कहानी -- * दुल्हन एक रात की *
प्रथम भागबहुत समय पहले की बात है।एक नगर में एक बहुत ही सम्पन्न सेठ रहते थे।अपार धन दौलत, खेती बारी सब कुछ भगवान की कृपा से उनके पास था।किसी तरह की कोई परेशानी नहीं थी।घर धनधान्य से भरा पड़ा था।मध्यम दर्जे का उनका परिवार भी था।रुपये पैसों की कोई कमी नहीं थी।
मातृत्व
सेठ जी की शादी हुए कई साल बीत चुके थे लेकिन घर में बच्चों की किलकारी नहीं गूंजी थी।इधर उधर से जहाँ से भी कोई किसी अच्छे डाक्टर बताता, पत्नी को साथ लेकर दवाइलाज कराने के लिए वहां पहुंच जाते।लेकिन कहीं से कोई लाभ नहीं मिलता।उनकी पत्नी बार बार कोसती कि मैं कैसी अभागिन हूँ जो मेरी कभी कोख नहीं भर सकी।बेचारी को दिन रात यही चिंता खाये जा रही थी।
माँ बनना हर नारी की इच्छा होती है
हर महिला की यह इच्छा होती है कि उसकी शादी किसी अच्छे घर में हो,अच्छा परिवार मिले,वह अपने बच्चों की मां बने,फिर उनके भी शादी ब्याह करने के बाद सुहागिन ही पति के रहते उसका देहांत हो,यानि कि औरत अगर मरना भी चाहती हैं तो पति की आँखों के सामने।ताकि उनकी अर्थी भी उठे तो पति के कंधों पर शमशान तक उनका साथ हो।वाह रे हमारे भारत की नारी। उसके पति के हाथों ही उसका अंतिम संस्कार भी हो।ऐसी ही हर स्त्री की कामना होती है।
ठीक उसी तरह से इस सेठानी ने भी मन में ऐसे ही विचार पाले हुए थी।बेचारी को अपनी सूनी गोद के कारण सभी घर के सुख होते हुए भी यह जिन्दगी रास नहीं आती थी।गहनें, कपड़े,वस्त्र आभूषण सभी मानों काँटे की तरह चूभने लगे थे।रातरात भर नींद नहीं आती थी, बेचारी जाग जागकर रातें बिता रही थी।
समय बीतता गया।जिसने जहाँ बताया, एक बच्चे की चाहत उसे वहीं भेज देती।पति पत्नी दोनों को सभी सुख सुविधा होते हुए भी वे सुखी नहीं थे।
एक संतान के लिए क्या क्या लोग कर जाते हैं
भगवान विष्णु जी महाराज अपनी पत्नी देवी लक्ष्मी जी से बताते हैं कि हे देवी, औरों को अपार धनसम्पत्ति, कोठी बंगला,गाड़ी, जवाहरात से भरपूर जब लोग देखते हैं ना, तो अपने को बहुत कोसते हैं कि आखिर हमनें क्या बिगाड़ा था कि भगवान ने हमें गरीब बना दिया।देखो न , वे कितने धनी और सम्पन्न लोग हैं।नौकर चाकर सब कुछ उनके पास है, लेकिन इन सबके बावजूद वे कितने सुखी हैं, शायद किसी को यह नहीं दिखता है।यह दुनियां तो अंधीऔर बहरी है देवी।
भगवान विष्णुजी बताते हैं कि धन-सम्पदा भरपूर मात्रा में उपलब्ध होने के बावजूद भी क्या लोग सुखी रहते हैं?कभी नहीं देवी।आप बस देखते जाओ..।धीरे धीरे सब समझ जायेंगी।
अब उस सेठ के पास चलते हैं, जहाँ पर हमनें कथा को विश्राम दिया था।जैसे ही किसी उत्तम हकीम, वैद्य, डाक्टर, झाड़-फूँक वाले ओझा-सोखा आदि के बारे में कहीं से भी जानकारी मिलती, दोनों लोग पतिपत्नी उनके पास पहुंच जाते।मिन्नतें करते, मुँहमाँगी रकम देने का वादा भी कर आते ।उनकी इच्छा थी कि किसी तरह से पत्नी गर्भवती हो जाय और उनके कुल के दीपक का जन्म हो जाय।क्योंकि संतान के न होने से यह सारी सम्पत्ति का वारिस कोई नहीं रहेगा तो यह सभी प्रकार के सुखसाधन का क्या होगा।बस यही सोच उन्हें दिन राते खाये जा रही थी।चिंता में रातरात भर उन्हें नींद भी नहीं आती थी।स्वास्थ्य गिरने लगा।
