चुटकी भर सिंदूर
कविता
चुटकी भर सिंदूरहै रंग नहीं कोई साधारण
बस चुटकी भर सिंदूर ये है
वो चीज नहीं है ये जिसको
चाहे जिसे लगादे जो।।
पर बिकता है यहभी बाजारों में
खरीदारी करती सुहागिनें इसको।
है प्रतीक पतिदेवों का,
सुहागनों की माँग में फबता है
दुल्हन की माँग सजाता है।।
लगाती नहीं कही इसको
जबतक रहें कुँवारी वो
भर गई मांग सिंदूर से जिसदिन
कहलाने लगती हैं नारी वो
है धन्य बहुत माथे पर तुझको
यूँहीं नहीं स्थान मिला ।
हो जाती हैं पराई बेटी उस दिन से
जबसे तूँ उसका श्रृंगार बना।।
कहने को तो तूँ है केवल
वह चुटकी भर सिंदूर
जीवनभर मर्यादा में रहना
सिखाने वाले हैं तेरे दस्तूर।।
इंसानों की बात छोड़िये
हो देवों के भी प्यारे तुम
बिन तेरे श्रृंगार अधूरा
सोचो कितने हो न्यारे तुम।।
सदा चमकते रहना प्यारे
जैसे हो सूरज की लाली
तेरे बिना हर नारी अधूरी
कोई गोरी हो चाहे काली।।
पिया वही जो माँग सजाये
जिस चुटकी भर सिंदूर से
दुल्हन वही जो पिया मन भाये
अपने सच्चे दस्तूर से।।
तुम पहचान दिलाते हो
जिसके माँग में बसते हो
हो चुकी है ये और किसी की
ये पिया की अपने प्यारी हो।।
--- मालचन्द कन्नौजिया बेपनाह*
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