद्वाज स्मृति, भारद्वाज सँहिता, राजशास्त्र, यँत्र-सर्वस्व(विमान अभियाँत्रिकी) आदि ऋषि भारद्वाज के रचित प्रमुख ग्रँथ हैं।

ऋषि भारद्वाज खाण्डल विप्र समाज के अग्रज है।खाण्डल विप्रों के आदि प्रणेता ऋषि जगाने के लिए ऋषि एक स्थान पर कहते हैं-अग्नि को देखो यह मरणधर्मा मानवों स्थित अमर ज्योति है। यह अति विश्वकृष्टि है अर्थात सर्वमनुष्य रूप है।


४-कश्यप ऋषि


महाभारत एवं पुराणों में असुरों की उत्पत्ति एवं वंशावली के वर्णन में कहा गया है की ब्रह्मा के सात मानस पुत्रों में से एक 'मरीचि' थे जिसने कश्यप ऋषि उत्पन्न हुए। कश्यप ने दक्ष प्रजापति की १७ पुत्रियों से विवाह किया। दक्ष की इन पुत्रियों से जो सन्तान उत्पन्न हुई उसका विवरण निम्नांकित है। महाभारत और विष्णु पुराण के अनुसार उन सत्रह पत्नियों के नाम हैं -:

अदिति,दिति,दनु,अनिष्ठा,काष्ठा,सुरसा,इला,मुनि,सुरभि,कद्रू,विनता,यामिनी,ताम्रा,तिमि,शक्रोधवशा,सुरमा,पातंगी।

मार्कण्डेय ,पुराण और भागवत पुराण के अनुसार तेरह पत्नियां बताई गई हैं जो इसप्रकार हैं।

अदिति,दिति,दनु,काष्ठा,अनिष्ठा,सुरसा,मुनि,सुरभि,विनता,कद्रू,पातंगी,तिमि,इला,

मत्स्य पुराण के अनुसार नौ पत्नियां

  अदिति,दिति,दनु,काष्ठा,अनिष्ठा,कद्रू,सुरसा,विनता,सुरभि।
अब चाहे जितनी पत्नियों के पति रहे हों लेकिन यह तो निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि वे कई पत्नियों के पति थे।







५- महर्षि दुर्वासा

    महर्षि दुर्बासा भी एक महान सिद्ध पुरुष थे।और सप्त ऋषियों में से एक यह भी थे।ऐसा कहा जाता है कि इनके क्रोध की कोई सीमा नहीं थी।जिसपर ये क्रोधित हो जाते उसका समझो सर्वनाश।इनका नाम शुरू शुरू में सुवासा था लेकिन लोग उन्हें दुर्वासा कहते थे इसलिए उन्होंने अपना नाम दुर्वासा ही कर लिया था।
महासती अनुसुइया इनकी माता थींऔर इनके पिता का नाम अत्रि था। कहा जाता है कि भगवान श्री राम वनगमन के समय सीताजी और लक्ष्मण के साथ इनके पिता श्री अत्रि मुनि के आश्रम पर विश्राम करने के लिए रुक कर अनुसुइया जी से सीताजी को कुछ नारियों के गुणों को जानने उनके पास भेजकर उन्हें दर्शन देकर उनकी कुटिया को पवित्र किया था।अनुसुइया जी ने उस समय सीताजी को कुछ आभूषण और दिव्य वस्त्र आदि भेंट किया था।
     आखिर में जब दुर्वासा ऋषि को पता चला कि अब भगवान श्री राम इस लोक से अपने परमधाम को जाने वाले हैं और अब वह समय आ गया है तो वे आखिरी बार भगवान राम के दर्शन के लिए आये।तब भगवान राम द्वार पर जो द्वारपाल नियुक्त किया था वो कोई और नहीं बल्कि उनके छोटे भाई लक्ष्मण थे।राम ने लक्ष्मण को आदेश दिया था कि बिना मेरी इजाजत कोई अंदर प्रवेश नहीं करेगा।इसलिए लक्ष्मण जी ने द्वार पर ही दुर्वासा जी को रोक दिया जिससे क्रोधित होकर वे समस्त अयोध्या को शाप देने जा रहे थे तभी लक्ष्मण जी ने सारी सजा को खुद अपने ऊपर स्वीकार करते हुए कहा कि भगवन अगर आप को शाप ही देना है तो वो मुझे दीजिये।मेरे कारण पूरी अयोध्या को शाप देना ठीक नहीं है।



