सोमवार, 6 नवंबर 2023

संत कबीर दास

         संत कबीर दास

कबीर दास जी का जीवन परिचय

  आज के समय में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो कबीर दास जी के नाम से परिचित न हो।चाहे भले ही उनके जीवन और उनसे जुड़ी हुई घटनाओं से भलीभांति परिचित नहों,लेकिन नाम से जरूर परिचित हैं।

कबीर दास का जन्म


    संत कबीरदास का जन्म सन् 1398 ई. में माना जाता है।कुछ लोग पन्द्रहवीं शताब्दी में कबीर के जन्म की बात बताते हैं।लेकिन सही तिथि बताना सम्भव नहीं है।जन्म स्थान के बारे में ऐसा कहा जाता है कि तब के काशी कहे जाने वाले शहर के एक लहरतारा नामक तालाब के किनारे सुबह प्रातःकाल के समय उधर से जा रहे एक निःसंतान जुलाहा दम्पति नीरूऔर नीमा को वहीं पर सदाबहार (बेहया)की झाडियों में रोते हुए मिले थे।लहरतारा आजभी उसी नाम से जाना जाता है और कबीरपंथी लोग हमेशा यहाँ उनके जन्म स्थान पर आते रहते हैं। संत कबीरदास के जन्म की सही तारीख के बारे में कोई नहीं जानता।

कबीर दास जी का जन्मस्थान-


प्राचीन काल में बनारस को ही काशी कहा जाता था।काशी में बाबा विश्वनाथ आज भी विराजमान हैं। लहरतारा वाराणसी कैंट स्टेशन से मात्र कुछ ही दूरी पर पड़ता है और कबीर की जन्मस्थली  आज भी देख सकते हैं। कुछ लोगों का मानना हैं कि वे जन्म से मुसलमान थे। और अपनी युवावस्था में स्वामी रामानन्द के प्रभाव में आकर उन्हें हिन्दू धर्म का ज्ञान हुआ।

कबीर दास के माता-पिता कौन थे


कबीर की माता  पिता का नाम किसी को ज्ञात नहीं है।नीरू और नीमा नामक एक जुलाहे ने उन्हें लालनपालन किया था, इसलिए लोग उन्हें ही उनके माता पिता मानते हैं। कबीर दास जी का जन्म एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ था, लोकलाज के भय से उन्हें काशी के लहरतारा नामक तालाब में फेंक दिया गया था। वहाँ से नीरू और नीमा नाम के निःसंतान दंपत्ति ने उन्हें तालाब के पास से घर लाकर बचाया और उनका पालन-पोषण किया, इसलिए नीरू और नीमा को उनके माता-पिता के रूप में माना जाता है।

नीरू और नीमा के कबीर दास से क्या संबंध थे


     ऐसा सुनने में आता है कि नीरूऔर नीमा के कोई संतान नहीं थी और वे एक मात्र संतान के लिए बहुत लालायित रहते थे।एक दिन भोर में ही दोनों पतिपत्नी कहीं जा रहे थे तो उन्हें लहरतारा तालाब के किनारे पर किसी नवजात शिशु के रोने की आवाज सुनाई दी।आवाज को सुनते हुए तालाब के किनारे पहुँचे तो बेहया सदाबहार झाड़ियों के बीच एक नवजात शिशु को रोते देखा।शायद किसी महिला ने लोकलाज के भय से बच्चे को जन्म देकर झाड़ियों में फेंककर चली गई थी।नीमा ने अपने पति नीरू से कहा कि ईश्वर ने इसे शायद हमारे लिए ही भेजा है, इसलिये इस बच्चे को हम घर ले जाना चाहते हैं।हमारी कोई संतान भी नहीं है, इसलिये हम खूब मन लगाकर इसका पालन पोषण करेंगे।पत्नी की बात सुनकर नीरू भी राजी हो गये।देखते ही देखते वहाँ लोगों की भारी भीड़ इकट्ठा हो गई तब सबकी उपस्थिति में नीरूऔर नीमा ने सबके सामने बच्चे को अपने साथ ले जाकर उसे पालने की जिम्मेदारी स्वयं लेने की इच्छा जताई तो सभी लोग राजी हो गये।घर लाकर लोगों ने बच्चे का नाम कबीर रखा।
        बच्चे की परवरिश बहुत अच्छे से होने लगी।अब कबीर बड़े हो गये तो उनकी शादी कर दी गई।जिससे एक पुत्र का जन्म हुआ, घर में खुशहाली का आलम था।कबीर के बेटे का नाम कमाल रखा गया। कबीर के घर पर कपड़े बुनाई का काम होता था और जब भी कोई उनके पास आकर बैठ जाता तो कबीर काम छोड़कर बतियाने लगते थे।जिससे उनके माता पिता बहुत नाराज होजाते थे।लेकिन कबीर को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था।

