रविवार, 31 दिसंबर 2023

भारत में कानून की कमजोरियों पर एक दृष्टि हमारी

 ऐ जाने वाले मेरे दिलदार

एक बार बस एकबार

मुस्कुरा कर देख ले

इस जिंदगी का क्या है

कब तलक हमारी रहेगी

यादें ही बस बची रहेंगी

इसलिए कुछ सोच ले यहाँ आकर

हमनें क्या अपने लिये किया

क्या औरों के लिए किया


क्या और कैसा है भारत का संविधान

क्या भारत के संविधान में ऐसा कोई कानून है, जिससे लोगों को एक साल के भीतर बड़े से बड़े और छोटे से छोटे मुकदमों को निपटाया जा सके?

भारत के संविधान में कानून बहुत कमजोर है

भारत के संविधान में ऐसा कोई कानून नहीं जो कोर्ट को एक निर्धारित समय के अंदर सही फैसला सुनाने पर बाध्य कर सके।जिसका लाभ उठाकर वकील और जज आपस में मिलकर पीड़ितों को गुमराह करते हुए उन्हें तारीख पर तारीख देकर दौड़ाते हैं।जिस अपराधी के पास पैसे हों,यदि वो चाहे तो आजीवन तारीखें ले लेकर आजीवन सजा से बच सकता है।मरने के बाद भी मुकदमा खत्म नहीं होगा, वो चलता रहेगा।फिर कोर्ट किसे सजा सुनायेगी।न्याय मांगते माँगते लोग मर जाते हैं।घर के सामान तक बिक जाते हैं।कोर्ट मुँह ताकते रहता है।


कानून में संशोधन करने या आवश्यकता पड़ने पर नया कानून बने।

अगर किसी कोर्ट का कोई इमानदार जज किसी अपराधी को सजा भी सुना दे तो भी उस मुजरिम को बचने के लिए उसके ऊपर की अदालतों के दरवाजे खुले रहते हैं।फिर आरोपी अपने बचाव के लिए एक एक कोर्ट में अपील करता जायेगा और हर कोर्ट में कम से कम  आठ दस साल तो आसानी से टाल ले जायेगा।फिर आखिर में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जाता है।तो इसका सीधा फायदा उन मुजरिमों को मिलता है और वे अपराध पर अपराध करते जाते हैं, करते जाते हैं।
इसलिए अब ऐसे कानून की जरूरत है जो मुजरिमों को जल्दी से जल्दी दंडित करने का फरमान जारी कर सके।उसके बाद अगर कोई अपराधी आगे की अदालत में जाता है तो फैसला सुनाने वाली अदालत के अनुसार कम से कम तारीख देकर बिना देरी किये अपने फैसले सुरक्षित कर सके।उसके बाद फिर यदि उससे भी ऊँची अदालत में जाये तो वहां और भी कम समय में कम गिनीचुनी तारीख ही लगाने का प्रावधान किया जाना चाहिए।जिससे किसी को न्याय के लिए इधरउधर इतनी लम्बी लड़ाई न लड़नी पड़े।

मेरा दिल तोड़के मत जा

 मेरा दिल तोड़के मत जा मेरे यार


मेरा दिल तोड़के जाने वाले

ये टूटा दिल भी लेते जा
पिंजरा छोड़ दो खाली मगर
दिल छोड़कर  मत जा।
इस टूटे हुए दिल का मुझे
अब जरूरत नहीं कोई
इसे तोड़ा है जब तूने तो
ये तूफान भी तूही रख़
मुझे अब शौक नहीं कोई
किसी से दिल लगाने की
जले हैं अरमानों की होली
अब इसे फिर क्यों जलाने हैं

मंगलवार, 26 दिसंबर 2023

सोच सोच में फर्क है

 सोचसोच में फर्क है




स्त्रियों के अर्धनग्न और छोटे कपडो़ में घूमने पर जो लोग या स्त्रियाँ ये कहते हैं कि कपड़े नहीं सोच बदलो।

उन लोगों से कुछ प्रश्न हैं !! आशा है आप जवाब देंगे 🙏


1)पहली बात - हम सोच क्यों बदलें?? सोच बदलने की नौबत आखिर आ ही क्यों रही है??? आपके अनुचित  आचरण के कारण ??? और आपने लोगों की सोच का ठेका लिया है क्या??


2) दूसरी बात - आप उन लड़कियों की सोच का आकलन क्यों नहीं करते?? कि  उन्होंने  क्या सोचकर ऐसे कपड़े पहने कि उसके स्तन पीठ जांघे इत्यादि सब दिखाई दे रहा है....इन कपड़ों के पीछे उसकी सोच क्या थी?? एक निर्लज्ज लड़की चाहती है की पूरा पुरुष समाज उसे देखे, वहीँ दूसरी तरफ  एक सभ्य लड़की बिलकुल पसंद नहीं करेगी की कोई उसे इस तरह से देखे।


3)अगर सोच बदलना ही है तो क्यों न हर बात को लेकर बदली जाए??? आपको कोई अपनी बीच वाली ऊँगली का इशारा करे तो आप उसे गलत मत मानिए......सोच बदलिये..वैसे भी ऊँगली में तो कोई बुराई नहीं होती....आपको कोई गाली बके तो उसे गाली मत मानिए...उसे प्रेम सूचक शब्द समझिये..... ???

हत्या ,डकैती, चोरी, बलात्कार, आतंकवाद इत्यादि सबको लेकर सोच बदली जाये...सिर्फ नग्नता को लेकर ही क्यों? क्या ये सारे कार्य अभिव्यक्ति की आज़ादी की श्रेणी में ही आते हैं????


4) कुछ लड़कियां कहती हैं कि हम क्या पहनेगे ये हम तय करेंगे....पुरुष नहीं.....

जी बहुत अच्छी बात है.....आप ही तय करें....लेकिन हम पुरुष भी किन लड़कियों  का सम्मान/मदद करेंगे ये भी हम तय करेंगे, स्त्रियां नहीं.... और 


"हम किसी का सम्मान नहीं करेंगे इसका अर्थ ये नहीं कि हम उसका अपमान करेंगे।"


5)फिर कुछ विवेकहीन लड़कियां कहती हैं कि हमें आज़ादी है अपनी ज़िन्दगी जीने की.....

जी बिल्कुल आज़ादी है, ऐसी आज़ादी सबको मिले, व्यक्ति को चरस गंजा ड्रग्स ब्राउन शुगर लेने की आज़ादी हो, गाय भैंस का मांस खाने की आज़ादी हो, वैश्यालय खोलने की आज़ादी हो, पोर्न फ़िल्म बनाने की आज़ादी हो... हर तरफ से व्यक्ति को आज़ादी हो।????


6) लड़कों को संस्कारो का पाठ पढ़ाने वाला कुंठित स्त्री समुदाय क्या इस बात का उत्तर देगा कि क्या भारतीय परम्परा में ये बात शोभा देती है की एक लड़की अपने भाई या पिता के आगे अपने निजी अंगो का प्रदर्शन बेशर्मी से करे ??? क्या ये लड़कियां पुरुषों को भाई/पिता की नज़र से देखती हैं ??? जब ये खुद पुरुषों को भाई/पिता की नज़र से नहीं देखती तो फिर खुद किस अधिकार से ये कहती हैं कि 


"हमें माँ/बहन की नज़र से देखो"???


कौन सी माँ बहन अपने भाई बेटे के आगे नंगी होती हैं??? भारत में तो ऐसा कभी नहीं होता था....


सत्य यह है की अश्लीलता को किसी भी दृष्टिकोण से सही नहीं ठहराया जा सकता। ये कम उम्र के बच्चों को यौन अपराधों की तरफ ले जाने वाली एक नशे की दुकान है और इसका उत्पादन स्त्री समुदाय करता है।

मष्तिष्क विज्ञान के अनुसार 4 तरह के नशों में एक नशा अश्लीलता(से....) भी है।


आचार्य कौटिल्य ने चाणक्य सूत्र में वासना' को सबसे बड़ा नशा और बीमारी बताया है।।

यदि  यह नग्नता आधुनिकता का प्रतीक है तो फिर पूरा नग्न होकर स्त्रियां पूर्ण आधुनिकता का परिचय क्यों नहीं देती????

गली गली और हर मोहल्ले में जिस तरह शराब की दुकान खोल देने पर बच्चों पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है उसी तरह अश्लीलता समाज में यौन अपराधों को जन्म देती है।इसको किसी भी तरह उचित नहीं ठहराया जा सकता है.।।

विचार करिए और चर्चा करिए.... या फिर मौन धारण कर लीजिए ।।

🙏🙏🙏. 

शुक्रवार, 15 दिसंबर 2023

 कहानी -- * दुल्हन एक रात की *

प्रथम भाग

बहुत समय पहले की बात है।एक नगर में एक बहुत ही सम्पन्न सेठ रहते थे।अपार धन दौलत, खेती बारी सब कुछ भगवान की कृपा से उनके पास था।किसी तरह की कोई परेशानी नहीं थी।घर धनधान्य से भरा पड़ा था।मध्यम दर्जे का उनका परिवार भी था।रुपये पैसों की कोई कमी नहीं थी।

मातृत्व


सेठ जी की शादी हुए कई साल बीत चुके थे लेकिन घर में बच्चों की किलकारी नहीं गूंजी थी।इधर उधर से जहाँ से भी कोई किसी अच्छे डाक्टर बताता, पत्नी को साथ लेकर दवाइलाज कराने के लिए वहां पहुंच जाते।लेकिन कहीं से कोई लाभ नहीं मिलता।उनकी पत्नी बार बार कोसती कि मैं कैसी अभागिन हूँ जो मेरी कभी कोख नहीं भर सकी।बेचारी को दिन रात यही चिंता खाये जा रही थी।

माँ बनना हर नारी की इच्छा होती है


हर महिला की यह इच्छा होती है कि उसकी शादी किसी अच्छे घर में हो,अच्छा परिवार मिले,वह अपने बच्चों की मां बने,फिर उनके भी शादी ब्याह करने के बाद सुहागिन ही पति के रहते उसका देहांत हो,यानि कि औरत अगर मरना भी चाहती हैं तो पति की आँखों के सामने।ताकि उनकी अर्थी भी उठे तो पति के कंधों पर शमशान तक उनका साथ हो।वाह रे हमारे भारत की नारी। उसके पति के हाथों ही उसका अंतिम संस्कार भी हो।ऐसी ही हर स्त्री की कामना होती है।

   ठीक उसी तरह से इस सेठानी ने भी मन में ऐसे ही विचार पाले हुए थी।बेचारी को अपनी सूनी गोद के कारण सभी घर के सुख होते हुए भी यह जिन्दगी रास नहीं आती थी।गहनें, कपड़े,वस्त्र आभूषण सभी मानों काँटे की तरह चूभने लगे थे।रातरात भर नींद नहीं आती थी, बेचारी जाग जागकर रातें बिता रही थी।

समय बीतता गया।जिसने जहाँ बताया, एक बच्चे की चाहत उसे वहीं भेज देती।पति पत्नी दोनों को सभी सुख सुविधा होते हुए भी वे सुखी नहीं थे।

