दहेज उत्पीड़न की शिकार होती बेटियाँ
दहेज उत्पीड़न की शिकार होती बेटियाँ
कुछ खबरों की ये तो सुर्खियां मात्र हैं,रोज खून के आँसू बहाती हैं बेटियाँ
आप सभी लोग जो इस समय हमारे लेख को पढ़ रहे हैं, सबने दहेज का नाम तो सुना होगा।दहेज प्रथा एक ऐसी प्रथा बनकर समाज को खोखला कर रही है जिसका कोई हिसाब नहीं है।दहेज को लेकर कईयों बार सरकार का ध्यान भी गया, कानून भी बने लेकिन दहेज एक छुआछूत का रोग बनते गया और समाज को सिर्फ देखादेखी मजबूर करता गया।जिसकी कोई कहीं शिकायत तबतक नहीं किया जाता है जबतक बेटियाँ जिंदा रहती हैं।दहेज उत्पीड़न का आरोप तब लगाया जाता है जब ससुराल वालों की प्रताड़ना से तंग आकर या तो बेटियाँ खुदकुशी कर लेती हैं या फिर उन्हें ससुराल वालों के द्वारा मौत के घाट उतार दिया जाता है।
दहेज किसे कहते हैं
बेटियों के ब्याह के लिए वर पक्ष को रिश्ता जोड़ने से लेकर बेटियों की विदायी तक लड़की के माता - पिता, भाईबंधुओं, बहनों एवं सगे सम्बधियों द्वारा दिया जानेवाला रूपया-पैसा, सामान, गिफ्ट इत्यादि सभी दहेज का ही हिस्सा है। हर परिवार के लोग जब कहीं भी अपनी बेटी ब्याहते हैं तो अपनी सामर्थ्य के अनुसार जो कुछ भी वरपक्ष (लड़की जिस घर में ब्याही जाती है)को अपनी बेटी की खुशहाली के लिए दान स्वरूप देते हैं, उसे ही दहेज कहते हैं।लेकिन जब शादी के लिए शर्त रखकर रूपये पैसे और सामान जैसे गाड़ी मोटर,फ्रीज, कूलर, एसी इत्यादि एवं सोने(gold) की माँग की जाती है तो यह एक कुप्रथा का रूप धारण कर लेती है और मजबूरी बस लोग बेटी की खुशी के लिए जैसेतैसे सारी व्यवस्था करने के लिए मजबूर हो जाते हैं।इसे दहेज कहते हैं।
जो जितना अमीर होता है, वह उतना ही बड़ा दहेज का लालची होता है।
जी,बिल्कुल सही पढ़ रहे हैं आप।जो जितना अमीर आदमी होता है, उसे उतना अधिक दहेज चाहिए ही चाहिए।और इसे झुठलाया नहीं जा सकता।
क्या कभी किसी गरीब बेटी के बाप को किसी बड़े और रईस आदमी के घर में अपनी बेटी ब्याहते देखा है?नहीं ना; जानते हैं क्यों?क्योंकि रिश्ता जोड़ने से पहले अपनी औकात आँकना पड़ता है।झोपड़ी में रहने वाले को महलों के सपने नहीं देखना चाहिए।यह कहावत भी आपने भी सुना होगा।बस, यहीं से औकात देखकर पता चलता है कि किसी के घर में क्या पकता है।बाहर से भोजन की गंध हवा में घुलकर लोगों को चीख-चीखकर बताती है कि किस घर की रसोई में कुछ खास है आज।
अगर दहेज की बात नहीं होती तो भगवान की कृपा से जिनके पास अकूत संपत्ति पहले से है, वे किसी मजबूर बेटी के बाप को अपने रूपये खर्च कर ,अपने पैसों का सदुपयोग करके उस घर की बेटी को अपनी बहू बना सकते हैं, जिसके बाप के पास उतनी दौलत नहीं हो दहेज के लिए।लेकिन ऐसा कहीं नहीं होता।जो जितना अमीर आदमी होगा उसे उतना ही अमीर घर की बेटी चाहिए बहू बनाने के लिए।यही जीवन का सत्य है।