कबीरदास जी की शिक्षा


    कबीर बेहद धार्मिक  स्वभाव वाले व्यक्ति थे और एक महान संत बन गये। उनकी शिक्षा किसी स्कूल या मदरसे में नहीं हो सकी।लोगों की संगत में रहते हुए जो कुछ सीखने को मिला वही सीखा।अपने प्रभावशाली परंपरा और संस्कृति से उन्हें विश्व प्रसिद्धि मिली। ऐसा माना जाता है कि अपने बचपन में उन्होंने अपनी सारी धार्मिक शिक्षा रामानंद नामक गुरु से ली। और एक दिन वो गुरु रामानंद के अच्छे शिष्य के रुप में जाने गये।

कबीर दास का वैवाहिक जीवन


      संत कबीरदास जी का विवाह लोई नाम की कन्या से हुआ था. विवाह के बाद कबीर और लोई को दो संतानें हुई, जिसमें एक लड़का व दूसरी लड़की. कबीर के लड़के का नाम कमाल तथा लड़की का नाम कमाली था.

कबीरदास जी के गुरु कौन थे


        कबीर दास जी को साधुसंतों की संगत बहुत पसंद थी।वे लोगों के पास बैठकर ज्ञान की बातें किया करते थे।जिसे सुनने के लिए लोग इनके पास आकर बैठ जाया करते थे।इन्होंने गुरु बनाने का मन बनाया तो सोचने लगे कि अपना गुरु किसे बनायें।उस समय रामानंद जी एक बहुत ही प्रसिद्ध वैष्णव भक्त के रूप में विख्यात थे।दूर दूर तक उनकी चर्चा थी।कबीर दास जी ने रामानंद जी को अपना गुरू बनाने की इच्छा लेकर उनके पास गये।उनसे दिक्षा लेने की इच्छा जताई तो रामानंद जी ने साफ इनकार कर दिया।कारण यह था कि कबीर का लालनपालन एक मुस्लिम समुदाय में हुआ था और रामानंद जी एक वैश्णव भक्त थे।बस इसीलिये वे कबीर को अपना शिष्य नहीं बनाना चाहते थे।