संतान नहीं तो संपत्तियों का क्या करना
भगवान विष्णुजी कहते हैं कि देखा देवी, सब सुखसाधन सम्पन्न होने के बावजूद भी उनके सारे सुखचैन गायब हो चुके थे।इसलिए हम तो यही कहते हैं कि चाहे कोई कितना भी अमीर क्यों न हो जाय;लेकिन सुख शांति और प्रेम दौलत से प्राप्त नहीं किया जा सकता।आखिर सेठ के पास तो सबकुछ हमनें दिया है फिर भी वह प्रसन्न क्यों नहीं है।आखिर हमनें तो सिर्फ उसकी शांति ही तो उसे नहीं दिया है ना।क्या करेगा उस संतान की जो उसकी है ही नहीं।जिस सम्पत्ति की लोग कामना करते हैं देवी, वो सब तो मैंने उसे दे दी है।फिर भी उसके मन की तृप्ति नहीं हो पा रही है।कहीं से भी खरीद ले अपना पुत्र..मन की शांति.. लेकिन जो उसका नहीं है वो उसे कैसे भोग पायेगा।
तब देवी लक्ष्मी जी ने भगवान विष्णु जी से निवेदन किया कि हे प्रभु, क्या सचमुच उसके भाग्य में पुत्र रत्न नहीं लिखा है आपने?
भगवान बोले, "क्यों नहीं!"
लक्ष्मी जी ने कहा कि फिर उन्हें संतान सुख के लिए इतना क्यों तड़पा रहे हैं, स्वामी?
संतान सुख
विष्णु जी ने कहा कि समय समय पर लोगों को याद दिलाने के लिए कभी कभी मुझे कुछ ऐसा करना पड़ता है।
तो चलिये अब उसकी अभिलाषा पूर्ण कर दीजिये।बेचारी की कोख भर दो स्वामी।एक नारी अपने पिता का घरबार छोड़कर पराये मर्द के साथ अपनी जिंदगी बीताने केलिए अपने माता - पिता, भाई - बहन,सखीसहेलियाँ सबको छोड़ आती हैं।फिर भी ससुराल में अगर पति का प्यार न मिले,सास ननद का स्नेह न प्राप्त हो और पति के वंश को आगे बढ़ाने के लिए वह संतान को जन्म न दे सके तो उसका जीवन तो नरक से बुरा होता है स्वामी।
सूनी गोंद में जब उसके बच्चों की किलकारी नहीं गूँजे तो वह अभागिन नारी अधूरी रह जाती है।नारी तो ममता की मूरत होती हैं जिसके आँचल में दूध और आँखों में पानी बहता है।
भगवान विष्णु जी मुस्कुराये,बोले- "ठीक है देवी,जल्द ही मैं उसे पुत्र रत्न से उसकी गोद भरने वाला हूँ।"
जब मन्नतें पूरी हुईं
कुछ महीने बाद सेठ की धर्मपत्नी गर्भवती हो जाती हैं और समय पूर्ण होने पर उन्हें एक बहुत ही सुंदर पुत्र प्राप्त होता है।पुत्र के जन्म लेने से पूरा परिवार बहुत खुश होता है।घर में पूजा पाठ होता है।लोगों को भोजन कराने का आयोजन किया जाता है।बहुत खुशी का माहौल होता है।समय बीतता है और बच्चा जैसे ही चारपाँच साल का होता है, उसकी एकआँख की रोशनी चली जाती है।घर से दूर पढ़ाई लिखाई के लिए बच्चे को बाहर भेज दिया जाता है।समय बीतता है और जब वह विवाह के योग्य हो जाता है तो उसके विवाह के लिए लोग रिश्ते लेकर आने लगते हैं।इसी बीच कहीं से बढ़ियां एक रिश्ता आता है लेकिन उन्हें ये नहीं मालूम होता है कि जिस लड़के के विवाह के लिए लोग रिश्ता लेकर आये हुए हैं उसमें एक कमी है।उसकी एक आँख ही गायब है।लेकिन जब लड़का देखने की बात आती है तो लोग एक पास का ही एक दूसरा लड़का दिखाकर विवाह का दिन पक्का कर देते हैं।
मँगनी का दूल्हा
संयोग से वह दूसरा लड़का भी बहुत सुन्दर था लेकिन वह निहायत गरीब परिवार का था।बचपन में ही उसके पिता का स्वर्गवास हो चुका था और माता इनके उनके घर में चूल्हा चौका करते हुए अपने बच्चे की परवरिश कर रही थी।सेठजी ने उसलड़के की मां से बात की।