एक संतान के लिए क्या क्या लोग कर जाते हैं


भगवान विष्णु जी महाराज अपनी पत्नी देवी लक्ष्मी जी से बताते हैं कि हे देवी, औरों को अपार धनसम्पत्ति, कोठी बंगला,गाड़ी, जवाहरात से भरपूर जब लोग देखते हैं ना, तो अपने को बहुत कोसते हैं कि आखिर हमनें क्या बिगाड़ा था कि भगवान ने हमें गरीब बना दिया।देखो न , वे कितने धनी और सम्पन्न लोग हैं।नौकर चाकर सब कुछ उनके पास है, लेकिन इन सबके बावजूद वे कितने सुखी हैं, शायद किसी को यह नहीं दिखता है।यह दुनियां तो अंधीऔर बहरी है देवी।
भगवान विष्णुजी बताते हैं कि धन-सम्पदा भरपूर मात्रा में उपलब्ध होने के बावजूद भी क्या लोग सुखी रहते हैं?कभी नहीं देवी।आप बस देखते जाओ..।धीरे धीरे सब समझ जायेंगी।

    अब उस सेठ के पास चलते हैं, जहाँ पर हमनें कथा को विश्राम दिया था।जैसे ही किसी उत्तम हकीम, वैद्य, डाक्टर, झाड़-फूँक वाले ओझा-सोखा आदि के बारे में कहीं से भी जानकारी मिलती, दोनों लोग पतिपत्नी उनके पास पहुंच जाते।मिन्नतें करते, मुँहमाँगी रकम देने का वादा भी कर आते ।उनकी इच्छा थी कि किसी तरह से पत्नी गर्भवती हो जाय और उनके कुल के दीपक का जन्म हो जाय।क्योंकि संतान के न होने से यह सारी सम्पत्ति का वारिस कोई नहीं रहेगा तो यह सभी प्रकार के सुखसाधन का क्या होगा।बस यही सोच उन्हें दिन राते खाये जा रही थी।चिंता में रातरात भर उन्हें नींद भी नहीं आती थी।स्वास्थ्य गिरने लगा।

संतान नहीं तो संपत्तियों का क्या करना



भगवान विष्णुजी कहते हैं कि देखा देवी, सब सुखसाधन सम्पन्न होने के बावजूद भी उनके सारे सुखचैन गायब हो चुके थे।इसलिए हम तो यही कहते हैं कि चाहे कोई कितना भी अमीर क्यों न हो जाय;लेकिन सुख शांति और प्रेम दौलत से प्राप्त नहीं किया जा सकता।आखिर सेठ के पास तो सबकुछ हमनें दिया है फिर भी वह प्रसन्न क्यों नहीं है।आखिर हमनें तो सिर्फ उसकी शांति ही तो उसे नहीं दिया है ना।क्या करेगा उस संतान की जो उसकी है ही नहीं।जिस सम्पत्ति की लोग कामना करते हैं देवी, वो सब तो मैंने उसे दे दी है।फिर भी उसके मन की तृप्ति नहीं हो पा रही है।कहीं से भी खरीद ले अपना पुत्र..मन की शांति.. लेकिन जो उसका नहीं है वो उसे कैसे भोग पायेगा।

तब देवी लक्ष्मी जी ने भगवान विष्णु जी से निवेदन किया कि हे प्रभु, क्या सचमुच उसके भाग्य में पुत्र रत्न नहीं लिखा है आपने?
भगवान बोले, "क्यों नहीं!"
लक्ष्मी जी ने कहा कि फिर उन्हें संतान सुख के लिए इतना क्यों तड़पा रहे हैं, स्वामी?

संतान सुख

विष्णु जी ने कहा कि समय समय पर लोगों को याद दिलाने के लिए कभी कभी मुझे कुछ ऐसा करना पड़ता है।
तो चलिये अब उसकी अभिलाषा पूर्ण कर दीजिये।बेचारी की कोख भर दो स्वामी।एक नारी अपने पिता का घरबार छोड़कर पराये मर्द के साथ अपनी जिंदगी बीताने केलिए अपने माता - पिता, भाई - बहन,सखीसहेलियाँ सबको छोड़ आती हैं।फिर भी ससुराल में अगर पति का प्यार न मिले,सास ननद का स्नेह न प्राप्त हो और पति के वंश को आगे बढ़ाने के लिए वह संतान को जन्म न दे सके तो उसका जीवन तो नरक से बुरा होता है स्वामी।
सूनी गोंद में जब उसके बच्चों की किलकारी नहीं गूँजे तो वह अभागिन नारी अधूरी रह जाती है।नारी तो ममता की मूरत होती हैं जिसके आँचल में दूध और आँखों में पानी बहता है।

भगवान विष्णु जी मुस्कुराये,बोले- "ठीक है देवी,जल्द ही मैं उसे पुत्र रत्न से उसकी गोद भरने वाला हूँ।"

जब मन्नतें पूरी हुईं

कुछ महीने बाद सेठ की धर्मपत्नी गर्भवती हो जाती हैं और समय पूर्ण होने पर उन्हें एक बहुत ही सुंदर पुत्र प्राप्त होता है।पुत्र के जन्म लेने से पूरा परिवार बहुत खुश होता है।घर में पूजा पाठ होता है।लोगों को भोजन कराने का आयोजन किया जाता है।बहुत खुशी का माहौल होता है।

समय बीतता है और बच्चा जैसे ही चारपाँच साल का होता है, उसकी एकआँख की रोशनी चली जाती है।घर से दूर पढ़ाई लिखाई के लिए बच्चे को बाहर भेज दिया जाता है।समय बीतता है और जब वह विवाह के योग्य हो जाता है तो उसके विवाह के लिए लोग रिश्ते लेकर आने लगते हैं।इसी बीच कहीं से बढ़ियां एक रिश्ता आता है लेकिन उन्हें ये नहीं मालूम होता है कि जिस लड़के के विवाह के लिए लोग रिश्ता लेकर आये हुए हैं उसमें एक कमी है।उसकी एक आँख  ही गायब है।लेकिन जब लड़का देखने की बात आती है तो लोग एक पास का ही एक दूसरा लड़का दिखाकर विवाह का दिन पक्का कर देते हैं।

मँगनी का दूल्हा


संयोग से वह दूसरा लड़का भी बहुत सुन्दर था लेकिन वह निहायत गरीब परिवार का था।बचपन में ही उसके पिता का स्वर्गवास हो चुका था और माता इनके उनके घर में चूल्हा चौका करते हुए अपने बच्चे की परवरिश कर रही थी।सेठजी ने उसलड़के की मां से बात की।

   "देखो,वैसे तो तुम्हारे लड़के में भी कोई कमी तो नहीं है।देखने में सुन्दर भी है तो क्यों न उसे हम सजा सँवार कर अपने लड़के के बजाय उसे दुल्हे कीतरह बना दें।फिर जब विवाह हो जायेगा तो कुछ रुपये पैसे भी तुम्हें दे देंगे।जिससे कुछ तुम्हारी मदद भी हो जायेगी और हमारा भी काम बन जायेगा।"

वह गरीब महिला स्तब्ध रह गई।वह कुछ बोलती, तबतक वह सेठ बोल पड़ा।अरे इतना सोचती क्या हो?कहाँ उन लोगों ने सही से हमारे लड़के को देखा है और फिर एक ही रात की तो बात है।हमनें तो तुम पर तरस खाकर कह दिया कि तुम काफी गरीब हो।कम से कम इसी बहाने से तुम्हारी कुछ मदद हो जायेगी।अन्यथा गाँव में बहुत से सुन्दर सुन्दर लड़के हैं।
हमतो तुम्हारी कुछ मदद करना चाह रहे थे।
बेचारी गरीब महिला क्या करे।तैयार हो गई।जबकि उसे यह समझने में जरा भी देर नहीं लगी कि अगर उसका बेटा दुल्हा बन जायेगा तो उस दुल्हन बनी लड़की के साथ काफी अन्याय होने वाला है।लेकिन भाग्य के लेख को कौन बदल सकता है।गरीबी क्या न करादे।और इस जमाने में यह कोई पहली बार तो ऐसा हो तो रहा नहीं।बहुत से लोग लड़का दूसरा दिखाकर शादी तय करलेते और बारात में दुल्हा बदल लेते।ठीक वैसा ही कुछ लड़की वाले भी कर देते थे।लड़की कोई और दिखाकर शादी तय हो जाती और जब बारात आती तो मंडप में दुल्हन बदल जाती थी।
दुल्हन को खूब ढाँककर मंडप में लाया जाता।पूरी रश्मदायगी हो जाती लेकिन मजाल क्या कि कोई लड़की का हाथ पैर भी देख सके।चेहरा और शक्ल सूरत देखपाना तो दूर की बात थी।

अब उस गरीब विधवा के बेटे को अच्छे अच्छे कपड़े सिलवाया गया।उसके अच्छे से बालों की कटिंग कराया गया और शादी के दिन उसे दूल्हे की पोशाक पहना कर दूल्हा बना दिया गया।

उस भाड़े के दूल्हे को खूब अच्छे से हिदायत दे दी गई कि कहीं तुम्हें अपने इस झूठी शादी की बात को किसी से जाहिर नहीं करना है।किसी को भी पता नहीं चलना चाहिए कि तुम दूसरे के बदले में दुल्हा बने हो।बस सिंदूरदान तक हो जाय  बस फिर हमलोग सब सम्हाल लेंगे।जैसे ही विवाह सम्पन्न हो जाता है फिर तुम्हारी छुट्टी हो जायेगी।उसके पहले तुम्हें बहुत ही शालीनता से रहना होगा।

       बारात चल पड़ी।लेकिन वह भाड़े का गरीब दूल्हा मन में भय और संकोच के कारण अंदर से काफी डराडरा सा था।उसे बारबार यह भय लग रहा था कि कहीं किसी ने पहचान लिया तो क्या होगा?लोग मारने न लगें। आखिर वह गरीब जो ठहरा।वहां तो उसकी मां भी नहीं रहेंगी और पिता तो पहले ही इस दुनियां से जा चुके थे।अगर कहीं कुछ गड़बड़ हुई तो उसका साथ कौन देगा?उसका तो वहाँ कोई न होगा।दिल की धड़कने बढ़ती जा रही थीं।बारात निकल चुकी थी।उधर सेठ के मन में भी काफी असमंजस बना हुआ था।कि कहीं लड़के की पोल न खुल जाय।कोई वहाँ पहुँचकर सच्चाई को बता न दे,कि दुल्हा बदल दिया गया है।मन में शंका तो जाहिर थी।
 

"अब आगे का सुनो देवी।"भगवान विष्णु जी देवी लक्ष्मी को बहुत ही सरलतापूर्वक कथा सुनाते जा रहे थे।लक्ष्मी जी भी गंभीर होकर बहुत ही ध्यान पूर्वक कथा सुन रही थीं।
लक्ष्मी जी ने पूछा, "तो क्या किसी ने उन्हें पहचान लिया था स्वामी या शादी उस मंगनी के दूल्हे के साथ ही संपन्न हो गई?"
"सुनो तो सही।सब विस्तार से सुनाउँगा।"विष्णु जी ने कहा।

जब बारात लड़की के गांव पहुंची तो नकली भाड़े का दुल्हाकिसी तरह से अपने को काबू में किये बैठा हुआ था।लोगों ने देखा कि दुल्हा कुछ घबराया हुआ लगता है तो लोगों ने हिम्मत बढ़ाया। बारात दरवाजे पर पहुंच गई और परछावन होने की बारी आई तो गांव घर की महिलाएं गंगलगीत गाते हुए दूल्हे को देख रही थीं।
"बड़ा सुन्दर दूल्हा मिला है।बड़ी भाग्यशाली है दूल्हन।"महिलाएं आपस में चर्चा करते हुए दूल्हे को निहारते नहीं अघा रही थीं।
कुछ महिलाओं ने मंगल गीत गाना शुरू किया तो गाये जा रही थीं।

"एमबीबीएस लड़की के मिलल दुलहा चरवाहा रे।
माई गोबरपथनी आ बपवा निपता रे।।"

बस फिर क्या, इतना गीत सुनते ही उस मंगनी के दूल्हे को तो मानों जोर का झटका लगा हो।सोचने लगा कि लगता है कि किसी ने शायद जाकर उन लोगों को मेरे बारे में सबकुछ बता दिया है क्या।लगता है कि ये लोग मुझे पहचान गए लगते हैं।अब क्या होगा भगवान।आप बचा लो मुझे।भला इसमें मेरी क्या गलती रही।अगर ये लोग मुझे सच में पहचान लिए हैं तो बहुत गड़बड़ हो सकता है।

बगल में खड़े बारात में आये लोगों ने जब देखा कि दूल्हा तो घबराया हुआ लगता है तो उन्होंने धीरे से कान के पास मुँह करके पूछा कि क्या बात है?तबीयत तो ठीक है न?इतना घबराहट क्यों हो रही है?