अमीरी आते ही गरीबों से रिश्ते टूट जाते हैं।
क्या आपने किसी अमीर आदमी के गरीब रिश्तेदार देखे हैं?ऐसा जरूर हुआ होगा कि पहले दोनों परिवार एक समान हैसियत रखते रहे हों तब रिश्ते बने थे।लेकिन जैसे ही एक आदमी दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करके आगे बढ़ने लगता है तो उसके गरीब रिश्तेदार छूट जाते हैं और किसी कार्यक्रम में अगर वे दिख जायेंगे तो लोगों की शान घट जायेगी।बस यही सोचकर लोग गरीबों से मूँह मोड़ने लगते हैं। बहुत से लोग बड़े होकर (पैसे वाले)होकर तो अपने माता पिता तक को भूल जाने लगे हैं।और उनके लिए वृद्धावस्था में वृद्धाश्रम की व्यवस्था भी कर देते हैं।क्योंकि अब वे ऊंची सोसायटी ज्वाइन कर चुके होते हैं तो उनके तालमेल बिगड़ जाने का भय उन्हें सताता है।
पढ़ेलिखे और सरकारी नौकरी वाले लड़के की लोग कीमत लगाते हैं।
एक बहुत ही बड़ा कटु सत्य यह भी है कि आज जिनके बेटे सरकारी नौकरी में लग चुके हों और अभी उनकी शादी न हुई हो तो ऐसे में परिवार उनकी शादी की बकायदे से दहेज में उन्हें क्या चाहिए, एक लम्बी लिस्ट जबानी रटकर याद कर लेते हैं।कितना रूपये चाहिए, कौन सी गाड़ी चाहिए, कितने तोले का स्वर्ण आभूषण चाहिए,क्या खिलाना पिलाना होगा, कितने मँहगे होटल में रश्मअदायगी होगी,तमाम बातें।लेकिन सावधानी इतनी अधिक चतुराई से बात करते हैं लोग कि पूछो मत।सबसे पहले वे यही कहते हैं कि वे दहेज के शख्त विरोधी हैं और उन्हें दहेज में कुछ नहीं माँगना है।बस हमारी पोजीशन तो आप देख ही रहे हैं।हमारे बड़ेबड़े लोगों से साथ-बाथ है और शादी में बड़े-बड़े लोग आयेंगे तो हमारी भी शान है।वह फीकी नहीं होनी चाहिये।बिना माँगे ही सबकुछ माँग लेते हैं।
कुछ लोग तो ऐसे भी देखे गए हैं जो खुद पेट्रोल भरवाने की क्षमता नहीं रखते लेकिन शादी में चार पहिया ही चाहिए।अगर लड़का अकेले है और उसके कोई भाई नहीं हैं, यानी सम्पूर्ण सम्पत्ति का अकेला वारिस तो कीमत आसमान छूती है लेकिन वे भी दहेज नहीं माँगते, सिर्फ दहेज लेते हैं और बिना दहेज के शादी कहाँ होती है जनाब।
एक अच्छे घर-वर की तलाश में एक बेटी के पिता को कितने घरों की चौखट पर माथा टेकने पड़ते हैं, यह किसी बेटी के बाप से पूछो।एक कहावत है कि 'जाके पाँव न फटी बेवाई,वो क्या जाने पीर पराई।'किसी की कहानी सुनने और सुनाने से कोई फर्क नहीं है लेकिन जिसके ऊपर बीतती है उसके दिल का हाल हम आप क्या समझेंगे।
एक शिक्षित बेटी दो घरों में एक साथ रोशनी करती है।