संत कबीर ने रामानंद जी को अपना गुरू कैसे बनाया

    जब रामानंद जी ने कबीर को अपना शिष्य बनाने से मना कर दिया तो कबीर लौट तो आये लेकिन उन्हें उनके जैसा महात्मा और भक्त कोई दूसरा नहीं दिखाई दिया।इसलिये कबीर ने भी निश्चय कर लिया कि वे गुरु बनायेंगे तो सिर्फ रामानंद को अन्यथा कोई दूसरे को नहीं।
    कबीर को पता था कि रामानंद जी प्रतिदिन सुबह तड़के ही काशी गंगा में स्नान करने जाते हैं।अतः एक दिन वे रात में ही गंगा घाट पर बनी सीड़ियों पर जाकर सो गये।भोर का समय था, साफ से अभी दिखाई भी नहीं पड़ रहा था कि रामानंद जी सीड़ियों से उतरते हुए गंगा में स्नान करने के लिए चले आ रहे थे।उनका पैर सीड़ियों पर लेटे हुए कबीर की छाती पर पड़ गये।तुरंत पैर को पीछे हटाते हुए बोले, "बच्चा ! रामराम कहो।"कबीर ने रामानंद जी के पाँव पकड़ लिए और कहे कि "अब तो आपने मुझे गुरुमंत्र दे ही दिया तो अब अपना शिष्य भी स्वीकार कर लीजिये।"
      रामानंद हतप्रभ रह गए।कबीर तूँ? तबसे कबीरजी कबीर दास कहलाने लगे।दिन - ब - दिन इनके शिष्य बढ़ते जा रहे थे।हिन्दू और मुसलमान दोनों संप्रदाय के लोग इनके शिष्य बन गये।

       कबीरदास जी की भाषा व प्रमुख रचनाएँ


       कबीर दास जी की भाषा व प्रमुख रचनाएँ सधुक्कड़ी एवं पंचमेल खिचड़ी हैं। इनकी भाषा में हिंदी भाषा की सभी बोलियों के शब्द सम्मिलित हैं।

      हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध कवि कबीरदास जी ने अपनी रचनाओं को बेहद सरल और आसान भाषा में लिखवाया करते थे।उन्होंने अपनी कृतियों में बेबाकी से धर्म, संस्कृति एवं जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी राय रखी है।

कबीरदास का भाव पक्ष
  कबीरदास(kabirdas) जी निर्गुण, निराकार ब्रह्म के उपासक थे । उनकी रचनाओं में राम शब्द का प्रयोग हुआ है । निर्गुण ईश्वर की आराधना करते हुए भी कबीरदास महान समाज सुधारक माने जाते है । इन्होंने हिन्दू और मुसलमान दोनों संप्रदाय के लोगों के कुरीतियों पर जमकर व्यंग किया।संत कबीर दास हिन्दी साहित्य के भक्ति काल के अंतर्गत ज्ञानमार्गी शाखा के कवि थे।

सधुक्कड़ी भाषा के कवि


     कबीर दास जी सांधु संतों की संगति में रहने के कारण उनकी भाषा में पंजाबी, फारसी, राजस्थानी, ब्रज, भोजपुरी तथा खड़ी बोली के शब्दों का प्रयोग किया है । इसलिए इनकी भाषा को साधुक्कड़ी तथा पंचमेल कहा जाता है । इनके काव्य में दोहा शैली तथा गेय पदों में पद शैली का प्रयोग हुआ है । इनकी रचनाओं में श्रृँगार, शांत तथा हास्य रस का भी प्रयोग देखने को मिलता है ।

कबीर दास का व्यक्तित्व


       कबीर परमात्मा को मित्र ,माता -पिता और पति के रूप में देखते थे । कबीर का जीवन सबके लिए था वे किसी जाति के या धर्म संप्रदाय विशेष के नहीं थे। वे अहिंसा,सत्य , सदाचार आदि गुणों के प्रशंसक थे । उनका सरल तथा साधु स्वभाव एवं संत प्रवृत्ति के कारण ही लोगों में उनका इतना आदर है ।

कबीर दास का साहित्यिक परिचय-

              कबीर सन्त कवि और समाज सुधारक थे। उनकी कविता का एक-एक शब्द पाखंडियों के पाखंडवाद और धर्म के नाम पर ढोंग व स्वार्थपूर्ति की निजी दुकानदारियों को ललकारता हुआ आया और सत्य भी ऐसा जो आज तक के परिवेश पर सवालिया निशान बन चोट भी करता है और खोट भी निकालता है।