तब उसने धीरे से फुसफुसा कर कहा कि आप सुन रहे हैं कि वे क्या कह रही हैं।
तब लोगों ने ढाँढस बढ़ाया।कि शादी ब्याह में ऐसे गीत गाने का प्रचलन है और इससे भी भद्दे भद्दे गीत अभी सुनने को मिलेंगे।बिल्कुल घबराने की कोई जरूरत नहीं है।
बेचारे को किसी तरह से हिम्मत मिली।
द्वाराचार रश्मदायगी सम्पन्न हो गई।लोगों को जलपान इत्यादि कराया गया।
कुछ समय पश्चात विवाह के लिए मंडप (माड़ो)में चलने का बुलावा आया तो कुछ खास रिश्तेदारों को साथ लेकर सेठ दुल्हे के साथ माड़ो में आकर बैठ गए।ब्राह्मण देवता पहले से मंडप में बैठे हुए थे।लड़की को खूब सजाकर दुल्हन बनाया गया था।सो दुल्हन भी आकर मंडप में बैठ गई।
गौरीगणेश का पूजन करने के पश्चात विवाह की एक एक रश्में सम्पन्न होती गई।

जब सिंदूरदान का वक्त आया तो नकली भाड़े का जो दूल्हा बना हुआ था सिर्फ एक रात के लिए तो वह कुछ झिझका।सोचने लगा कि अगर उसने यह सिंदूरदान  भी कर दिया तो यह बेचारी दूल्हन तो सचमुच की उसकी धर्म पत्नी हो जायेगी।वह उसका पति।बस इसी सोच में वह  सिंदूर नहीं डालना चाहता था।बारबार उस लड़के के पिता की ओर देखे जा रहा था कि वे कुछ बोलें तो .।इधर ब्राह्मण देवता बार बार सिंदूर पहनाने को बोले जा रहे थे।बात समझ में नहीं आ रही थी कि करें तो क्या करें।
सिंदूर पहनायें या नहीं, या कि बता दें कि हम यह सिंदूरदान नहीं कर सकते।
इसलिए सेठजी की ओर नजरें टिकी थीं।लोग समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर दूल्हे को हो क्या गया, जो सिंदूर पहनाने में हिचक रहा है।कहीं कुछ दान दहेज की बात तो नहीं है जिसके कारण दूल्हा सिंदूर नहीं पहना रहा है। खुसरफुसर होते देख सेठने मंगनी के दुल्हे को सिंदूर पहनाने को भी कह दिया।
हाँ हाँ बेटे, सिंदूरदान करो ना।क्या. क् .क्या सोच रहे हो.. हम हैं ना।सिंदूरदान करो।
अब असमंजस में फँसा हुआ बेचारे गरीब मंगनी के दूल्हे ने काँपते हाथों से कन्या की मांग को सिंदूर से भर दिया।
विवाह संपन्न हो गया।

विवाह हो जाने के बाद लोगों ने समधी आदि बरातियों को मंडप से बाहर भेजकर सिर्फ दूल्हे को माड़ो में कुछ विशेष रश्म के लिए रोक लिया। उसके बाद दूल्हे को कोहबर की रश्म करनी थी,इसलिए दूल्हा कोहबर में चला जाता है।दूल्हा जब कोहबर में था तभी एक एक करके सभी लड़कियाँ, सहेलियाँ आदि जो भी अंदर मौजूद थीं, सभी निकल कर दिया बाहर चली  गईं।और सिर्फ दूल्हा-दूल्हन ही अंदर बचे रह गए।
कुछ देर दोनों शांत मौन पड़े रहे।लेकिन फिर भी जब दूल्हे ने कोई हरकत नहीं की तो दूल्हन ने चुप्पी तोड़ी।

"क्या हुआ, आप इतने उदास क्यों हैं,क्या कुछ लेनदेन में कमी रह गई या हम आपको पसंद नहीं आये जो आप इसतरह से  एकदम मुँह लटकाये और उदास लग रहे हैं।आखिर बात क्या है?कुछ बोलते क्यों नहीं?"दूल्हन ने दूल्हे को हाथ से स्पर्श करते हुए पूछने लगी।

दूल्हन की बात सुनकर नकली दूल्हे ने किसी तरह से हिम्मत जुटाकर पहले दूल्हन की ओर ध्यान से देखा तो देखते रह गया। गजब की खूबसूरत और नेक दिल औरत और ममता की कोई मूरत।वह दूल्हा अब सोचने लगा कि मैंने तो इसकी माँग में सिंदूर भरा है उस हिसाब से तो यह मेरी पत्नी हुई।लेकिन कल जब इसकी विदायी हो जायेगी तो यह हमारे घर न जाकर उस सेठ के घर चली जायेगी।और जब इसे वास्तविकता का पता चलेगा तो बेचारी के दिल पर क्या बीतेगी । मैं तो इसके लिए एक दलाल बनकर रह जाऊँगा।यह औरत तब मेरे बारे में क्या सोचेगी।और अभी तो आधी रात बाकी है।अगर मैं इसके साथ कुछ गलत करता हूँ तो मैं दोषी हो जाऊँगा।क्योंकि इसका विवाह तो मेरे साथ सिर्फ एक समझौता हुआ है,मेरे साथ तो यह सिर्फ दिखाने के लिए सादी है, और मुझे उसके लिए कुछ कीमत लोगों ने चुकाया है।
तो क्या अब मुझे सारी सच्चाई इसे बता देना चाहिए.....?


कहानी का शेष भाग अगले अंक में.




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शुक्रवार, 8 दिसंबर 2023

अजब प्रेम की गजब कहानियाँ

 अजब प्रेम की गजब कहानियां

सरहदों के बीच बढ़ती दूरियाँ कभी दोस्ती तो कभी दुश्मनी भी  एहसास कराती रहती हैं।यह दुनियां जब से आबाद है।हमेशा कुछ नयेनये किस्से कहानियों में प्रेम के अलग अलग रूप देखने को मिलते रहे।सुनने में आते रहे।ऐसा नहीं है कि यह सब पुराने युग की बात है।यह तो हर युग की बात है और हमेशा ऐसा होता रहा है।
कभी लैला मजनूँ की गाथा ने दुनियां के सामने  अपने जलते हुए अरमान को यूँ ही रौंदते देखा।लोगों ने उनकी एक न सूनी।ठोकरें मारमार कर उन्हें बेहाल कर दिया। लोग मारते तो कैस को थे लेकिन दर्द तो कैस और लैला दोनों को हो रहा था।

फिर सीरी और फरहाद के प्रेम ग्रंथों को भी लोगों ने पढ़ा सुना।और हीर राँझा की कहानियां भी किसी से छुपी नहीं रह सकीं।
ःयेतो हुई कुछ पुरानी प्रेम कहानियां जो किताबों में लिखी गई थीं और फिल्में बनीं थीं।लेकिन आजके इस आधुनिक युग में भी ऐसी तमाम कहानियां  जीवंत हुई हैं और लोगों ने अपनी इन आँखों के सामने घटित होते हुए भी देखा है।

https://youtu.be/cuLQZ5wEhJU?feature=shared

कुछ ऐसी ही प्रेम कहानी भारत और पाकिस्तान के बीच दो दिल मोबाइल पर गेमिंग के दौरान कब एक दूसरे को अपना दिल हार बैठे कि उनकी मोहब्बत को दो दुश्मन देशों की सरहदें भी रोक न सकीं।किसी भी तरीक़े को अपना कर वे एक होना चाहते थे लेकिन कुछ दिक्कतें उन्हें मिलने से रोक रही थीं।लेकिन प्यार तो प्यार होता है और जब यह दिल को अपनी आगोश में ले लेता है तो उस समय वह कुछ भी कर गुजरने की हिम्मत भी रखता है।

यह कहानी थी एक पाकिस्तानी महिला की जो शादी शुदा तो थी ही, साथ में चार चार बच्चों की माँ।क्या कहेंगे इसे ?क्या यह उम्र उनके किसी गैर मर्द से दिल लगाने की उम्र थी?लेकिन यहाँ तो दिल भी लग गया और इश्क भी हो गया।पहले पति के घर को छोड़कर नये जीवन साथी की तलाश में सीमा ने सीमा को पार करते हुए सचिन नामक अपने कँवारे दुबले पतले आशिक के लिए अपने पति को छोड़ा,उसका घरबार छोड़ा,अपना देश छोड़ा और अंत में अपना धर्म भी छोड़दिया।

 
https://youtube.com/shorts/4mrQodOQX18?feature=shared

अब यहाँ भारत में ही एक और ऐसी ही प्रेम कहानी निकल कर आती है जो भारत के राजस्थान प्रांत में शुरू हो कर पाकिस्तान तक जाती है।और यह कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है।राजस्थान की एक शादी शुदा महिला वह भी बालबच्चेदार जब सीमा के प्यार की कहानी सुनती है तो कि एक चार बच्चों की माँ अपने पति को छोड़कर बच्चों को साथ लेकर अपने प्रेमी से मिलने और शादी करने के लिए किस तरह से सरहद पार करने में कामयाब हो जाती है तो इस राजस्थान की अंजू नामक उस लड़की ने बकायदा सरकार से बीजा लेकर अपने प्रेम की अलख जगाने पाकिस्तान जाती है।यह अंजू भी सीमा की तरह ही अपने  एक कथित प्रेमी जिसका नाम नसरुल्लाह बताया गया, उसके साथ बकायदा निकाह करती है और अपना धर्म भी छोड़कर इस्लाम धर्म को अपना लेती है। 

