शुक्रवार, 8 नवंबर 2024

जौ गोजई के हथुई रोटी


गाँव-शहर आ नगर दिहात में
टोला मोहल्ला सगरी भयवा
एक्कै बात सुनात बाय
आज बहुत मँहगाई बढ़िगै
सब्जी महगँ बिकात बाय।
डीजल पेट्रोल सब मँहगा होइगा
दारू खूब छनात बा
नेता नगारी सबके मुँह से
सरकारै के दोस दियात बा।
अब हमरे समझ में ई ना आवत,
कइसन ई मँहगाई बा?
मुरगा,मछरी, बकरा, बकरी के
का सस्ता माँस बिकात बा?
खरीदारन के भीड़ उहाँ खूब,
लागत अपरम्पार बा।
का ऊहै सस्ता बीक रहल बा
जनता तरै उप्पर भहरात बा।।


दारू के ठीका पर देखलीं
लोग पी-पीके ढमिलात रहें।
पाँच रुपया के नमकीन लेके
शीशी के दारू छनात रहे
एतनी मँहगाई पर ई हाल  बाटे
नेकुरा ले दारू छकात हवे।

साँच बात त इहै भइया ,
मँहगाई ना अबहीं बाय ना तब्बै रहे।
जेकरा लगे खूब पइसा बाटे
ऊ का बूझै मँहगाई के
जेकरा लगे ना फूटही कौड़ी
ईओकरा खातिर मँहगाई हवे।

सौ रुपिया में पहिले , बिगहन खेत बिकात रहे
ना पइसा  जुर पावै  केहू के,बहुतै मँहगा बुझात रहे।
आज पचास लाख के बिस्वा भी
देखबा लेवे वाले तइयार हवैं।

मँहगाई हौ त घर घरे में
बड़की मोबाइल देखात हवे।
एक मोबाइल से के बतियाई
सबके अलगे अलगे किनात हवे।।

दस हजार से कवनों क दाम कम नइखे,
चार छ गो हर घरही में देखात हवै।
बेटवा के शादी तय होतकहा,
बड़की मोबाइल चोरी से किनात हवै,
बजार हटिया के बहाने,
होवै वाली दुलहिन के लगे
शादी से पहिले चल जात हवे।।
रातरात भर फुसुर खूब हालचाल लियात हवै।
वाटसाप पर आनलाइन हरदम  प्यार के इजहार होखे
रिचार्ज खतम भइला से पहिले
बिना पुछले डाटा रोज भरात हवै।।


कान खोल के सुनला सभे
इहै न मँहगाई बाय
तेल भरावे के बेंवत नइखे
दहेज में मोटरसइकिल मँगात हवे।।

जेकरे घर में सरकारी नौकरी बा
पइसा के ओकरे खरिहान हवै
उम्मीद से ज्यादा तनख्वाह मिलत हौ
फिर भी मुँह पर अंन्हियार लगे।
एहरवोहर से खुब लूटतो बा लोग
तउने प ओतनै उहे लोग रोवतो बाय
घूमघूमके ढेर उहै लोग
सगरी ओर बतियवतो बाय।
बड़ी मँहगाई ई सरकार लेआइल
एहमें लूटमार अपार हवै।।
आटा दाल सब मँहगा हो गइल
तरकारी मँहगँ बिकात हवे।।
सुनत सुनत कान पक गइल
त कवि मालचन्द ई कविता लिखलैं
जेके जेतने मालिक दिहले बाड़न ,
ऊ ओतनै में परशान हवे।।

बजड़ी,टाँगुन,मड़ुआ, लतरी
पहिले इहै सबके बोआत रहै।
तिल्ली, तीसी,लाही चउमुख
खेते में लहलहात रहै।।
जौ- गोजई के हथुई रोटी
देखतै मन खिझियात रहै।।
नेनुआ, लौकी,कोहड़ा ,सरपुतिया,
छानी पर  चढ़ जात रहै।।
होत सबरे लेहसुन मिरचा
सिल्ही पर सबके कुटात रहै।

तब दु चार आना में सवासेर
देशी घीव बिकात रहै।।
बुद्धू कहलैं झिंगुरल्ली से
कब्बो ना पेट भरात रहे।।

बेशक पेट भरत ना रहे
फिर भी जान अपार रहै।
चटनी रोटी खातखात,
हगतो के गाँड़ भभात रहै।।

🔻वीडियो शामिल है👎
 https://youtu.be/xksY_o4RAmA?si=hinM0N7kMoIXboM-

कबोकबो त एइसन होखे
लोगभूखे पेट सो जात रहै।
अधपेटवा खाके सगर दिन
कूवाँ से पानी दुहात रहै।।
सरसों के साग,मड़ुआ के रोटी,
अधपेटवै सब खात रहे।
बजर के जाँगर देत रहैं मालिक
सबलोग मेहनती देखात रहैं।।
दस बरीस गड़खुल्लै घुमैं
भगई तब किनात रहै।।
करैं मजूरी मेहरारु सब
तब घरमें सबकर मान रहै।
गा-गा के जाँता रोज पीसैं
तब जाके रोटी मिलत रहै।
कूटैं, पीसै, पकवै ,धौवैं
दिनभर गदही नीयन खटत रहैं।
दर्जन भर लइका जन्मावत रहलीं
कबहुँ ना अस्पताल में जात रहैं।।
सात सोति के दूध पियाके
बेटवा के पहलवान कर देत रहैं।।
डब्बा के दूध तब्बो रहे लेकिन
ऊ ना कहलीं कब्बो मरदे से,
लइका के आपन दूध पियाइब ना।
तोहार कमाई उफ्फर परै
आपन देंह गँवाब ना।।
झिन्नीमुट क लइका लेके
खाना हम बनाइब ना।
रोइरोयके भोजन बनवेलीं
चुल्हा हमसे फुँकाई ना।।

टमठ टमठ के आगी तब बरै।।
गैस सिलेंडर तब रहै ना
धूवाँ आँखिन में एतना लागै
फिर भी चूल्ही के ना जरै आग।
बड़ी तपस्या से भोजन बनवैं
तब जाके पेट के बूझै आग।।
  

तब मँहगाई ना रहै बस
एतना रुपिया पइसा ना रहे।
तब सोना चाँनी अपार रहे
हँसुली,गुजहा,काड़ा, छाड़ा
बाजूबंद, करधनी, नकबुल्ला
चारचार लर के हार होखे।
ना रहै बेलाउज आधा पेट के
जवना से देंह उघार लगे।
एक हाथ के घूँघट काढ़ैं
मर्यादा के  बहुतै लाज रहै।।
बिजली के अँजोर तब ना रहै
दिया बाती से काम चलै
रात अँजोरिया आवै त
सबके अँगना उँजियार लगे।।
खटपटी,खड़ाऊँ, टायर के चप्पल
एही से सबकर काम चलै
मँगनी के कुर्ता धोती से
केहूकेहू के बियाह होखे।
मँहगाई तब ना रहे बस
पइसा के खाली अभाव रहे।
पइसा के खाली अभाव रहे।।
अरे मालचन्द समय बदल गै
पहिले जब कोड़हारा चले
महिया खाय सब भड़रो होखे
जगह जगह खरिहान होखे।।।

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