आखिर क्यों बहुजन समाज पार्टी का जनाधार खिसकता जा रहा है?
क्या बहुजन समाज पार्टी अपनी नीतियों से भटकती जा रही है?
आखिर क्यों इसका जनाधार खिसकता जा रहा है? एक बड़ा सवाल..
बसपा के संस्थापक माननीय कांशीराम
बसपा संस्थापक कांशीराम ने अस्सी के दशक में दलित समुदाय के बीच ऐसी राजनीतिक चेतना जगाई कि यूपी में राजनीतिक भूचाल आ गया और बसपा की 4 बार सरकार बनी और बहनजी के नाम से जानीजाने वाली तेजतर्रार शिक्षित महिला नेता सुश्री मायावती मुख्यमंत्री रहीं। गली मुहल्लों में छोटे छोटे बच्चों के हाथ में झंडा पकड़ा कर उनके साथ चलते हुए नारेबाजी करने का जो सिलसिला शुरू किया गया और जो नारा दिया गया वो यह था--चढ़ दुश्मन की छाती पर, मुहर लगेगी हाथी पर।
बहुजन समाज पार्टी समाज पार्टी के उत्साही कार्यकर्ता पार्टी का सिंबल बांटते रहते हैं लोगों में। और बच्चे इनके नारे लगाते रहते हैं। चाहे समझ आये ना आये. हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा, विष्णु महेश है। बचपन में भी मुझे भी समझ नहीं आता था पर अच्छा लगता था। क्योंकि हाथी बड़ा प्यारा सिंबल लगता था। वो भी ब्लू हाथी।
पर हाथी ही क्यों है बसपा का सिंबल? यह तो सोचने वाली बात थी।बहुत सोच समझकर बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक श्रीकांशीराम जी ने इलेक्शन कमीशन से हाथी ही क्यों मांगा था चुनाव चिन्ह के लिए? इसकी कई वजहें थीं- 1.कांशीराम जाति-प्रथा में नीचे के लोगों को बहुजन कहते थे। क्योंकि इनकी आबादी बाकी जातियों से ज्यादा थी. फिर ये दलित कहे जाने के खिलाफ भी था। क्योंकि दलित कहने से किसी की मानसिक मजबूती कैसे बढ़ेगी? तो कांशीराम मानते थे कि बहुजन समाज एक हाथी की तरह है। विशालकाय,हाड़-तोड़ मेहनत करने वाला, बेहद मजबूत। बस इसको अपनी ताकत की समझ नहीं है,इसीलिए ऊपरी जातियों के लोग कमजोर होने के बावजूद महावत की तरह कंट्रोल करते हैं।
2.इसके अलावा हाथी का बौद्ध धर्म से भी रिश्ता है। इस धर्म को भीमराव अंबेडकर ने अपने मरने से कुछ समय पहले अपना लिया था। बुद्ध की जातक कथाओं में हाथी का जिक्र है।गौतम बुद्ध की मां महामाया ने सपना देखा था कि एक सफेद हाथी अपनी सूंड उठाये कमल का फूल लिये हुए उनके गर्भ में आ रहा है।एक संत ने इसका मतलब बताया था कि लड़्का पैदा होगा और बहुत महान बनेगा। 3.फिर भीमराव अंबेडकर ने जब अपनी पार्टी बनाई तो हाथी को ही सिंबल के तौर पर लिया था।कांशीराम को अंबेडकर की राजनीति का उत्तराधिकारी माना जाता था. तो ये एक सम्मान का भी प्रतीक था. साथ ही प्रथा को कायम रखने का भी जरिया था।
4.हिमाचल प्रदेश, पंजाब, बिहार राज्यों में बहुत सारे बहुजन हाथी को देवताओं की सवारी भी मानते हैं। यहां तक तो आधुनिकता पहुंची नहीं थी, ऐसे में अपनी चीजों को बड़े स्तर पर देखना कांफिडेंस देता। कांशीराम उस वक्त बहुजन समाज को जोड़ रहे थे। उस समाज में ज्यादा लोग पढ़े-लिखे नहीं थे उस वक्त।हालांकि अब वो बात नहीं है. बहुत पढ़ते हैं।