वहाँ पाकिस्तान में इसकी खूब आवभगत भी की जाती है और लोग इसे मुस्लिम धर्म अपनाने से खुश होकर खूब चंदा इकट्ठे करके इसे तोहफा भी देते हैं।।लगभग चार महीने पाकिस्तानी युवाओं के साथ मौजमस्ती करने के बाद अंजू फिर भारत लौट आती है तो यहाँ पर भी माहौल गरम हो जाता है।घरवाले उसके माता पिता और पति किसी भी हाल में उसे घर में घुसने की इजाजत नहीं देना चाहते।
सही भी है कि जिसने बिना कुछ सोचे घर परिवार की इज्ज़त को भरे बाजार में नीलाम कर दिया हो,उससे हमदर्दी कैसी?और जब चली ही गई तो आयी ही क्यों?अगर बच्चों की मोहब्बत खींच लाई तो क्या तब बच्चों का मोह नहीं लगा जब उन्हें छोड़कर चली गई। 
 चूंकि भारत और पाकिस्तान के आपसी संम्बंध काफी खराब चल रहे हैं तो इसलिए भारत से कोई पाकिस्तान जाये या वहाँ से कोई पाकिस्तानी भारत में कदम रखेगा तो शक की नजरों से ही देखा जायेगा।

 यह प्रेम अगर किसी कँवारे जोड़े का होता तो भी कुछ समझ में आता, लेकिन चार चार पाँच पाँच बच्चों की अम्मा अपनी हवस मिटाने के लिए इधर उधर घूमती फिरेगी तो समाज के लिए बहुत बुरा प्रभाव डाल सकता है।


प्यार करने की कोई उमर नहीं होती


इसके लिए हमें भारत से पाकिस्तान जाकर वहां इस्लाम धर्म अपनाने के साथ एक पाकिस्तानी लड़के से शादी करने वाली अंजू और नशरुल्ला के कहानी पर गौर करना होगा।अंजू कोई कँवारी लड़की नहीं है।लेकिन जज्बात में आकर उसने मर्यादा की हद को पार किया और अपने बच्चों को छोड़कर गैर मुल्क में जाकर अपने प्यार का इजहार किया।

इसके पहले पाकिस्तानी वुमन जिसे लोग सीमा हैदर के नाम से जानते हैं।वह मोबाइल पर गेमिंग के दौरान अपना दिल एक हिन्दुस्तानी के संग हार गई।और पति विदेश में नौकरी कर रहा था।यह सीमा घर में जब अकेली रहती तो आशिक मिजाज अपने सचिन नामक एक लड़के से चैटिंग और गेमिंग करते करते इतनी व्याकुल हो जाती है कि पाकिस्तान से अपने सभी चारों बच्चों को साथ लेकर चोरी छिपे भारत में अपने प्रेमी के पास आ जाती है और।जब इसकी भनक पुलिस को लगती है तो बकायदा पुलिस उन्हें रिमांड पर लेकर खूब पूछताछ करने के बाद साथ साथ दोनों प्रेमियों को रहने की मंजूरी दे देती है।
इसलिए यह कहना कोई गलत नहीं होगा कि प्यार करने की कोई उमर नहीं होती।

https://youtu.be/t00Y5HFu1Cc?feature=shared

प्यार कभी भी, किसी भी उमर में किसी को भी हो सकता है।बस उसका जमीर जिंदा होना चाहिये।
अगर ऐसा नहीं होता तो बूढ़े दादा दादी, नाना नानी अपने पोते पोतियों या नातिन और नातियों के प्रति इतने लगाव क्यों रखते।लेकिन आपने अक्सर देखा होगा कि।कुछ मासूम से बच्चे जिन्हें आप खूब प्यार करते हैं वे आपको कहीं भी आते जाते देखते हैं तो तुरंत ही आपके साथ जाने की जिद करने लगते हैं।उन्हें आपके प्रति वह लगाव उन्हें ऐसा करने की चाहत पैदा देता है और आप लाख मना करो,उन्हें मारो पीटो फिर भी कुछ बच्चे अपनी मां से दूर और उनसे अलग बिल्कुल नहीं होना चाहते।और रोते रोते सो जाते हैं।यह उनका प्यार ही तो है।उन्हें कोई समझ नहीं है।कोई हानि लाभ नहीं है लेकिन मोहब्बत तो देखो।

इसीलिए कहा जाता है कि प्यार करने की कोई उमर नहीं होती।प्यार एक ऐसा खेल है जो अपने आप किसी को भी किसी से भी हो जाता है।


दिल कब किसे और क्यों चाहने लगता है दिल को भी पता नहीं होता

बात जब दो दिलों के प्यार करने की हो तो यह जरूरी नहीं होता कि किसे किसने प्यार किया।क्योंकि प्यार तो बिना कुछ किये ही हो जाता है।और जब यह रोज रोज का मिलना दिल में एक ऐसी जगह बना लेता है कि बिना देखे मन का शुकून जाने लगेऔर एक नजर उस खासम खास की झलक देखने को जब यह दिल बेचैन हो उठता है तो वहाँ प्यार है।माता पिता का अपने बच्चों के प्रति, बाई बहन के साथ मित्रों के साथ जाने अनजाने किसी के साथ किसी को हो जाता है लेकिन।दो प्रेमी जोड़े जब एक ही वर्ग समुदाय और मानवी प्रवृत्ति के होते हैं तो वह कुछ खास होता है।
कुछ पशु पक्षियों के प्रेमी होते हैं जो उनके साथ इतना घुलमिल जाते हैं कि वे उनके बिना नहीं रह पाते। प्यार में ऐसी ताकत होती है।

ये है एक छोटी सी घटना जो कभी सुर्खियों में थी।

https://youtu.be/cuLQZ5wEhJU?feature=shared


इसके बाद एक बार फिर एक इंसान और एक पंक्षी ने अपने दिल को एक दूसरे के साथ इस कदर लगाया कि वह भी लोगों के लिए एक मिशाल बन.गया।


https://youtu.be/7hEdPhsrjD4?feature=shared

 सच्चा प्यार तो दिल से होता है


सच्चे मन से जब किसी को कोई चाहता है तो यह नि:स्वार्थ प्रेम कहलाता है।और यह दिल से होता है और आत्मा तक इसकी गूंज सुनाई देती है। यह प्यार किसी प्रेमी और प्रेमिकाओं के प्रेम से कुछ अलग ही होता है।
 यह भी एक प्यार का ही रिश्ता है जो किसी को भी किसी से भी हो सकता है।किसी के चाहने न चाहने से उसपर कोई असर नहीं होता।
पशु पक्षियों के प्रति लगाव भी उनके प्यार को दर्शाता है।और दो दिल मिलकर जब एक जान बन जाते हैं तो उनके प्रेम की गाथा लिख दी जाती है और वह एक अमर प्रेम की अमर कहानी बन जाती है।
यहाँ पर ऊँचनीच, जातिपाँति, भेदभाव, छोटा बड़ा, अमीरी गरीबी कुछ भी मायने नहीं रखती।बस  हम तुम और बीच में कोई दीवार नहीं।एक अलग ही अहसास होता होगा मन में जब सारी दुनियां एक तरफ और दो दिल तमाम दुश्वारियों को झेलते हुए भी अलग न होने की जिद पर अड़े होते हैं और उन्हें दुनियां की कोई ताकत तोड़ नहीं पाती और फिर मजबूर होकर वे प्रेमी इस दुनियाँ को अलविदा कहदेते हैं।




https://youtu.be/ivmg37mBqSI?feature=shared


बहुत ही मुश्किल होता है तब जिंदगी का।इसलिए  प्यार की वह.ताकत जिसके सामने दुनियाँ नत मस्तक हो जाती वह मुहब्बत दिल से होती है।

आँखों की लगाई आग में दिल जब जलता है

यह प्यार और इश्क का खेल तो चलता रहता है।यहां सबसे बड़ी गुनहगार तो ये आँखें होती हैं।आँखों की अगुवाई से शुरू होने वाली प्रेम कहानी में जब दिल बेचारा फंस जाता है तो आँखों को कोई फर्क नहीं पड़ता है लेकिन दिल की धड़कनें बढ़ने लगती हैं।
हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि बिहारी लाल ने अपनी बिहारी सतसई में एक दोहा इस प्रेम प्रसंग को ऐसे ही कुछ लिखा था

     क्यों बसिये, क्यों निबहिये, नीति नेहपुर नाहिं।
     लगालगी लोइन करैं, नाहक मन बंधि जाय।।

शायद आँखों की इस तरह आशिकी में बेचारे दिल को सब झेलना पड़ता है।

आसान नहीं होता प्यार करके निभाना

जब दिल किसी को भाता है तो वह हर रिश्ता भूल जाता है।उसके लिए सिर्फ उसका प्यार ही सबकुछ होता है।यह कब ,किसे,क्यों और होता है किसी को पता नहीं होता।और जब पता चलता है तबतक बहुत देर हो चुकी होती है।
प्यार करनेवालों के दुश्मन हजारों होते हैं। पहला तो यह समाज है जो कभी दो प्यार करनेवालों को नहीं समझता।समाज बिना किसी सामाजिक और मान्य रिश्ते के दोप्रेमियों को कभी स्वीकार नहीं करता है।उनके सम्पर्क में आनेवाले बच्चों के भी बिगड़ने का भय बन जाता है।

माता पिता अपनी संतान के दुश्मन तो होते नहीं।समय आने पर हर माता पिता अपने बच्चों का घर बसाने के लिए उनके शादी विवाह कर देना चाहते हैं लेकिन परिस्थितियों के अनुकूल न होने के कारण कुछ देरी हो सकती है।लेकिन आजकल के कुछ बच्चे जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही शारीरिक संम्बंध बनाने को उत्सुक होने लगते हैं।गलत संगति में पड़कर उनके कदम बहकने लगते हैं और इसी जिश्म की भूख और प्यास को बुझाने के लिए जो रास्ते पकड़ते हैं आजकल के लोग उसे ही प्यार का नाम लेकर बदनाम कर देते हैं।

सच्चाई तो  यह है कि वाकई यह कोई प्यार व्यार नहीं होता।है और जैसे ही इन्हें कोई ऐसे कृत्य करते देख लेता है या ये पकड़ लिए जाते हैं तो सारा इश्क का भूत यहीं छोड़कर फूर हो जाता है।


लेकिन जब कोई किसी से सच्चे मन से प्यार करता है और उसका लगाव उसके साथ सिर्फ सम्बन्ध बनाने या संभोग करने की इच्छा से परे हटकर उसके साथ दिल का रिश्ता जोड़ता है।उसे सिर्फ एकनजर देखने के लिए लालायित रहते हैं।बिना देखे, बिना बातें किये भूखप्यास सब भूल जायें, देखते ही मानों सारी भूख मर जाये।बिना खाये ही पेट भर जाये।बिना कुछ कहे बहुत कुछ बातें हो जाये तो समझो कि दिल ने दिल को याद किया है और यहाँ पर प्यार हुआ है।
 
अब जब इतना लगाव बन जाता है तो अगर कोई इसके खिलाफ जाकर कुछ करना चाहता है तो मुश्किल होता है और।अब जब कोई एक दूसरे के बिना रह नहीं सकता और कोई उन्हें अलग कर देता है तो  यह उनदोनों प्रेमी युगल के लिए कष्टकारी बन जाता है।दोनों का अलग होना नामुमकिन सा होता है और आप उन्हें अलग करके उनकी