कबीर जी की कविताएं-


       कबीर दास साहित्यिक दृष्टि से भक्तिकाल की निर्गुण शाखा जिसे “ज्ञानमर्गी उपशाखा” कहा जाता है जुडे रहे।  इनकी रचनाओं और गंभीर विचारों ने भक्तिकाल आंदोलन को गहरे स्तर तक प्रभावित किया था। इसके साथ ही उन्होंने उस समय समाज में फैली कुरीतियों, कर्मकांड, अंधविश्वास की निंदा की और सामाजिक बुराइयों की कड़ी आलोचना की। संत कबीर दास की रचनाओं के कुछ अंश सिक्खों के “आदि ग्रंथ” में भी सम्मिलित किए गए हैं। आइए जानते हैं संत कबीर दास का जीवन परिचय कैसा रहा।  

नामसंत कबीर दासजन्म स्थानवाराणसी, उत्तर प्रदेशपिता का नामनीरूमाता का नामनीमापत्नी का नामलोईसंतान कमाल (पुत्र), कमाली (पुत्री)शिक्षा निरक्षर मुख्य रचनाएं साखी, सबद, रमैनीकाल भक्तिकाल शाखा ज्ञानमर्गी उपशाखाभाषा अवधी, सुधक्कड़ी, पंचमेल खिचड़ी भाषा

कबीर दास का संक्षिप्त जीवन परिचय  

कबीर साहब का जन्म कब हुआ,

नीरू एवं नीमा नामक एक जुलाहा दंपति को यह नदी किनारे मिले और उन्होंने ही इनका पालन-पोषण किया। कबीर के गुरु का नाम ‘संत स्वामी रामानंद’ था। कबीर का विवाह ‘लोई’ नामक महिला से हुआ था जिससे इन्हें ‘कमाल’ एवं ‘कमाली’ के रूप में दो संतान प्राप्त हुई। अधिकांश विद्वानों के अनुसार संत कबीर का 1575 के आसपास मगहर में स्वर्गवास हुआ था। 

कबीर दास की साहित्यक रचनाएं 

कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे। उन्होंने अपनी वाणी से स्वयं ही कहा है “मसि कागद छूयो नहीं, कलम गयो नहिं हाथ।” जिससे ज्ञात होता है कि उन्होंने अपनी रचनाओं को नहीं लिखा। इसके पश्चात भी उनकी वाणी से कहे गए अनमोल वचनों के संग्रह रूप का कई प्रमुख ग्रंथो में उल्लेख मिलता है। ऐसा माना जाता है कि बाद में उनके शिष्यों ने उनके वचनो का संग्रह ‘बीजक’ में किया। 

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने भी स्पष्ट कहा है कि, “कविता करना कबीर का लक्ष्य नहीं था, उनका लक्ष्य तो लोकहित था।” 
  कबीर की कुछ प्रसिद्ध रचनाएं इस प्रकार हैं:-

साखी, शबद और रमैनी यही इनकी कृतियाँ हैं।जिसमें इसके उपदेशों को इनके शिष्यों के द्वारा लिखकर एकत्र किया गया।

  

संत कबीर दास जी को कई भाषाओं का ज्ञान था। वे साधु-संतों के साथ कई जगह भ्रमण पर जाते रहते थे। इसलिए उन्हें कई भाषाओं का ज्ञान हो गया था। इसके साथ ही कबीरदास अपने विचारों और अनुभवों को व्यक्त करने के लिए स्थानीय भाषा के शब्दों का इस्तेमाल करते थे। जिसे स्थानीय लोग उनकी वचनों को भली भांति समझ जाते थे। बता दें कि कबीर दास जी की भाषा को ‘सधुक्कड़ी’ भी कहा जाता है।

कबीर दास जी के प्रसिद्ध दोहे 

यहाँ संत कबीर दास जी के जीवन परिचय के साथ ही उनके कुछ लोकप्रिय अनमोल विचारों के बारे में भी बताया जा रहा है। जिन्हें आप नीचे दिए गए बिंदुओं में देख सकते हैं:-