उस वक्त लोगों को एक झंडे के नीचे लाने के लिए किसी सिंबल की जरूरत थी जिसे लोग आसानी से समझ सकें। और खुद को जुड़ा हुआ महसूस कर सकें। क्योंकि उस वक्त तक बहुजन समाज के ज्यादातर वोट कांग्रेस को ही जाते थे। क्योंकि कांग्रेस को बहुत दिन से लोग जानते थे। समझ नहीं थी कि किसको वोट करना है। एक अबूझ सी लॉयल्टी थी, जो नफे-नुकसान से परे थी. ऐसे में उनको तोड़ के लाना और भरोसा दिलाना कि हम अच्छा करेंगे, बड़ा मुश्किल था। कई सारे प्रतीक खोजे गये।सबको एक बनाने के लिये।तो हाथी बड़ा काम का सिद्ध हुआ।फिर इस को ले के बड़ प्यारे और जबान पर चढ़ने वाले नारे भी बन गये।
जब बसपा का जनाधार बढ़ता ही जा रहा था
यूपी से सटे बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, राजस्थान, पंजाब, छत्तीसगढ़ में भी बसपा अपनी जड़ें जमाने में मजबूती के साथ सफलता हासिल करने में जुटी रही। यूपी की तरह देश के दूसरे राज्यों मेंभले ही बसपा की सरकार कभी न बनी हो, लेकिन विधायक और सांसद जीतते रहे हैं।क्योंकि अबतक बसपा एक मजबूत पार्टी बन चुकी थी।इसके साथ एक वर्ग विशेष के सभी लोग जो दलित समुदाय से आते थे, एक जुट हो गये और बाबा साहब भीमराव अंबेडकर के नारे लगाते हुए अपनी जाति के सभी घरों को इस पार्टी ने ऐसे इकट्ठे करके जोड़ लिया कि वे किसी के बहकावे में कभी नहीं आ सकते थे।अब उन्हीं वोटबैंको के आधार पर इसके टिकट पाने के लिए अन्य जातियों के बाहरी नेता इसपार्टी से चुनाव लड़ने के लिए बेचैन होने लगे।जिसे चुनाव में उतारा जाता चाहे वो कोई भी क्यों न, उसका कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि भी न हो, लेकिन अगर उसने बसपा से टिकट प्राप्त कर लिया तो उसे तमाम दलित वोट समझो उसको मिल गया।बाकी लोग भी जातियों के वोट अगर खींचने में कामयाब होते तो जीत पक्की हो जाती थी।
दलित समुदाय का वोट बैंक भी बसपा से छिटका
यूपी में तो बसपा ने अपने पैर जमा लिए थे और काफी मजबूती से उत्तर प्रदेश में उसने अपनी सरकार भी चलाया।यूपी के बाद बहुजन समाज पार्टी नेअपनी मजबूत बनाने पकड़ बनाते बनाते
मध्य प्रदेश में तो एक समय बसपा का 15 फीसदी से ज्यादा वोट हो गया था। और राजस्थान में भी तीसरी ताकत बनकर खड़ी हो गई थीं।अब सन् 2007 में बसपा यूपी में अपने दम पर पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाने में कामयाब रही, लेकिन उसके बाद से दलित समुदाय ने बसपा से मुंह मोड़ा तो वो लगातार जारी है। बसपा दिन ब दिन और चुनाव दर चुनाव कमजोर होती जा रही है।दलित समुदाय का वोट बैंक भी बसपा से लगातार छिटकता जा रहा है और लगातार दूर हो रहा है। यह स्थिति बसपा की सिर्फ उत्तर प्रदेश में ही नहीं बल्कि देश भर के राज्यों में हुई है।
आखिर कैसे बसपा हुई इतनी कमजोर?