अक्सर टूट जाती हैं प्यार वाली शादियाँ

 लोग एक दूसरे से प्यार करते हुए जब शादी करने की बारी आती है तो बहुत से लड़के पीछे हटने लगते हैं।क्योंकि उन्हें तो उनसे कभी प्यार था ही नहीं।लड़कियाँ जिसे पाने के लिए उसका प्यार समझती रहती हैं, वो एक धोखा होता है।
लड़कियों को पटाने के लिए लड़कों द्वारा बिछाया गया एक जाल होता है जिसे आजकल की मासूम लड़कियाँ समझ नहीं पातीं हैं और उनके लिए अपनी जवानी को सौंप कर अपना सौंदर्य पूर्व यौवन लुटा देती हैं। इससे उनका ही नहीं बल्कि उस माता पिता एवं भाई बहनों के साथ ही पूरे परिवार की इज्ज़त पर एक ऐसा कालिख पोत जाती हैं जिसे किसी भी प्रकार से धोकर छुपाया नहीं जा सकता।

आजकल के लड़के लड़कियों को फँसाने के लिए उनके ऊपर खर्च भी दिल खोलकर करने से नहीं हिचकते।अगर पास में पैसे न हो तो घर से झूठे बहाने बना कर पैसे लाते हैं, दोस्तों से उधार ले लेते हैं और अगर सनक सवार हो सिर पर किसी का जिस्म पाने की तो चोरी छिनैती कुछ भी कर सकते हैं लेकिन अपनी उस झूठे प्रेम को दर्शाने के लिए अपनी धाक जमाना उन्हें अच्छा लगता है।

अब जो बच्चियाँ अपने लोकलाज खोने से पहले अगर शादी की शर्त रख देती हैं और जब वे कहती हैं कि हम आपके साथ तभी सम्बन्ध बनाने देंगी, जब आप हमसे शादी करने का वादा करोगे।तो सभी लड़के तुरंत इसके लिए तैयार हो जाते हैं और उन शादी की शर्त रखने वाली लड़कियों के जिश्म से खूब जी भरके खेलते हैं।लेकिन अगर कोई लड़की इसी बीच गर्भवती हो जाती है तो उसके सारे भूत उतर जाते हैं।और अक्सर नब्बे प्रतिशत लड़के इस शादी से साफ इंकार कर जाते हैं।तब उन भोली भाली लड़कियों को एहसास होता है कि उन्होंने यह बहुत गलत किया।।बहुत सी लड़कियाँ आत्महत्या तक कर लेती हैं तो बहुत सी माँ बनने से पहले इस दुनियां में आने के लिए बेताब उसस मासूम को अपने गर्भ में ही मार डालती हैं।


लेकिन जो लोग प्यार करके शादी कर लेते हैं तो उनकी जिंदगी में  जहर कैसे घुलता है, आओ इसपर अपनी चर्चा करते हैं।
शादी से पहले हर युवा लड़कियों के हर इशारे पर नाचता है।महगी शापिंग, मँहगे होटल में जाने के साथ साथ हर ख्वाहिश पूरी करने की कोशिश करना पड़ता है लेकिन जब यह रिश्ता पति पत्नी का बन जाता है तो अक्सर जो भी सामान घर में नहीं होता है और पत्नी लाने को बोलती है तो हजारों बहाने शुरू हो जाते हैं कि चलो कल आ जायेगा।आज पैसे नहीं है। बाद में देखते हैं।अभी तो लाये थे,कितना खर्च हैं तुम्हारे।कुछ बचत भी करना सीखो।बस यहीं से मनमुटाव बढ़ने लगता है कि जो प्रेमी उसके जुबान खुलने से पहले ही उसकी बातें समझ जाता था और बिना माँगे सब हाजिर कर देता था, उसकी एक झलक पाने के लिए दीवाना बना घूमता था,आज नजरें चुरा रहा है।झगड़ा होना ही होना है।
बस दिन बदिन रोज नोकझोंक परिवार में  कलह कराने वाली हो जाती है और एक दिन यह पवित्र रिश्ता टूट जाता है।

प्यार करके शादी करने से अच्छा है कि शादी करके लायी गयी पत्नी को इतना प्यार दें कि वह एक प्रेमिका लगने लगे


जी, अगर आप हमारे साथ जुड़कर हमारी सोच और हमारी संस्कृति और हमारी कविताओं और कहानियों में रुचि रखते हैं तो तो शायद यह  हमारी जो विचारधारा है शायद आपको दिल तक छू जाये।
यह कहानी उन नव दम्पतियों के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण साबित हो सकती है जिनका अभी विवाह नहीं है या अभी हाल ही में हुआ है।जो कभी किसी के प्यार में फँसकर अपनी जिन्दगी को तबाह करने वाले हैं या तबाह हो चुके हैं।सबके लिए यह प्रेरणादायक साबित हो सकती है।

हर माता पिता को अपने बच्चों को लेकर मन में एक आशा और विश्वास होता है कि उसके बच्चे बड़े होकर उसका नाम रोशन करेंगे।आज जिसे बच्चे को लोग माता पिता के नाम से जानते हैं, कल वे उसके नाम से जाने जायेंगे।तो दिल खुशी से झूम उठेगा।लेकिन जब उन बच्चों के कर्म अच्छे होंगे तब।न कि बच्चे कहीं गलती करके आयें और लोग कहें कि येही इनके बाप हैं।देख लो, इन्होंने कैसे संस्कार दिया था अपने बच्चों को।

बड़ा फर्क होता है दोनों में।

जब एक नयी उमर के लड़के लड़कियाँ आपस में मिलते हैं तो जब वे बाल्यावस्था से आगे बढ़ने वाली उमर में होते हैं तो नयी उमंगें हिलोरें मारने लगती हैं।लड़कियों के शरीर में तेजी से परिवर्तन होने लगता है और उनके स्तनों का उभार बढ़ने लगता है तो उनके तन की की सुंदरता लोगों को अनायास ही आकर्षित करने लगती है।लोगों का विपरीत सेक्स के प्रति यह जो आकर्षण होता है बढ़ जाता है और अब इस उमर में जो लड़के या लड़कियाँ अपने आप को सम्हाल नहीं पाते और कदम बहक जाते हैं।वे क्षणभर के मानसिक और शारीरिक सुखद अनुभूति की प्राप्ति के लिए सबकुछ भूलकर एक ऐसी राह पर चले जाते हैं, जहाँ से पीछे मुड़कर देखने पर सिर्फ बदनामी और बेइज्जती के सिवा कुछ भी दिखाई नहीं देता।

यहाँ पर एक मर्यादा होती है जो लोकलाज का भय दिखाकर इस नरक में डूबने से बचाती है।पशुओं में इसी बात की कमी होती है और अगर मनुष्य भी वैसा ही आचरण करने लगे तो मनुष्य और जानवर में भेद कैसा रह जायेगा।

मनुष्य के रुप में यदि जन्म हुआ है तो उसके कुछ सामाजिक नियम भी बने हुए हैं।जिसे निभाना होता है। समाज में विवाह एक संस्कार पैदा करता है और विवाह करके घर में आयी हुई पत्नी को यदि कोई पुरुष उसका पति अपनी पत्नी को  अपनी प्रेमिका बना कर उससे प्रेम करना शुरू कर दे,और पत्नी भी अपने पति को परमेश्वर माने या न माने अपना प्रेमी बना ले तो यही दाम्पत्य जीवन इतना सुखमय हो जायेगा, जिसकी कोई कल्पना नहीं की जा सकती।



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गुरुवार, 7 दिसंबर 2023

क्या राजनीति के लिए गठबंधन का नाम देश के नाम से जोड़ना अनुचित नहीं लगता

 देश के नाम को बदनाम करने की साजिश के तहत महागठबंधन का नाम I.N.D.I.A. रखा गया लगता है।


भारत की छवि को धूमिल करने और विदेशों में मोदीजी की लोकप्रियता को भंग करने के उद्देश्य से विरोधियों द्वारा कुछ माह पहले एक गठबंधन बनाया गया।इस गठजोड़ में वे तमाम पार्टियों के लोग चाहे वे उत्तर प्रदेश से हों,बिहार के हों,छत्तीसगढ़ के हों,राजस्थान, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, तेलंगाना आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक आदि सहित सभी विपक्षी दल एक जुट होकर एक मंच साझा किया था।जिसमें सभी दलों ने भाजपा के चर्चित चेहरे को अपना लक्ष्य बनाया था।उनकी बस एक ही बात थी कि किसी भी तरह से भाजपा को सत्ता से बाहर निकाल फेका जाय।जबतक मोदीजी सत्ता की कुर्सी पर आसीन रहेंगे, किसी भी दल की राजनीति नहीं चल सकती।इसलिए सभी एक जुट होकर एक मंच पर आइये और संकल्प लिया जाय।
लेकिन बात यहीं खत्म नहीं नहीं हुई सभी दलों के मुखिया लोग अपने अपने जुगाड़ में मस्त थे।और सभी लोग खुद कोअगला प्रधानमंत्री का चेहरा  मानते हुए इस गठबंधन में शामिल हुए थे।

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यहाँ पर लोगों ने एक भूल कर दिया उस मीटिंग में यह तय नहीं कर पाये कि यह गठबंधन जिसका नाम इंडिया रखा जा रहा है तो किसे प्रधानमंत्री पद का असली चेहरा बनाया जाय जिसे मोदी के बाद लोग पसंद करेंगे।यही कमी रह थी और यह सम्भव ही नहीं था कि वे अपने सिवा किसी और के सिर पर प्रधानमंत्री का मुकुट पहने बरदाश्त करते।इसलिये सिर्फ सभी दलों ने मिलकर जो गठबंधन बनाया और जिसका नाम भी ऐसा रखा जिस हर वह मतदाता या नागरिक जो राजनीति के गलियारों से दूरी बनाकर सिर्फ अपने काम से मतलब रखता है और चुनाव के दौरान अपने मतदान उसे करता है जो भारत को एक नई दिशा देना चाहता है।यहाँ सबको पता था कि आखिर यह गठबंधन कहाँ तक जायेगा, क्योंकि जब इन लोगों में खुद आपसी सहमति नहीं बन रही है।प्रधानमंत्री बनने का सपना देखने वालों में यूपी के सपा नेता, बहुजन के मुखिया, बिहार के नितीश जी,बंगाल की दीदी के साथ साथ तमाम बड़े चेहरे खुद को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठते हुए देखना चाहते हैं।लेकिन दुर्भाग्य से उनकी मुख्यमंत्री वाली कुर्सी भी हाथ से खिसकती जा रही है।

