मंगलवार, 31 अक्टूबर 2023

बनारसी साड़ियों का शहर मुबारकपुर (रेशमी नगरी)


 बनारसी साड़ियों का शहर मुबारकपुर(रेशमी नगरी)आजमगढ़ उ.प्र.

असली बनारसी साड़ी यहीं बनती हैं


         आजमगढ़ जिले का एक कस्बा है मुबारकपुर । वैसे तो मुबारकपुर अपनी पहचान का मुहताज तो नहीं है फिर भी उसे अपनी एक कमी बहुत खलती है।आजमगढ़ शहर से मात्र पन्द्रह से सोलह किलोमीटर दूर बसे शहर से पूरब दिशा में स्थित यह बहुत ही घनी आबादी वाला क्षेत्र है। यह एक मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र है जहाँ खासकर बुनकर समुदाय के लोग रहते हैं और इन्हें जुलाहा कहा जाता है।इनके अलावा यहाँ हिन्दू भी कोई कम नहीं हैं।खासकर यहाँ अहीर,खटिक, धोबी,पासी आदि जातियों के लोग भी रहते हैं। पूरे कस्बा व आसपास की बस्तियों में दिन भर लूम की खटर-पटर होती रहती है। पहले हथकरघे चलते थे, तब इतनी आवाज नहीं होती थी । लेकिन अब आधुनिकता के इस युग में यहाँ भी हथकरघा की जगह पॉवरलूम चलने लगे हैं।

मुबारकपुर की पहचान बनारसी साड़ी


  मुबारकपुर में आज से कुछ साल पहले लगभग घर-घर में सिर्फ साड़ियों की बुनाई होती थी और यहाँ की बुनी हुई साड़ियाँ पूरे भारत में ही नहीं बल्कि समूचे विश्व में बनारसी साड़ी के नाम से मशहूर हैं।अब अनजाने लोग जिन्हें नहीं पता है,वे तो यही जानते होंगे कि जिस साड़ी को घर की महिलाएं पहनने के लिए इतनी लालायित रहती हैं वह बनारसी रेशमी साड़ी आखिर बनती कहाँ हैं।सूरत में,अहमदाबाद में । जी नहीं,जब नाम है बनारसी तो बनारस में बनती होगी।लेकिन यह भी सच्चाई नहीं है।असली सच्चाई तो यह है कि उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के मुबारकपुर कस्बे में  यहाँ के कारीगरों की मेहनत और लगन से तैयार की जाने वाली साड़ी को बनारसी साड़ी कहा जाता है।

इसका न तो अपना कोई खुद का ब्रांड है और कोई बाजार।इसीलिए बाजार भी सिमटता जा रहा है। मुबारकपुर की साड़ी को ओडीओपी में शामिल तो है लेकिन बनारसी के नाम से।

मुबारकशाह के नाम पर बसा है मुबारकपुर


    कहा जाता है कि कोई मुबारक शाह नाम के एक रईस गृहस्थ जुलाहा थे ।राजाओं जैसा ठाटबाट था और लोग उन्हें राजा कहते भी थे।उन्हीं के नाम पर इस छोटे से शहर का नाम मुबारकपुर पड़ा था।

रेशमी नगरी मुबारकपुर


मुबारकशाह के नाम पर बसे हुए इस कस्बे में सन् 1971 ई0 से लेकर 2000 ई0 तक यहाँ रेशमी साड़ी का कारोबार बुलंदी पर था। ढाई लाख हथकरघों पर कारीगार रात दिन काम करके भी बाजार की मांग को पूरी नहीं कर पाते थे। कस्बे के आसपास के गांवों में भी लोग बुनाई से जुड़े हुए थे। यहाँ मुबारकपुर में कोई ऐसा घर नहीं था चाहे वो किसी भी जाति के हों जिसके घर के एक या दो लोग साड़ी बुनाई का काम न करते रहे हों। एक अच्छा बुनकर बनने में समय लगता है। ऐसे में लोगों ने अपने बच्चों को भी बुनकरी की कला सिखाना शुरू कर दिया था। स्कूल जाने की उम्र में ही बच्चे ताना-बाना का ककहरा पढ़ने लगते थे।

घर के नौनिहाल बच्चों को भी बुनकरी में जोड़ दिया जाता था


       यह व्यवसाय इतना  यहाँ लोकप्रिय हुआ करता था कि लोग अपने घरों के बच्चों को भी स्कूलों से लौटने के बाद हुनर सीखने में लगा देते थे।और बड़े होते होते एक अच्छे कारीगर बन जाते।कोई कला कोई गुण एक दिन में तो आता नहीं है ,उसे सीखने की लगन और मेहनत जरूरी होता है।यहाँ मजदूरों की कोई कमी नहीं थी।आसपास के अनेकों गांव के लोग या तो किसी बुनकर के यहाँ जाकर साड़ी की बुनाई करते थे या कुछ लोग तो अपने घरों में ही गृहस्थ बुनकरों से अपने घरों में ही लूम लगवा लेते थे और उनसे माल उठाकर उनके माल तैयार कर उन्हें दे आते थे और अपनी मजदूरी पा जाते थे।इसतरह से यहाँ के लोगों को आसानी से रोजगार भी उपलब्ध हो जाता था और बुनकरों को अपनी फैक्टरी बढ़ाने के लिए जमीन की कोई कमी नहीं खलती थी।लोग आकर खुद अपने घरों में करघा लगाने को बोल जाते कि हमारा घर खाली है, आप उसमें भी दो चार लूम लगा दीजिये, हम उसी में आपका माल तैयार करते रहेंगे।
इस तरह से अगर देखा जाय तो यहाँ के लोगों की सोच काफी अच्छी थी।लेकिन सरकार की उदासीनता के कारण इन लोगों को कोई विशेष प्रोत्साहन नहीं दिया गया।आजादी के बाद से लेकर आजतक यहाँ सिर्फ वोटों की राजनीति की गई।

बुनकर हथकरघा पर बनारसी साड़ी बूनते थे

        बुनकर हथकरघा पर साड़ी तैयार कर शाम को उसे मंडी में बेंचकर अपना मुनाफा कमाते थे। मुबारकपुर में समृद्धि झलकती थी। सन् 1998 के बाद से यहां के कारोबार पर मंदी का साया मंडराने लगा। उसके बाद फिर व्यवसाय संकट से उबर नहीं पाया। क्षेत्र में पहले ढाई लाख से भी अधिक हथकरघा हुआ करते थे, जो घटकर 25 हजार तक होकर सिमटते जा रहे हैं। इस बीच पावरलूम लगे लेकिन उनकी संख्या भी तीन हजार ही है।

युवा पीढ़ी नहीं करना चाहती हथकरघा पर काम


   पॉवरलूम की मशीन बिजली से चलती है लेकिन हथकरघा को हाथ और पांव के जोर पर चलाना पड़़ता है।अधिक मेहनत करके भी उत्पादन कम ही होता है। इससे लागत बढ़ जाती है। पॉवरलूम पर वैसी ही डिजाइन की साड़ी कम कीमत में तैयार हो जाती है। हथकरघा काम कहीं ज्यादा बेहतर होता है। अब हैंडलूम की ब्रांडिंग होने लगी है और उसके लिए अधिक कीमत चुकाने वाले भी हैं। इसके बावजूद युवा पीढ़ी हथकरघा पर काम करने में कम ही रुचि ले रही है।
नहीं खुला विपणन केंद्र, बिजली की पड़ी मार ऊपर से
   पहले पावरलूम को फिक्स दर से बिजली मिलती थी। अब स्मार्ट मीटर लगा दिए गए हैं। इससे बिजली का बिल चार से पांच गुना बढ़कर आने लगा है। सपा सरकार में मुबारकपुर में लगभग 12 करोड़ की लागत से विपणन केंद्र का निर्माण हुआ। इसमें 158 दुकाने हैं। तत्कालीन जिलाधिकारी प्रांजल यादव व अभिनेत्री शबाना आजमी ने इसके लिए प्रयास किया था। इसमें साप्ताहिक हाट लगाने की योजना थी ताकि व्यापारी आएं और बुनकरों को लाभ मिले। मगर आजतक यहाँ कभी दुकानें नहीं सजीं,क्योंकि जबतक कोई खरीदार नहीं होगा तो बिक्री कैसे होगी। अब तक इसे शुरू नहीं किया जा सका।

कारोबार को लगा ग्रहण

मुबारकपुर में जब से मंडी खत्म हुई यहां का कारोबार सिमट गया। रेशम में रंग भरने वाले बुनकर अब होटल में जाकर बर्तन धो रहे हैं। कुछ जो काबिल हैं वे विदेश जाकर नौकरी करने को मजबूर हैं।
मुबारकपुर में बनने वाली रेशमी साड़ी को आजाद भारत के इतने सालों बाद भीअपना ब्रांड नाम नहीं मिल सका है। उसके पास अपना बाजार ही नहीं है। इनके बुने हुये, इनके हुनर को किसी और के नाम से पहचान बनाई गई।काश,ये नाम और पहचान इन्हें मिली होती।आज तक आजमगढ़ अपनी पहचान नहीं स्थापित कर सका।

आज हाथकरघा पर पूरा परिवार मिलकर पांच सौ रुपये नहीं कमा पाता है। पावरलूम का और बुरा हाल है। वहां भी ढाई सौ से तीन सौ रुपये मजदूरी मिल पाती है। इस महंगाई के दौर में परिवार चलाना मुश्किल है।कभी मुबारकपुर के आसपास के लगभग पचासों गांव ऐसे थे जहाँ के लोग बनारसी साड़ी के कारोबार से जुड़े थे।बच्चे हों महिलाएं, सब इस कला से जुड़े हुए थे।सबके घर में इस कारोबार से होने वाली कमाई आती थी लेकिन अब ऐसा नहीं है।

सरकारी उपेक्षा का शिकार हुआ हुनर


यह मुबारकपुर की बदकिस्मती है जो यहाँ के लोगों को इनकी पहचान नहीं मिल सकी।वह कौन सी मनहूस घड़ी रही होगी या कौन सी मजबूरी रही हुई होगी जब अपने माल को बेचने के लिए, बाजार ढूंढने के लिए दूसरे के नाम का सहारा लेना पड़ा था।आज आजमगढ़ इस प्रसिद्धि को पाने के लिए तड़प रहा है कि हमारे जिले का माल दूसरे के नाम से आखिर कब तक बिकता रहेगा। यातायात की दृष्टि से भी यहाँ से रेलवे स्टेशन लगभग पाँच किमी दूर है।सड़क मार्ग से आने के लिए सीधे रोडवेज की कोई बसें यहाँ नहीं आती हैं।जबकि कई साल पहले यहाँ पर सरकार ने नया माडर्न रोडवेज का निर्माण भी कराया।लेकिन वह भी शहर से काफी दूर।जहाँ से बिना आटो के काम नहीं चल सकता।अभी भी वहाँ से बसों का संचालन नहीं किया जाता है उसका भी एक खास कारण यह है कि अगर यहां से बसों को चलाया भी जाता है तो शहर से दूर होने के कारण लोग प्राइवेट गाड़ियां ही पकड़ कर निकल जातेहैं।
जिन्हें बाहर होना चाहिये वे अंदर घुसकर सवारी उठा रहे हैं और जिसे शहर में रहना चाहिए वे बाहर दूर खड़े होकर सवारियां/पैसेंजर्स ढूंढने में लगे हैं।
ओंछी राजनीति और घटिया सोच
यहाँ के नेताओं की सोच बहुत ओंछी है।अपनी घटिया सोच के कारण ही हर बार यहाँ के लोग ठगे जाते हैं।यहाँ लोग सिर्फ वोट माँगने के लिए ही आते हैं लेकिन यहाँ के विकास की बात कोई नहीं करता।धर्म और जाति से जोड़कर या पार्टी के नाम पर यहाँ के लोग हमेशा मतदान करते रहे हैं।इसलिए हमेशा ठगे जाते हैं।

 

यहाँ तक कैसे पहुँचें

प्रमुख संसाधन : यातायात के प्रमुख साधन निम्नलिखित हैं।जिससे आसानी से यहाँ पहुंचा जा सकता है।
1-रेलमार्ग
2-हवाई जहाज मार्ग
3- सड़क मार्ग
 
1-रेलमार्ग :- सबसे पहले अगर कोई यहाँ आना चाहता है तो उसके लिए रेलगाड़ी से भी आ सकते हैं।यहाँ का प्रमुख स्टेशन आजमगढ़ है।यहां उतर कर आप सठियांव होते हुए मुबारकपुर आटो ,जीप या बस के द्वारा आ सकते हैं।सठियांव भी यहाँ का सबसे नजदीकी स्टेशन है लेकिन यहाँ पर सभी गाड़ियों का ठहराव नहीं होता है इसलिए सलाह दी जाती है कि रेलमार्ग से यात्रा करनेवाले यात्री आजमगढ़ स्टेशन पर ही उतर जायें।फिर अगर कोई लोकल ट्रेन मिल जाती है तो उसे पकड़ सकते हैं।अन्यथा सड़क मार्ग से आटो या जीप के द्वारा निकल लें।जबतक ट्रेन का इंतजार करेंगे, तबतक अपने गंतव्य तक पहुंच जायेंगे।

2- हवाई मार्ग  :- आजमगढ़ आने के लिए बहुत शीघ्र ही हवाई जहाज की उड़ान भी शुरू होने वाली है। यह हवाई अड्डा शहर से मात्र कुछ ही दूर है और यहाँ से सीधे जिला मुख्यालय आजमगढ़ आना होगा।फिर आटो या जीप या बस जो समय से मिल जाय,वही पकड़ कर आ सकते हैं।

3- सड़क मार्ग :- अब तो आजमगढ़ आने के लिए सड़कों का जाल सा बिछ गया लगता है।सड़क मार्ग से आने के लिए लखनऊ या दिल्ली से सीधे बस सेवा निरंतर जारी है।

 आजमगढ़ शहर से मात्र पन्द्रह से सोलह किमी की दूरी पर बसे इस कस्बे तक बहुत ही आसानी से आया जा सकता है।आजमगढ़ के नरौली या सिधारी टैक्सी स्टैंड से बराबर आटो मिलता रहता है।अगर आप चाहें तो वहीं से सठियांव के लिए कोई भी बस या टैक्सी भी पकड़ कर सठियांव तक जायें और वहाँ से मुबारकपुर के लिए आटो पकड़ सकते हैं।सठियांव से चार किमी की दूरी है।अगर जो लोग मऊ ,बलिया,या गाजीपुर की ओर से आ रहे हैं वे सीधे सठियांव उतरकर मुबारकपुर आ सकते हैं।
 

रविवार, 29 अक्टूबर 2023

अनुराधा पौडवाल गायन की सुरसाम्राज्ञी

 अनुराधा पौडवाल गायन की सुरसम्राज्ञी





अनुराधा पौडवाल का जीवन परिचय

अनुराधा पौडवाल भारतीय हिन्दी सिने जगत की सबसे प्रतिभाशाली गायिकाओं मे से एक हैं। हिंदी सिनेमा में उन्हें गायकी के योगदान के लिए कई सारे पुरुस्कारों से भी नवाजा जा चुका है। अनुराधा एकमात्र ऐसी गायिका थीं जो मंगेशकर बहनों को टक्कर देने की क्षमता रखती थीं।

 

भक्ति गीतों की पहचान थीं अनुराधा

अनुराधा पौडवाल हिन्दी भक्तिगीत को अपने मधुर सुर संगीत से लोगों को भाव विभोर करनेवाली वे शक्शियत हैं जिन्होंने अपने गायकी के द्वारा लोगों का विश्वास ही नहीं दिल जीता है।उनका जन्म 27 अक्टूबर 1954 को हुआ था। 


शादी एवं वैवाहिक जीवन

अनुराधा पौडवाल की शादी अरुण पौडवाल नामक व्यक्ति से हुई थी। उनके एक पुत्र जिसका नाम आदित्य पौडवाल और एक बेटी कविता पौडवाल हैं।