दरअसल, कांशीराम के निधन के बाद से दलित और पिछड़ी जातियों का बसपा से लगातार मोहभंग होता चला गया। कांशीराम ने डीएस-फोर के दौर से ही तमाम दलित एवं अति पिछड़ी जातियों को गोलबंद करके बसपा का गठन किया था। उन्होंने हाशिए पर जातियों में लीडरशिप पैदा कर उन्हें सियासत में लाए।मायावती के हाथों में बसपा की कमान आने के बाद पार्टी ने 2007 में अपने उरूज को छुआ, लेकिन जातीय क्षत्रपों के धीरे-धीरे बसपा से निकलने और निकाले जाने के बाद पार्टी कमजोर होती चली गई।
बसपा के छिटपुट विधायक कई राज्यों में जीत हासिल करते रहे हैं, लेकिन बसपा कभी किसी सरकार में शामिल नहीं हुई।
हाल कुछ ऐसा रहा
जब काशी राम जी ने अपनी पार्टी बनाया तो उन्होंने सबसे पहले दलितों और अल्प संख्यक कहे जाने वाले मुसलमानों को एक मंच दिया तथा कुछ पिछड़ी जातियों के भी अपने साथ लाकर पार्टी खड़ी कर लिया।तब उसका नाम रखा * डी.एस.4* जिसने अपना सर्वप्रथम नारा दिया था कि
तिलक तराजू और तलवार,
इनको मारो जूते चार ।
यही डीयस फोर बाद में बहुजन समाज पार्टी हो गई और उसके चर्चा का बाजार गर्म हो गया।इसनेअपनी ऐसी छवि बना लिया कि बड़ेबड़े दल इससे घबराने लगे थे।इस पार्टी का टिकट लेकर चुनाव में उतरने के लिए लोग आपस में खीचतान करने लगे ।कारण साफ था कि अगर जो इस पार्टी का झंडा लेकर मैदान में उतार दिया जाता तो दलितों में खासकर चमार जाति का सम्पूर्ण वोट उसको मिल जाने की गारंटी रहती थी और बाकी तो लोग इधर उधर से अगर खींच लेते तो जीत भी हो जाती थी।अक्सर सुनने में आता रहा कि चुनाव लड़ने के लिए जो लोग टिकट की आशा में रहते, मायावती जी के जन्मदिन पर मुबारकबाद देने के लिए भारी गिफ्ट्स भेजकर अपने ऊपर उनकी कृपा दृष्टि ललचाई आँखों से देखते रहते।
दलितों को सिर्फ मतदाता ही समझने की सबसे बड़ी भूल
बहुजन समाज पार्टी उत्तर प्रदेश में उस ऊँचाई पर पहुंच चुकी थी जहाँ से पूरे देश की राजनीति शुरू किया जाता है।धीरे धीरे इसने यूपी के बाहर भी अपने प्रत्याशी उतारने लगे।लेकिन कांशीराम जी निधन हो जाने के बाद धीरे धीरे यह पार्टी बिखरने लगी। अल्पसंख्यकों का जो मुस्लिम समुदाय था वो कभी सपा की ओर तो कभी बसपा की ओर लुढ़कने लगा।दोनों पार्टियों ने मुस्लिम समुदाय को अपने साथ जोड़ने के लिए अलग अलग
राग अलापने लगे । जब अयोध्या में श्री राम मंदिर का मुद्दा गरमाया तो भाजपा के शासनकाल में जब विवादित ढाँचा गिराये जाने की खबर फैली तो उस समय केन्द्र में रक्षामंत्री के पद पर रहते हुए सपा प्रमुख माननीय मुलायम सिंह यादव जी ने मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति का सहारा लेकर रामभक्त कारसेवकों पर खूब गोलियां चलवाने का जो दुस्साहस कर दिया उससे भारी संख्या में हिन्दुओं का नरसंहार किया गया।और भाजपा सरकार को इस्तीफा देना पड़ गया।इतनी बड़ी जनकुर्बानी देने के बाद मुसलमानों ने सपा में ही अपनी मजबूत स्थिति को देखने लगे और जुड़ते गये।यहां तक कि मुसलमानों को खुश रखने के लिए नेताजी ने बकायदा मुस्लिम टोपी पहने ईद की नमाज पढ़ते इनके खूब फोटो भी वायरल हुए।नेताजी को कुछ लोग इनके नाम के आगे मुल्ला भी एक शब्द जोड़ने लगे थे। कहीं पर कुछ मुस्लिम सपा खेमे में तो कहीं मुसलमान बसपा के झंडे के नीचे अपनी अपनी जमीन तलाश लेते थे।तबतक सब कुछ ठीक ठाक ही था।
