रविवार, 31 दिसंबर 2023

भारत में कानून की कमजोरियों पर एक दृष्टि हमारी

 ऐ जाने वाले मेरे दिलदार

एक बार बस एकबार

मुस्कुरा कर देख ले

इस जिंदगी का क्या है

कब तलक हमारी रहेगी

यादें ही बस बची रहेंगी

इसलिए कुछ सोच ले यहाँ आकर

हमनें क्या अपने लिये किया

क्या औरों के लिए किया


क्या और कैसा है भारत का संविधान

क्या भारत के संविधान में ऐसा कोई कानून है, जिससे लोगों को एक साल के भीतर बड़े से बड़े और छोटे से छोटे मुकदमों को निपटाया जा सके?

भारत के संविधान में कानून बहुत कमजोर है

भारत के संविधान में ऐसा कोई कानून नहीं जो कोर्ट को एक निर्धारित समय के अंदर सही फैसला सुनाने पर बाध्य कर सके।जिसका लाभ उठाकर वकील और जज आपस में मिलकर पीड़ितों को गुमराह करते हुए उन्हें तारीख पर तारीख देकर दौड़ाते हैं।जिस अपराधी के पास पैसे हों,यदि वो चाहे तो आजीवन तारीखें ले लेकर आजीवन सजा से बच सकता है।मरने के बाद भी मुकदमा खत्म नहीं होगा, वो चलता रहेगा।फिर कोर्ट किसे सजा सुनायेगी।न्याय मांगते माँगते लोग मर जाते हैं।घर के सामान तक बिक जाते हैं।कोर्ट मुँह ताकते रहता है।


कानून में संशोधन करने या आवश्यकता पड़ने पर नया कानून बने।

अगर किसी कोर्ट का कोई इमानदार जज किसी अपराधी को सजा भी सुना दे तो भी उस मुजरिम को बचने के लिए उसके ऊपर की अदालतों के दरवाजे खुले रहते हैं।फिर आरोपी अपने बचाव के लिए एक एक कोर्ट में अपील करता जायेगा और हर कोर्ट में कम से कम  आठ दस साल तो आसानी से टाल ले जायेगा।फिर आखिर में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया जाता है।तो इसका सीधा फायदा उन मुजरिमों को मिलता है और वे अपराध पर अपराध करते जाते हैं, करते जाते हैं।
इसलिए अब ऐसे कानून की जरूरत है जो मुजरिमों को जल्दी से जल्दी दंडित करने का फरमान जारी कर सके।उसके बाद अगर कोई अपराधी आगे की अदालत में जाता है तो फैसला सुनाने वाली अदालत के अनुसार कम से कम तारीख देकर बिना देरी किये अपने फैसले सुरक्षित कर सके।उसके बाद फिर यदि उससे भी ऊँची अदालत में जाये तो वहां और भी कम समय में कम गिनीचुनी तारीख ही लगाने का प्रावधान किया जाना चाहिए।जिससे किसी को न्याय के लिए इधरउधर इतनी लम्बी लड़ाई न लड़नी पड़े।

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