बेटे आदित्य का निधन


       बताया जाता है कि अनुराधा पौडवाल जी के बेटे आदित्य पौडवाल का 12 सितम्बर 2020 को महज 35 साल की उम्र में किडनी खराब हो जाने से मृत्यु हो गयी। 


कैरियर 

अनुराधा पौडवाल जी ने अपने करियर की शुरुआत 1973 में बनी अमिताभ बच्चन एवं जयाभादुड़ी द्वारा अभिनीत फिल्म अभिमान से की थी, जिसमें उन्होने एक श्लोक गीत गया था।
       1976 में उन्हें कालीचरण नामकी एक दूसरे फिल्म में भी गाने का अवसर तो मिला पर उनके एकल गाने की शुरुआत हुई फिल्म आप बीती से।इस फिल्म में हेमामालिनी और शशि कपूर साहब मुख्य भूमिका में थे। इस फिल्म का संगीत लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल ने दिया था। जिनके साथ अनुराधा ने और भी कई प्रसिद्ध गाने गाए। उन्होने और भी संगीतकारों जैसे राजेश रोशन, जे देव, कल्याणजी आनांदजी आदि लोगों के साथ भी अच्छी जोड़ी बनाई। अनुराधा ने कभी शास्त्रीय संगीत का प्रशिक्षण नहीं लिया ।ऐसा कहा जाता है कि उन्होने कई बार कोशिश तो की , पर बात नहीं बनी। उन्होंने लताजी को सुनते सुनते और खुद घंटो अभ्यास करते करते ही अपने सुर बनाए।यानी लतामंगेश्कर जी से काफी प्रभावित थीं अनुराधा जी।


       अनुराधा को लोकप्रियता मिली फिल्म हीरो के गानों की सफलता के बादऔर उनकी गिनती शीर्ष गायिकाओं में की जाने लगी| इस फिल्म में उन्होंने लक्षिकांत-प्यारेलाल के साथ जोड़ी बनाई। हीरो की सफलता के बाद इस जोड़ी ने कई और फिल्मों मे सफल गाने दिए, जैसे " मेरी जंग, बँटवारा, राम लखन और तेज़ाब। " 


टी सीरीज से जुड़ा नाता


      इसके बाद उन्होंने टी-सीरीज़ के गुलशन कुमार के साथ हाथ मिलाया और कहा जाता है कि इन्होंने कई नये चेहरों को बॉलीवुड में दाखिला दिलाया। इनमें से कुछ के नाम हैं जैसे उदित नारायण, सोनू निगम, कुमार सानू, अभिजीत, अनु मलिक और नदीम श्रवण। जी हाँ,ये वही अनुराधा पौडवाल जी हैं जिन्होंने भक्ति गीत का ऐसा परचम लहराया जिसके चाहनेवालों की कभी कमी नहीं हुई।

 


विवादों से घिरी अनुराधा


       अनुराधा पौडवाल को अपनी सफलता के साथ कुछ विवादों का भी सामना करना पड़ा। उनके पति अरुण की मृत्यु के बाद उनके और गुलशन कुमार के रिश्तों पर अफवाहें उड़ने लगीं। वहीं अपनी सफलता के चरम पर उन्होंने सिर्फ़ टी-सीरीज़ के साथ काम करने का एलान कर दिया , जिसका फायदा अल्का याग्निक को खूब मिला। अनुराधा पौडवाल ने फिल्मों से हटकर जब सिर्फ भक्ति गीतों पर ध्यान देना शुरू किया तो वे पीछे मुड़कर कभी नहीं देखीं और इस क्षेत्र में बहुत से सफल भजन गाए। कुछ समय तक काम करने के बाद उन्होंने एक विश्राम ले लिया और 5 साल बाद फिर पार्श्व गायन में आ गयीं हालाँकि उनका दुबारा गायकी के क्षेत्र में लौटना उनके लिए बहुत सफल साबित नहीं रहा। 


पुरस्‍कार

अनुराधा पौडवाल को संगीत के क्षेत्र में किये गये उनके बेहतरीन योगदान के लिये कई सारे पुरस्‍कारों से सम्‍मानित भी  किया जा चुका है। उन्‍हें भारत सरकार की तरफ से साल 2017 में पद्मश्री से सम्‍मानित किया गया। इसके अलावा उन्‍हें 4 बार फिल्‍म फेयर पुरस्‍कार से और एक बार राष्‍ट्रीय फिल्‍म पुरस्‍कार से भी सम्‍मानित किया जा चुका है। 


अनुराधा के दीवाने हुए फैंस


       टीवी पर आने वाले सिंगिंग रियलिटी शो से हर साल बॉलीवुड को नए सिंगिंग सुपरस्टार्स भी मिलते हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी सिंगर रहे हैं, जिन्होंने अपनी सिंगिंग से पहले फैंस को दीवाना बनाया और उसके बाद अंधेरे की गहराइयों में कहीं खो गए। एक ऐसी ही सिंगर थीं अनुराधा पौडवाल, जिनकी जिंदगी की एक छोटी सी गलती ने उन्हें बॉलीवुड इंडस्ट्री से गायब कर दिया।

     एक समय था जब अनुराधा पौडवाल के लिए इंडस्ट्री के लोग ही उन्हें कहने लगे थे कि वह दूसरी लता मंगेशकर बनने जा रही हैं। लेकिन फिर कुछ ऐसा हुआ, जिसने उनकी जिंदगी ही बदल दी। आज हम आपको अनुराधा पौडवाल का तेजी से बढ़ता करियर अचानक से कैसे गिरता गया।आइये थोड़ा सा उसे भी जानलेते हैं।अब ये प्लानिंग के तहत हुआ या उनको उनकी ही गलती भारी पड़ गई।यह सोचना तो बनता है।

एक से बढ़कर एक सुपरहिट गाए गानें

      जैसा कि विदित है , कई दशकों तक अपनी सिंगिंग का लोहा मनवाने वाली लता मंगेशकर को 'स्वर कोकिला' कहा जाता है।उन्होंने एक से बढ़कर एक गाने गाये।उनके गानों का इंडस्ट्री ही नहीं बल्कि देश दुनिया में काफी सारे फैंन्स रहे हैं।इसी बीच जब अनुराधा पौडवाल की बॉलीवुड में एंट्री हुई और उन्होंने एक से बढ़कर एक शानदार सुपरहिट गाने गाने लगीं तो अनुराधा जी की मधुर एवं  मखमली आवाज की टी-सीरीज के मालिक गुलशन कुमार कायल हो गए। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो उन्होंने तो इतना तक कह दिया कि अनुराधा पौडवाल इंडस्ट्री की दूसरी लता मंगेशकर बनने जा रही हैं।

     अनुराधा पौडवाल की आवाज सुनकर एक म्यूजिक कंपोजर ने तो यहां तक कह दिया कि अब लता मंगेशकर का समय खत्म होने वाला है, क्योंकि अनुराधा उन्हें रिप्लेस करने जा रही हैं। उस दौर में शानदार सिंगिंग के लिए हर तरफ अनुराधा पौडवाल के बारे में ही बातें हो रही थीं। ये वो दौर था, जब अनुराधा पौडवाल अपनी स्वर कोकिला लता मंगेशकर और उनकी बहन आशा भोंसले को सिंगिंग में टक्कर दे रही थीं।

जब म्यूजिक डायरेक्टर्स  को जब अनुराधा का बयान  रास नहीं आया

आलम यह था कि अनुराधा को इंडस्ट्री में लता से भी ज्यादा माइलेज मिलने लगी. अनुराधा टी-सीरीज के साथ एक से बढ़कर एक हिट गाने गाती जा रही थीं और साथ ही साथ म्यूजिक एल्बम भी बना रही थीं।
    कहा जाता है कि एक दिन अनुराधा पौडवाल ने यह दावा करके सबको हैरत में डाल दिया  कि उन्होंने एक दिन में लता से ज्यादा गाने गए हैं।बताया जाता है कि लता और आशा जी को लेकर उन्होंने कुछ विवादित बयान भी दिए थे (जिसकी हम पुष्टि नहीं करते)और लता और आशा पर बॉलीवुड सिंगिंग में मोनोपोली तक का आरोप लगा दिया। हालांकि, उनका यह अंदाज बॉलीवुड के म्यूजिक डायरेक्टर्स को कतई पसंद नहीं आया। म्यूजिक डायरेक्टर्स आशा और लता को नाराज नहीं करना चाहते थे, इसलिए उन्होंने अनुराधा को तवज्जों देना कम कर दिया। यहां तक की दीवार इतनी बढ़ गयी कि अनुराधा के कुछ गानों को लता मंगेशकर से डब करा लिए गए। मीडिया रिपोट्स की मानें को इंडस्ट्री के ही कुछ लोगों का कहना था कि ये अनुराधा को दरकिनार करने की एक सोची समझी प्लानिंग थी।

अनुराधा ने कौन सा फैसला ले लिया

    विवाद तक तो ठीक था, लेकिन उसके बाद अनुराधा ने एक ऐसा फैसला लिया, जिससे उनका सिंगिंग करियर ही खत्म हो गया।अनुराधा अपने करियर के पीक पर थीं और एक से बढ़कर एक हिट सॉन्ग इंडस्ट्री को दे रही थीं। तभी उन्होंने एक ऐसा फैसला लिया जो उन पर भारी पड़ गया।अनुराधा ने टी-सीरीज के साथ करार किया और घोषणा कर दी कि वह अब सिर्फ टी-सीरीज के लिए ही गाने गायेंगी, हालांकि इसके बाद यह  चर्चा शुरू हो गई कि अनुराधा का गुलशन कुमार के साथ अफेयर चल रहा है। हालांकि, दोनोंलोगों ने इन खबरों को नकारते हुए इसका खंडन करते। फिर अनुराधा का कैरियर सिर्फ टी-सीरीज तक ही सिमट कर रह गया और धीरे-धीरे उनका करियर अंधेरे की ओर चला गया।

गुरुवार, 26 अक्टूबर 2023

पंचवटी मेंं राम लछिमन

    पंचवटी में राम लछिमन
  
भाई पत्नी सहित प्रभू स्वयं रामजी

पंचवटी में कुटिया बनाये  हुए थे
साधु सन्तों की संगत उन्हें मिलती रही
उनका पंचवटी में आना गजब हो गया
अच्छा खासा गुजरता था वक्त अभी तक
साथ सीताजी को लाना गजब हो गया ||

घूमते राक्षसी एक दिन रावण की बहना
राम को देखकर मन में हर्षित हुई
थी वो विधवा मगर अभी जवानी में थी
मन में मदहोशी है उसके जब छाने लगी
हो जाये शादी अगर मेरी आज इनसे
इससे अच्छी भला और क्या बात थी।।
उनसे नजरें मिलाना गजब हो गया।।
उनका पंचवटी मेंआना गजब हो गया।। 2

पलभर में बन गयी ऐसी हुस्न की मलिका
बनाया रूप कुछ ऐसा,जाके करीब बोली
थामलो हाथ मेरा,अब सोचो ना विचारो
खुशगवार मंजर है यहाँ का, मेरे सोना
लूटते मजा चलो इस हुस्नोंशबाब का
ये घड़ी नहीं है किसी इन्तजार का
सुपनखिया का आना गजब हो गया || 3

बिना विचलित हुए राम बोले-
सीता को देखकर मैं कुँवारा नहीं,
और तू भी मुझे  स्वीकार नहीं है
एक पत्नी के होते तुमसे शादी करूँ।
ऐसा मन में भाव कभी आया नहीं है।
पास लक्ष्मण के जाना गजब हो गया ।।4.

पहुँची करीब जाकरके लक्ष्मण से बोली
करले शादी मुझसे, अब जवान हो गया है।
तेरे जवान जिश्म पर मेरा दिल आगया है
मन में दहकती ज्वाला कई साल हो गया है।
सोचे समझे बिना ऐ मेरे दोस्तों,
उसका जलवा दिखाना गजब हो गया।।5

मैं हूँ सेवक सुनो अपने प्रभू राम का ।
सेवा करना ही देखो यहाँ मेरा काम है।
घर में बैठी एक सुहागन है पत्नी मेरी
उसे भी साथ रखना मुझे जब गवारा नहीं
है तू सुन्दर बहुत, मगर तुझमें एक बात है
तेरा बिजली गिराना गजब हो गया ।। 6

इसे भी देखें
https://mkbepnahofficial.blogspot.com/2023/09/blog-post_15.html

ठुकरा गयी जब दोनों तरफसे हुई गुस्से से लाल ।
भेष भयंकर बनाके फिरवो पहुंची सीता के पास ।।

   देखा पिशाचिनी का जब रूप ये भयंकर ।
   काटे है नाक कान तब लक्ष्मणजी दौड़कर ।।

रोते बिलखते भागते खर दूषण के पास वो जब गई
खून से लथपथ देख वो बोले तेरी ये हाल क्या हुई
किसकी मजाल यहाँ हुई जिसने तेरा ये हाल किया
काटकर मैं फेंक दूँगा, कौन है हमें तूँ नाम बता
उसका नजरें लड़ाना गजब ढा गया।।

सुना के हाल वहाँ से पुन: है मायके गई
उसका रावण के यहाँ जाना गजब हो गया ||

त्रियाचरित्र देखिये उसका क्या हाल हम सुनायें।
बताने लगी है सुपनखा दो बालक पंचवटी में आये हुए हैं हैं वो साधूसरीखे दिखते मगर, कंधे पे धनुही टांगे हुए हैं है साथ में रहती उनके एक नारी  है सुन्दर ।
देखकर अकेली मुझे उसने ढाया है ऐसा कहर
नहीं नेक हैं विचार उनके सुनो मेरे भइया
जहाँ कुटिया वे अपनी बनाये हुए हैं।।

मैंने कहा जब उससे सिर्फ उसके पास जाकर
तूँ चाहे तो मैं तुझे लंका की रानी बना सकती हूँ।
रावण  हैं मेरे भइया, उनसे तुमसे मिला सकती हूँ।।
इतना कहना ही मेरा गजब हो गया।।

मेरे नाक कान उसने काटा उसी क्षण
मेरा पंचवटी में रहना उन्हें भाया नहीं
उनकी कूदृष्टि मुझपर जाने कबसे लगी
मेरा वहाँ जाना आफत बन गया

तुम्हारे जैसे भाइयों के रहते हुए
बहन लूट जाये तो जीना भी क्या
बदला लेलो भइया अभी इसी क्षण
नकटी बनकर जीने से मरना भला
क्रोध भड़काकर तब वो, महल में गई
मरने मारने का नया खेला रच दिया

सुनी जब बात बहना की,दशकंधर का गुस्सा जाग उठा
ठान लिया मन में उसने भी सीता को लंका अब लाऊँगा
मारीच से बोला जाकर तुम सोने के मृग बनकर जाओ
राम की कुटिया पर जाकर उनका ध्यान तुम भटकाओ
बनाकर भेष साधू का, रावण सीता को हर लाया
मृग मारिच का बनना गजब हो गया ||

   ----मालचन्द कन्नौजिया ' बेपनाह '



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शनिवार, 21 अक्टूबर 2023

सुनिये कथा रघुनाथ की

 सुनिये कथा रघुनाथ की


एक बार किसी गांव में  रहने वाला एक अनपढ़ (गँवार) आदमी एक महात्मा जी के पास गया और वहाँ जाकर महात्मा जी से बोला ‘‘महाराज ! हमको कोई आसान और सीधा-साधा नाम बता दो जिसे हम जपा करें। हमें  भगवान का नाम लेना है।हमें उसी नाम का जाप करना है।

      


भगवान को किस नाम से जपें

    
   महात्माजी उसकी ओर देखकर कुछ देर शांत रहे।फिर उन्होंने उस आदमी से कहा- तुम ‘अघमोचन-अघमोचन’ नाम का जाप किया करो।

अघमोचन  =  अघ् + मोचन
("अघ" माने पाप, "मोचन" माने छुड़ाने वाला)
जो पाप से छुड़ादें वही अघमोचन हैं।भगवान हैं।

  महात्मा जी ने उसे समझाया कि देखो , जो मनुष्य  को उसके पाप कर्मों से मुक्ति दिलाये वही भगवान हैं, वही ईश्वर हैं।उनके तो हजारों नाम हैं।मैं तुम्हें एक सरल नाम बता रहा हूँ।उसीको जपा करो।

भक्ति और भजन की भाषा 


        अब वह बेचारा अनपढ़ गँवार आदमी "अघमोचन-अघमोचन" करता हुआ वहाँ से चला गया। गाँव जाते-जाते "अ" भूल गया। अघमोचन कहने में उसे थोड़ा अटपटा लग रहा था । बहुत दिमाग पर जोर लगाया किन्तु उसे अघमोचन नाम कंठस्थ नहीं हुआ। अब वह  अघमोचन के बजाय 'घमोचन-घमोचन" जपने लगा। इसीतरह से जपते हुए कुछ दिन बीत गए।धीरे धीरे जब उसकी जापध्वनि ब्रहमाण्ड में गूँजने लगी तो एक दिन की बात है वह गरीब किसान जब वह हल जोत रहा था तो हल चलाते हुए भी नाम जपते जा रहा था और वही सधा सधाया नाम बारंबार "घमोचन-घमोचन" कर रहा था।

जब भगवान को भक्त के नाम जाप पर हँसी आ गई

    
     उधर वैकुंठ लोक में भगवान भोजन करने बैठे ही थे कि उनके कानों में घमोचन नाम का उच्चारण ध्वनि सुनाई दी।अपना एक नया नाम जाप सुनकर उनको हँसी आ गयी।पास में बैठी हुई  लक्ष्मीजी ने पूछा-‘प्रभू! आप क्यों हँस रहे हो ? क्या भोजन में कोई त्रुटि हुई है?

