पंचवटी मेंं राम लछिमन
पंचवटी में कुटिया बनाये हुए थे
साधु सन्तों की संगत उन्हें मिलती रही
उनका पंचवटी में आना गजब हो गया
अच्छा खासा गुजरता था वक्त अभी तक
साथ सीताजी को लाना गजब हो गया ||
घूमते राक्षसी एक दिन रावण की बहना
राम को देखकर मन में हर्षित हुई
थी वो विधवा मगर अभी जवानी में थी
मन में मदहोशी है उसके जब छाने लगी
हो जाये शादी अगर मेरी आज इनसे
इससे अच्छी भला और क्या बात थी।।
उनसे नजरें मिलाना गजब हो गया।।
उनका पंचवटी मेंआना गजब हो गया।। 2
पलभर में बन गयी ऐसी हुस्न की मलिका
बनाया रूप कुछ ऐसा,जाके करीब बोली
थामलो हाथ मेरा,अब सोचो ना विचारो
खुशगवार मंजर है यहाँ का, मेरे सोना
लूटते मजा चलो इस हुस्नोंशबाब का
ये घड़ी नहीं है किसी इन्तजार का
सुपनखिया का आना गजब हो गया || 3
बिना विचलित हुए राम बोले-
सीता को देखकर मैं कुँवारा नहीं,
और तू भी मुझे स्वीकार नहीं है
एक पत्नी के होते तुमसे शादी करूँ।
ऐसा मन में भाव कभी आया नहीं है।
पास लक्ष्मण के जाना गजब हो गया ।।4.
पहुँची करीब जाकरके लक्ष्मण से बोली
करले शादी मुझसे, अब जवान हो गया है।
तेरे जवान जिश्म पर मेरा दिल आगया है
मन में दहकती ज्वाला कई साल हो गया है।
सोचे समझे बिना ऐ मेरे दोस्तों,
उसका जलवा दिखाना गजब हो गया।।5
मैं हूँ सेवक सुनो अपने प्रभू राम का ।
सेवा करना ही देखो यहाँ मेरा काम है।
घर में बैठी एक सुहागन है पत्नी मेरी
उसे भी साथ रखना मुझे जब गवारा नहीं
है तू सुन्दर बहुत, मगर तुझमें एक बात है
तेरा बिजली गिराना गजब हो गया ।। 6
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ठुकरा गयी जब दोनों तरफसे हुई गुस्से से लाल ।
भेष भयंकर बनाके फिरवो पहुंची सीता के पास ।।
देखा पिशाचिनी का जब रूप ये भयंकर ।
काटे है नाक कान तब लक्ष्मणजी दौड़कर ।।
रोते बिलखते भागते खर दूषण के पास वो जब गई
खून से लथपथ देख वो बोले तेरी ये हाल क्या हुई
किसकी मजाल यहाँ हुई जिसने तेरा ये हाल किया
काटकर मैं फेंक दूँगा, कौन है हमें तूँ नाम बता
उसका नजरें लड़ाना गजब ढा गया।।
सुना के हाल वहाँ से पुन: है मायके गई
उसका रावण के यहाँ जाना गजब हो गया ||
त्रियाचरित्र देखिये उसका क्या हाल हम सुनायें।
बताने लगी है सुपनखा दो बालक पंचवटी में आये हुए हैं हैं वो साधूसरीखे दिखते मगर, कंधे पे धनुही टांगे हुए हैं है साथ में रहती उनके एक नारी है सुन्दर ।
देखकर अकेली मुझे उसने ढाया है ऐसा कहर
नहीं नेक हैं विचार उनके सुनो मेरे भइया
जहाँ कुटिया वे अपनी बनाये हुए हैं।।
मैंने कहा जब उससे सिर्फ उसके पास जाकर
तूँ चाहे तो मैं तुझे लंका की रानी बना सकती हूँ।
रावण हैं मेरे भइया, उनसे तुमसे मिला सकती हूँ।।
इतना कहना ही मेरा गजब हो गया।।
मेरे नाक कान उसने काटा उसी क्षण
मेरा पंचवटी में रहना उन्हें भाया नहीं
उनकी कूदृष्टि मुझपर जाने कबसे लगी
मेरा वहाँ जाना आफत बन गया
तुम्हारे जैसे भाइयों के रहते हुए
बहन लूट जाये तो जीना भी क्या
बदला लेलो भइया अभी इसी क्षण
नकटी बनकर जीने से मरना भला
क्रोध भड़काकर तब वो, महल में गई
मरने मारने का नया खेला रच दिया
सुनी जब बात बहना की,दशकंधर का गुस्सा जाग उठा
ठान लिया मन में उसने भी सीता को लंका अब लाऊँगा
मारीच से बोला जाकर तुम सोने के मृग बनकर जाओ
राम की कुटिया पर जाकर उनका ध्यान तुम भटकाओ
बनाकर भेष साधू का, रावण सीता को हर लाया
मृग मारिच का बनना गजब हो गया ||
----मालचन्द कन्नौजिया ' बेपनाह '
लेबल: पंचवटी सुपंनखा, रामायण की कथा


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