बसपा सुप्रीमो ने दलितों को कभी प्रत्याशी बनाने पर बल नहीं दिया
बसपा सुप्रीमो जीतने के लिए तरह तरह के हथकंडे अपनाने से कभी नहीं चूकी।हमेशा टिकट को लेकर चंदा में विश्वास किया और खुद तो मालामाल होती चली गईं।मुसलमानों, यादवों ,पंडितों, कुर्मियों, भूमिहारों आदि पिछड़ी या सामान्य जातियों के इन्होंने अपनी पारी खेलनी शुरू किया तो दलितों को सिर्फ अपने घर
का वोटर समझा। हाथी झंडा निशानऔर नीला झंडा देखकर दलित खुश हो जा रहे थे।और आँखें बंदकर बीएसपी को अपने वोट देते रहे।हाँ इतना जरूर था,इस दौरान हर थाने और हर विभाग को चौकन्ना कर दिया गया कि हमारे शासन काल में दलितों का उत्पीड़न बर्दाश्त नहीं किया जायेगा।जो भी अधिकारी अपनी मनमानी से काम के प्रति लापरवाही बरतने की कोशिश करता, उसे उसकी सजा अवश्य मिलती।एक तरह से सुशासन चलता नजर आ रहा था।अधिकारियों की मनमानी नहीं चलती थी।जरा सी भृकुटि टेढ़ी हुई, अधिकारी, कर्मचारी सस्पेंड।जाओ घर बैठो , फिर बड़ी मनौव्वल के बाद बेचारे बहाल किये जाते।हर दलित बस्ती को अम्बेडकर गांव बनाकर उसे अतिरिक्त सुविधाएं देकर नाली, खडंजा, शौचालय ,पक्की सड़क आदि से जोड़कर उन्हें खुश करने की कोशिश की गयीं बहुजन समाज की सरकार में।ये सारी सुविधाएं मिलने के बाद भी हरिजन बस्ती उसी अनुरूप रही जैसी पहले थी।क्योंकि जिसे जैसे परिवेश में रहने की आदत थी वो उससे आगे नहीं निकल सके।शौचालय बने लेकिन यूजलेस मानों सिर्फ पैसे भुगतान के लिए।नालियों और खडंजे का भी वही हाल।कब बने और कब समाप्त हो गया किसी को पता ही नहीं चला। अब जबकि बहुजन समाज पार्टी सत्ता में नहीं होती तो दलितों का खूब शोषण करने की कोशिशें जारी हो जाती थीं।इसी तरह उतार चढ़ाव होता रहा।बसपा के साथ जो दलितों का वोट बैंक था अब कुछ लोगों ने इसमें सेंधमारी करनी शुरू कर दिया।वे अभियान चलाकर दलितों को समझाने लगे कि यह बसपा अब बाबा साहेब के बतलाये रास्ते से भटक रही है। हम दलितों के पास इतना वोट होते हुए भी हमें वह कभी चुनाव लड़ने का अवसर नहीं देती।इस पार्टी से कोई भी कलुआ बरहिमा को टिकट देकर हमारे बीच जब भेजा जाता है तो हम बिना सोचे विचारे उसे पार्टी के नाम पर वोट दे देते हैं।लेकिन जब हम सब एक छोटा सा गांव का प्रधान ही क्यों न हो यदि बनना चाहते हैं तो हमें लोग अपना वोट नहीं देते हैं।इसलिए हम क्यों उन्हें वोट डालें जो हमें वोट देने से कतराते हैं।दलित कभी सामान्य सीठ से विजयी नहीं होता।अगर सीटें सुरक्षित होती हैं तो वहाँ भी दलितों में भी ऊँचनीच देखकर लोग मतदान करते हैं।
जब यह बात दलितों को समझ में आने लगी कि ये दलित तो दलित ही रह गए और इनका उत्थान तबतक नहीं हो सकता जबतक ये स्वयं आगे की रणनीति में जुड़कर काम नहीं करेंगे।बहुजन समाज पार्टी के साथ रहकर सिर्फ मतदाता ही बने रहना होगा,और हमें कभी आगे नहीं बढ़ने दिया जायेगा।इनका जनाधार खिसकने लगा।
अन्य दलों से गठबंधन रास नहीं आया
जब बसपा काभी जनाधार खिसकने लगा तो इसने अन्य दलों के साथ गठजोड़ भी किया।लेकिन यहाँ उसकी दाल नहीं गलती दिखी।इसके मतदाताओं ने तो अपने वोट देते रहे लेकिन जहाँ इसके प्रत्याशी थे,वहाँ विपक्षियों के वोट ये हासिल न कर सकीं।अब पिछले कुछ सालों से सदा सुर्खियों में रहनेवाली बसपा सुप्रीमो बहन कुमारी मायावती जी का कोई कहीं से बयान नहीं आता है।जबसे भाजपा ने केन्द्र और प्रदेश में बागडोर संभाली तभी से मानों बसपा की बोलती बंद होती गई।अब इसके पीछे का क्या कारण हो सकता है,कौन है जिम्मेदार, किसी को पता नहीं।