"देखो,वैसे तो तुम्हारे लड़के में भी कोई कमी तो नहीं है।देखने में सुन्दर भी है तो क्यों न उसे हम सजा सँवार कर अपने लड़के के बजाय उसे दुल्हे कीतरह बना दें।फिर जब विवाह हो जायेगा तो कुछ रुपये पैसे भी तुम्हें दे देंगे।जिससे कुछ तुम्हारी मदद भी हो जायेगी और हमारा भी काम बन जायेगा।"
वह गरीब महिला स्तब्ध रह गई।वह कुछ बोलती, तबतक वह सेठ बोल पड़ा।अरे इतना सोचती क्या हो?कहाँ उन लोगों ने सही से हमारे लड़के को देखा है और फिर एक ही रात की तो बात है।हमनें तो तुम पर तरस खाकर कह दिया कि तुम काफी गरीब हो।कम से कम इसी बहाने से तुम्हारी कुछ मदद हो जायेगी।अन्यथा गाँव में बहुत से सुन्दर सुन्दर लड़के हैं।
हमतो तुम्हारी कुछ मदद करना चाह रहे थे।
बेचारी गरीब महिला क्या करे।तैयार हो गई।जबकि उसे यह समझने में जरा भी देर नहीं लगी कि अगर उसका बेटा दुल्हा बन जायेगा तो उस दुल्हन बनी लड़की के साथ काफी अन्याय होने वाला है।लेकिन भाग्य के लेख को कौन बदल सकता है।गरीबी क्या न करादे।और इस जमाने में यह कोई पहली बार तो ऐसा हो तो रहा नहीं।बहुत से लोग लड़का दूसरा दिखाकर शादी तय करलेते और बारात में दुल्हा बदल लेते।ठीक वैसा ही कुछ लड़की वाले भी कर देते थे।लड़की कोई और दिखाकर शादी तय हो जाती और जब बारात आती तो मंडप में दुल्हन बदल जाती थी।
दुल्हन को खूब ढाँककर मंडप में लाया जाता।पूरी रश्मदायगी हो जाती लेकिन मजाल क्या कि कोई लड़की का हाथ पैर भी देख सके।चेहरा और शक्ल सूरत देखपाना तो दूर की बात थी।
अब उस गरीब विधवा के बेटे को अच्छे अच्छे कपड़े सिलवाया गया।उसके अच्छे से बालों की कटिंग कराया गया और शादी के दिन उसे दूल्हे की पोशाक पहना कर दूल्हा बना दिया गया।
उस भाड़े के दूल्हे को खूब अच्छे से हिदायत दे दी गई कि कहीं तुम्हें अपने इस झूठी शादी की बात को किसी से जाहिर नहीं करना है।किसी को भी पता नहीं चलना चाहिए कि तुम दूसरे के बदले में दुल्हा बने हो।बस सिंदूरदान तक हो जाय बस फिर हमलोग सब सम्हाल लेंगे।जैसे ही विवाह सम्पन्न हो जाता है फिर तुम्हारी छुट्टी हो जायेगी।उसके पहले तुम्हें बहुत ही शालीनता से रहना होगा।
बारात चल पड़ी।लेकिन वह भाड़े का गरीब दूल्हा मन में भय और संकोच के कारण अंदर से काफी डराडरा सा था।उसे बारबार यह भय लग रहा था कि कहीं किसी ने पहचान लिया तो क्या होगा?लोग मारने न लगें। आखिर वह गरीब जो ठहरा।वहां तो उसकी मां भी नहीं रहेंगी और पिता तो पहले ही इस दुनियां से जा चुके थे।अगर कहीं कुछ गड़बड़ हुई तो उसका साथ कौन देगा?उसका तो वहाँ कोई न होगा।दिल की धड़कने बढ़ती जा रही थीं।बारात निकल चुकी थी।उधर सेठ के मन में भी काफी असमंजस बना हुआ था।कि कहीं लड़के की पोल न खुल जाय।कोई वहाँ पहुँचकर सच्चाई को बता न दे,कि दुल्हा बदल दिया गया है।मन में शंका तो जाहिर थी।
"अब आगे का सुनो देवी।"भगवान विष्णु जी देवी लक्ष्मी को बहुत ही सरलतापूर्वक कथा सुनाते जा रहे थे।लक्ष्मी जी भी गंभीर होकर बहुत ही ध्यान पूर्वक कथा सुन रही थीं।
लक्ष्मी जी ने पूछा, "तो क्या किसी ने उन्हें पहचान लिया था स्वामी या शादी उस मंगनी के दूल्हे के साथ ही संपन्न हो गई?"