      भगवान विष्णु जी बोले- " देवी! आज हमारा एक भक्त , एक ऐसा नाम ले रहा है कि वैसा नाम तो किसी शास्त्र में है ही नहीं। उसी को सुनकर मुझे हँसी आ गयी है।"

‘‘लक्ष्मी जी बोलीं - "प्रभू! तब तो हम उस भक्तको अवश्य देखेंगे और सुनेंगेे कि वह कैसा भक्त है और कौन-सा नाम ले रहा है।’’

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    भगवान स्वयं देवी लक्ष्मी के साथ दर्शन देने भक्त के पास पहुंच गए


         लक्ष्मी-नारायण दोनों उसी खेत के पास पहुँच गए जहाँ वह हल जोतते हुए "घमोचन-घमोचन" का जप कर रहा था ।

       पास में एक गड्ढा था भगवान विष्णु जी स्वयं तो वहीं जाकर छिप गये और लक्ष्मीजी भक्त के पास जाकर पूछने लगीं- ‘‘अरे, यह क्या घमोचन-घमोचन बोले जा रहे हैं?’’
  " यह घमोचन कौन नया देवता आ गए?.....कुछ तो बोलो।"

   उन्होंने एक बार, दो बार, तीन बार पूछा परंतु उस किसान ने कुछ भी उत्तर ही नही दिया।

   उसने सोचा कि इसको बताने में हमारा नाम-जप छूट जायेगा। पता नहीं कौन सी स्त्री है और आकर मेरा ध्यान भटका रही है।अतः वह उन्हें अनसुना करते हुए "घमोचन-घमोचन" करते रहा, बोला ही नहीं।

जब बार-बार लक्ष्मी जी पूछती रहीं कि अरे बाबा कुछ तो बोलो,बताते क्यों नहीं ,आखिर ये किसका नाम जपे जा रहे हो? बार बार जाप में बाधा उत्पन्न करती हुई जानकर उस किसान को गुस्सा आ गया। अनपढ़ आदमी तो था ही, बोला : ‘‘जा ! तेरे भरतार (पति) का नाम ले रहा हूँ।बोलो जानकर क्या कराेगी ।’’

     अब तो लक्ष्मी जी डर गयी ,कि यह तो हमको पहचान गया लगता है। फिर बोलीं- ‘‘अरे, तू मेरे भरतार (पति) को जानता है क्या? कहाँ हैं मेरा भरतार?’’

   वह फिर झुँझलाकर बोला -- ‘‘जा देख उधर , वहीं कहीं गड्ढे में पड़ा है, जाना है तुझे भी उस गड्ढे मे..???

अब तो लक्ष्मी जी समझ गयीं कि इसने हमको पक्का पहचान लिया है और वहाँ से तुरंत चली गईं। जाकर विष्णु भगवान से बोलीं, " प्रभू! बाहर आ जाइये,अब छिपने से कोई फायदा नही है।"

भक्ति के लिए किसी विशेष भाषा की जानकारी जरूरी नहीं है।


...और तब विष्णुभगवान उस गड्ढे से बाहर निकल कर वहाँ आ गये और बोले; ‘‘ देख लिया देवी , मेरे नाम की महिमा ! यह अघमोचन और घमोचन का भेद भले ही न समझता हो लेकिन यह जप तो हमारा ही कर रहा था। हम तो समझते हैं...उसके मनोभावों को।भाषा कोई भी हो,वह किसी भाषा में पुकारे , हम तो सब समझते हैं।चाहे हमें किसी भी नाम से कोई पुकारे, हमें क्या फर्क पड़ता है।"मुस्कुराते हुए प्रभु ने कहा।

" यह घमोचन नाम से हमको ही पुकार रहा था देवी। जिसके कारण आज मुझे इसको दर्शन देना पड़ा।"

भगवान ने भक्त को दर्शन देकर कृतार्थ किया । कोई भी भक्त शुद्ध-अशुद्ध, टूटे- फूटे शब्दों से अथवा गुस्से में भी कैसे भी भगवान का नाम लेता है तब भी भगवान का ह्रदय उससे मिलने को लालायित हो उठता है और खुद को भक्त से मिलने को रोक नहीं पाते।
अब भक्ति करना भक्त का कर्तव्य है और फल देना भगवान के हाथ में।यदि हम अपने आप को मन,वचन और कर्म से भगवान को समर्पित करने में जुट जायें तो यह यह जीवन धन्य हो सकता है।
प्रेम से बोलिए सच्चिदानन्द भगवान की जय।
                   
                        -- मालचन्द कन्नौजिया बेपनाह।

(यह कथा कैसी लगी ?आप अवश्य अपने विचारों से अवगत करायेंऔर शेयर करें।ऐसी ही और कथाएँ सुनने के लिए बने रहें हमारे साथ।)

शुक्रवार, 20 अक्टूबर 2023

एक नशीहत नई पीढ़ी के लिए

 नवयुवक एवं युवतियों के लिए एक नशीहत


      एक युवक को नाबालिग से रेप के मामले में दोषी ठहराया गया था। हालांकि युवक का नाबालिग के साथ 'रोमांटिक अफेयर' था। कोर्ट ने कहा कि यह हर किशोरी का कर्तव्य/दायित्व है कि वह अपने शरीर की अखंडता के अधिकार की रक्षा करे।उसकी गरिमा और आत्मसम्मान की रक्षा करे। जेंडर संबंधी बाधाओं को पार कर अपने विकास के लिए प्रयास करें। कोर्ट ने कहा कि अपनी यौन इच्छाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि हर किसी को अधिकार है कि वह अपने शरीर की स्वायत्तता और उसकी निजता के अधिकार की रक्षा करे। उसका हनन होने से बचे और बचाये।

महिलाओं का सम्मान


   कोर्ट ने पुरुषों के लिए कहा कि किसी युवा लड़की या महिला का सम्मान करना एक किशोर पुरुष का कर्तव्य है और उसे अपने दिमाग को एक महिला, उसकी गरिमा, गोपनीयता का सम्मान करने के लिए प्रशिक्षित करना चाहिए।

कोर्ट ने कहा कि एक युवा लड़की या महिला का सम्मान करना एक किशोर पुरुष का कर्तव्य है और उसे एक महिला, उसके आत्मसम्मान, उसकी गरिमा का सम्मान करने के लिए अपने दिमाग को प्रशिक्षित करना चाहिए।


सेक्स एजुकेशन


सेक्स एजुकेशन पर कोर्ट ने कहा कि  * cherrity begain's at home * 'चैरिटी बिगंस एट होम'। मतलब अच्छे काम की शुरुआत घर से होनी चाहिए। इसके लिए माता-पिता पहले शिक्षक होने चाहिए। इसलिए हमारा मानना है कि बच्चों, विशेषकर लड़कियों को बैड टच, बैड, बुरी संगति को पहचानने के लिए माता-पिता का मार्गदर्शन जरूरी है।
    यहाँ तक तो ठीक है।लेकिन कोर्ट ने  उस दोषी युवक को सजा नहीं सुनाई।सिर्फ नसीहत देते हुए उसे बरी कर दिया था। जबकि नीचली अदालत ने उस लड़के को रेप का आरोपी पाया था और उस नवयुवक ने एक नाबालिग लड़की के साथ अफेयर के चलते उसके साथ रेप किया था।

सभी अपराधियों को कोर्ट सजा नहीं देता


          कोई जरूरी नहीं होता है कि कोर्ट हर मामले में आरोपी को सजा ही देगा। सबसे पहले तो थाने से ही लोग मामले को दबा देना चाहते हैं।अगर मामला वहां से रफादफा नहीं हो पाता है तो कोर्ट कचहरी में लम्बी लड़ाई चलती है।अनेकों प्रकार के उल्टेसुल्टे प्रश्नों की झड़ी लगाकर वकील साहब मामले को पेचीदा बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते।अगर आरोपी पैसे वाला है तो वकील उसे बचाने का हर सम्भव प्रयास करते हैं।पीड़िता से ऐसे ऐसे गंदे सवाल किये जाते हैं कि लड़की शर्मिंदगी महसूस करते हुए मुँह ही न खोले।आरोप सिद्ध करने के लिए गवाह चाहिए होते हैं और कोई किसी के मामलों में पड़कर उलझना नहीं चाहता।जब गवाह ही नहीं रहेंगे तो सजा ही नहीं होगी।बलात्कार जैसी घटनाएं कहीं एकांत देखकर लोग करते हैं, जहाँ किसी की नजर न पड़े तो ऐसे में जब कोई देखा ही न हो,गवाही कैसे देगा।जब गवाही नहीं होगी तो सजा भी कोर्ट नहीं दे सकता।अगर किसी कोर्ट ने सजा दे भी दिया तो अगली कोर्ट में अपील किया जाता है और हो सकता है कि आरोपी वहां से बरी हो जाय।अक्सर हो भी जाते हैं।इसलिये जवानी की चौखट को छू रही उन तमाम बच्चियों को ऐसे दिल फेंक आशिक से दूर रहना चाहिए।उनके झूठे प्रेम जाल में न आयें। शादी के पहले किसी के साथ शारीरिक सम्बन्ध बनाने से बचें।

इज्ज़त जाने के बाद कभी  लौटकर नहीं आती


रूपया पैसा, धन दौलत सब आता जाता रहता है।आज पैसा नहीं है, कल आ सकता है लेकिन जब इज्जत जहाँ से चली गई तो समझिये उसे वापस नहीं पाया जा सकता।इसलिए इज्ज़त वह धन है जो बहुत ही बढ़िया से बचाकर रखना चाहिए।उसे खो दिया तो सबकुछ खो दिया।


यौन इच्छाओं पर नियंत्रण


कलकत्ता हाईकोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान यह अहम टिप्पणी की।कोर्ट ने कहा कि किशोर लड़कियों को अपनी यौन इच्छाओं पर नियंत्रण रखना चाहिए।साथ ही कहा कि किशोर लड़कों को युवा लड़कियों और महिलाओं और उनकी गरिमा का सम्मान करना चाहिए।

आजकल का प्रेम एक दिखावा है।


      अब सबसे अहम बात यह है कि आजकल के लड़के प्रेम का दिखावा करके  लड़कियों को पहले अपने झूठे प्रेमजाल में फँसाते हैं।अगर लड़कियों की तरफ से उसको जरा सी भी ढील मिली  यानी अगर लड़की विरोध करने में असमर्थता जताई, तो लड़कों को  बल मिल जाता है।परिचय बढ़ाने लगते हैं।जैसे ही मेलजोल हुआ कि उँगली छोड़़ हाथ पकड़ लेते हैं।अब चूँकि किशोरावस्था की वह उन सीढ़ियों पर चढ़ रही होती हैं, जहाँ से यौवन अँगड़ाइयाँ भरने लगता है।विपरीत सेक्स के लिए एक विशेष आकर्षण बढ़ता जाता है।लड़के गलत तरीक़े से बार बार लड़कियों को छूने के लिए कोशिश करते हैं और यदि लड़कियाँ उसका विरोध नहीं करती हैं तो रेप होना निश्चित है।और यह प्रेम सिर्फ एक दिखावा होता है।असली खेल तो शारीरिक यौन इच्छाओं की पूर्ति करने के लिए रचा गया एक प्रपंच मात्र है।

    किशोरावस्था में उभरती हुई जवानी की दहलीज पर कदम पड़ते ही वे बहकने लगतेहैं।इसे रोकना ,उन बहकते कदमों पर नियंत्रण पाना एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी होती है।सामान आपका है, हिफाजत भी आपको करनी है।अपनी आबरू को बचाकर रखना होगा।ऐश तो जीवन भर करना है।उसके लिए माँबाप हैं जो आपके लिए एक अच्छे से जीवनसाथी की तलाश में रहते हैं।आपसे ज्यादा उनके पास इस जीवन के अनुभव हैं।वे कभी नहीं चाहेंगे कि उनके बच्चे कुँवारे रहें या इधर उधर कहीं मूँह काला करते फिरें।

माता पिता की जिम्मेदारी


जैसे ही बच्चियाँ सयानी होती जाती हैं, उनके हावभाव बदलने लगते हैं।उनके चलने का ढंग बात करने का तरीका सब बदल जाता है।उनके पहनावे भी बदल जाते हैं। माता पिता की जिम्मेदारी बनती है कि वे अपने बच्चे बच्चियों के कपड़ों पर अवश्य ध्यान रखें।लड़कियों के वस्त्र इतने भड़कीले नहीं होने चाहिए कि जिधर से वे गुजरें, लोगों की नजरें बस उन्हें ही देखने लगें।इससे लड़कियों के लिए खतरा बढ़ जाता है।

लड़कियों की जिद


कुछ लड़कियाँ जीद्दी स्वभाव की होती हैं और वे इसे नहीं मानती हैं।और कुछ लोग उनका सपोर्ट भी करते हैं।यह पूरी तरह से गलत है।और इतना ही नहीं ऐसी ही लड़कियों के साथ ज्यादातर बलात्कार जैसी घटनाएं हो जाया करती हैं।

लड़कियों के पहनावे

  
     लड़कियों के कपड़े भी उनकी अस्मत बचाने और लुटाने में उतने ही जिम्मेदार हैं जितने कि लड़के।कुछ लड़कियाँ ऐसे ऐसे कपड़ों में बाहर निकलती हैं कि देखने वालों की नजरें उनपर ही टिक जाती हैं।हटाये नहीं हटतीं।कुछ शोहदे, कुछ अय्याश नयी उमंग वाले बिगड़ैल मनबड़ तो पीछे भी लग जाते हैं और जैसे ही सुनसान जगह दिखी कि अस्मत पर डाका डाल देते हैं। अब यहाँ किसका दोष दिया जाय।सामान अगर सुंदर है तो बहुत से लोगों का मन मोह लेता है।ठीक वैसा ही होताहै, इन कपड़ों के मामले में भी।कुछ कपड़े बहुत ही अश्लीलता भरा प्रदर्शित करते हैं।और कपड़े तो अंगों को ढकने के लिए पहने जाते हैं।जिस वस्त्र को धारण करके भी अगर जिश्म दिखाई देता हो तो उसे क्या कहा जाय।