आजाद समाज पार्टी का अभ्युदय
सबसे बड़ा नुकसान इनसे बसपा का ही हो रहा है ।कहीं न कहीं बहुजन समाज पार्टी को चन्द्रशेखर रावण से ही ज्यादा नुकसान पहुंचता रहा है।क्योंकि उन्हें भी उन्हीं लोगों का साथ मिल रहा है जो कभी बसपा के साथ थे।कुछ दलबदलू नेताओं की बात है तो वे मौका परस्त लोग तो हर जगह होते हैं।इनकी स्थिति आजकल बहुजन समाज पार्टी से कुछ ठीक लग रही है।अब देखना यह है कि क्या सुश्री मायावती जी से दलितों का मोह भंग होकर चन्द्रशेखर रावण के साथ जाता है या बहनजी पुनः अपने चहेते दलित भाईबंधुओं को अपने साथ मनाकर वापस ला सकती हैं, या अब उनकी यहीं से राजनीति को लोग सलाम कर देंगे।
निष्कर्ष यह है कि समय सबका बदलता है।
कहने का तात्पर्य यह है कि चाहे सरकार किसी भी दल की हो,जब सत्ता की बागडोर संभालने के लिए उस सिंहासन पर आसीन होता है तो उसे सभी जनमानस को एक दृष्टि से देखते हुए कार्य करना चाहिए।क्योंकि यह राजा का कर्तव्य बनता है कि उसके राज्य की सम्पूर्ण जनता उनका एक परिवार है और सबको साथ लेकर चलना है।सबसे भाईचारा बना रहे।धर्म और जाति से ऊपर उठकर सबके विकास सबको रोजगार की बात होनी चाहिये क्योंकि जहाँ प्रजा तंत्र होता है वहाँ प्रजा ही शासक होती है और प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री तो उसके प्रतिनिधि मात्र।अतः जब जनता को लगने लगेगा कि देश में अराजकता फैलती जा रही है और शासक लाचार है तो जनता किसी और को चुन कर उसे सत्ता सौंपने का अधिकार रखती है।लेकिन फिर भी हर सरकार में सत्ता में रहनेवाले लोग अपनी जाति बिरादरी को कुछ अधिक ही सम्मान देते रहे हैं और देते रहेंगे।उदाहरण के तौर पर यूपी में जबसे योगीजी मुख्यमंत्री बने हैं, ठाकुरवाद हावी हुआ है।सपा के शासनकाल में यादवों का बोलबाला कायम था।और मायावती जी की सरकार में तो दलित उत्पीड़न की कोई गुंजाइश नहीं थी।लोग दलितों को सताना तो दूर उनसे कड़क होकर बात नहीं करते थे।क्योंकि उस समय हरिजन बनाम सवर्ण धारा बड़े ही आराम से लग जाती थी।तो ये होती है सत्ता की धमक।
तो इसलिये कहना है कि सरकार चाहे किसी की हो सभी को सम्मान के साथ जीने के अधिकार को कायम रखना चाहिए।लोगों के अंदर से वैमनस्यता खत्म कर दिया जाना चाहिए।लेकिन. लोग हैं कि सत्ता पाने के लिए देश को भी बेच खाने के लिए उतारु हो जाते हैं।
• लेखक एक स्वंतत्र विचारधारा का कवि है।ना उधौ का लेना न माधन का देना।
कुछ खास बातें
• बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक कांशीराम थे।
• बसपा की शुरुआत बीयस फोर के नाम के साथ हुई जिसे बदल कर बहुजन समाज पार्टी कर दिया गया।
• बसपा की अध्यक्ष के रूप में मायावती कांशीराम की उत्तराधिकारी बनी।
• उत्तर प्रदेश में, बसपा का अपना मुख्य आधार है और यह 2019 के भारतीय आम चुनाव में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी थी।
• बसपा का चुनाव चिन्ह, जैसा कि भारत के चुनाव आयोग द्वारा अनुमोदित है, एक 'हाथी' है जिसका मुख बाईं ओर है।
लेबल: बहुजन समाज पार्टी का खिसकता जनाधार, माननीय कांशीराम राम


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