"सुनो तो सही।सब विस्तार से सुनाउँगा।"विष्णु जी ने कहा।
जब बारात लड़की के गांव पहुंची तो नकली भाड़े का दुल्हाकिसी तरह से अपने को काबू में किये बैठा हुआ था।लोगों ने देखा कि दुल्हा कुछ घबराया हुआ लगता है तो लोगों ने हिम्मत बढ़ाया। बारात दरवाजे पर पहुंच गई और परछावन होने की बारी आई तो गांव घर की महिलाएं गंगलगीत गाते हुए दूल्हे को देख रही थीं।
"बड़ा सुन्दर दूल्हा मिला है।बड़ी भाग्यशाली है दूल्हन।"महिलाएं आपस में चर्चा करते हुए दूल्हे को निहारते नहीं अघा रही थीं।
कुछ महिलाओं ने मंगल गीत गाना शुरू किया तो गाये जा रही थीं।
"एमबीबीएस लड़की के मिलल दुलहा चरवाहा रे।
माई गोबरपथनी आ बपवा निपता रे।।"
बस फिर क्या, इतना गीत सुनते ही उस मंगनी के दूल्हे को तो मानों जोर का झटका लगा हो।सोचने लगा कि लगता है कि किसी ने शायद जाकर उन लोगों को मेरे बारे में सबकुछ बता दिया है क्या।लगता है कि ये लोग मुझे पहचान गए लगते हैं।अब क्या होगा भगवान।आप बचा लो मुझे।भला इसमें मेरी क्या गलती रही।अगर ये लोग मुझे सच में पहचान लिए हैं तो बहुत गड़बड़ हो सकता है।
बगल में खड़े बारात में आये लोगों ने जब देखा कि दूल्हा तो घबराया हुआ लगता है तो उन्होंने धीरे से कान के पास मुँह करके पूछा कि क्या बात है?तबीयत तो ठीक है न?इतना घबराहट क्यों हो रही है?
तब उसने धीरे से फुसफुसा कर कहा कि आप सुन रहे हैं कि वे क्या कह रही हैं।
तब लोगों ने ढाँढस बढ़ाया।कि शादी ब्याह में ऐसे गीत गाने का प्रचलन है और इससे भी भद्दे भद्दे गीत अभी सुनने को मिलेंगे।बिल्कुल घबराने की कोई जरूरत नहीं है।
बेचारे को किसी तरह से हिम्मत मिली।
द्वाराचार रश्मदायगी सम्पन्न हो गई।लोगों को जलपान इत्यादि कराया गया।
कुछ समय पश्चात विवाह के लिए मंडप (माड़ो)में चलने का बुलावा आया तो कुछ खास रिश्तेदारों को साथ लेकर सेठ दुल्हे के साथ माड़ो में आकर बैठ गए।ब्राह्मण देवता पहले से मंडप में बैठे हुए थे।लड़की को खूब सजाकर दुल्हन बनाया गया था।सो दुल्हन भी आकर मंडप में बैठ गई।
गौरीगणेश का पूजन करने के पश्चात विवाह की एक एक रश्में सम्पन्न होती गई।
जब सिंदूरदान का वक्त आया तो नकली भाड़े का जो दूल्हा बना हुआ था सिर्फ एक रात के लिए तो वह कुछ झिझका।सोचने लगा कि अगर उसने यह सिंदूरदान भी कर दिया तो यह बेचारी दूल्हन तो सचमुच की उसकी धर्म पत्नी हो जायेगी।वह उसका पति।बस इसी सोच में वह सिंदूर नहीं डालना चाहता था।बारबार उस लड़के के पिता की ओर देखे जा रहा था कि वे कुछ बोलें तो .।इधर ब्राह्मण देवता बार बार सिंदूर पहनाने को बोले जा रहे थे।बात समझ में नहीं आ रही थी कि करें तो क्या करें।