आज लोगों की सोच बदल रही है।लोग बेटे बेटियों में अंतर और भेदभाव नहीं करते हैं।बेटों के समान ही बेटियों को भी शिक्षित करने में लगे हैं।बल्कि बेटों से ज्यादा बेटियाँ पढ़लिख रही हैं।नम्बर भी अच्छे ला रही हैं।पुरुषों के बीच अपनी अस्मतें बचाते हुए नौकरी भी पकड़ रही हैं और अपनी ड्यूटी भी निभातीहै।घर में चुल्हा चौका से लगायत बाहर के कार्य तक बड़ी ही मेहनत से निभाने में कोई उन्हें ऊँगली उठाये तो यह गलत होगा।बच्चों की देखभाल करने से लेकर पति की सेवा, उनके लिए व्रत क्या नहीं करती हैं महिलाएं, लेकिन बदले में उन्हें क्या मिलता है?पति की डाँट,सास एवं ननद के तानें!फिर भी उफ तक नहीं करती हैं बेचारी।आखिर कबतक ये शिक्षित होते हुए भी अक्षित सा जुर्म सहती रहेंगी।लोग बेटी के ब्याह में क्षमता से भी अधिक मुँहमाँगी रकम जुटाकर, कर्जे लेकर मँहगे रिश्ते ढूंढते हैं कि शायद उनकी बेटी खुश रहेगी लेकिन जब बेटी को दहेज के नाम पर प्रताड़ित किया जाता है तो हर मां बाप, भाई की रूहें काँप जाती हैं।
दहेज के खिलाफ कोई आवाज क्यों नहीं उठाता
जब लोग रिश्ते ढूंढने जाते हैं और शादी तय करते हैं तो जब दहेज की बात आती है तो लोगों बिना माँगे बहुत कुछ माँग जाते हैं और हर लड़की पक्ष उसे सामर्थ्य न होते हुए भी देने को राजी हो जाता है और शायद यह सोचते हैं कि चलो किसी तरह बेटी का घर बस जाय।बस बेटी का घर बसाने की चाहत में बाप बिक जाते हैं और जीवन भर की जुटाई गई रकम दिल खोलकर खर्च करने का उत्साह भरे दिल से बरात का स्वागत करते हैं।सरकार ने दहेज के खिलाफ कानून तो बनाया है लेकिन उसपर आजतक अभी भी कोई ठोस पहल नहीं हुई।
दहेज के लिए प्रताड़ित करने या जान जाने के बाद केस दर्ज होता है और तबतक बहुत देर हो चुकी होती है।मुकदमा दर्ज होने के बाद न्याय में अत्यधिक देरी का होना और आरोपियों को कड़ी सजा न देना ही अपराध का सबसे बड़ा कारण है।अगर समय से न्याय मिलता तो दहेज प्रथा ही क्या बड़ेबड़े अपराध भी खत्म हो सकता है।लेकिन भारत सरकार की कानूनी प्रक्रिया ही बहुत घटिया है।
दहेज उत्पीड़न का शिकार सिर्फ महिलाएं ही नहीं होतीं
जैसा कि अगर देखा जाय तो दहेज एक ऐसा राक्षस है जो सिर्फ महिलाओं को ही नहीं अपितु उन सभी लोगों को सताता रहता है जो उस परिवार से जुड़े लोग होते हैं।शादी तय होने से पहले बेटी के माता पिता एवं भाई जो भी घर के खर्च सम्हालने में लगे होते हैं, उनकी जिम्मेदारी होती है कि वे अपनी मान मर्यादा को ध्यान में रखते हुए घर में जवान हो चुकी बहन-बेटियों को उनके हाथ पीलेकर उनकी शादी ब्याह करके उनके घर बसाने की अपनी जिम्मेदारी निभायें।अब जिम्मेदारी को निभाने के लिए उन्हें इस दहेज रूपी दानव से समझौता करना पड़ता है।शादी के पहले कोई मां बाप नहीं चाहते कि जिस घर में वे अपनी बेटी को ब्याहना चाह रहे हैं उनके साथ किसी तरह का मतभेद बने।इस लिए सिफारिशों के द्वारा उन्हें मनाने की भरपूर कोशिश करते हैं और उसके बाद अगर दूसरा पक्ष राजी हो गया तो ठीक है।