• साधो, देखो जग बौराना

• सहज मिले अविनासी

• काहे री नलिनी तू कुमिलानी

• मन मस्त हुआ तब क्यों बोलै

• रहना नहिं देस बिराना है

• कबीर की साखियाँ

• हमन है इश्क मस्ताना

• कबीर के पद

कबीर दास के जीवन का अंत (मृत्यु)


     कबीर दास जी के जीवन का अंत यानी मृत्यु कैसे हुई और उनका अंतिम संस्कार कैसे हुआ ?आइये जानते हैं।कहा जाता है कि कबीर दास की मृत्यु मगहर में हुईथी जो कि उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर जिलांतर्गत आता है।उस समय एक भ्रांति फैली हुई थी कि काशी में मरने वालों को मोक्ष मिलता है और मगहर में मरनेवालों को नरक में भटकना पड़ता है।अंतिम समय में कबीर दास मगहर चले गए थे जहाँ उन्होंने शरीर का त्याग किया।

कबीर दास के जन्म से जुड़ी हुई एक कथा और भी है।


      कबीर दास के जन्म से लेकर मृत्यु तक की एक और कहानी सुनने को मिलती है,जिसका वर्णन कुछ इस प्रकार है।

देवी लक्ष्मी एवं भगवान विष्णु जी की कहानी से जुड़ी संतकबीर की जीवनगाथा




    ऐसा कहा जाता है कि एकबार माता लक्ष्मी जी ने भगवान विष्णु जी से कुछ विनोद स्वरूप वार्ता कर रही थीं।माता लक्ष्मी जी ने भगवान विष्णु जी कहा कि आपके भक्त तो चोर हैं।भगवान विष्णु थोड़ा मुस्कुराये,बोले कि "कोई सुबूत भी है या सिर्फ लांछन लगा रही हैं देवी."
   इसपर लक्ष्मी जी ने विनोद वश मुस्कुराते हुए कहा कि "हमने अपनी इन आँखों से देखा है और हमारे पास सुबूत भी है।बस आप मौका देकर तो देखिये।"
भगवान विष्णु जी ने कहा कि ठीक है,दिखाइये क्या सुबूत है आपके पास जरा हमभी तो देखें।
  
