शनिवार, 21 अक्टूबर 2023

सुनिये कथा रघुनाथ की

 सुनिये कथा रघुनाथ की


एक बार किसी गांव में  रहने वाला एक अनपढ़ (गँवार) आदमी एक महात्मा जी के पास गया और वहाँ जाकर महात्मा जी से बोला ‘‘महाराज ! हमको कोई आसान और सीधा-साधा नाम बता दो जिसे हम जपा करें। हमें  भगवान का नाम लेना है।हमें उसी नाम का जाप करना है।

      


भगवान को किस नाम से जपें

    
   महात्माजी उसकी ओर देखकर कुछ देर शांत रहे।फिर उन्होंने उस आदमी से कहा- तुम ‘अघमोचन-अघमोचन’ नाम का जाप किया करो।

अघमोचन  =  अघ् + मोचन
("अघ" माने पाप, "मोचन" माने छुड़ाने वाला)
जो पाप से छुड़ादें वही अघमोचन हैं।भगवान हैं।

  महात्मा जी ने उसे समझाया कि देखो , जो मनुष्य  को उसके पाप कर्मों से मुक्ति दिलाये वही भगवान हैं, वही ईश्वर हैं।उनके तो हजारों नाम हैं।मैं तुम्हें एक सरल नाम बता रहा हूँ।उसीको जपा करो।

भक्ति और भजन की भाषा 


        अब वह बेचारा अनपढ़ गँवार आदमी "अघमोचन-अघमोचन" करता हुआ वहाँ से चला गया। गाँव जाते-जाते "अ" भूल गया। अघमोचन कहने में उसे थोड़ा अटपटा लग रहा था । बहुत दिमाग पर जोर लगाया किन्तु उसे अघमोचन नाम कंठस्थ नहीं हुआ। अब वह  अघमोचन के बजाय 'घमोचन-घमोचन" जपने लगा। इसीतरह से जपते हुए कुछ दिन बीत गए।धीरे धीरे जब उसकी जापध्वनि ब्रहमाण्ड में गूँजने लगी तो एक दिन की बात है वह गरीब किसान जब वह हल जोत रहा था तो हल चलाते हुए भी नाम जपते जा रहा था और वही सधा सधाया नाम बारंबार "घमोचन-घमोचन" कर रहा था।

जब भगवान को भक्त के नाम जाप पर हँसी आ गई

    
     उधर वैकुंठ लोक में भगवान भोजन करने बैठे ही थे कि उनके कानों में घमोचन नाम का उच्चारण ध्वनि सुनाई दी।अपना एक नया नाम जाप सुनकर उनको हँसी आ गयी।पास में बैठी हुई  लक्ष्मीजी ने पूछा-‘प्रभू! आप क्यों हँस रहे हो ? क्या भोजन में कोई त्रुटि हुई है?

      भगवान विष्णु जी बोले- " देवी! आज हमारा एक भक्त , एक ऐसा नाम ले रहा है कि वैसा नाम तो किसी शास्त्र में है ही नहीं। उसी को सुनकर मुझे हँसी आ गयी है।"

‘‘लक्ष्मी जी बोलीं - "प्रभू! तब तो हम उस भक्तको अवश्य देखेंगे और सुनेंगेे कि वह कैसा भक्त है और कौन-सा नाम ले रहा है।’’

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    भगवान स्वयं देवी लक्ष्मी के साथ दर्शन देने भक्त के पास पहुंच गए


         लक्ष्मी-नारायण दोनों उसी खेत के पास पहुँच गए जहाँ वह हल जोतते हुए "घमोचन-घमोचन" का जप कर रहा था ।

       पास में एक गड्ढा था भगवान विष्णु जी स्वयं तो वहीं जाकर छिप गये और लक्ष्मीजी भक्त के पास जाकर पूछने लगीं- ‘‘अरे, यह क्या घमोचन-घमोचन बोले जा रहे हैं?’’
  " यह घमोचन कौन नया देवता आ गए?.....कुछ तो बोलो।"

   उन्होंने एक बार, दो बार, तीन बार पूछा परंतु उस किसान ने कुछ भी उत्तर ही नही दिया।

   उसने सोचा कि इसको बताने में हमारा नाम-जप छूट जायेगा। पता नहीं कौन सी स्त्री है और आकर मेरा ध्यान भटका रही है।अतः वह उन्हें अनसुना करते हुए "घमोचन-घमोचन" करते रहा, बोला ही नहीं।

जब बार-बार लक्ष्मी जी पूछती रहीं कि अरे बाबा कुछ तो बोलो,बताते क्यों नहीं ,आखिर ये किसका नाम जपे जा रहे हो? बार बार जाप में बाधा उत्पन्न करती हुई जानकर उस किसान को गुस्सा आ गया। अनपढ़ आदमी तो था ही, बोला : ‘‘जा ! तेरे भरतार (पति) का नाम ले रहा हूँ।बोलो जानकर क्या कराेगी ।’’

     अब तो लक्ष्मी जी डर गयी ,कि यह तो हमको पहचान गया लगता है। फिर बोलीं- ‘‘अरे, तू मेरे भरतार (पति) को जानता है क्या? कहाँ हैं मेरा भरतार?’’

   वह फिर झुँझलाकर बोला -- ‘‘जा देख उधर , वहीं कहीं गड्ढे में पड़ा है, जाना है तुझे भी उस गड्ढे मे..???

अब तो लक्ष्मी जी समझ गयीं कि इसने हमको पक्का पहचान लिया है और वहाँ से तुरंत चली गईं। जाकर विष्णु भगवान से बोलीं, " प्रभू! बाहर आ जाइये,अब छिपने से कोई फायदा नही है।"

भक्ति के लिए किसी विशेष भाषा की जानकारी जरूरी नहीं है।


...और तब विष्णुभगवान उस गड्ढे से बाहर निकल कर वहाँ आ गये और बोले; ‘‘ देख लिया देवी , मेरे नाम की महिमा ! यह अघमोचन और घमोचन का भेद भले ही न समझता हो लेकिन यह जप तो हमारा ही कर रहा था। हम तो समझते हैं...उसके मनोभावों को।भाषा कोई भी हो,वह किसी भाषा में पुकारे , हम तो सब समझते हैं।चाहे हमें किसी भी नाम से कोई पुकारे, हमें क्या फर्क पड़ता है।"मुस्कुराते हुए प्रभु ने कहा।

" यह घमोचन नाम से हमको ही पुकार रहा था देवी। जिसके कारण आज मुझे इसको दर्शन देना पड़ा।"

भगवान ने भक्त को दर्शन देकर कृतार्थ किया । कोई भी भक्त शुद्ध-अशुद्ध, टूटे- फूटे शब्दों से अथवा गुस्से में भी कैसे भी भगवान का नाम लेता है तब भी भगवान का ह्रदय उससे मिलने को लालायित हो उठता है और खुद को भक्त से मिलने को रोक नहीं पाते।
अब भक्ति करना भक्त का कर्तव्य है और फल देना भगवान के हाथ में।यदि हम अपने आप को मन,वचन और कर्म से भगवान को समर्पित करने में जुट जायें तो यह यह जीवन धन्य हो सकता है।
प्रेम से बोलिए सच्चिदानन्द भगवान की जय।
                   
                        -- मालचन्द कन्नौजिया बेपनाह।

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