६- वशिष्ठ मुनि

          अयोध्या के कुलगुरू कहे जाने वाले वशिष्ठ जी को कौन नहीं जानता।वशिष्ठ जी महर्षि थे और ब्रह्मा जी के पुत्र थे।राजा दशरथ जी अपने सारे काज  इनके परामर्श से ही किया करते थे।सारे राजकाज अयोध्या के इनकी देखरेख में सम्पन्न होते थे।वशिष्ठ जी अयोध्या के राजपुरोहित थे।
  इनके पास एक ऐसी गाय थी जो जब चाहो ,जितना चाहे दुध उपलब्ध कर देती थी । इतना ही नहीं, उसके अंदर एक ऐसा गुण था जिससे जब भी कोई अतिथि चाहे कितनी भी संख्या में हो,सबको कुछ ही समय में सारे स्वादिष्ट व्यंजन उपलब्ध करा देती थीं।कहा जाता है कि वह कोई साधारण गाय नहीं थी।बल्कि कामधेनू की पुत्री थी।उनका नाम नन्दिनी था।नन्दिनी ही वह कारण थी जिससे एक क्षत्रिय राजा को ऋषि बनने पर विवश कर दिया और फिर ऋषि से ब्रह्मर्षि बना दिया।

आज बस इतना ही, आगे और जानकारी के लिए जुड़े रहें हमारे साथ।तबतक के लिए धन्यवाद।



7-विश्वामित्र

 विश्वामित्र पहले एक क्षत्रिय राजा थे और इनकी ख्याति ऐसी प्रसिद्ध थे।एकबार तो इन्होंने अपने तप के बल से एक अलग स्वर्ग बसाने शुरू कर दिया था और विधि के प्रतिकूल होकर ये काम करना चाहते थे।लेकिन किसी तरह से इन्हें समझा बुझाकर कर रोका गया था।जब राम अभी चौदह पन्द्रह साल के थे तभी ये राजा दशरथ के दरबार में उपस्थित हुए।राजा दशरथ जी ने खूब स्वागत सत्कार किया।और अचानक उनके अयोध्या आने का प्रयोजन जानना चाहा तो इनके उत्तर सुनकर राजा दशरथ के पाँव डगमगाने लगे।उन्होंने निवेदन किया कि मुनिवर अभी राम लक्ष्मण छोटे छोटे बालक हैं और वे आपकी क्या सहायता कर पायेंगे।अगर आप कहें तो मैं आपके साथ अपनी सेना की एक टुकड़ी भेज दूँ।लेकिन मुनि तो राम लक्ष्मण को पहले ही पहचान चुके थे।इसलिए वे हरहाल में रामलक्ष्मण को अपने साथ लेकर जाने से कम पर बिल्कुल तैयार नहीं थे।कहीं क्रोधित होकर वे शाप न देदें, इसलिए राजा दशरथ जी ने राम लक्ष्मण दोनों भाइयों को विश्वामित्रजी के साथ लगा दिया था और वन में राम लक्ष्मण ने धनुर्विद्या का वहीं घोर अध्ययन किया।विश्वामित्र ने उन्हें अपनी तपोशक्तियों अर्जित युद्ध के भिन्न भिन्न अश्त्र शस्त्र भी उपलब्ध कराया था।राम लक्ष्मण को उन्हीं का दिया हुआ ऐस तरकश था जिससे कभी बाण तो समाप्त ही नहीं हो सकता था और छूटा हुआ बाण दुबारा तरकश में लौट आया करता था।









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