          वे लोग जिधर हैं, सब लोग उधर देखते हैं।
          हम तो देखने वालों की नजर देखते हैं।।
    
      नजर ही वह समस्या है जो किसी की मुश्किलें खड़ी कर देती हैं।


 














मंगलवार, 10 अक्टूबर 2023

महाभारत में द्रौपदी की भूमिका और उसका रहस्य

 महाभारत में द्रोपदी की भूमिकाऔर उसका रहस्य



            महाभारत में द्रौपदी की भूमिका का काफी वर्णन मिलता है। कौरवों एवं पांडवों के बीच साम्राज्य की लड़ाई से लेकर महाभारत युद्ध तक में द्रौपदी का वर्णन मिलता है।

पांचाल नरेश राजा द्रुपद की पुत्री


        महाभारत की कथा के अनुसार पांचाल देश के राजा द्रुपद की पुत्री का नाम द्रौपदी था। वह पंचकन्याओं में से एक थी, जिन्हें चिर-कुमारी भी कहा जाता है।द्रौपदी को लोग कृष्णेयी, यज्ञसेनी, महाभारती, सैरंध्री, पांचाली, अग्निसुता आदि अन्य नामो से भी पुकारते थे।

अग्नि देव की पुत्री


     राजा द्रुपद ने एक बार बहुत बड़ा यज्ञ करवाये थे।और उसी यज्ञशाला में बने हवनकुँड में से एक सुन्दर कन्या और एक हृष्टपुष्ट बालक प्रकट हुए।बालक का नाम ध्रृतद्युम्न एवं कन्या का नाम द्रोपदी रखा गया।  वह एक दिव्य कन्या थी और उसका जन्म अग्निकुंड से हुआ था।कहा जाता है कि जब कौरव और पाँडव ने अपनी पूरी शिक्षा गुरु द्रोणाचार्य जी से प्राप्त किया था। जब उनकी शिक्षा पूर्ण हो गई तो गुरु द्रोणाचार्य ने उनमें कौरवों से एक गुरुदक्षिणा मांगी। द्रोणाचार्य ने वर्षो पूर्व द्रुपद से हुए अपने किसी अपमान का बदला लेने की एक गुप्त योजना बनाये हुए थे।

    उन्होंने कौरवों से कहा कि पांचाल नरेश द्रुपद को बंदी बनाकर मेरे समक्ष लाओ। कौरवों ने पहले द्रुपद पर हमला किया लेकिन वे हार गए इसके बाद पांडवों ने द्रुपद पर हमला किया जिसमें उन्हें जीत मिली। वे उन्हें बंदी बनाकर द्रोणाचार्य के पास ले आए। द्रोणाचार्य ने उनसे उनका आधा राज्य ले लिया और उन्हें छोड़ दिया। द्रुपद ने इसी अपमान का बदला लेने के लिए अद्भुत यज्ञ करवाया जिससे द्रोपदी का जन्म हुआ। उस यज्ञवेदी से ही एक सुंदर कन्या उत्पन्न हुई। तभी आकाशवाणी हुई कि इस कन्या का जन्म क्षत्रियों के संहार के लिए हुआ है। इसके कारण कौरव भयभीत रहने लगे।

       धीरे धीरे जब द्रोपदी युवती हो गई तो द्रौपदी के विवाह के लिए द्रुपद ने एक ऐसे स्वयंवर का आयोजन किया, जिसमें एक से बढ़कर एक धनुर्धर स्वयंवर के आयोजन में आये हुए थे। जिसमें दुर्योधन और कर्ण भी आये हुए थे।कहा जाता है कि जब सभी वीर धनुर्धर अपने लक्ष्य को भेदने में सफल नहीं हुए तो कर्ण उठकर सामने आया।कर्ण को देखते ही बाकी राजाओं में खलबली मच गई।लोग कर्ण का विरोध करने लगे।लोगों ने कहा कि यह तो हम सभी राजाओं का अपमान किया जा रहा है। कर्ण क्या है , किस राज्य का राजा हैं ,कर्ण।अर्जुन ने स्वयंवर की शर्त पूरी कर द्रौपदी से विवाह कर लिया।

द्रौपदी का स्वयंवर


    द्रौपदी का स्वयंवर था और उसकी शर्त यह थी कि ऊपर एक मछली लटका कर उसके नीचे एक घूमता हुआ चक्र लगाया गया था और फिर सबसे नीचे जमीन पर एक चूल्हे पर कढ़ाही में तेल खौल रहा था और उस खौलते हुए तेल में मछली की परछाई देखते हुए ऐसा बाण मारना था जो सीधे मछली की आँख में लग जाये।
    वैसे तो उस स्वयंवर में बहुत से वीर और धनुर्धर आये हुए थे लेकिन कोई उस लक्ष्य को भेदने में सफल नहीं हो सका।उसी सभा में वनवास काटरहे पाँचों भाई पाँडव भी वेष बदलकर बैठे हुए थे।अर्जुन ने लक्ष्य को साधकर तीर छोड़ा तो सीधे निशाने पर जा लगा।

द्रौपदी को पाँच पतियों की पत्नी बनने का मिला सौभाग्य


    जब अर्जुन द्रौपदी के साथ विवाह करके अपनी उस कुटिया में लौटे तो उस समय उनकी माता कुन्ती कुटिया में भीतर सोयी हुई थीं।अर्जुन ने बाहर से ही माँ को आवाज लगाया कि मां देखो आज हम भिक्षा में क्या लेकर आये हैं।
   माँ ने बिना उनकी ओर देखे ही उत्तर दिया कि तुम भी साथ लाये हो पाँचों भाई मिलकर आपस में बाँट लो।पाँडव अवाक रह गए।फिर बोले माँ तुमनें ये नहीं पूछा कि लाये क्या हैं और बिन देखे बोले जा रही हैं।तब माता उठकर उनकी ओर देखती हैं और कहती हैं कि अब तो मैंने जो कह दिया उसे टाल भी तो नहीं सकती हूँ।इसलिए ये तुम पाँचों भाइयों की पत्नी बनकर रहेंगीं।इस प्रकार से द्रौपदी ने सास के वचनों का पालन करते हुए सास के आशिर्वाद स्वरूप पाँच पतियों की पत्नी बनकर रहने लगीं।

द्रौपदी का जीवन वरदान था या शाप


       हवन कुंड से उत्पन्न होने और एक राजा की पुत्री होने का सौभाग्य तो मिल गया लेकिन राजाओं के यहाँ होने वाले स्वयंवर ने तो द्रौपदी का जीवन ही बदल दिया।राजसी ठाटबाट से पलीबढ़ी होने के बाद भी उसका स्वयंवर एक ऐसे वीर पुरुष और धनुर्धर से तो हो गया,लेकिन जीवनभर संघर्ष में जीना पड़ गया। रानी बनकर रहने का सौभाग्य ने साथ छोड़ दिया।और जैसे ही द्रौपदी का विवाह सम्पन्न हुआ, उनके भाग्य में  विपदाओं ने ऐसा खेल रच दिया जिससे वे जंगल जंगल भटकने को विवश होना पड़ा।बारह साल वनवास तो लो काट ही रहे थे और उन्हें एक साल तक अज्ञात वास में भी बिताना पड़ गया। अज्ञात वास में उन्हें दासी बनकर समय बिताना पड़ा था।

     दुर्योधन को अंधे का पुत्र कहने की भूल कर बैठी


       जब हस्तिनापुर में पाँडवों को उनका हिस्सा नहीं मिला तो खांडव वन को काटकर और उसे जलाकर पांडवों ने ऐसा अद्भुत महल बनाया था जिसे देखकर आँखें चौंधिया जाती थीं।बनावट कुछ इस प्रकार की थी कि जहाँ पानी होता वहां सूखा दिखाई देता था और सूखी जगह पानी का आभास होता था।दुर्योधन गच्चा खा गया और जहाँ पानी का आभास होता वहाँ अपनी धोती ऊपर कर लेता और जूते उतारकर हाथ में ले लेता था लेकिन जैसे ही पानी दिखना बंद हो जाता था तो धोती हाथ से छोड़ देता।और द्रौपदी झरोखे से यह दृष्य देखकर हँस पड़ी।मुँह से ऐसे शब्द निकल पड़े जो नहीं कहने चाहिए थे।दुर्योधन की यह मसखरे भरी भूल का द्रौपदी ने मजाक बना दिया और कही कि अंधे के जन्में भी अंधे ही होते हैं।बस इसी अपमान का बदला लेने के के लिए दुर्योधन ने अपने मामा शकुनि की मदद से जुये की योजना बना डाली।शर्तेभी बड़ी ऊँची ऊँची  रखी गई थीं ।

दुःशासन ने भरी सभा में द्रौपदी का साड़ी खींकर नंगा करना चाहता था।


    जब जुए में युधिष्ठिर ने द्रौपदी को भी दाँव पर लगाकर उसे हार गये तो भरी सभा में दुर्योधन ने अपने उस अपमान का बदला लेने के लिए द्रौपदी को नंगा करने हेतु दुश्साहस से उसका साड़ी खींचकर खोलवाने का बड़ा प्रयास किया।किन्तु वह खुद थककर गिर पड़ा मगर साड़ी खत्म नहीं हुई। बड़ेबड़े धर्मात्मा सभा में उपस्थित थे लेकिन किसी ने कोई विरोध नहीं किया।सब के सब मुँह लटका कर बैठे रहे ।

     .



द्रौपदी की मृत्यु कैसे हुई 


       द्रौपदी की मृत्यु को लेकर ऐसा कहा जाता है कि पांडवों के साथ परलोक की यात्रा के दौरान द्रौपदी की मृत्यु हो गई थी।
द्रौपदी का विवाह पांच पांडवों से हुआ था। युधिष्ठिर, अर्जुन, नकुल, सहदेव, भीम से उनका विवाह हुआ था। चूंकि अर्जुन ने ही द्रौपदी को स्वयंवर में जीता था इसलिए द्रौपदी पांचों में से अर्जुन से सबसे ज्यादा प्रेम करती थी। द्रोपदी की खूबसूरती पर कौरवों के बड़े भाई दुर्योधन की नजरें लगी रहती थी। एक बार दुर्योधन ने भरी सभा में द्रौपदी का चीरहरण किया था जिसके बाद कौरवों और पांडवों के बीच महाभारत का युद्ध छिड़ गया था। 
     
       द्रौपदी को लेकर  महाभारत में कई कहानियां आपने सुनी होंगी। यहां हम आपको आज बताएंगे द्रौपदी की मृत्यु कैसे हुई थी। यदुवंशियों का राजपाट समाप्त हो जाने के बाद पांडवों को इसका काफी दुख हुआ। इसके बाद युधिष्ठिर ने वेद व्यास से अनुमति लेकर राजपाट छोड़कर परलोक जाने का निश्चय किया। पांडवों के स्वर्गारोहण की कहानी में इसका वर्णन मिलता है। महाभारत में 18 पर्व में से एक है महाप्रस्थानिक पर्व है, जिसमें पांडवों की महान यात्रा अर्थात मोक्ष की यात्रा का उल्लेख है। भारत यात्रा करने के बाद मोक्ष प्राप्त करने के लिए पांडव द्रौपदी के साथ हिमालय की गोद में चले गए। वहां मेरु पर्वत के पार उन्हें स्वर्ग का रास्ता मिला। पांचों पांडवों के साथ द्रौपदी और एक कुत्ता उनके साथ यात्रा पर था। इसी दौरान द्रौपदी लड़खड़ाकर गिर पड़ी। भीम ने पूछा कि उसने कभी कोई पाप नहीं किया है तो ये कैसे गिर गईं? इस पर युधिष्ठिर ने कहा कि ये हम पांचों में से अर्जुन को सबसे ज्यादा प्रेम करती थी, इतना कहकर वे उन्हें बिना देखे आगे बढ़ गए। इसी यात्रा के दौरान द्रौपदी की मृत्यु हो गई थी। इस यात्रा में एक-एक करके सारे पांडव भाई मौत की आगोश में चले गए। सबसे पहले इसमें द्रौपदी की मृत्यु हुई थी। लेकिन यहां रोचक बात ये है कि केवल युधिष्ठिर को ही स्वर्ग में प्रवेश करने की अनुमति मिली थी। 

   

उपसंहार


       हमें इस कथावार्ता से एक बात तो समझ में आती है कि जुआ एक गंदी और खराब लत है।जुए में लोगों ने घर लक्ष्मी अपनी पत्नी को भी हार चुके हैं।इसलिए जुए नहीं खेलना चाहिए क्योंकि इसकी लत लग सकती है और भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
    यहाँ एक और खास चीज हमें देखने को मिली वो यह कि जो हमारी किस्मत में नहीं है वो हमें नहीं मिलती है।समय बहुत बलवान होता है।समय और भाग्य का जीवन में बहुत बड़ा योगदान होता है।जो भी करें सोच समझकर करें।समय राजा को भी भिखारी बना देता है।

सोमवार, 9 अक्टूबर 2023

हिन्दी कैलेण्डर के कुछ आसान से टिप्स

हिन्दी कैलेण्डर के कुछ आसान से टिप्स

नमस्कार , मित्रों! आज हम आपको कुछ आसान से ऐसे टिप्स समझाने वाले हैं, जो समझने में बहुत ही आसान है। और वह ऐसा कोई न तो साफ्टवेयर है और न ही कोई ऐप है।अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर वह कौन सा फार्मूला है जो मैं आपको बताने वाला हूँ तो आप बिल्कुल मत घबरायें।जब कह रहा हूँ तो जरूर बताऊँगा।

यह कोई जादू का खेल नहीं है और न तो कोई मेरे हाथ की सफाई है।बस एक छोटा सा फार्मूला है और अगर आपने इसे सीख लिया तो कभी भी कहीं भी आप हों।अगर कोई आपसे पूछे कि आज से अस्सी दिन बाद कौन सा दिन होगा?या फिर कोई बोले कि आजसे एक सौ पाँच दिन बाद कौन सा दिन पड़ने वाला है?या फिर आज से 301दिन बाद कौन सा दिन आयेगा?

 तो अब आप लोग सोच रहे होंगे कि दो चार दस दिन बाद का दिन अगर कोई पूछता तो हाथ की उंगलियों पर गिनकर पता किया जा सकता है लेकिन अब तीन सौ , चार सौ , हजार  दिन के बाद का दिन  भला कैसे जोड़ा जाएगा। पड़ गए न घनचक्कर में......।

चलो कोई बात नहीं।चिंता छोड़ो और कलम उठाओ ।निकाल लो हिसाब ।

दो मिनट भी नहीं लगेगा। जी हाँ.।


देखिये  कुल  दिन होते कितने हैं.

सात  7 . जी बिल्कुल सही पढ़ा आपने।कुल सात दिन ही होते हैं।और जबसे यह दुनियां बसी है तब से  आजतक सिर्फ और सिर्फ 7 दिन ही हुए।

1- सोमवार

2- मंगलवार

3- बुधवार

4- बृहस्पतिवार या गुरुवार

5- शुक्रवार

6- शनिवार

7- रविवार

   ये रहे हमारे सभी दिनों के नाम।तो पूरा समझकर ही जाइयेगा।मैं थोड़ा मजे लेकर समझाने की कोशिश कर रहा हूँ तो बने रहिये और कुछ देर के लिये।

मेरे मित्रों , भगवान ने हमारे लिए यही सात दिन बनाया है।इन्हीं सात दिनों में जन्म से लेकर शादीव्याह, लड़ाई झगड़ा, प्यार मोहब्बत सब कुछ होना है और अन्त में इन्हीं में से किसी एक दिन हमारी मृत्यु भी निश्चित की गई है।सारा खेल सात दिनों में ही समाप्त होने वाला।किसी व्यक्ति विशेष के लिए अलग से कोई आठवां दिन नहीं होने वाला।


चलिये मनोरंजन भी हो गया।अब सवाल पर आते हैं।

सवाल  है--  🥀 आज यदि मंगलवार है तो आज से दस दिन बाद कौन सा दिन होगा ?🦋

  देखिये मात्र दस बाद वाला दिन जानने के लिए आप इसे तो अपनी उंगलियों पर ही गिनकर बता सकता है।

लेकिन यही अगर सवाल ज्यादा दिनों बाद का जानना हो तो मुश्किल हो जाता है।चलिए इसे हल करने का फार्मूला देखते हैं। 

फार्मूला है  :-   👉 पूछे गए दिनों की संख्या में दिन की संख्या  से भाग दे देंगे। और दिन की संख्या होती है 7.