एक दूजे की टाँग खींचने के चक्कर में लोग विकास की राह में रोड़ा बनते जा रहे हैं।जनता को भी अपना हित और अनहित सब समझ में आता है।लेकिन नेतागण सभी जनमानस को सिर्फ और सिर्फ मुर्ख समझती रही हैं।आज जब लोगों ने अपने क्षेत्र के विकास की गति को देखा तो उन्हें यह बात समझने में जरा भी देरी नहीं लगी देश का हित कहाँ है।
यहाँ यह जान लेना भी जरूरी है कि क्या भाजपा में सभी लोग बहुत अच्छे और दूध के धुले हुए हैं तो उसका भी जवाब है कि नहीं।क्योंकि भाजपा भी कुछ बाहरी गंदे लोगों को अपने दल में जगह देकर कुछ गंदगी उसने भी बटोर रखी है लेकिन यह भी उसकी कहीं न कहीं मजबूरी रही होगी।क्योंकि बड़े दलों को तोड़ने के लिए उसके जिताऊ नेताओं को अपने साथ लाकर उस दल को कमजोर करना था और खुद को मजबूत बनाना था।वेकुछ ऐसे नेता हैं, जो चाहे जिस किसी भी दल को पकड़ लेंगे जीत पक्की तो ऐसे लोगों को मिलाकर अपनी पकड़ को मजबूत हर दल करता है।लेकिन कुछ बहुत पुराने कार्यकर्ता जो शुरू से आखिर तक भाजपा के साथ खड़े रहे।नारे लगाते रहे, प्रचार प्रसार करते रहे, उनसे ज्यादा बाहर से आये मेहमान नेताओं को सम्मान देते हुए उन्हें मैदान में उतारना मुनासिब तो नहीं होता।लेकिन जहाँ हार जीत की बात होती है तो वह बात भुलाकर उसे उतारा जाता है जिसे जीतने के अवसर अधिक लगते हैं।इसलिए अब जो सेवक सदा से ही पार्टी की सेवा में लगे रहते हैं उन्हें तो दिक्कत होती ही है।खबर है इस विधानसभा चुनाव में कोई एक दो नहीं पूरे नौ मंत्रियों ने अपनी सीटें नहीं बचा पायी।तो उन्हें समझना चाहिए कि आखिर ऐसा क्यों हुआ।आपसे गलती कहाँ हुई थी।
     लिखने का तात्पर्य यह है कि यह प्रजा तंत्र है और जनता अपना शासक खुद चुनती है।इसलिए किसी पद को पाकर पूरी निष्ठा और इमानदारी से अपने पद का सही उपयोग करना चाहिए।क्योंकि जब जनता आपको अपनी आँखों में बसाकर अपने दिल में बिठाया है तो उसकी भी कुछ उम्मीदें हैं आपसे।यह जरूरी नहीं कि आप किसी को कोई व्यक्तिगत सुविधा उपलब्ध नहीं कराया लेकिन सामूहिकता के दायरे में रहते हुए सारी सरकारी योजनाओं का लाभ आप सभी के लिए उतारें।जब मंत्री, मुख्यमंत्री या प्रधानमंत्री देश की जनता के साथ भेदभाव करने लगेंगे तो जनता भी उन्हें दिल से नकार देगी और उसके लिए उसके पास अपने मतों का अधिकार मिला हुआ है।जब जनता बिना किसी भेदभाव के अपना फैसला खुद करेगी तो अच्छी सरकार मिलेगी।लेकिन जब जातिवाद, पूंजीवाद, पार्टीवाद लेकर चलेगी तो न कभी अच्छे लोग चुनाव जीतेंगे और ही कभी अच्छी सरकार बनेगी।जबभी मतदान का समय आता है तो खुलकर बिना किसी दबाव या भय के सभी को अपना मतदान अवश्य करना चाहिए।आपके एक वोट की ताकत सत्ता बदल सकती है और सत्ता बचा सकती है।इसलिए जागरूक होइये।मतदान खुद की समझदारी से करने की जरूरत है।

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आखिर क्यों बहुजन समाज पार्टी का जनाधार खिसकता जा रहा है?

क्या बहुजन समाज पार्टी अपनी नीतियों से भटकती जा रही है? 

आखिर क्यों इसका जनाधार खिसकता जा रहा है? एक बड़ा सवाल..

बसपा के संस्थापक माननीय कांशीराम

बसपा संस्थापक कांशीराम ने अस्सी के दशक में दलित समुदाय के बीच ऐसी राजनीतिक चेतना जगाई कि यूपी में राजनीतिक भूचाल आ गया और बसपा की 4 बार सरकार बनी और  बहनजी के नाम से जानीजाने वाली तेजतर्रार शिक्षित महिला नेता सुश्री मायावती मुख्यमंत्री रहीं। गली मुहल्लों में छोटे छोटे बच्चों के हाथ में झंडा पकड़ा कर उनके साथ चलते हुए नारेबाजी करने का जो सिलसिला शुरू किया गया और जो नारा दिया गया वो यह था--
चढ़ दुश्मन की छाती पर, मुहर लगेगी हाथी पर।






बहुजन समाज पार्टी समाज पार्टी के उत्साही कार्यकर्ता पार्टी का सिंबल बांटते रहते हैं लोगों में। और बच्चे इनके नारे लगाते रहते हैं। चाहे समझ आये ना आये. हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा, विष्णु महेश है। बचपन में भी मुझे भी समझ नहीं आता था पर अच्छा लगता था। क्योंकि हाथी बड़ा प्यारा सिंबल लगता था। वो भी ब्लू हाथी।
 पर हाथी ही क्यों है बसपा का सिंबल? यह तो सोचने वाली बात थी।बहुत सोच समझकर बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक श्रीकांशीराम जी ने इलेक्शन कमीशन से हाथी ही क्यों मांगा था चुनाव चिन्ह के लिए? इसकी कई वजहें थीं- 1.कांशीराम जाति-प्रथा में नीचे के लोगों को बहुजन कहते थे। क्योंकि इनकी आबादी बाकी जातियों से ज्यादा थी. फिर ये दलित कहे जाने के खिलाफ भी था। क्योंकि दलित कहने से किसी की मानसिक मजबूती कैसे बढ़ेगी? तो कांशीराम मानते थे कि बहुजन समाज एक हाथी की तरह है। विशालकाय,हाड़-तोड़ मेहनत करने वाला, बेहद मजबूत। बस इसको अपनी ताकत की समझ नहीं है,इसीलिए ऊपरी जातियों के लोग कमजोर होने के बावजूद महावत की तरह कंट्रोल करते हैं। 
2.इसके अलावा हाथी का बौद्ध धर्म से भी रिश्ता है। इस धर्म को भीमराव अंबेडकर ने अपने मरने से कुछ समय पहले अपना लिया था। बुद्ध की जातक कथाओं में हाथी का जिक्र है।गौतम बुद्ध की मां महामाया ने सपना देखा था कि एक सफेद हाथी अपनी सूंड उठाये कमल का फूल लिये हुए उनके गर्भ में आ रहा है।एक संत ने इसका मतलब बताया था कि लड़्का पैदा होगा और बहुत महान बनेगा। 3.फिर भीमराव अंबेडकर ने जब अपनी पार्टी बनाई तो हाथी को ही सिंबल के तौर पर लिया था।कांशीराम को अंबेडकर की राजनीति का उत्तराधिकारी माना जाता था. तो ये एक सम्मान का भी प्रतीक था. साथ ही प्रथा को कायम रखने का भी जरिया था।
4.हिमाचल प्रदेश, पंजाब, बिहार राज्यों में बहुत सारे बहुजन हाथी को देवताओं की सवारी भी मानते हैं। यहां तक तो आधुनिकता पहुंची नहीं थी, ऐसे में अपनी चीजों को बड़े स्तर पर देखना कांफिडेंस देता। कांशीराम उस वक्त बहुजन समाज को जोड़ रहे थे। उस समाज में ज्यादा लोग पढ़े-लिखे नहीं थे उस वक्त।हालांकि अब वो बात नहीं है. बहुत पढ़ते हैं।
उस वक्त लोगों को एक झंडे के नीचे लाने के लिए किसी सिंबल की जरूरत थी जिसे लोग आसानी से समझ सकें। और खुद को जुड़ा हुआ महसूस कर सकें। क्योंकि उस वक्त तक बहुजन समाज के ज्यादातर वोट कांग्रेस को ही जाते थे। क्योंकि कांग्रेस को बहुत दिन से लोग जानते थे। समझ नहीं थी कि किसको वोट करना है। एक अबूझ सी लॉयल्टी थी, जो नफे-नुकसान से परे थी. ऐसे में उनको तोड़ के लाना और भरोसा दिलाना कि हम अच्छा करेंगे, बड़ा मुश्किल था। कई सारे प्रतीक खोजे गये।सबको एक बनाने के लिये।तो हाथी बड़ा काम का सिद्ध हुआ।फिर इस को ले के बड़ प्यारे और जबान पर चढ़ने वाले नारे भी बन गये।
 

जब बसपा का जनाधार बढ़ता ही जा रहा था




यूपी से सटे बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, पंजाब, छत्तीसगढ़ में भी बसपा अपनी जड़ें जमाने में मजबूती के साथ सफलता हासिल करने में जुटी रही। यूपी की तरह देश के दूसरे राज्यों मेंभले ही बसपा की सरकार कभी न बनी हो, लेकिन विधायक और सांसद जीतते रहे हैं।क्योंकि अबतक बसपा एक मजबूत पार्टी बन चुकी थी।इसके साथ एक वर्ग विशेष के सभी लोग जो दलित समुदाय से आते थे, एक जुट हो गये और बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के नारे लगाते हुए अपनी जाति के सभी घरों को इस पार्टी ने ऐसे इकट्ठे करके जोड़ लिया कि वे किसी के बहकावे में कभी नहीं आ सकते थे।अब उन्हीं वोटबैंको के आधार पर इसके टिकट पाने के लिए अन्य जातियों के बाहरी नेता इसपार्टी से चुनाव लड़ने के लिए बेचैन होने लगे।जिसे चुनाव में उतारा जाता चाहे वो कोई भी क्यों न, उसका कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि भी न हो, लेकिन अगर उसने बसपा से टिकट प्राप्त कर लिया तो उसे तमाम दलित वोट समझो उसको मिल गया।बाकी लोग भी जातियों के वोट अगर खींचने में कामयाब होते तो जीत पक्की हो जाती थी।

दलित समुदाय का वोट बैंक भी बसपा से छिटका


यूपी में तो बसपा ने अपने पैर जमा लिए थे और काफी मजबूती से उत्तर प्रदेश में उसने अपनी सरकार भी चलाया।यूपी के बाद बहुजन समाज पार्टी नेअपनी मजबूत बनाने पकड़ बनाते बनाते
मध्य प्रदेश में तो एक समय बसपा का 15 फीसदी से ज्यादा वोट हो गया था। और राजस्थान में भी तीसरी ताकत बनकर खड़ी हो गई थीं।अब सन् 2007 में बसपा यूपी में अपने दम पर पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने में कामयाब रही, लेकिन उसके बाद से दलित समुदाय ने बसपा से मुंह मोड़ा तो वो लगातार जारी है। बसपा दिन ब दिन और चुनाव दर चुनाव कमजोर होती जा रही है।दलित समुदाय का वोट बैंक भी बसपा से लगातार छिटकता जा रहा है और लगातार दूर हो रहा है। यह स्थिति बसपा की सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही नहीं बल्कि देश भर के राज्यों में हुई है।

आखिर कैसे बसपा  हुई इतनी कमजोर?