शादी के दिन रखकर सारी शर्तों को पूरा कर ब्याह सम्पन्न कर दिया जाता है।लेकिन कुछ लोगों का पेट इतने से भी नहीं भरता।वे बार बार कम दहेज लाने की बात कहते हैं और लड़कियों को प्रताड़ित करने लगते हैं।कुछ लड़कियाँ चुपचाप सबकुछ सहन करती रही हैं लेकिन कभी कभी जब उनके सब्र का बाँध टूट जाता है और वे मजबूर हो जाती हैं तो मौत को गले लगाकर अपनी जिंदगी समाप्त कर लेती हैं।तब उस बच्ची के माता पिता अदालत का दरवाजा खटखटाते हैं लेकिन वहाँ भी अगर माता पिता गरीब हैं और वकील को फीस भरने एवं ज्यादा दिन तक मुकदमों को झेलने में सक्षम नहीं हैं तो न्याय की उम्मीद नहीं कर सकते।क्योंकि भारत जैसे महान देश की घटिया कानूनी दाँवपेंच में उलझकर रह जायेंगे लेकिन न्याय नहीं पा सकते।क्योंकि यहाँ कानून भी बिकता है अगर खरीदने वाला दमदार हो।यह बात पुलिस थाने में पहुँचते ही पता चल जाती है।ऐसा सिर्फ गरीबों के साथ ही नहीं होता है, बल्कि सभी छोटे बड़े,अमीर गरीब सबको इस दौर से गुजरना पड़ता है।ऐसा नहीं है कि दहेज सिर्फ गरीबों को ही सताता है।यह दहेज रूपी दानव अमीरों के घर से निकलता है और गरीबों को भी अमीरी के सब्जबाग दिखाते हुए ललचाता रहता है और यही कारण है कि बड़ोंकी भाँति छोटे और गरीब तबके के लोग भी बिना दहेज के शादी करने से कतराते हैं।जिसकी जितनी औकात रहतीहै उससे कहीं ज्यादा आगे उसके लालच सिर चढ़कर बोलते हैं।
शादियों में खर्च का कोई सीमित दायरा नहीं है।
अगर दहेज प्रथा को खत्म करना है तो सरकार को मजबूत और ठोस पहल करनी होगी।शादियों में होने वाली फिजूलखर्ची को नियंत्रित करना होगा।और हर शादियों के पहले वर एवं कन्या पक्ष के द्वारा शपथपत्र भरवाने और शादी के बाद उन्हें विवाह प्रमाण पत्र देने की व्यवस्था करनी चाहिए ।जिसमें शादी में होने वाले खर्च का ब्यौरा दर्ज किया जा सके।
कोई लिखित प्रमाण पत्र न होना
सामाजिक तौर पर तो हमेशा शादी ब्याह होते रहते हैं लेकिन क्या किसी के पास शादीशुदा होने का प्रमाणपत्र जारी किया जाता है,नहीं होता।समाज ने मान्यता दे रखा है।बारात निकाली , जान पहचान वाले लोगों को इकट्ठा किया और सबको खाना खिलाया ,दुल्हन की मांग में सिंदूर भरा गया, दहेज में मिले सामान उठाया और दुल्हन की विदायी कराया चल दिया।इससे बड़ा प्रमाण और क्या चाहिए।
वहीं दूसरी ओर देखा जाय तो कुछ बच्चों के बहकते हुए कदम अपनी मनमर्जी से इश्क में पड़कर घर परिवार की इज्ज़त को मिट्टी में मिलाने के बाद क्षणिक सुख की खातिर समाज की नजरों में गिरने के बाद कोर्ट में जाकर शादी का सार्टिफिकेट बनवाते हैं।लेकिन समाज उन्हें जल्दी स्वीकार नहीं करता।क्योंकि यह सब समाज की दृष्टि में गलत होता है।