तो  सात से भाग देंगे यानि डिवाइड कर देंगे। अ ब जो शेष बचेगा उसे आज के दिन उतने दिन बाद वाला दिन ही आपका उत्तर होगा।

 जैसे अगर आपको तीन शेष बचे थे  और आज रविवार है तो  रविवार के तीनदिन बाद  बुधवार आयेगा।इसलिए आपका उत्तर बुधवार होगा।

सवाल का हल :-       10÷7  =  1और शेष बचा 3  

अब दिन था मंगलवार तो  मंगलवार से 3 दिन बाद शुक्रवार  आता है और हमारा जवाब होगा

अगर आज मंगलवार है तो आज से दस दिन बाद शुक्रवार होगा।,,


   👉  ठीक इसी प्रकार से  यदि आज शुक्रवार है तो आज से 301 दिन बाद कौन सा दिन हो सकता है?


इसे भी देख लेतेहैं।

         301/7 = 43  तो यहाँ कोई शेष नहीं बचा यानि 301 दिन में जब आप 7 से डिवाइड करते हैं तो वह पूरा पूरा डिवाइड हो जाता है और शेष शून्य हो जाता है तो आज जो दिन है उसमें कुछ नहीं जुटेगा।इसलिए आज जो दिन है आज के  301 दिन बाद भी वही दिन होगा जो आज है।

इसी प्रकार जो भी संख्या सात से पूरी तरह बंट जाती है तो उतने दिन बाद आज ही का दिन पड़ेगा।उसी प्रकार यदि शेष आपको 6 गिरता है तो आज से या पूछे गए दिन से एक दिन पहले वाला दिन आपका उत्तर होगा।अब आप चाहे आजसे 6 दिन बाद वाला दिन पता करने के लिए छ जोड़े या  छ घटायें।पर यह ध्यान रखें कि यदि आपने दिन की संख्या को जोड़ा है आगे बढ़ना है और घटाकर देखते हैं तो उल्टे गिनना होगा।


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हमारे साथ जुड़े रहने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद।

आपका दिन शुभ हो।🌹🥀🌹🥀

     ,

 

लेबल:

चुटकी भर सिंदूर

 कविता 

         चुटकी भर सिंदूर  



है रंग नहीं कोई साधारण
बस चुटकी भर सिंदूर ये है
वो चीज नहीं है ये जिसको
चाहे जिसे लगादे जो।।


पर बिकता है यहभी बाजारों में
खरीदारी करती सुहागिनें इसको।
है प्रतीक पतिदेवों का,
सुहागनों की माँग में फबता है
प्रथम बार पति के ही हाथों
दुल्हन की माँग सजाता है।।

लगाती नहीं कही इसको
जबतक रहें कुँवारी वो
भर गई मांग सिंदूर से जिसदिन
कहलाने लगती हैं नारी वो


है धन्य बहुत माथे पर तुझको
यूँहीं नहीं स्थान मिला ।
हो जाती हैं पराई बेटी उस दिन से
जबसे तूँ उसका श्रृंगार बना।।


कहने को तो तूँ है केवल
वह चुटकी भर सिंदूर
जीवनभर मर्यादा में रहना
सिखाने वाले हैं तेरे दस्तूर।।


इंसानों की बात छोड़िये
हो देवों के भी प्यारे तुम
बिन तेरे श्रृंगार अधूरा
सोचो कितने हो न्यारे तुम।।


सदा चमकते रहना प्यारे
जैसे हो सूरज की लाली
तेरे बिना हर नारी अधूरी
कोई गोरी हो चाहे काली।।


पिया वही जो माँग सजाये
जिस चुटकी भर सिंदूर से
दुल्हन वही जो पिया मन भाये
अपने सच्चे दस्तूर से।।

तुम पहचान दिलाते हो
जिसके माँग में बसते हो
हो चुकी है ये और किसी की
ये पिया की अपने प्यारी हो।।
        --- मालचन्द कन्नौजिया बेपनाह*

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शुक्रवार, 6 अक्टूबर 2023

सप्तर्षि कौन थे

 सप्तर्षि कौन थे?


  प्राचीन काल में जब ब्रह्मा जी  श्रृष्टि की रचना कर रहे थे तो उनके मन में विचार आया कि क्यों न मानव श्रृष्टि को विस्तृत किया जाय।तब उन्होंने अपने मानस पुत्रों को उत्पन्न किया।जब उन्हें श्रृष्टि के विस्तार के लिए उनसे संतान उत्पन्न करने हेतु विवाह करने और वंश चलाने की बात करते तो वे यह कहते हुए अपना पल्ला झाड़ कर निकल लेते कि भगवान के भक्ति भजन से ज्यादा कुछ नहीं करेंगे।तब उन्होंने अपने मानस पुत्र दक्ष प्रजापति को उत्पन्न किया।जब उनसे यह बात की तो उन्होंने हाँ कहते हुए ब्रह्मा जी को उनकी श्रृष्टि के विस्तार करने में अपने यथा संभव योगदान देने में अपनी अनुमति प्रदान कर दिया।
    


उसी समय कुछ ब्रह्मा जी के मानस पुत्रों में से एवं कुछ दूसरे मनुष्य अपने अथक परिश्रम और तपस्या के बलबूते एक ऐसा स्थान प्राप्त कर लिया जिससे संसार में उनका काफी नाम और सम्मान प्राप्त किया।ऐसा कहा जाता है कि उन्हीं में से सात ऐसे महान ऋषि और मुनि हो गये जिनमें से कुछ सात ऋषियों ने अपने तपोबल से सबको सकते में डाल दिया।आइये आज हम एक एक करके उनके बारे में बताते हैं।सप्तर्षि सात ऋषियों का एक समूह था,जिनके शाप से तो देवताओं के राजा इन्द्र भी सदा भयभीत रहते।

सप्तर्षियों के नाम

      सप्तर्षि उन सात महान ऋषियों का एक ऐसा समूह था जिससे मनुष्य तो क्या स्वयं देवताओं के राजा इंद्र भी डरते थे।आइये पहले उनके नाम से परिचित हो जायें।फिर एक एक करके उनके बारे में और जानकारी देने का प्रयास हम यहाँ करेंगे।
१-अगत्स्य मुनि
२- भृगु ऋषि
३- भरद्वाज ऋषि
४- कश्यप ऋषि
५- महर्षि दुर्वासा
६- वशिष्ठ मुनि
७- विश्वामित्र

1- अगत्स्य  

       अगस्त्य मुनि को तो आपने जरूर कहीं न कहीं पढ़ा होगा।अगर नहीं पढ़ा है और नहीं सुना है तो चलिये हम उनकी कथा  आपको बता देते हैं।
 

वशिष्ठ मुनि के बड़े भाई  थे, अगत्स्य मुनि


  अगस्त्य मुनि वशिष्ठ मुनि के बड़े भाई कहे जाते हैं ।इनकी तपस्या से देवता सब बड़े प्रभावित थे।देवताओं के विनम्रतापूर्वक निवेदन करने से अगस्त्य मुनि काशी छोड़कर दक्षिण भारत की ओर चले गये।और उधर ही जाकर रहने लगे।उसी समय समुद्र में छिपे हुए राक्षसों का इतना आतंक फैला हुआ था जिससे सभी देवताओं में भय ब्याप्त हो गया था यहां तक कि देवताओं के राजा इन्द्र को भी चिंता होने लगी थी।जिससे देवताओं ने मिलकर अगस्त्य मुनि से विनती किया तो अगस्त्य मुनि ने पूरा समुद्र का जल अपनी तपोबल से पीकर सुखा दिया था। समुद्र के भीतर जितने भी जीवजन्तु थे सभी व्याकुल हो उठे।तब समुद्र देव ने आग्रह करके उनसे समुद्र में जल छोड़ने की विनम्र भाव से विनती की और यह समुद्र पुनःअपने स्वरूप को प्राप्त किया।

विन्ध्याचल को ऊँचा उठने से रोक दिया

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महर्षि अगस्त्य को लेकर एक और कथा सुनने को मिलती है।कहा जाता है कि किसी समय विन्ध्याचल पर्वत जब अपने पूरे यौवन पर था तो वह बहुत ऊँचाई तक पहुंच गया था और हमेशा अपना विस्तार करते जा रहा था।और फिर एक समय तो ऐसा आ गया था कि सूरज की किरणें पूरब से पश्चिम अब पहुंच ही नहीं सकती थीं।मानों पृथ्वी का पश्चिमी भूभाग सूरज की किरणों को बिना देखे अंधकार में डूबने के कगार पर पहुंच गया है।तब तो पश्चिमी दिशा में सिर्फ रात ही रात रह जायेगी।दिन का उजाला किसी को देखने को मिलेगा ही नहीं।फिर देवताओं ने अगत्स्य जी के पास जाकर उनसे मदद करने का आवाहन किया।लोगों ने बताया कि महाराज!त्राहिमाम त्राहिमाम प्रभू।कुछ करिये गुरुदेव।अन्यथा यह धरती आधा तो बिना सूर्य के प्रकाश की हो जायेगी।ये विन्ध्याचल तो इतना बड़ा होता जा रहा है कि इसने हम सभी को अंधकार में डूबाने जा रहा है।उसे रोकना होगा प्रभु।हमारी मदद करें । अगत्स्य जी मान भी गये।वे विन्ध्याचल के पास गए और आवाज लगाकर विंध्याचल को बुलाया और कहा कि हम दक्षिण दिशा की ओर जा रहे हैं ,हमें रास्ता तो दो।ये क्या हुआ तुम इस तरह तनकर हमारा मार्ग अवरुद्ध किये खड़े हो।
बस , इतना कहना भारी था।विन्ध्याचल उनका शिष्य था और गुरु की बात टालना उसके लिए उचित नहीं था।उसने तत्काल अपने गुरु कोअपने समक्ष खड़ा देखकर साष्टांग प्रणाम किया(साष्टांग = पूरा लेटकर किया जाने वाला प्रणाम)और उन्हें जाने के लिए रास्ता साफ कर दिया। जब उन्होंने विन्ध्याचल को पार कर लिया तब मुड़कर विन्ध्याचल से कहे कि जबतक  हम लौटकर नहीं आते, तुम इसी हालत में पड़े रहना।क्योंकि हम बारबार तुम्हारी प्रतिक्षा नहीं कर सकते और न तो हम तुमसे निवेदन करेंगे कि हमें मार्ग चाहिए।आज्ञाकारी शिष्य विंध्याचल उसी प्रकार से लेटा रहा और उनके आने की बाट देखने लगा।लेकिन वेकभी भी उधर लौटकर आये ही नहीं।तबसे आजतक विंध्याचल उसी तरह से लेटा हुआ है।
  ऐसा कहा जाता है कि भगवान श्री राम भी विंध्याचल गये थे,और अपने वनवास के समय अगस्त्य मुनि के आश्रम पर भी पधार कर उन्हें दर्शन दिया था।








२-महर्षि भृगु

     
        महर्षि भृगु जी महराज के जन्म के संबंध में अनेक मत हैं। कुछ विद्वानों द्वारा इन्हें अग्नि से उत्पन्न बताया गया है, तो कुछ ने इन्हें ब्रह्मा की त्वचा एवं हृदय से उत्पन्न बताया है। कुछ विद्वान इनके पिता को वरुण बताते हैं। कुछ कवि तथा मनु को इनका जनक मानते हैं। कुछ का मानना है कि ब्रह्मा के बाद 7500 ईसा पूर्व प्रचेता नाम से एक ब्रह्मा हुए थे जिनके यहां भृगु का जन्म हुआ।अब चाहे जो भी सच्चाई हो,उसे बहुत ही गहन अध्ययन करने से ही सही निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है।



माता-पिता :
वरुण और चार्षिणी को कुछ विद्वान लोग भृगु ऋषि का माता पिता मानते हैं।उनके मतानुसार उनकी भृगु ऋषि की दो पत्नियाँ दिव्या और पुलोमा थीं।दिव्या से दो पुत्र जन्म लिए जिसमें शुक्राचार्य जो कि बड़े (ज्येष्ठ पुत्र)थे।उनके दूसरे पुत्र त्वष्टा थे जिन्हें आज हम भगवान विश्वकर्मा के नाम से जानते हैं।ये दोनों शुक्राचार्य और विश्वकर्मा भृगु ऋषि के पुत्र कहे जाते हैं।
   भृगु ऋषि की दूसरी पत्नी जिनका नाम पुलोमा था, उसे लोग पौलवी भी कहते हैं।उसके गर्भ से दो पुत्र और एक पुत्री ने जन्म लिया। पुत्रों के नाम थे ऋचीक और च्यवन तथा पुत्री का नाम रेणुका बताया गया है।अब थोड़ा और विस्तार से आइये जानते हैं।ं

भृगु की दो पत्नियां : महर्षि भृगु के भी दो विवाह हुए थे। इनकी पहली पत्नी जिनका नाम दिव्या था वह दैत्यराज हिरण्यकश्यप की पुत्री थीं। अब जो भृगु जी की दूसरी पत्नी पुलोमा थीं वह दानवराज पुलोम की पुत्री थीं जिसे लोग पौलमी कहकर बुलाते थे वे थीं।

पहली पत्नी : पहली पत्नी दैत्यराज हिरण्यकश्यप की पुत्री दिव्या देवी से भृगु मुनि के दो पुत्र हुए जिनके नाम शुक्र और त्वष्टा रखे गए। आचार्य बनने के बाद शुक्र को शुक्राचार्य के नाम से और त्वष्टा को शिल्पकार बनने के बाद विश्वकर्मा के नाम से जाना गया। इन्हीं भृगु मुनि के पुत्रों को उनके मातृवंश अर्थात दैत्यकुल में शुक्र को काव्य एवं त्वष्टा को मय के नाम से जाना गया है
पत्नी : दिव्या और पुलोमा
दिव्या के पुत्र : शुक्राचार्य और त्वष्टा (विश्वकर्मा)।
पौलमी के पुत्र : ऋचीक व च्यवन और पुत्री रेणुका।
प्रपौत्र : परशुराम



वरुण के भृगु : भागवत के अनुसार वरुणदेव की पत्नी चार्षिणी के गर्भ से भृगु, वाल्मीकि और अगस्त्य नामक 3 पुत्रों का जन्म हुआ। इस मान से भृगु ब्रह्मा के पुत्र न होकर असुरदेव वरुण के पुत्र थे। वरुण का निवास स्थान अरब माना गया है, हालांकि विद्वान मानते हैं कि इन भृगु का जन्म ईरान में 7500 ईसा पूर्व के आसपास हुआ था।


नोट : ऋग्वेद की अनुक्रमणिका से ज्ञात होता है कि असुरों के पुरोहित भृगु के पौत्र और कवि ऋषि के सुपुत्र थे।
परसुराम
   महर्षि भृगु के प्रपौत्र, वैदिक ऋषि ऋचीक के पौत्र, जमदग्नि के पुत्र परशुराम थे। भृगु ने उस समय अपनी पुत्री रेणुका का विवाह विष्णु पद पर आसीन विवस्वान (सूर्य) से किया।

दूसरी पत्नी पौलमी : पौलमी असुरों के पुलोम वंश की कन्या थी। पुलोम की कन्या की सगाई पहले अपने ही वंश के एक पुरुष से, जिसका नाम महाभारत शांतिपर्व अध्याय 13 के अनुसार दंस था, से हुई थी। परंतु उसके पिता ने यह संबंध छोड़कर उसका विवाह महर्षि भृगु से कर दिया।