दरअसल, कांशीराम के निधन के बाद से दलित और पिछड़ी जातियों का बसपा से लगातार मोहभंग होता चला गया। कांशीराम ने डीएस-फोर के दौर से ही तमाम दलित एवं अति पिछड़ी जातियों को गोलबंद करके बसपा का गठन किया था। उन्होंने हाशिए पर जातियों में लीडरशिप पैदा कर उन्हें सियासत में लाए।मायावती के हाथों में बसपा की कमान आने के बाद पार्टी ने 2007 में अपने उरूज को छुआ, लेकिन जातीय क्षत्रपों के धीरे-धीरे बसपा से निकलने और निकाले जाने के बाद पार्टी कमजोर होती चली गई।

बसपा के छिटपुट विधायक कई राज्यों में जीत हासिल करते रहे हैं, लेकिन बसपा कभी किसी सरकार में शामिल नहीं हुई।

हाल कुछ ऐसा रहा


जब काशी राम जी ने अपनी पार्टी बनाया तो उन्होंने सबसे पहले दलितों और अल्प संख्यक कहे जाने वाले मुसलमानों को एक मंच दिया तथा कुछ पिछड़ी जातियों के भी अपने साथ लाकर  पार्टी खड़ी कर लिया।तब उसका नाम रखा * डी.एस.4* जिसने अपना सर्वप्रथम नारा दिया था कि  

     तिलक तराजू और तलवार,

      इनको मारो जूते चार ।


यही  डीयस फोर बाद में बहुजन समाज पार्टी हो गई और उसके चर्चा का बाजार गर्म हो गया।इसनेअपनी ऐसी छवि बना लिया कि बड़ेबड़े दल इससे घबराने लगे थे।इस पार्टी का टिकट लेकर चुनाव में उतरने के लिए लोग आपस में खीचतान करने लगे ।कारण साफ था कि अगर जो इस पार्टी का झंडा लेकर मैदान में उतार दिया जाता तो दलितों में खासकर चमार जाति का सम्पूर्ण वोट उसको मिल जाने की गारंटी रहती थी और बाकी तो लोग इधर उधर से अगर खींच लेते तो जीत भी हो जाती थी।अक्सर सुनने में आता रहा कि चुनाव लड़ने के लिए जो लोग टिकट की आशा में रहते, मायावती जी के जन्मदिन पर मुबारकबाद देने के लिए भारी गिफ्ट्स भेजकर अपने ऊपर उनकी कृपा दृष्टि ललचाई आँखों से देखते रहते।


दलितों को सिर्फ मतदाता ही समझने की सबसे बड़ी भूल


बहुजन समाज पार्टी उत्तर प्रदेश में उस ऊँचाई पर पहुंच चुकी थी जहाँ से पूरे देश की राजनीति शुरू किया जाता है।धीरे धीरे इसने यूपी के बाहर भी अपने प्रत्याशी उतारने लगे।लेकिन कांशीराम जी निधन हो जाने के बाद धीरे धीरे यह पार्टी बिखरने लगी। अल्पसंख्यकों का जो मुस्लिम समुदाय था वो कभी सपा की ओर तो कभी बसपा की ओर लुढ़कने लगा।दोनों पार्टियों ने मुस्लिम समुदाय को अपने साथ जोड़ने के लिए अलग अलग
राग अलापने लगे । जब अयोध्या में श्री राम मंदिर का मुद्दा गरमाया तो भाजपा के शासनकाल में जब विवादित ढाँचा गिराये जाने की खबर फैली तो उस समय केन्द्र में रक्षामंत्री के पद पर रहते हुए सपा प्रमुख माननीय मुलायम सिंह यादव जी ने मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति का सहारा लेकर रामभक्त कारसेवकों पर खूब गोलियां चलवाने का जो दुस्साहस कर दिया उससे भारी संख्या में हिन्दुओं का नरसंहार किया गया।और भाजपा सरकार को इस्तीफा देना पड़ गया।इतनी बड़ी जनकुर्बानी देने के बाद मुसलमानों ने सपा में ही अपनी मजबूत स्थिति को देखने लगे और जुड़ते गये।यहां तक कि मुसलमानों को खुश रखने के लिए नेताजी ने बकायदा मुस्लिम टोपी पहने ईद की नमाज पढ़ते इनके खूब फोटो भी वायरल हुए।नेताजी को कुछ लोग इनके नाम के आगे मुल्ला भी एक शब्द जोड़ने लगे थे। कहीं पर कुछ मुस्लिम सपा खेमे में तो कहीं मुसलमान बसपा के झंडे के नीचे अपनी अपनी जमीन तलाश लेते थे।तबतक सब कुछ ठीक ठाक ही था।



बसपा सुप्रीमो ने दलितों को कभी प्रत्याशी बनाने पर बल नहीं दिया


बसपा सुप्रीमो जीतने के लिए तरह तरह के हथकंडे अपनाने से कभी नहीं चूकी।हमेशा टिकट को लेकर चंदा में विश्वास किया और खुद तो मालामाल होती चली गईं।मुसलमानों, यादवों ,पंडितों, कुर्मियों, भूमिहारों आदि पिछड़ी या सामान्य जातियों के इन्होंने अपनी पारी खेलनी शुरू किया तो दलितों को सिर्फ अपने घर
का वोटर समझा। हाथी झंडा निशानऔर नीला झंडा देखकर दलित खुश हो जा रहे थे।और आँखें बंदकर बीएसपी को अपने वोट देते रहे।हाँ इतना जरूर था,इस दौरान हर थाने और हर विभाग को चौकन्ना कर दिया गया कि हमारे शासन काल में दलितों का उत्पीड़न बर्दाश्त नहीं किया जायेगा।जो भी अधिकारी अपनी मनमानी से  काम के प्रति लापरवाही बरतने की कोशिश करता, उसे उसकी सजा अवश्य मिलती।एक तरह से सुशासन चलता नजर आ रहा था।अधिकारियों की मनमानी नहीं चलती थी।जरा सी भृकुटि टेढ़ी हुई, अधिकारी, कर्मचारी सस्पेंड।जाओ घर बैठो , फिर बड़ी मनौव्वल के बाद बेचारे बहाल किये जाते।हर दलित बस्ती को अम्बेडकर गांव बनाकर उसे अतिरिक्त सुविधाएं देकर नाली, खडंजा, शौचालय ,पक्की सड़क आदि से जोड़कर उन्हें खुश करने की कोशिश की गयीं बहुजन समाज की सरकार में।ये सारी सुविधाएं मिलने के बाद भी हरिजन बस्ती उसी अनुरूप रही जैसी पहले थी।क्योंकि जिसे जैसे परिवेश में रहने की आदत थी वो उससे आगे नहीं निकल सके।शौचालय बने लेकिन यूजलेस मानों सिर्फ पैसे भुगतान के लिए।नालियों और खडंजे का भी वही हाल।कब बने और कब समाप्त हो गया किसी को पता ही नहीं चला। अब जबकि बहुजन समाज पार्टी सत्ता में नहीं होती तो दलितों का खूब शोषण करने की कोशिशें जारी हो जाती थीं।इसी तरह उतार चढ़ाव होता रहा।बसपा के साथ जो दलितों का वोट बैंक था अब कुछ लोगों ने इसमें सेंधमारी करनी शुरू कर दिया।वे अभियान चलाकर दलितों को समझाने लगे कि यह बसपा अब बाबा साहेब के बतलाये रास्ते से भटक रही है। हम दलितों के पास इतना वोट होते हुए भी हमें वह कभी चुनाव लड़ने का अवसर नहीं देती।इस पार्टी से कोई भी कलुआ बरहिमा को टिकट देकर हमारे बीच जब भेजा जाता है तो हम बिना सोचे विचारे उसे पार्टी के नाम पर वोट दे देते हैं।लेकिन जब हम सब एक छोटा सा गांव का प्रधान ही क्यों न हो यदि बनना चाहते हैं तो हमें लोग अपना वोट नहीं देते हैं।इसलिए हम क्यों उन्हें वोट डालें जो हमें वोट देने से कतराते हैं।दलित कभी सामान्य सीठ से विजयी नहीं होता।अगर सीटें सुरक्षित होती हैं तो वहाँ भी दलितों में भी ऊँचनीच देखकर लोग मतदान करते हैं।

जब यह बात दलितों को समझ में आने लगी कि ये दलित तो दलित ही रह गए और इनका उत्थान तबतक नहीं हो सकता जबतक ये स्वयं आगे की रणनीति में जुड़कर काम नहीं करेंगे।बहुजन समाज पार्टी के साथ रहकर सिर्फ मतदाता ही बने रहना होगा,और हमें कभी आगे नहीं बढ़ने दिया जायेगा।इनका जनाधार खिसकने लगा।

अन्य दलों से गठबंधन रास नहीं आया


जब बसपा काभी जनाधार खिसकने लगा तो इसने अन्य दलों के साथ गठजोड़ भी किया।लेकिन यहाँ उसकी दाल नहीं गलती दिखी।इसके मतदाताओं ने तो अपने वोट देते रहे लेकिन जहाँ इसके प्रत्याशी थे,वहाँ विपक्षियों के वोट ये हासिल न कर सकीं।अब पिछले कुछ सालों से सदा सुर्खियों में रहनेवाली बसपा सुप्रीमो बहन कुमारी मायावती जी का कोई कहीं से बयान नहीं आता है।जबसे भाजपा ने केन्द्र और प्रदेश में बागडोर संभाली तभी से मानों बसपा की बोलती बंद होती गई।अब इसके पीछे का क्या कारण हो सकता है,कौन है जिम्मेदार, किसी को पता नहीं।


 


आजाद समाज पार्टी का अभ्युदय


दलितों के बीच से ही एक नौजवान नेता बोलने में काफी तेज, अपना काफिला लेकर जब जनता के बीच पहुँचने लगा,तो जनता में एक नयी उर्जा का उसने मंत्र फूँक दिया।और परिणाम यह निकला कि काफिला बढ़ता गया और लोग जुटते गये।इन्होंने भी अपने साथ मुस्लिम समुदाय को जोड़ने का निश्चय करके अपने रास्ते को चुना।क्योंकि राजनीति ऐसी चीज है कि कोई भी कभी भी सिर्फ एक जाति विशेष को ध्यान में रखकर सत्ता में कब तक रहेगा?वह नहीं चल पायेगा।इसलिए इस नये युग की शुरुआत करने के लिए एक चर्चित नेता का नाम सामने आने लगा।नाम है चन्द्रशेखर।इसे कभी कोई चन्द्रशेखर आजाद कहता है तो कोई चन्द्रशेखर रावण भी लोग इसे कहते हैं।आजाद भी यह है और रावण भी।

चन्द्रशेखर रावण




सबसे बड़ा नुकसान इनसे बसपा का ही हो रहा है ।कहीं न कहीं बहुजन समाज पार्टी को चन्द्रशेखर रावण से ही ज्यादा नुकसान पहुंचता रहा है।क्योंकि उन्हें भी उन्हीं लोगों का साथ मिल रहा है जो कभी बसपा के साथ थे।कुछ दलबदलू नेताओं की बात है तो वे मौका परस्त लोग तो हर जगह होते हैं।इनकी स्थिति आजकल बहुजन समाज पार्टी से कुछ ठीक लग रही है।अब देखना यह है कि क्या सुश्री मायावती जी से दलितों का मोह भंग होकर चन्द्रशेखर रावण के साथ जाता है या बहनजी पुनः अपने चहेते दलित भाईबंधुओं को अपने साथ मनाकर वापस ला सकती हैं, या अब उनकी यहीं से राजनीति को लोग सलाम कर देंगे।