सिंदूर पहनायें या नहीं, या कि बता दें कि हम यह सिंदूरदान नहीं कर सकते।
इसलिए सेठजी की ओर नजरें टिकी थीं।लोग समझ नहीं पा रहे थे कि आखिर दूल्हे को हो क्या गया, जो सिंदूर पहनाने में हिचक रहा है।कहीं कुछ दान दहेज की बात तो नहीं है जिसके कारण दूल्हा सिंदूर नहीं पहना रहा है। खुसरफुसर होते देख सेठने मंगनी के दुल्हे को सिंदूर पहनाने को भी कह दिया।
हाँ हाँ बेटे, सिंदूरदान करो ना।क्या. क् .क्या सोच रहे हो.. हम हैं ना।सिंदूरदान करो।
अब असमंजस में फँसा हुआ बेचारे गरीब मंगनी के दूल्हे ने काँपते हाथों से कन्या की मांग को सिंदूर से भर दिया।
विवाह संपन्न हो गया।
विवाह हो जाने के बाद लोगों ने समधी आदि बरातियों को मंडप से बाहर भेजकर सिर्फ दूल्हे को माड़ो में कुछ विशेष रश्म के लिए रोक लिया। उसके बाद दूल्हे को कोहबर की रश्म करनी थी,इसलिए दूल्हा कोहबर में चला जाता है।दूल्हा जब कोहबर में था तभी एक एक करके सभी लड़कियाँ, सहेलियाँ आदि जो भी अंदर मौजूद थीं, सभी निकल कर दिया बाहर चली गईं।और सिर्फ दूल्हा-दूल्हन ही अंदर बचे रह गए।
कुछ देर दोनों शांत मौन पड़े रहे।लेकिन फिर भी जब दूल्हे ने कोई हरकत नहीं की तो दूल्हन ने चुप्पी तोड़ी।
"क्या हुआ, आप इतने उदास क्यों हैं,क्या कुछ लेनदेन में कमी रह गई या हम आपको पसंद नहीं आये जो आप इसतरह से एकदम मुँह लटकाये और उदास लग रहे हैं।आखिर बात क्या है?कुछ बोलते क्यों नहीं?"दूल्हन ने दूल्हे को हाथ से स्पर्श करते हुए पूछने लगी।
दूल्हन की बात सुनकर नकली दूल्हे ने किसी तरह से हिम्मत जुटाकर पहले दूल्हन की ओर ध्यान से देखा तो देखते रह गया। गजब की खूबसूरत और नेक दिल औरत और ममता की कोई मूरत।वह दूल्हा अब सोचने लगा कि मैंने तो इसकी माँग में सिंदूर भरा है उस हिसाब से तो यह मेरी पत्नी हुई।लेकिन कल जब इसकी विदायी हो जायेगी तो यह हमारे घर न जाकर उस सेठ के घर चली जायेगी।और जब इसे वास्तविकता का पता चलेगा तो बेचारी के दिल पर क्या बीतेगी । मैं तो इसके लिए एक दलाल बनकर रह जाऊँगा।यह औरत तब मेरे बारे में क्या सोचेगी।और अभी तो आधी रात बाकी है।अगर मैं इसके साथ कुछ गलत करता हूँ तो मैं दोषी हो जाऊँगा।क्योंकि इसका विवाह तो मेरे साथ सिर्फ एक समझौता हुआ है,मेरे साथ तो यह सिर्फ दिखाने के लिए सादी है, और मुझे उसके लिए कुछ कीमत लोगों ने चुकाया है।
तो क्या अब मुझे सारी सच्चाई इसे बता देना चाहिए.....?
कहानी का शेष भाग अगले अंक में.
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