मंगलवार, 31 अक्टूबर 2023

बनारसी साड़ियों का शहर मुबारकपुर (रेशमी नगरी)


 बनारसी साड़ियों का शहर मुबारकपुर(रेशमी नगरी)आजमगढ़ उ.प्र.

असली बनारसी साड़ी यहीं बनती हैं


         आजमगढ़ जिले का एक कस्बा है मुबारकपुर । वैसे तो मुबारकपुर अपनी पहचान का मुहताज तो नहीं है फिर भी उसे अपनी एक कमी बहुत खलती है।आजमगढ़ शहर से मात्र पन्द्रह से सोलह किलोमीटर दूर बसे शहर से पूरब दिशा में स्थित यह बहुत ही घनी आबादी वाला क्षेत्र है। यह एक मुस्लिम बाहुल्य क्षेत्र है जहाँ खासकर बुनकर समुदाय के लोग रहते हैं और इन्हें जुलाहा कहा जाता है।इनके अलावा यहाँ हिन्दू भी कोई कम नहीं हैं।खासकर यहाँ अहीर,खटिक, धोबी,पासी आदि जातियों के लोग भी रहते हैं। पूरे कस्बा व आसपास की बस्तियों में दिन भर लूम की खटर-पटर होती रहती है। पहले हथकरघे चलते थे, तब इतनी आवाज नहीं होती थी । लेकिन अब आधुनिकता के इस युग में यहाँ भी हथकरघा की जगह पॉवरलूम चलने लगे हैं।

मुबारकपुर की पहचान बनारसी साड़ी


  मुबारकपुर में आज से कुछ साल पहले लगभग घर-घर में सिर्फ साड़ियों की बुनाई होती थी और यहाँ की बुनी हुई साड़ियाँ पूरे भारत में ही नहीं बल्कि समूचे विश्व में बनारसी साड़ी के नाम से मशहूर हैं।अब अनजाने लोग जिन्हें नहीं पता है,वे तो यही जानते होंगे कि जिस साड़ी को घर की महिलाएं पहनने के लिए इतनी लालायित रहती हैं वह बनारसी रेशमी साड़ी आखिर बनती कहाँ हैं।सूरत में,अहमदाबाद में । जी नहीं,जब नाम है बनारसी तो बनारस में बनती होगी।लेकिन यह भी सच्चाई नहीं है।असली सच्चाई तो यह है कि उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले के मुबारकपुर कस्बे में  यहाँ के कारीगरों की मेहनत और लगन से तैयार की जाने वाली साड़ी को बनारसी साड़ी कहा जाता है।

इसका न तो अपना कोई खुद का ब्रांड है और कोई बाजार।इसीलिए बाजार भी सिमटता जा रहा है। मुबारकपुर की साड़ी को ओडीओपी में शामिल तो है लेकिन बनारसी के नाम से।

मुबारकशाह के नाम पर बसा है मुबारकपुर


    कहा जाता है कि कोई मुबारक शाह नाम के एक रईस गृहस्थ जुलाहा थे ।राजाओं जैसा ठाटबाट था और लोग उन्हें राजा कहते भी थे।उन्हीं के नाम पर इस छोटे से शहर का नाम मुबारकपुर पड़ा था।

रेशमी नगरी मुबारकपुर


मुबारकशाह के नाम पर बसे हुए इस कस्बे में सन् 1971 ई0 से लेकर 2000 ई0 तक यहाँ रेशमी साड़ी का कारोबार बुलंदी पर था। ढाई लाख हथकरघों पर कारीगार रात दिन काम करके भी बाजार की मांग को पूरी नहीं कर पाते थे। कस्बे के आसपास के गांवों में भी लोग बुनाई से जुड़े हुए थे। यहाँ मुबारकपुर में कोई ऐसा घर नहीं था चाहे वो किसी भी जाति के हों जिसके घर के एक या दो लोग साड़ी बुनाई का काम न करते रहे हों। एक अच्छा बुनकर बनने में समय लगता है। ऐसे में लोगों ने अपने बच्चों को भी बुनकरी की कला सिखाना शुरू कर दिया था। स्कूल जाने की उम्र में ही बच्चे ताना-बाना का ककहरा पढ़ने लगते थे।