   कहा जाता है भगवान अपने भक्तों की हमेशा रक्षा करते रहते हैं।उनकी आन-बान-शान में कभी आँच नहीं आने देते।बस भक्त सच्चा हो।
लक्ष्मी जी को पता था कि रामानंदजी विष्णु जी के परमभक्त हैं और वे प्रतिदिन प्रातःकाल गंगा स्नान के लिए जाते हैं।अतः उन्होंने अपनी माया से तरह तरह के खिले हुए फूलों से सुशोभित एक सुंदर फुलवारी तैयार कर दिया और खुद फुलवारी में एक किनारे बैठ गईं।  रामानंद जी ने खिले हुए फूलों को देखकर सोचा कि क्यों न आज अपने भगवान को इन प्यारे प्यारे फूलों से उनका श्रृंगार और पूजन किया जाय।आज तो हमारा सौभाग्य लगता है कि इतने सुन्दर सुंदर पुष्प खिले हुए हैं।जैसे ही उन्होंने फूलों को तोड़ना शुरू किया, लक्ष्मी जी चिल्लाते हुए सामने आकर खड़ी हो गईं और कहीं कि आपने हमारी बगिया से इसतरह चोरीछिपे फूल क्यों तोड़ा।क्या कभी आपने भी इस खाद पानी इत्यादि दिया है? तुम तो बड़े चोर लगते हो और झूठ में यह साधू बने फिरते हो।
रामानंद लज्जित होकर सिर झुका कर खड़े रहे और तोड़ा गया फूल हाथों से छूटकर नीचे जमीन पर गिर गया।खुद को कोसने लगे कि आजतो सबेरे सबेरे ही बड़ी भारी भूल कर दी।अब क्या होगा।
भगवान विष्णु जी को पता चल गया कि आज तो उनके शिष्य पर संकट छा गया,कुछ तो करना चाहिए।
लक्ष्मी जी उस फूल को पृथ्वी पर से उठाकर अपने आँचल में छुपा कर भगवान विष्णु को दिखाने निकल पड़ीं।जब वे कुछ ही दूर आगे बढ़ीं तो आश्चर्य चकित हो गईं।आँचल में छुपाया हुआ फूल बालक का रूप धारण कर रोने लगा।ध्यान लगाया तो विष्णु जी की यह लीला समझ गईं कि वे कभी भी अपने भक्तों की निंदा नहीं सुन सकते।इसलिये उन्होंने मेरे साथ यह खेल रच दिया।
बस फिर क्या था,वे वहीं पास में लहरतारा नामक तालाब के किनारे झाड़ियों के बीच बालक को सुलाकर भगवान विष्णुजी के पास पहुंच गईं।
विष्णु भगवान बोले , " क्या हुआ देवी, कोई सुबूत मिला?लक्ष्मी जी ने बुरा सा मुँह बना कर आगे बढ़ गईं।
विष्णु जी ने लक्ष्मी को समझाया कि बेचारे नीरू और नीमा को एक बच्चा चाहिए था, किन्तु उनके भाग्य में इस जन्म में कोई बच्चा नहीं था।इसलिए मुझे यह लीला करनी पड़ी।इस बच्चे को हम नीरु और नीमा को देकर उन्हें बच्चे का सुख प्रदान करने वाले हैं।
कहा जाता है कि तभी भोर में नीरू और नीमा उसी रास्ते से होकर कहीं जा रहे थे और नवजात शिशु की आवाज सुनकर वे उसके पास गये और उसे घर लाकर उसका पालन पोषण करने लगे।उनका नाम कबीर रखा गया और बड़े होकर कबीर ने रामानंद जी को ही अपना गुरु बनाया।कहा जाता है कि जब कबीर दास जी की मृत्यु हुई तो मृत्यु के कुछ ही देर बाद चादर से ढकी हुई उनकी लाश (मृतशरीर) गायब हो गया था और उसके स्थान पर कुछ फूल रखे मिले।उसी फूल को ले जाकर उनके शिष्यों ने अपने अपने धर्म के अनुसार उनके अंतिम संस्कार किये थे।
  ये रही कबीरदासजी के जीवन से जुड़ी हुई एक अन्य कहानी। आपको कैसा लगा,कमेंट करके जरूर लिखियेगा।



कबीर दास जी के मृत्यु के संदर्भ में भी ऐसा कहा जाता है कि जब उनकी मृत्यु हुई तो उनके अंतिम संस्कार करने को लेकर उनके शिष्यों में विवाद उत्पन्न हो गया।हिन्दू शिष्य उन्हें फूँकने(जलाने)की जिद पर अड़े थे तो मुसलमान शिष्य उन्हें दफनाना चाह रहे थे।सामने लाश को एक चादर ओढ़ाकर रखा गया था।अचानक वहाँ कोई आया और लोगों से पूछा कि आपलोग इस तरह क्यों लड़ रहे हो और यह चादर ओढ़कर लेटा कौन है?लोगों ने बताया कि ये कबीर दास जी की लाश है और उन्हीं के अंतिम संस्कार करने को लेकर यह विवाद हो रहा है।अब आप ही बताइये कि इनका अंतिम संस्कार कैसे किया जाय।
उस व्यक्ति के समक्ष जब चादर हटायी गई तो कबीर दास जी की लाश गायब थी और उसके स्थान पर कुछ पुष्प पड़े थे,जिसे उस व्यक्ति ने दोनों संप्रदाय के लोगों में आधा आधा बाँट दिया।और लोगों ने अपने अपने धर्म के रीति रिवाजों के अनुसार उनका अंतिम संस्कार किया।

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