शादी का सर्टिफिकेट सबको बनाया जाना चाहिए और यह आधार कार्ड की तरह अनिवार्य भी किया जाना चाहिए।
शादीब्याह गुड्डे गुड़ियों का खेल नहीं है
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।वह समाज में रहता है और उसके सबके साथ एक सम्बन्ध बनाकर जीना होता है।मनुष्य के लिए यह बहुत जरूरी होता है कि वह आपस में सामंजस्य बना कर जीवन के हर मार्ग पर चले।परिवार चलाने और वंश परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए विवाह नामक एक संस्कार की व्यवस्था समाज के द्वारा की गई है।अन्यथा मनुष्य और पशुओं में कोई अंतर नहीं रह जायेगा।समाज में भाई,बहन, माता पिता सबके अलग अलग सम्बन्ध बने हैं।शारीरिक सम्बन्ध होना सबके लिए एक आवश्यकता है लेकिन उसके लिए भी समाज में एक व्यवस्था की गई है।वह है परिणय संस्कार।अग्नि को साक्षी मानते हुए अपने हीतमीत ,बंधुवांधवों की उपस्थित में सात फेरों केसाथ सात बचन लेकर गंधर्व विवाह करने की व्यवस्था समाज में की गई।
दो दिलों को जोड़ता है एक रिश्ता
जब दो अनजान पथिक एक दूजे के साथ शादी के बंधन में बंध जातेहैं तो वे एक नया जीवन शुरू करते हैं एक साथ मिलकर।न कोई पहले की जान पहचान न कोई रिश्ता होता है फिर भी जब अपने लोग एक प्यार का रिश्ता ढूंढ कर लाते हैं और ब्याह रचा देते हैं तो एक साथ हर सुख दुख में मरने जीने की कसमें खाते हैं।और इस तरह से एक परिवार बनता है।लेकिन उसी परिवार में जब रिश्ते में कोई दरार पड़ जाती है तो यह रिश्ता नरक से बदतर जिंदगी जीने को मजबूर कर देता है।
सम्बन्ध तबतक निराला होता है जब तक प्रेम बरकरार रहता है।इसलिए थोड़ी सी सावधानी बरतें और थोड़ी सूझबूझ से काम करें तो यह जीवन खुशियों से भर जायेगा।दौलत का क्या है;वो आज है, कल नहीं रहेगी।या आज नहीं है लेकिन हो सकता है कि कल भविष्य में एक नयी सुबह हो और झोली खुशियों से भर जाय।इसलिए कभी दौलत का घमंड नहीं किया जाना चाहिए।
दौलत से सिर्फ सामान मिल सकता है
आदमी जिंदगी भर दौलत के लिए रूपये के पीछे भागता रहता है।चाहे जैसे भी हो सके, बस पैसे आना चाहिए।ताकि उससे बड़ीबड़ी कोठी और महल बना सके।अपनी व्यवस्था मजबूत कर सके।लेकिन क्या कभी किसी ने सोचा है कि पैसों से वो महल तो बना सकता है लेकिन नींद तो सुकून से मिलती है।नींद का इंजेक्शन लिया तो जा सकता है लेकिन आँखों को सुकून तो चैन की नींद ही दे सकती है।पैसे से दौलत ,सुख के सभी साधन खरीद सकते हैं लेकिन सुख को खरीदा नहीं जा सकता।इसलिये कभी दौलत के लिए किसीका दिल दुखाना नहीं चाहिए।
अखबार में बनती हैं सुर्खियां दहेज में मरने वाली बेटियाँ
लेबल: दहेज उत्पीड़न पर, दहेज एक दानव, दहेज के लिए होती हैं हत्यायें, दहेज प्रथा




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