घर के नौनिहाल बच्चों को भी बुनकरी में जोड़ दिया जाता था


       यह व्यवसाय इतना  यहाँ लोकप्रिय हुआ करता था कि लोग अपने घरों के बच्चों को भी स्कूलों से लौटने के बाद हुनर सीखने में लगा देते थे।और बड़े होते होते एक अच्छे कारीगर बन जाते।कोई कला कोई गुण एक दिन में तो आता नहीं है ,उसे सीखने की लगन और मेहनत जरूरी होता है।यहाँ मजदूरों की कोई कमी नहीं थी।आसपास के अनेकों गांव के लोग या तो किसी बुनकर के यहाँ जाकर साड़ी की बुनाई करते थे या कुछ लोग तो अपने घरों में ही गृहस्थ बुनकरों से अपने घरों में ही लूम लगवा लेते थे और उनसे माल उठाकर उनके माल तैयार कर उन्हें दे आते थे और अपनी मजदूरी पा जाते थे।इसतरह से यहाँ के लोगों को आसानी से रोजगार भी उपलब्ध हो जाता था और बुनकरों को अपनी फैक्टरी बढ़ाने के लिए जमीन की कोई कमी नहीं खलती थी।लोग आकर खुद अपने घरों में करघा लगाने को बोल जाते कि हमारा घर खाली है, आप उसमें भी दो चार लूम लगा दीजिये, हम उसी में आपका माल तैयार करते रहेंगे।
इस तरह से अगर देखा जाय तो यहाँ के लोगों की सोच काफी अच्छी थी।लेकिन सरकार की उदासीनता के कारण इन लोगों को कोई विशेष प्रोत्साहन नहीं दिया गया।आजादी के बाद से लेकर आजतक यहाँ सिर्फ वोटों की राजनीति की गई।

बुनकर हथकरघा पर बनारसी साड़ी बूनते थे

        बुनकर हथकरघा पर साड़ी तैयार कर शाम को उसे मंडी में बेंचकर अपना मुनाफा कमाते थे। मुबारकपुर में समृद्धि झलकती थी। सन् 1998 के बाद से यहां के कारोबार पर मंदी का साया मंडराने लगा। उसके बाद फिर व्यवसाय संकट से उबर नहीं पाया। क्षेत्र में पहले ढाई लाख से भी अधिक हथकरघा हुआ करते थे, जो घटकर 25 हजार तक होकर सिमटते जा रहे हैं। इस बीच पावरलूम लगे लेकिन उनकी संख्या भी तीन हजार ही है।

युवा पीढ़ी नहीं करना चाहती हथकरघा पर काम


   पॉवरलूम की मशीन बिजली से चलती है लेकिन हथकरघा को हाथ और पांव के जोर पर चलाना पड़़ता है।अधिक मेहनत करके भी उत्पादन कम ही होता है। इससे लागत बढ़ जाती है। पॉवरलूम पर वैसी ही डिजाइन की साड़ी कम कीमत में तैयार हो जाती है। हथकरघा काम कहीं ज्यादा बेहतर होता है। अब हैंडलूम की ब्रांडिंग होने लगी है और उसके लिए अधिक कीमत चुकाने वाले भी हैं। इसके बावजूद युवा पीढ़ी हथकरघा पर काम करने में कम ही रुचि ले रही है।
नहीं खुला विपणन केंद्र, बिजली की पड़ी मार ऊपर से
   पहले पावरलूम को फिक्स दर से बिजली मिलती थी। अब स्मार्ट मीटर लगा दिए गए हैं। इससे बिजली का बिल चार से पांच गुना बढ़कर आने लगा है। सपा सरकार में मुबारकपुर में लगभग 12 करोड़ की लागत से विपणन केंद्र का निर्माण हुआ। इसमें 158 दुकाने हैं। तत्कालीन जिलाधिकारी प्रांजल यादव व अभिनेत्री शबाना आजमी ने इसके लिए प्रयास किया था। इसमें साप्ताहिक हाट लगाने की योजना थी ताकि व्यापारी आएं और बुनकरों को लाभ मिले। मगर आजतक यहाँ कभी दुकानें नहीं सजीं,क्योंकि जबतक कोई खरीदार नहीं होगा तो बिक्री कैसे होगी। अब तक इसे शुरू नहीं किया जा सका।

कारोबार को लगा ग्रहण

मुबारकपुर में जब से मंडी खत्म हुई यहां का कारोबार सिमट गया। रेशम में रंग भरने वाले बुनकर अब होटल में जाकर बर्तन धो रहे हैं। कुछ जो काबिल हैं वे विदेश जाकर नौकरी करने को मजबूर हैं।
मुबारकपुर में बनने वाली रेशमी साड़ी को आजाद भारत के इतने सालों बाद भीअपना ब्रांड नाम नहीं मिल सका है। उसके पास अपना बाजार ही नहीं है। इनके बुने हुये, इनके हुनर को किसी और के नाम से पहचान बनाई गई।काश,ये नाम और पहचान इन्हें मिली होती।आज तक आजमगढ़ अपनी पहचान नहीं स्थापित कर सका।

आज हाथकरघा पर पूरा परिवार मिलकर पांच सौ रुपये नहीं कमा पाता है। पावरलूम का और बुरा हाल है। वहां भी ढाई सौ से तीन सौ रुपये मजदूरी मिल पाती है। इस महंगाई के दौर में परिवार चलाना मुश्किल है।कभी मुबारकपुर के आसपास के लगभग पचासों गांव ऐसे थे जहाँ के लोग बनारसी साड़ी के कारोबार से जुड़े थे।बच्चे हों महिलाएं, सब इस कला से जुड़े हुए थे।सबके घर में इस कारोबार से होने वाली कमाई आती थी लेकिन अब ऐसा नहीं है।