 निष्कर्ष  यह है कि समय सबका बदलता है।


कहने का तात्पर्य यह है कि चाहे सरकार किसी भी दल की हो,जब सत्ता की बागडोर संभालने के लिए उस सिंहासन पर आसीन होता है तो उसे सभी जनमानस को एक दृष्टि से देखते हुए कार्य करना चाहिए।क्योंकि यह राजा का कर्तव्य बनता है कि उसके राज्य की सम्पूर्ण जनता उनका एक परिवार है और सबको साथ लेकर चलना है।सबसे भाईचारा बना रहे।धर्म और जाति से ऊपर उठकर सबके विकास सबको रोजगार की बात होनी चाहिये क्योंकि जहाँ प्रजा तंत्र होता है वहाँ प्रजा ही शासक होती है और प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री तो उसके प्रतिनिधि मात्र।अतः जब जनता को लगने लगेगा कि देश में अराजकता फैलती जा रही है और शासक लाचार है तो जनता किसी और को चुन कर उसे सत्ता सौंपने का अधिकार रखती है।लेकिन फिर भी हर सरकार में सत्ता में रहनेवाले लोग अपनी जाति बिरादरी को कुछ अधिक ही सम्मान देते रहे हैं और देते रहेंगे।उदाहरण के तौर पर यूपी में जबसे योगीजी मुख्यमंत्री बने हैं, ठाकुरवाद हावी हुआ है।सपा के शासनकाल में यादवों का बोलबाला कायम था।और मायावती जी की सरकार में तो दलित उत्पीड़न की कोई गुंजाइश नहीं थी।लोग दलितों को सताना तो दूर उनसे कड़क होकर बात नहीं करते थे।क्योंकि उस समय हरिजन बनाम सवर्ण धारा बड़े ही आराम से लग जाती थी।तो ये होती है सत्ता की धमक।

तो इसलिये कहना है कि सरकार चाहे किसी की हो सभी को सम्मान के साथ जीने के अधिकार को कायम रखना चाहिए।लोगों के अंदर से वैमनस्यता खत्म कर दिया जाना चाहिए।लेकिन. लोग हैं कि सत्ता पाने के लिए देश को भी बेच खाने के लिए उतारु हो जाते हैं।



•  लेखक एक स्वंतत्र विचारधारा का कवि है।ना उधौ का लेना न माधन का देना।


कुछ खास बातें


• बहुजन समाज पार्टी की स्थापना 14 अप्रैल 1984 में हुई।

• बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम थे। 
• बसपा की शुरुआत बीयस फोर के नाम के साथ हुई जिसे बदल कर बहुजन समाज पार्टी कर दिया गया।

• बसपा की अध्यक्ष के रूप में मायावती कांशीराम की उत्तराधिकारी बनी।

• उत्तर प्रदेश में, बसपा का अपना मुख्य आधार है और यह 2019 के भारतीय आम चुनाव में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी थी।

• बसपा का चुनाव चिन्ह, जैसा कि भारत के चुनाव आयोग द्वारा अनुमोदित है, एक 'हाथी' है जिसका मुख बाईं ओर है



 

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रविवार, 3 दिसंबर 2023

मतदान को त्योहार की तरह मनाया जाना चाहिए

चुनाव को त्योहार की तरह मनाया जाना चाहिए

चुनावी मुद्दा



  बड़े ही सौभाग्य की बात है कि भारत जैसे देश में आज  आमजनता को भी अपनी सरकार चुनने की ये अधिकार प्राप्त किया गया है।आज अगर हमारे लोगों को यह अधिकार नहीं मिला होता तो हमें अपनी सरकार बनाने का उसे बदलने का अवसर नहीं होता।लेकिन हमारे संविधान निर्माता ने हमारे भारत के संविधान में वह लिखित अनुमति दी कि भारत का हर वो नागरिक जो वयस्क होगा, चुनाव लड़ने और मतदान करने का अधिकार प्राप्त कर  लेगा।अब जितना किसी महान व्यक्ति की एक वोट की कीमत होती है उतना ही एक गरीब परिवार के लिए भी।लेकिन फिर भी बहुत से लोग आज भी इसे दिल से नहीं समझते। तो जब हम इसमें कोई दिलचस्पी नहीं दिखायेंगे तो हमें बढ़ियां सरकार नहीं मिलेगी। अच्छी सरकार में अच्छे लोग होंगे तो देश भी अच्छे से चलेगा।




 प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने कभी सदन में अपने भाषणों में भी यह कहा था कि जनता देख रही है.... पूरा भाषण यहाँ सुन सकते हैं।




जब सदन में गूँजने लगा मोदीजी का यह भाषण

 https://twitter.com/indiatvnews/status/1731214271009435891?ref_src=twsrc%5Etfw%7Ctwcamp%5Etweetembed%7Ctwterm%5E1731214271009435891%7Ctwgr%5E7ef63cdb73a0821ba4cd1efcb29a4f29af485e24%7Ctwcon%5Es1_c10&ref_url=http%3A%2F%2Fapi-news.dailyhunt.in%2F


जातिपाँति से ऊपर उठकर मतदान करना चाहिए

जनता को जाति पाँत धर्म द्वेष पार्टी आदि से बारह निकल कर एक अच्छा प्रत्याशी को चुनाव में वोट देकर उन्हें अपने क्षेत्र के विकास के लिए सदन में भेजने चाहिए।तब क्षेत्रीय विकास होगा।क्षेत्र का विकास होगा तो देश आगे बढ़ेगा।लेकिन जब हम जातिपाँति में उलझकर मतदान करने लगेंगे तो हमारी विकास की गति रुक जायेगी।

कुछ लोग मतदान करने की रुचि नहीं रखते

आज भी बहुत से लोग ऐसे हैं जो यह कहते हैं कि वोट देने से क्या लाभ, कोई हमें खर्चा दे रहा है क्या?हम अपना किसी को वोट नहीं देंगे तो ऐसी सोच वाले लोग आज भी हैं।उन्हें आजभी उतना ज्ञान नहीं है कि मतदान कितना महत्वपूर्ण होता है।उसे त्योहार समझना चाहिए और बढ़चढक़र अपने चहेते प्रत्याशी को वोट देकर अपना कर्तव्य निभाने चाहिए।लेकिन उन्हें शायद ये नहीं पता है कि उनके एक वोट से देश की दिशा बदल सकती है।

कुछ लोग वोट डालने में बहुत ही मनोरंजन कर लेते हैं

कुछ लोग तो वोट डालने में इतनी ज्यादा दिलचस्पी रखते हैं कि अपना तो वोट डालते ही हैं साथ में आठदस वोट दूसरे लोगों का भी चोरी छुपे डाल आते हैं।जबकि यह पूरी तरह से गलत है और ऐसा किसी को नहीं करना चाहिए।अगर कोई ऐसा करता है तो पुलिस उसे पकड़ कर उसे सजा भी दे सकती है लेकिन ऐसा होता नहीं है।और पकड़ने के बाद कुछ ही देर में उन्हें छोड़ दिया जाता है।जिससे फर्जी मतदान को बल मिल जाता है और कमोबेष लगभग सभी पार्टियों के सपोर्टर अपनी पार्टियों को जिताने के लिए इस तरह का काम करते हैं।


बचपन की कुछ यादें

आज से लगभग चालीस साल पहले की बात है मुझे आज भी अभी अच्छे से याद भी है, उस समय हमलोग बहुत छोटे थे तो चुनाव में जो भी प्रचार वाली गाड़ियाँ आती थीं तो उसके पीछे पीछे भागते थे।उनके फेंके गए बिल्ला और पर्चे इकट्ठा कर के बहुत खुश होते थे।हमें इससे कोई मतलब नहीं होता था कि यह किस दल का है।एकसाथ अनेकों पार्टियों के बिल्ले आलपिन से अपने कमीज की जेब पर लटका कर हम सभी बच्चे खूब मगन होते थे।उस समय हमें किसी भी पार्टी या किसी भी दल या किसी भी नेता के बारे में कोई जानकारी नहीं होती थी लेकिन जब चुनाव आता था तो सबसे ज्यादा बच्चों को खुशहाल देखा जाता था।जैसे लगता था कि यह चुनाव कोई बहुत बड़ा त्योहार है जिसे हिन्दू मुस्लिम सब मिलकर एक साथ मनाते हैं।बस इससे आगे कुछ नहीं।चाहे कोई जीते, कोई हारे, हम लोगों को कोई फर्क नहीं पड़ता था।

चुनाव आने की खुशी का अंदाजा नहीं था

चुनाव की घोषणा होते ही गाड़ियों में भोंपू (लाउडस्पीकर) बाँधकर उसे चिल्लवाती हुई गाड़ियों में आठ दस लोग बैठे होते।और गाँव की कच्ची सड़क पर धूल उड़ाते हुए धीरे धीरे आगे बढ़ती जाती थीं और एक साथ दसदस बीसबीस लड़के पर्चा माँगते पीछेपीछे भागते रहते थे और एकाध दो लड़के उसमें से गिरकर रोने भी लगते थे तो कभी जो बच्चे एक भी पर्चा नहीं लूट पाते तो वे भी रोते रोते घर लौट आते थे।इतनी खुशी शायद आज चुनाव के जीत और हार की खबरें सुनकर भी नहीं होती।बचपन के वो दिन भी क्या दिन रहे होंगे।

चुनाव को त्यौहार की तरह मनाया जाना चाहिए

हाँ,तो बात हम ये बता रहे थे कि पहले गरीब और दबे कुचले लोगों के अक्सर वोट तो दूसरे दबंग लोगों द्वारा पहले ही डाल दिया जाता था।अधिकारी बैठे रहते थे और उनके नाश्ता पानी की व्यवस्था गाँव के प्रधान को सौंप दी जाती थी और चुनाव ड्यूटी में तैनात कर्मचारी उनके लिए कभी कोई विरोध नहीं करते थे।और दो दो घंटे तक लोग लाइन में खड़े रहने के बाद जब उनके नाम का मिलान मतदाता सूची से किया जाता था तो अधिकांश लोगों को यह बताया जाता था कि आपका वोट तो पड़ गया है और बारह भेज दिया जाता था।अब बेचारे गरीब लोग किससे झगड़ा करें।अगर कोई अकड़ता तो पुलिस वाले बाँह पकड़ कर बाहर कर देते कि जाओ बाहर पता करो कि किसने तुम्हारा वोट डाल दिया।वाह, क्या जमाना था।लेकिन लेकिन आज जब जनता मतदान के प्रति जागरूक हुई है तो भी पूरी तरह से आज भी फर्जी मतदान बंद नहीं हुआ है।


फर्जी मतदान को रोकने के लिए इवीएम में सुधार करने की आवश्यकता है।

फर्जी मतदान को रोकने के लिए मतदाता पहचान पत्र जारी किया गया फिर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन आयी फिर आधार कार्ड बना और फिर उसे मतदाता पहचान पत्र से भी जोड़ा गया लेकिन फर्जी मतदान आज भी होते रहते हैं।ईवीएम में थोड़ा सा और सुधार कर दिया जाता तो जैसे कि आधार कार्ड से अंगूठा लगाकर सरकारी दुकान से राशन उठाया जाता है और दुबारा कोई चाहकर भी राशन धोखे से नहीं उठा सकता तो ठीक वैसे ही ईवीएम को भी संशोधित करने की आवश्यकता है जिससे मतदाता एकबार मतदान करने के उपरांत यदि दुबारा किसी और के नाम पर फर्जी मतदान करने की कोशिश करता है तो उसके अंगुलियों के निशान न होने के कारण वे पकड़ में आ जाते ।


मतदान अवश्य करें और अपनी पसंदीदा सरकार चुनें।