जब महर्षि च्यवन उसके गर्भ में थे, तब भृगु की अनुपस्थिति में एक दिन अवसर पाकर दंस (पुलोमासर) पौलमी का हरण करके ले गया। शोक और दुख के कारण पौलमी का गर्भपात हो गया और शिशु पृथ्वी पर गिर पड़ा, इस कारण यह च्यवन (गिरा हुआ) कहलाया। इस घटना से दंस पौलमी को छोड़कर चला गया, तत्पश्चात पौलमी दुख से रोती हुई शिशु (च्यवन) को गोद में उठाकर पुन: आश्रम को लौटी। पौलमी के गर्भ से 5 और पुत्र बताए गए हैं।

शुक्राचार्य : शुक्र के दो विवाह हुए थे। इनकी पहली स्त्री इन्द्र की पुत्री जयंती थी जिसके गर्भ से देवयानी ने जन्म लिया था। देवयानी का विवाह चन्द्रवंशीय क्षत्रिय राजा ययाति से हुआ था और उसके पुत्र यदु और मर्क तुर्वसु थे। दूसरी स्त्री का नाम गोधा (शर्मिष्ठा) था जिसके गर्भ से त्वष्ट्र, वतुर्ण शंड और मक उत्पन्न हुए थे।

च्यवन ऋषि : च्यवन का विवाह मुनिवर ने गुजरात के भड़ौंच (खम्भात की खाड़ी) के राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या से किया। भार्गव च्यवन और सुकन्या के विवाह के साथ ही भार्गवों का हिमालय के दक्षिण में पदार्पण हुआ। च्यवन ऋषि खम्भात की खाड़ी के राजा बने और इस क्षेत्र को भृगुकच्छ-भृगु क्षेत्र के नाम से जाना जाने लगा।

सुकन्या से च्यवन को अप्नुवान नाम का पुत्र मिला। द‍धीच इन्हीं के भाई थे। इनका दूसरा नाम आत्मवान भी था। इनकी पत्नी नाहुषी से और्व का जन्म हुआ। और्व कुल का वर्णन ब्राह्मण ग्रंथों में ऋग्वेद में 8-10-2-4 पर, तैत्तरेय संहिता 7-1-8-1, पंच ब्राह्मण 21-10-6, विष्णुधर्म 1-32 तथा महाभारत अनु. 56 आदि में प्राप्त है।

ऋचीक : पुराणों के अनुसार महर्षि ऋचीक, जिनका विवाह राजा गाधि की पुत्री सत्यवती के साथ हुआ था, के पुत्र जमदग्नि ऋषि हुए। जमदग्नि का विवाह अयोध्या की राजकुमारी रेणुका से हुआ जिनसे परशुराम का जन्म हुआ।

उल्लेखनीय है कि गाधि के एक विश्वविख्‍यात पुत्र हुए जिनका नाम विश्वामित्र था जिनकी गुरु वशिष्ठ से प्रतिद्वंद्विता थी। परशुराम को शास्त्रों की शिक्षा दादा ऋचीक, पिता जमदग्नि तथा शस्त्र चलाने की शिक्षा अपने पिता के मामा राजर्षि विश्वामित्र और भगवान शंकर से प्राप्त हुई। च्यवन ने राजा शर्याति की पुत्री सुकन्या से विवाह किया।
     
      सप्त ऋषियों में भृगु ऋषि भी एक महान ऋषि माने जाते हैं।जिनसे देवराज इन्द्र भी भयभीत रहा करते थे।

विरोधाभाष : 
      पुराणों में विरोधाभाषिक उल्लेख के कारण यह फर्क कर पाना कठिन है कि कितने भृगु थे या कि एक ही भृगु थे। माना जाता है कि प्रचेता ब्रह्मा की पत्नी वीरणी के गर्भ से भृगु का जन्म हुआ था।
        मरीचि कुल में एक और भृगु हुए जिनकी ख्याति ज्यादा थी। इनका जन्म 5000 ईसा पूर्व ब्रह्मलोक-सुषा नगर (वर्तमान ईरान) में हुआ था। इनके परदादा का नाम मरीचि, दादाजी का नाम कश्यप ऋषि, दादी का नाम अदिति था।

इनके पिता प्रचेता-विधाता जो ब्रह्मलोक के राजा बनने के बाद प्रजापिता ब्रह्मा कहलाए, अपने माता-पिता अदिति-कश्यप के ज्येष्ठ पुत्र थे। महर्षि भृगुजी की माता का नाम वीरणी देवी था। अपने माता-पिता से सहोदर दो भाई थे। आपके बड़े भाई का नाम अंगिरा ऋषि था। इनके पुत्र बृहस्पतिजी हुए, जो देवगणों के पुरोहित-देव गुरु के रूप में जाने जाते हैं।

यदि दोनों ही भृगु मुनि ही है तो फिर उनकी तीन पत्नियां थीं- ख्या‍ति, दिव्या और पौलमी ।
    
निष्कर्ष
  अब मेरे प्रिय पाठक बंधुओं,आपको जानकारी के लिए हमारी सबसे बड़ी चुनौती हमारे सनातन धर्म और संस्कृति के साथ यही एक सबसे बड़ा धोखा किया गया है जिससे सनातन संस्कृति को लोग बड़ी ही आसानी से तोड़ताड़कर शुद्ध को अशुद्ध कर दिया गया है।हम यहीं पर झेंपने लगते हैं।हमारे कुछ इतिहासकारों एवं पौराणिक कथा वाचकों ने पता नहीं कहाँ से उलटफेर करदिया।जो आज क्या सही और क्या गलत है में भेद कर पाना कठिन बना दिया।


३-भरद्वाज


     सप्तर्षियों में से एक नाम महर्षि भरद्वाज जी का भी नाम है।ये भी कोई साधारण नहीं थे।इनकी भी ख्याति से इंद्रासन डोलने लगता था। तो चलिये जानकारी जुटाते हैं भरद्वाज जी के विषय में।
भारद्वाज ऋषि प्राचीन भारतीय ऋषि थे। चरक संहिता (Charaka Samhita) के अनुसार भारद्वाज ने इन्द्र से आयुर्वेद का ज्ञान प्राप्त किया था। ऋक्तंत्र के अनुसार वे ब्रह्मा, बृहस्पति एवं इन्द्र के बाद वे चौथे व्याकरण-प्रवक्ता थे। उन्होंने व्याकरण का ज्ञान इन्द्र से प्राप्त किया था। महर्षि भृगु ने उन्हें धर्मशास्त्र का उपदेश दिया।

महर्षि वाल्मीकि के शिष्य

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तमसा-तट पर क्रौंचवध के समय भारद्वाज महर्षि वाल्मीकि के साथ थे, वाल्मीकि रामायण के अनुसार भारद्वाज महर्षि वाल्मीकि के शिष्य थे।

वैदिक ऋषियों में भारद्वाज ऋषि (bhardwaj rishi) का उच्च स्थान है। अंगिरावंशी भारद्वाज के पिता बृहस्पति और माता ममता थीं। बृहस्पति ऋषि का अंगिरा के पुत्र होने के कारण ये अंगिरा वंशीय कहलाए। ऋषि भारद्वाज ने अनेक ग्रंथों की रचना की उनमें से यंत्र सर्वस्व और विमानशास्त्र की आज भी चर्चा होती है।

  भरद्वाज जी के माता पिता कौन थे


     भारद्वाज-ऋषि का अति उच्च स्थान है। भारद्वाज के पिता बृहस्पति और माता ममता थीं।



ऋषि भरद्वाज के पुत्रों में 10 ऋषि ऋग्वेद के मन्त्र द्रष्टा हैं और एक पुत्री जिसका नाम 'रात्रि' था, वह भी रात्रि सूक्त की मन्त्रद्रष्टा मानी गयी है। भारद्वाज के दस ऐसे पुत्र थे जिन्हें मंत्रद्रष्टा कहा जाता है।मन्त्रद्रष्टा पुत्रों के नाम क्रमशः इसप्रकार हैं-
1-ऋजिष्वा,
2- गर्ग,
3-नर,
4-पायु,
5-वसु,
6-शास,
7- शिराम्बिठ,
8- शुनहोत्र,
9- सप्रथ
10- सुहोत्र।
  
    ऋग्वेद की सर्वानुक्रमणी के अनुसार 'कशिपा' भारद्वाज की पुत्री कही गयी है। इस प्रकार ऋषि भारद्वाज की 12 संतानें मन्त्रद्रष्टा ऋषियों की कोटि में सम्मानित थीं। भारद्वाज ऋषि ने बड़े गहन अनुभव किये थे। उनकी शिक्षा के आयाम अतिव्यापक थे।

भारद्वाज की शिक्षा

• भारद्वाज ने इन्द्र से व्याकरण-शास्त्र का अध्ययन किया था और उसे व्याख्या सहित अनेक ऋषियों को पढ़ाया था। 'ऋक्तन्त्र' और 'ऐतरेय ब्राह्मण' दोनों में इसका वर्णन है।

• भारद्वाज ने इन्द्र से आयुर्वेद पढ़ा था, ऐसा चरक ऋषि ने लिखा है। अपने इस आयुर्वेद के गहन अध्ययन के आधार पर भारद्वाज ने आयुर्वेद-संहिता की रचना भी की थी।

• भारद्वाज ने महर्षि भृगु से धर्मशास्त्र का उपदेश प्राप्त किया और 'भारद्वाज-स्मृति' की रचना की।पांचरात्र-भक्ति-सम्प्रदाय में प्रचलित है कि सम्प्रदाय की एक संहिता 'भारद्वाज-संहिता' के रचनाकार भी ऋषि भारद्वाज ही थे।

• महाभारत, शान्तिपर्व के अनुसार ऋषि भारद्वाज ने 'धनुर्वेद'- पर प्रवचन किया था।वहाँ यह भी कहा गया है कि ऋषि भारद्वाज ने 'राजशास्त्र' का प्रणयन किया था।कौटिल्य ने अपने पूर्व में हुए अर्थशास्त्र के रचनाकारों में ऋषि भारद्वाज को सम्मान से स्वीकारा है।ऋषि भारद्वाज ने 'यन्त्र-सर्वस्व' नामक बृहद् ग्रन्थ की रचना की थी। इस ग्रन्थ का कुछ भाग स्वामी ब्रह्ममुनि ने 'विमान-शास्त्र' के नाम से प्रकाशित कराया है। इस ग्रन्थ में उच्च और निम्न स्तर पर विचरने वाले विमानों के लिये विविध धातुओं के निर्माण का वर्णन है। इस प्रकार एक साथ व्याकरणशास्त्र, धर्मशास्त्र,शिक्षा-शास्त्र, राजशास्त्र, अर्थशास्त्र, धनुर्वेद, आयुर्वेद और भौतिक विज्ञानवेत्ता ऋषि भारद्वाज थे- इसे उनके ग्रन्थ और अन्य ग्रन्थों में दिये उनके ग्रन्थों के उद्धरण ही प्रमाणित करते हैं।

• इंद्र का वरदान

       भारद्वाज ने सम्पूर्ण वेदों के अध्ययन का यत्न किया। दृढ़ इच्छा-शक्ति और कठोर तपस्या से इन्द्र को प्रसन्न किया। भारद्वाज ने प्रसन्न हुए इन्द्र से अध्ययन हेतु सौ वर्ष की आयु माँगी। भारद्वाज अध्ययन करते रहे। सौ वर्ष पूरे हो गये। अध्ययन की लगन से प्रसन्न होकर दुबारा इन्द्र ने फिर वर माँगने को कहा, तो भारद्वाज ने पुन: सौ वर्ष अध्ययन के लिये और माँगा। इन्द्र ने सौ वर्ष प्रदान किये। इस प्रकार अध्ययन और वरदान का क्रम चलता रहा। भारद्वाज ने तीन सौ वर्षों तक अध्ययन किया। इसके बाद पुन: इन्द्र ने उपस्थित होकर कहा-'हे भारद्वाज! यदि मैं तुम्हें सौ वर्ष और दे दूँ तो तुम उनसे क्या करोगे?' भारद्वाज ने सरलता से उत्तर दिया, 'मैं वेदों का अध्ययन करूँगा।' इन्द्र ने तत्काल बालू के तीन पहाड़ खड़े कर दिये, फिर उनमें से एक मुट्ठी रेत हाथों में लेकर कहा-'भारद्वाज, समझो ये तीन वेद हैं और तुम्हारा तीन सौ वर्षों का अध्ययन यह मुट्ठी भर रेत है। वेद अनन्त हैं। तुमने आयु के तीन सौ वर्षों में जितना जाना है, उससे न जाना हुआ अत्यधिक है।' अत: मेरी बात पर ध्यान दो- 'अग्नि है सब विद्याओं का स्वरूप। अत: अग्नि को ही जानो। उसे जान लेने पर सब विद्याओं का ज्ञान स्वत: हो जायगा, इसके बाद इन्द्र ने भारद्वाज को सावित्र्य-अग्नि-विद्या का विधिवत ज्ञान कराया। भारद्वाज ने उस अग्नि को जानकर उससे अमृत-तत्त्व प्राप्त किया।

• इन्द्र द्वारा अग्नि-तत्त्व का साक्षात्कार किया, ज्ञान से तादात्म्य किया और तन्मय होकर रचनाएँ कीं।

• आयुर्वेद के प्रयोगों में ये परम निपुण थे। इसीलिये उन्होंने ऋषियों में सबसे अधिक आयु प्राप्त की थी। वे ब्राह्मणग्रन्थों में 'दीर्घजीवितम' पद से सबसे अधिक लम्बी आयु वाले ऋषि गिने गये हैं।

• चरक ऋषि ने भारद्वाज को 'अपरिमित' आयु वाला कहा।

• भारद्वाज ऋषि काशीराज दिवोदास के पुरोहित थे। वे दिवोदास के पुत्र प्रतर्दन के पुरोहित थे और फिर प्रतर्दन के पुत्र क्षत्र का भी उन्हीं मन्त्रद्रष्टा ऋषि ने यज्ञ सम्पन्न कराया था। 

• वनवास के समय श्री राम इनके आश्रम में गये थे, जो ऐतिहासिक दृष्टि से त्रेता-द्वापर का सन्धिकाल था। उक्त प्रमाणों से भारद्वाज ऋषि को 'अनूचानतम' और 'दीर्घजीवितम' भी कहा गया है।

महर्षि भारद्वाज व्याकरण, आयुर्वेद संहित, धनुर्वेद, राजनीतिशास्त्र, यंत्रसर्वस्व, अर्थशास्त्र, पुराण, शिक्षा आदि पर अनेक ग्रंथों के रचयिता हैं। वायुपुराण के अनुसार उन्होंने एक पुस्तक आयुर्वेद संहिता लिखी थी, जिसके आठ भाग करके अपने शिष्यों को सिखाया था। चरक संहिता के अनुसार उन्होंने आत्रेय पुनर्वसु को कायचिकित्सा का ज्ञान प्रदान किया था।

ऋषि भारद्वाज को प्रयाग का प्रथम वासी माना जाता है अर्थात ऋषि भारद्वाज ने ही प्रयाग को बसाया था। प्रयाग में ही उन्होंने घरती के सबसे बड़े गुरूकुल(विश्वविद्यालय) की स्थापना की थी और हजारों वर्षों तक विद्या दान करते रहे। वे शिक्षाशास्त्री, राजतंत्र मर्मज्ञ, अर्थशास्त्री, शस्त्रविद्या विशारद, आयुर्वेेद विशारद,विधि वेत्ता, अभियाँत्रिकी विशेषज्ञ, विज्ञानवेत्ता और मँत्र द्रष्टा थे। ऋग्वेेद के छठे मंडल के द्रष्टाऋषि भारद्वाज ही हैं। इस मंडल में 765 मंत्र हैं। अथर्ववेद में भी ऋषि भारद्वाज के 23 मंत्र हैं। वैदिक ऋषियों में इनका ऊँचा स्थान है। आपके पिता वृहस्पति और माता ममता थीं।