सरकारी उपेक्षा का शिकार हुआ हुनर


यह मुबारकपुर की बदकिस्मती है जो यहाँ के लोगों को इनकी पहचान नहीं मिल सकी।वह कौन सी मनहूस घड़ी रही होगी या कौन सी मजबूरी रही हुई होगी जब अपने माल को बेचने के लिए, बाजार ढूंढने के लिए दूसरे के नाम का सहारा लेना पड़ा था।आज आजमगढ़ इस प्रसिद्धि को पाने के लिए तड़प रहा है कि हमारे जिले का माल दूसरे के नाम से आखिर कब तक बिकता रहेगा। यातायात की दृष्टि से भी यहाँ से रेलवे स्टेशन लगभग पाँच किमी दूर है।सड़क मार्ग से आने के लिए सीधे रोडवेज की कोई बसें यहाँ नहीं आती हैं।जबकि कई साल पहले यहाँ पर सरकार ने नया माडर्न रोडवेज का निर्माण भी कराया।लेकिन वह भी शहर से काफी दूर।जहाँ से बिना आटो के काम नहीं चल सकता।अभी भी वहाँ से बसों का संचालन नहीं किया जाता है उसका भी एक खास कारण यह है कि अगर यहां से बसों को चलाया भी जाता है तो शहर से दूर होने के कारण लोग प्राइवेट गाड़ियां ही पकड़ कर निकल जातेहैं।
जिन्हें बाहर होना चाहिये वे अंदर घुसकर सवारी उठा रहे हैं और जिसे शहर में रहना चाहिए वे बाहर दूर खड़े होकर सवारियां/पैसेंजर्स ढूंढने में लगे हैं।
ओंछी राजनीति और घटिया सोच
यहाँ के नेताओं की सोच बहुत ओंछी है।अपनी घटिया सोच के कारण ही हर बार यहाँ के लोग ठगे जाते हैं।यहाँ लोग सिर्फ वोट माँगने के लिए ही आते हैं लेकिन यहाँ के विकास की बात कोई नहीं करता।धर्म और जाति से जोड़कर या पार्टी के नाम पर यहाँ के लोग हमेशा मतदान करते रहे हैं।इसलिए हमेशा ठगे जाते हैं।

 

यहाँ तक कैसे पहुँचें

प्रमुख संसाधन : यातायात के प्रमुख साधन निम्नलिखित हैं।जिससे आसानी से यहाँ पहुंचा जा सकता है।
1-रेलमार्ग
2-हवाई जहाज मार्ग
3- सड़क मार्ग
 
1-रेलमार्ग :- सबसे पहले अगर कोई यहाँ आना चाहता है तो उसके लिए रेलगाड़ी से भी आ सकते हैं।यहाँ का प्रमुख स्टेशन आजमगढ़ है।यहां उतर कर आप सठियांव होते हुए मुबारकपुर आटो ,जीप या बस के द्वारा आ सकते हैं।सठियांव भी यहाँ का सबसे नजदीकी स्टेशन है लेकिन यहाँ पर सभी गाड़ियों का ठहराव नहीं होता है इसलिए सलाह दी जाती है कि रेलमार्ग से यात्रा करनेवाले यात्री आजमगढ़ स्टेशन पर ही उतर जायें।फिर अगर कोई लोकल ट्रेन मिल जाती है तो उसे पकड़ सकते हैं।अन्यथा सड़क मार्ग से आटो या जीप के द्वारा निकल लें।जबतक ट्रेन का इंतजार करेंगे, तबतक अपने गंतव्य तक पहुंच जायेंगे।

2- हवाई मार्ग  :- आजमगढ़ आने के लिए बहुत शीघ्र ही हवाई जहाज की उड़ान भी शुरू होने वाली है। यह हवाई अड्डा शहर से मात्र कुछ ही दूर है और यहाँ से सीधे जिला मुख्यालय आजमगढ़ आना होगा।फिर आटो या जीप या बस जो समय से मिल जाय,वही पकड़ कर आ सकते हैं।

3- सड़क मार्ग :- अब तो आजमगढ़ आने के लिए सड़कों का जाल सा बिछ गया लगता है।सड़क मार्ग से आने के लिए लखनऊ या दिल्ली से सीधे बस सेवा निरंतर जारी है।

 आजमगढ़ शहर से मात्र पन्द्रह से सोलह किमी की दूरी पर बसे इस कस्बे तक बहुत ही आसानी से आया जा सकता है।आजमगढ़ के नरौली या सिधारी टैक्सी स्टैंड से बराबर आटो मिलता रहता है।अगर आप चाहें तो वहीं से सठियांव के लिए कोई भी बस या टैक्सी भी पकड़ कर सठियांव तक जायें और वहाँ से मुबारकपुर के लिए आटो पकड़ सकते हैं।सठियांव से चार किमी की दूरी है।अगर जो लोग मऊ ,बलिया,या गाजीपुर की ओर से आ रहे हैं वे सीधे सठियांव उतरकर मुबारकपुर आ सकते हैं।
 

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