ऋषि भारद्वाज को इंद्र देव ने आयुर्वेद और सावित्र्य अग्नि विद्या का विधिवत ज्ञान कराया। भारद्वाज ने उस अग्नि को जानकर उससे अमृत-तत्त्व प्राप्त किया।

• इन्द्र द्वारा अग्नि-तत्त्व का साक्षात्कार किया, ज्ञान से तादात्म्य किया और तन्मय होकर रचनाएँ कीं।

• आयुर्वेद के प्रयोगों में ये परम निपुण थे। इसीलिये उन्होंने ऋषियों में सबसे अधिक आयु प्राप्त की थी। वे ब्राह्मणग्रन्थों में 'दीर्घजीवितम' पद से सबसे अधिक लम्बी आयु वाले ऋषि गिने गये हैं।

• चरक ऋषि ने भारद्वाज को 'अपरिमित' आयु वाला कहा।

• भारद्वाज ऋषि काशीराज दिवोदास के पुरोहित थे। वे दिवोदास के पुत्र प्रतर्दन के पुरोहित थे और फिर प्रतर्दन के पुत्र क्षत्र का भी उन्हीं मन्त्रद्रष्टा ऋषि ने यज्ञ सम्पन्न कराया था। 

• वनवास के समय श्री राम इनके आश्रम में गये थे, जो ऐतिहासिक दृष्टि से त्रेता-द्वापर का सन्धिकाल था। उक्त प्रमाणों से भारद्वाज ऋषि को 'अनूचानतम' और 'दीर्घजीवितम' भी कहा गया है।

महर्षि भारद्वाज व्याकरण, आयुर्वेद संहित, धनुर्वेद, राजनीतिशास्त्र, यंत्रसर्वस्व, अर्थशास्त्र, पुराण, शिक्षा आदि पर अनेक ग्रंथों के रचयिता हैं। वायुपुराण के अनुसार उन्होंने एक पुस्तक आयुर्वेद संहिता लिखी थी, जिसके आठ भाग करके अपने शिष्यों को सिखाया था। चरक संहिता के अनुसार उन्होंने आत्रेय पुनर्वसु को कायचिकित्सा का ज्ञान प्रदान किया था।

ऋषि भारद्वाज को प्रयाग का प्रथम वासी माना जाता है अर्थात ऋषि भारद्वाज ने ही प्रयाग को बसाया था। प्रयाग में ही उन्होंने घरती के सबसे बड़े गुरूकुल(विश्वविद्यालय) की स्थापना की थी और हजारों वर्षों तक विद्या दान करते रहे। वे शिक्षाशास्त्री, राजतंत्र मर्मज्ञ, अर्थशास्त्री, शस्त्रविद्या विशारद, आयुर्वेेद विशारद,विधि वेत्ता, अभियाँत्रिकी विशेषज्ञ, विज्ञानवेत्ता और मँत्र द्रष्टा थे। ऋग्वेेद के छठे मंडल के द्रष्टाऋषि भारद्वाज ही हैं। इस मंडल में 765 मंत्र हैं। अथर्ववेद में भी ऋषि भारद्वाज के 23 मंत्र हैं। वैदिक ऋषियों में इनका ऊँचा स्थान है। आपके पिता वृहस्पति और माता ममता थीं।

ऋषि भारद्वाज को आयुर्वेद और सावित्र्य अग्नि विद्या का ज्ञान इन्द्र और कालान्तर में भगवान श्री ब्रह्मा जी द्वारा प्राप्त हुआ था। अग्नि के सामर्थ्य को आत्मसात कर ऋषि ने अमृत तत्व प्राप्त किया था और स्वर्ग लोक जाकर आदित्य से सायुज्य प्राप्त किया था।

सम्भवतः इसी कारण ऋषि भारद्वाज सर्वाधिक आयु प्राप्त करने वाले ऋषियों में से एक थे।ऋषि भारद्वाज ने प्रयाग के अधिष्ठाता भगवान श्री माधव जोकि साक्षात श्री हरि विष्णु ही हैं, की पावन परिक्रमा की स्थापना भगवान श्री शिव जी के आशीर्वाद से की थी। ऐसा माना जाता है कि भगवान श्री द्वादश माधव परिक्रमा सँसार की पहली परिक्रमा है। ऋषि भारद्वाज ने इस परिक्रमा की तीन स्थापनाएं दी हैं।

आयुर्वेद सँहिता, भारद्वाज स्मृति, भारद्वाज सँहिता, राजशास्त्र, यँत्र-सर्वस्व(विमान अभियाँत्रिकी) आदि ऋषि भारद्वाज के रचित प्रमुख ग्रँथ हैं।

ऋषि भारद्वाज खाण्डल विप्र समाज के अग्रज है।खाण्डल विप्रों के आदि प्रणेता ऋषि जगाने के लिए ऋषि एक स्थान पर कहते हैं-अग्नि को देखो यह मरणधर्मा मानवों स्थित अमर ज्योति है। यह अति विश्वकृष्टि है अर्थात सर्वमनुष्य रूप है।


४-कश्यप ऋषि


महाभारत एवं पुराणों में असुरों की उत्पत्ति एवं वंशावली के वर्णन में कहा गया है की ब्रह्मा के सात मानस पुत्रों में से एक 'मरीचि' थे जिसने कश्यप ऋषि उत्पन्न हुए। कश्यप ने दक्ष प्रजापति की १७ पुत्रियों से विवाह किया। दक्ष की इन पुत्रियों से जो सन्तान उत्पन्न हुई उसका विवरण निम्नांकित है। महाभारत और विष्णु पुराण के अनुसार उन सत्रह पत्नियों के नाम हैं -:

अदिति,दिति,दनु,अनिष्ठा,काष्ठा,सुरसा,इला,मुनि,सुरभि,कद्रू,विनता,यामिनी,ताम्रा,तिमि,शक्रोधवशा,सुरमा,पातंगी।

मार्कण्डेय ,पुराण और भागवत पुराण के अनुसार तेरह पत्नियां बताई गई हैं जो इसप्रकार हैं।

अदिति,दिति,दनु,काष्ठा,अनिष्ठा,सुरसा,मुनि,सुरभि,विनता,कद्रू,पातंगी,तिमि,इला,

मत्स्य पुराण के अनुसार नौ पत्नियां

  अदिति,दिति,दनु,काष्ठा,अनिष्ठा,कद्रू,सुरसा,विनता,सुरभि।
अब चाहे जितनी पत्नियों के पति रहे हों लेकिन यह तो निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि वे कई पत्नियों के पति थे।







५- महर्षि दुर्वासा

    महर्षि दुर्बासा भी एक महान सिद्ध पुरुष थे।और सप्त ऋषियों में से एक यह भी थे।ऐसा कहा जाता है कि इनके क्रोध की कोई सीमा नहीं थी।जिसपर ये क्रोधित हो जाते उसका समझो सर्वनाश।इनका नाम शुरू शुरू में सुवासा था लेकिन लोग उन्हें दुर्वासा कहते थे इसलिए उन्होंने अपना नाम दुर्वासा ही कर लिया था।
महासती अनुसुइया इनकी माता थींऔर इनके पिता का नाम अत्रि था। कहा जाता है कि भगवान श्री राम वनगमन के समय सीताजी और लक्ष्मण के साथ इनके पिता श्री अत्रि मुनि के आश्रम पर विश्राम करने के लिए रुक कर अनुसुइया जी से सीताजी को कुछ नारियों के गुणों को जानने उनके पास भेजकर उन्हें दर्शन देकर उनकी कुटिया को पवित्र किया था।अनुसुइया जी ने उस समय सीताजी को कुछ आभूषण और दिव्य वस्त्र आदि भेंट किया था।
     आखिर में जब दुर्वासा ऋषि को पता चला कि अब भगवान श्री राम इस लोक से अपने परमधाम को जाने वाले हैं और अब वह समय आ गया है तो वे आखिरी बार भगवान राम के दर्शन के लिए आये।तब भगवान राम द्वार पर जो द्वारपाल नियुक्त किया था वो कोई और नहीं बल्कि उनके छोटे भाई लक्ष्मण थे।राम ने लक्ष्मण को आदेश दिया था कि बिना मेरी इजाजत कोई अंदर प्रवेश नहीं करेगा।इसलिए लक्ष्मण जी ने द्वार पर ही दुर्वासा जी को रोक दिया जिससे क्रोधित होकर वे समस्त अयोध्या को शाप देने जा रहे थे तभी लक्ष्मण जी ने सारी सजा को खुद अपने ऊपर स्वीकार करते हुए कहा कि भगवन अगर आप को शाप ही देना है तो वो मुझे दीजिये।मेरे कारण पूरी अयोध्या को शाप देना ठीक नहीं है।



६- वशिष्ठ मुनि

          अयोध्या के कुलगुरू कहे जाने वाले वशिष्ठ जी को कौन नहीं जानता।वशिष्ठ जी महर्षि थे और ब्रह्मा जी के पुत्र थे।राजा दशरथ जी अपने सारे काज  इनके परामर्श से ही किया करते थे।सारे राजकाज अयोध्या के इनकी देखरेख में सम्पन्न होते थे।वशिष्ठ जी अयोध्या के राजपुरोहित थे।
  इनके पास एक ऐसी गाय थी जो जब चाहो ,जितना चाहे दुध उपलब्ध कर देती थी । इतना ही नहीं, उसके अंदर एक ऐसा गुण था जिससे जब भी कोई अतिथि चाहे कितनी भी संख्या में हो,सबको कुछ ही समय में सारे स्वादिष्ट व्यंजन उपलब्ध करा देती थीं।कहा जाता है कि वह कोई साधारण गाय नहीं थी।बल्कि कामधेनू की पुत्री थी।उनका नाम नन्दिनी था।नन्दिनी ही वह कारण थी जिससे एक क्षत्रिय राजा को ऋषि बनने पर विवश कर दिया और फिर ऋषि से ब्रह्मर्षि बना दिया।

आज बस इतना ही, आगे और जानकारी के लिए जुड़े रहें हमारे साथ।तबतक के लिए धन्यवाद।



7-विश्वामित्र

 विश्वामित्र पहले एक क्षत्रिय राजा थे और इनकी ख्याति ऐसी प्रसिद्ध थे।एकबार तो इन्होंने अपने तप के बल से एक अलग स्वर्ग बसाने शुरू कर दिया था और विधि के प्रतिकूल होकर ये काम करना चाहते थे।लेकिन किसी तरह से इन्हें समझा बुझाकर कर रोका गया था।जब राम अभी चौदह पन्द्रह साल के थे तभी ये राजा दशरथ के दरबार में उपस्थित हुए।राजा दशरथ जी ने खूब स्वागत सत्कार किया।और अचानक उनके अयोध्या आने का प्रयोजन जानना चाहा तो इनके उत्तर सुनकर राजा दशरथ के पाँव डगमगाने लगे।उन्होंने निवेदन किया कि मुनिवर अभी राम लक्ष्मण छोटे छोटे बालक हैं और वे आपकी क्या सहायता कर पायेंगे।अगर आप कहें तो मैं आपके साथ अपनी सेना की एक टुकड़ी भेज दूँ।लेकिन मुनि तो राम लक्ष्मण को पहले ही पहचान चुके थे।इसलिए वे हरहाल में रामलक्ष्मण को अपने साथ लेकर जाने से कम पर बिल्कुल तैयार नहीं थे।कहीं क्रोधित होकर वे शाप न देदें, इसलिए राजा दशरथ जी ने राम लक्ष्मण दोनों भाइयों को विश्वामित्रजी के साथ लगा दिया था और वन में राम लक्ष्मण ने धनुर्विद्या का वहीं घोर अध्ययन किया।विश्वामित्र ने उन्हें अपनी तपोशक्तियों अर्जित युद्ध के भिन्न भिन्न अश्त्र शस्त्र भी उपलब्ध कराया था।राम लक्ष्मण को उन्हीं का दिया हुआ ऐस तरकश था जिससे कभी बाण तो समाप्त ही नहीं हो सकता था और छूटा हुआ बाण दुबारा तरकश में लौट आया करता था।









सोमवार, 2 अक्टूबर 2023

श्राद्ध कर्म क्या होता है और यह कैसे सम्पन्न किया जाता है?

श्राद्ध क्या है और यह श्राद्ध किसका  किया जाता है ? आओ जानें

        हिंदू धर्म और सनातन संस्कृति की बात करें तो  हिन्दू समाज में सदियों से यह परंपरा चली आ रही है।श्राद्ध मरे हुए पूर्वजों का होता है और यह श्रद्धा भाव होता है जो कभी हमारे थे लेकिन आज हमारे बीच नहीं होकर सिर्फ हमारी यादों में शेष हैं।उनके मरने के बाद हर साल क्वार के महिने का कृष्ण पक्ष अपने पितरों के लिए ही बनाया गया है।इसलिए इसे पितृपक्ष भी कहते हैं।इसके तुरंत बाद देवपक्ष प्रारंभ हो जाता है।देव पक्ष शुरू होते ही शुरुआती नौ दिन देवी दुर्गा के नाम समर्पित हो जाता है।भक्त जन नौ दुर्गा के नौ रुपों का व्रत रखते हैं।कुछ लोग पहला और आखिरी नवरात्र का व्रत करते हैं तो कोई कोई नवों दिन दुर्गा उपासना करते हैं। क्वार को आश्विन मास भी कहा जाता है।और यह पूरा महीना ही पितरों और देवताओं के नाम ही समर्पित है।


*श्राद्ध से सम्बन्धित महत्वपूर्ण जानकारी*


ऐसी मान्यता है कि पितृपक्ष में पितरों को यह आशा रहती है कि हमारे पुत्र-पौत्र आदि हमें अन्न-जल से संतुष्ट करेंगे; यही आशा लेकर वे पितृलोक से पृथ्वीलोक पर आते हैं । लेकिन कुछ लोगों का यह कहना है कि पितर हैं ही कहाँ, या जो मर गए वो लौट कर कहाँ आते हैं।ऐसी भी धारणा मन में पाले हुए हैं।जो लोग–पितर हैं ही कहां? –यह मानकर उचित तिथि पर जल व शाक से भी अपने पितरों का श्राद्ध नहीं करते हैं, उनके पितर दु:खी व निराश होकर दुखी मन से शाप देकर अपने लोक वापिस लौट जाते हैं ।वे पितर मोहबस अपने पीढ़ियों के लोगों का सुखदुख जानने स्वर्ग लोक से मृत्यु लोक में आते हैं।जब उनके लोग उनका श्राद्ध नहीं करते ,उन्हें एक लोटा जल नहीं देते तो बाध्य होकर श्राद्ध न करने वाले अपने सगे-सम्बधियों का वे पूर्वज रक्त चूसने लगते हैं। फिर इस अभिशप्त परिवार को जीवन भर कष्ट-ही-कष्ट झेलना पड़ता है और मरने के बाद नरक में जाना पड़ता है।

    श्रद्धा का श्राद्ध


     धार्मिक मान्यता के अनुसार, पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनके तर्पण के निमित्त श्राद्ध किया जाता है। यहां श्राद्ध का अर्थ श्रद्धा पूर्वक अपने पितरों के प्रति सम्मान प्रकट करने से है। हिंदू धर्म में श्राद्ध का विशेष महत्व होता है। आइए जानते हैं श्राद्ध पक्ष से जुड़ी हर वो जरूरी बात जिसे आपको  हमको, सबको जानना चाहिए।

श्राद्ध किसे कहते हैं?

 


      श्राद्ध का अर्थ श्रद्धा पूर्वक अपने पितरों को प्रसन्न करने से  होता है। सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार जो परिजन अपना देह त्यागकर चले गए हैं, उनकी आत्मा की तृप्ति के लिए सच्ची श्रद्धा के साथ जो तर्पण किया जाता है, उसे ही  श्राद्ध कहा जाता है।हमारे शास्त्रों में ऐसी मान्यता है कि मृत्यु के देवता यमराज श्राद्ध पक्ष में उन सभी जीव को मुक्त कर देते हैं, ताकि वे अपने स्वजनों के यहां जाकर तर्पण ग्रहण कर सकें।

कौन कहलाते हैं पितर?


      जिस किसी के परिजन चाहे वह विवाहित हो या अविवाहित हों, बच्चा हो या बुजुर्ग, स्त्री हो या पुरुष उनकी मृत्यु हो चुकी है उन्हें  ही पितर कहा जाता है। पितृपक्ष में मृत्युलोक से पितर पृथ्वी पर आते हैं। और अपने परिवार के लोगों को आशीर्वाद देते हैं। पितृपक्ष में पितरों की आत्मा की शांति के लिए उनको तर्पण किया जाता है। पितरों के प्रसन्न होने पर घर पर सुख शान्ति आती है।ऐसी मान्यता है।

कब बनता है पितृपक्ष का योग?


    हिंदू धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व होता है। पितृपक्ष के 15 दिन पितरों को समर्पित होता है। शास्त्रों अनुसार श्राद्ध पक्ष भाद्रपक्ष की पूर्णिणा से आरम्भ होकर आश्विन मास की अमावस्या तक चलते हैं। भाद्रपद पूर्णिमा को सिर्फ उन्हीं का श्राद्ध किया जाता है जिनका निधन वर्ष की किसी भी पूर्णिमा को हुआ हो।

   श्राद्ध करने के लिए महत्वपूर्ण सुझाव

 
शास्त्रों में बताया गया है कि साल के किसी भी पक्ष में, जिस तिथि को परिजन का देहांत हुआ हो उनका श्राद्ध कर्म उसी तिथि को करना चाहिए।जब याद ना हो श्राद्ध की तिथि,मतलब यदि अपने पूर्वज के मृत्यु की तिथि का सही तिथि ठीक से याद ही न हो तो ऐसे में कुछ लोग ये सवाल खड़े कर सकते हैं कि फिर उनका श्राद्ध कब और किस तिथि को करनी चाहिए? तो उसका भी निवारण बताया गया है।

     पितृपक्ष में पूर्वजों का स्मरण और उनकी पूजा करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है। जिस तिथि पर हमारे परिजनों की मृत्यु होती है उसे श्राद्ध की तिथि कहते हैं। बहुत से लोगों को अपने परिजनों की मृत्यु की तिथि याद नहीं रहती ऐसी स्थिति में शास्त्रों में इसका भी निवारण बताया गया है।

शास्त्रों के अनुसार यदि किसी को अपने पितरों के देहावसान की तिथि मालूम नहीं है तो ऐसी स्थिति में आश्विन अमावस्या को तर्पण किया जा सकता है। इसलिये इस अमावस्या को सर्वपितृ अमावस्या कहा जाता है। इसके अलावा यदि किसी की अकाल मृत्यु हुई हो तो उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को किया जाता है। ऐसे ही पिता का श्राद्ध अष्टमी और माता का श्राद्ध नवमी तिथि को करने की मान्यता है।

क्या श्राद्ध करने की कोई पौराणिक कथा भी है?


     कहा जाता है कि जब महाभारत के युद्ध में दानवीर कर्ण का निधन हो गया और उनकी आत्मा स्वर्ग पहुंच गई, तो उन्हें नियमित भोजन की बजाय खाने के लिए सोना और गहने दिए गए। इस बात से निराश होकर कर्ण की आत्मा ने इंद्र देव से इसका कारण पूछा। तब इंद्र ने कर्ण को बताया कि आपने अपने पूरे जीवन में सोने के आभूषणों को दूसरों को दान किया लेकिन कभी भी अपने पूर्वजों को कभी कुछ भी खाने पीने को नहीं दिया।तब कर्ण ने उत्तर दिया कि वह अपने पूर्वजों के बारे में नहीं जानता है।तब उसे सुनने के बाद भगवान इंद्र ने उसे 15 दिनों की अवधि के लिए पृथ्वी पर वापस जाने की अनुमति दी ताकि वह अपने पूर्वजों को भोजन दान कर सके। इसी 15 दिन की अवधि को पितृ पक्ष के रूप में जाना जाता है।

श्राद्ध की वस्तुएं पितरों को कैसे मिलती हैं?


  श्राद्ध का अर्थ क्या है : - ‘श्रद्धया दीयते यत् तत् श्राद्धम्।’


  ‘श्राद्ध’ का अर्थ है श्रद्धा से जो कुछ दिया जाए। पितरों के लिए श्रद्धापूर्वक किए गए पदार्थ-दान (हविष्यान्न, तिल, कुश, जल के दान) का नाम ही श्राद्ध है। श्राद्धकर्म पितृऋण चुकाने का सरल व सहज मार्ग है। पितृपक्ष में श्राद्ध करने से पितरगण वर्षभर प्रसन्न रहते हैं।

श्राद्ध-कर्म से व्यक्ति केवल अपने सगे-सम्बन्धियों को ही नहीं, बल्कि ब्रह्मा से लेकर तृणपर्यन्त सभी प्राणियों व जगत को तृप्त करता है। पितरों की पूजा को साक्षात् विष्णुपूजा ही माना गया है।

प्राय: कुछ लोग यह शंका करते हैं कि श्राद्ध में समर्पित की गईं वस्तुएं पितरों को कैसे मिलती है?

अलग अलग योनियों में  पितरों को तृप्ति कैसे मिलती है?



यह भी मन में एक प्रश्न खड़ा करता है कि चलो मनुष्य तो अपने पितरों का श्राद्ध करने में सक्षम हैं और कर सकते हैं लेकिन कोई पशु,पक्षी, कीड़े मकोड़े ये भी तो अपनी संतानों से तर्पण चाहते होंगे तो उन्हें कैसे क्या विधि का विधान बनाया गया है।कर्मों की भिन्नता के कारण मरने के बाद गतियां भी भिन्न-भिन्न होती हैं।कोई देवता, कोई पितर, कोई प्रेत, कोई हाथी, कोई चींटी, कोई वृक्ष और कोई तृण बन जाता है। तब मन में यह शंका होती है कि छोटे से पिण्ड से अलग-अलग योनियों में पितरों को तृप्ति कैसे मिलती है? इस शंका का स्कन्दपुराण में बहुत सुन्दर समाधान मिलता है।

एक बार राजा करन्धम ने महायोगी महाकाल से पूछा–’मनुष्यों द्वारा पितरों के लिए जो तर्पण या पिण्डदान किया जाता है तो वह जल, पिण्ड आदि तो यहीं रह जाता है फिर पितरों के पास वे वस्तुएं कैसे पहुंचती हैं और कैसे पितरों को तृप्ति होती है?’

भगवान महाकाल ने बताया कि विश्वनियन्ता ने ऐसी व्यवस्था कर रखी है कि श्राद्ध की सामग्री उनके अनुरुप होकर पितरों के पास पहुंचती है। इस व्यवस्था के अधिपति हैं अग्निष्वात आदि। पितरों और देवताओं की योनि ऐसी है कि वे दूर से कही हुई बातें सुन लेते हैं, दूर की पूजा ग्रहण कर लेते हैं और दूर से कही गयी स्तुतियों से ही प्रसन्न हो जाते हैं।

      वे भूत, भविष्य व वर्तमान सब जानते हैं और सभी जगह पहुंच सकते हैं। पांच तन्मात्राएं, मन, बुद्धि, अहंकार और प्रकृति इन नौ तत्वों से उनका शरीर बना होता है और इसके भीतर दसवें तत्व के रूप में साक्षात् भगवान पुरुषोत्तम उसमें निवास करते हैं। इसलिए देवता और पितर गन्ध व रसतत्व से तृप्त होते हैं। शब्दतत्व से रहते हैं और स्पर्शतत्व को ग्रहण करते हैं। पवित्रता से ही वे प्रसन्न होते हैं और वर देते हैं।

पितरों का आहार है अन्न-जल का सारतत्व


     जैसे मनुष्यों का आहार अन्न है, पशुओं का आहार तृण है, वैसे ही पितरों का आहार अन्न का सार-तत्व (गंध और रस) है। अत: वे अन्न व जल का सारतत्व ही ग्रहण करते हैं। शेष जो स्थूल वस्तु है, वह यहीं रह जाती है।

किस रूप में पहुंचता है पितरों को आहार ?

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    १- नाम व गोत्र के उच्चारण के साथ जो अन्न-जल आदि पितरों को दिया जाता है।
     २ - विश्वेदेव एवं अग्निष्वात (दिव्य पितर) हव्य-कव्य को पितरों तक पहुंचा देते हैं। यदि पितर देवयोनि को प्राप्त हुए हैं तो यहां दिया गया अन्न उन्हें ‘अमृत’ होकर प्राप्त होता है। यदि गन्धर्व बन गए हैं तो वह अन्न उन्हें भोगों के रूप में प्राप्त होता है।

३- यदि पशुयोनि में हैं तो वह अन्न तृण के रूप में प्राप्त होता है। नागयोनि में वायुरूप से, यक्षयोनि में पानरूप से, राक्षसयोनि में आमिषरूप में, दानवयोनि में मांसरूप में, प्रेतयोनि में रुधिररूप में और मनुष्य बन जाने पर भोगने योग्य तृप्तिकारक पदार्थों के रूप में प्राप्त होता हैं।

४- जिस प्रकार बछड़ा झुण्ड में अपनी मां को ढूंढ़ ही लेता है, उसी प्रकार नाम, गोत्र, हृदय की भक्ति एवं देश-काल आदि के सहारे दिए गए पदार्थों को मन्त्र पितरों के पास पहुंचा देते हैं। जीव चाहें सैकड़ों योनियों को भी पार क्यों न कर गया हो, तृप्ति तो उसके पास पहुंच ही जाती है।


सीताजी को पितर के रूप उनके ससुर राजा दशरथ का दर्शन मिला

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      कहा जाता है कि श्रीराम द्वारा श्राद्ध में आमन्त्रित ब्राह्मणों में सीताजी ने किए थे राजा दशरथ व पितरों के दर्शन।श्राद्ध में आमन्त्रित ब्राह्मण पितरों के प्रतिनिधिरूप होते हैं।
    एक बार पुष्कर में श्रीरामजी अपने पिता दशरथजी का श्राद्ध कर रहे थे। रामजी जब ब्राह्मणों को भोजन कराने लगे तो सीताजी वृक्ष की ओट में खड़ी हो गयीं। ब्राह्मण-भोजन के बाद रामजी ने जब सीताजी से इसका कारण पूछा तो वे बोलीं –

    मैंने जो आश्चर्य देखा, उसे आपको बताती हूँ। आपने जब नाम-गोत्र का उच्चारणकर अपने पिता-दादा आदि का आवाहन किया तो वे यहां ब्राह्मणों के शरीर में छायारूप में सटकर उपस्थित थे। ब्राह्मणों के शरीर में मुझे अपने श्वसुर आदि पितृगण दिखाई दिए फिर भला मैं मर्यादा का उल्लंघनकर वहां कैसे खड़ी रहती; इसलिए मैं ओट में हो गई।

श्राद्ध में तुलसी की महिमा

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       तुलसी से पिण्डार्चन किए जाने पर पितरगण प्रलयपर्यन्त तृप्त रहते हैं। तुलसी की गंध से प्रसन्न होकर गरुड़ पर आरुढ़ होकर विष्णुलोक चले जाते हैं।

पितर प्रसन्न तो सभी देवता प्रसन्न!

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श्राद्ध से बढ़कर और कोई कल्याणकारी कार्य नहीं है और वंशवृद्धि के लिए तो पितरों की आराधना ही एकमात्र उपाय है।

  आयु: पुत्रान् यश: स्वर्ग कीर्तिं पुष्टिं बलं श्रियम्।
  पशुन् सौख्यं धनं धान्यं प्राप्नुयात् पितृपूजनात्।। (यमस्मृति, श्राद्धप्रकाश)

यमराजजी का कहना है कि–

१-श्राद्ध-कर्म से मनुष्य की आयु बढ़ती है।
२-पितरगण मनुष्य को पुत्र प्रदान कर वंश का विस्तार करते हैं।

३-परिवार में धन-धान्य का अंबार लगा देते हैं।
४-श्राद्ध-कर्म मनुष्य के शरीर में बल-पौरुष की वृद्धि करता है और यश व पुष्टि प्रदान करता है।

५-पितरगण स्वास्थ्य, बल, श्रेय, धन-धान्य आदि सभी सुख, स्वर्ग व मोक्ष प्रदान करते हैं।

६-श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करने वाले के परिवार में कोई क्लेश नहीं रहता वरन् वह समस्त जगत को तृप्त कर देता है।

श्राद्ध न करने से होने वाली हानि

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        शास्त्रों में श्राद्ध न करने से होने वाली हानियों का जो वर्णन किया गया है, उन्हें जानकर रोंगटे खड़े हो जाते हैं। शास्त्रों में मृत व्यक्ति के दाहकर्म के पहले ही पिण्ड-पानी के रूप में खाने-पीने की व्यवस्था कर दी गयी है। यह तो मृत व्यक्ति की इस महायात्रा में रास्ते के भोजन-पानी की बात हुई। परलोक पहुंचने पर भी उसके लिए वहां न अन्न होता है और न पानी। यदि सगे-सम्बन्धी भी अन्न-जल न दें तो भूख-प्यास से उसे वहां बहुत ही भयंकर दु:ख होता है।

      आश्विन मास के पितृपक्ष में पितरों को यह आशा रहती है कि हमारे पुत्र-पौत्रादि हमें अन्न-जल से संतुष्ट करेंगे; यही आशा लेकर वे पितृलोक से पृथ्वीलोक पर आते हैं लेकिन जो लोग–पितर हैं ही कहां?–यह मानकर उचित तिथि पर जल व शाक से भी श्राद्ध नहीं करते हैं, उनके पितर दु:खी व निराश होकर शाप देकर अपने लोक वापिस लौट जाते हैं और बाध्य होकर श्राद्ध न करने वाले अपने सगे-सम्बधियों का रक्त चूसने लगते हैं। फिर इस अभिशप्त परिवार को जीवन भर कष्ट-ही-कष्ट झेलना पड़ता है और मरने के बाद नरक में जाना पड़ता है।

     मार्कण्डेयपुराण में बताया गया है कि जिस कुल में श्राद्ध नहीं होता है, उसमें दीर्घायु, निरोग व वीर संतान जन्म नहीं लेती है और परिवार में कभी मंगल नहीं होता है।

  धन के अभाव में कैसे करें श्राद्ध?

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          ब्रह्मपुराण में बताया गया है कि धन के अभाव में श्रद्धापूर्वक केवल शाक [साग]से भी श्राद्ध किया जा सकता है। यदि इतना भी न हो तो अपनी दोनों भुजाओं को उठाकर कह देना चाहिए कि मेरे पास श्राद्ध के लिए न धन है और न ही कोई वस्तु। अत: मैं अपने पितरों को प्रणाम करता हूँ; वे मेरी भक्ति से ही तृप्त हों।

पितृपक्ष पितरों के लिए पर्व का समय है, अत: प्रत्येक गृहस्थ को अपनी शक्ति व सामर्थ्य के अनुसार पितरों के निमित्त श्राद्ध व तर्पण अवश्य करना चाहिए।
  संक्षेप में यह मान लिया जाय कि जिस प्रकार हमारे घर किसी अतिथि, मित्र, रिश्तेदार या कोई भी सगा सम्बन्धी आता है तो हम उसका आदर सत्कार करते हैं और उसका स्वागत करते हैं।उसकी सेवा में कोई कमी नहीं छोड़ते तो पितर भी हमारे सगे सम्बंधित ही होते हैं।इसलिए उन्हें बिना जल ग्रहण कराये भूखे विदा नहीं करना चाहिए।
कहा भी गया है कि  अतिथि देवो भवः।