शनिवार, 4 मई 2024

अपराध बनाम अदालत

 अपराध बनाम अदलत


मेरे प्यारे मित्रों एवं समस्त देशवासियों बंधु-बांधवों, साथियों, बच्चों एवं महिलाओं !
अगर मेरे इस लेख को एक बार जरूर पढ़ते चलें।मुझे तब यह महसूस होगा कि देश को आगे बढ़ने और उचित मार्गदर्शन करने में मेरा यह योगदान अपने सार्थक प्रयास में सफलता की ओर अग्रसर हो रहा है।🙏


🥀🥀आजकल एक बात बड़ीआसानी से लोग कह देतेहैं कि उन्हें कोर्ट पर पूरा भरोसा है ,और वे उसमें सहयोग करेंगे।होना भी चाहिए।क्योंकि हम सबको एक ऐसी व्यवस्था की दरकार है जो हमें हमारे साथ सच्चे मन इंसाफ कर सके।हर पीड़ित को उचित समय पर उचित न्याय मिलना चाहिए।लेकिन आज हमारे संविधान और हमारी न्याय व्यवस्था पर एक प्रश्न चिन्ह खड़ा हो जाता है जब कोई भी न्याय के लिए दर दर की ठोकरें खाकर भी न्याय नहीं पाता।बल्कि न्याय पाने की आस लिए अपने प्राण तक लोग छोड़ दे रहे हैं।

जानते हैं क्यों?
क्योंकि... उन्हें पता होता है
इतनी जल्दी कोर्ट कोई फैसला नहीं ले सकता।
यह कविता किसी एक मजबूर पीड़ित व्यक्ति क्या तमाम ऐसे परिवार की कहानी बयां करती है जो न्याय की गुहार लगाने अदालत जाते हैं।भूखे प्यासे रहकर भी वकील की फीस भरते हैं और अगली तारीख देकर उन्हें फिर बुलाया जाता है और यह सिलसिला लगातार चलता रहता है।फैसला आने की कोई समय सीमा तय नहीं होता है।कई पीढ़ियाँ गुजर जाती हैं अदालत का फैसला नहीं लिखा जाता।यही हमारे संविधान की व्यवस्था है।हम हर कहीं बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर जी के संविधान को हाथ में उनकी मूर्ति देख सकते हैं लेकिन उसमें एक यही कमी छूट गई जो खलती है कि आखिर कितने समय में कोई अदालत किसी के साथ न्याय करेगी।)
रसूख है, पैसा है, बड़ेबड़े वकील हैं, पहुंच है तो
वे किस दिन काम आयेंगे।
जब तक चाहेंगे
फैसला नहीं लिखा जायेगा
कलम रुक जाती है जजों की
रोकने वाले हाथ अगर मजबूत होंतो
पैसों पर बिक जाती है न्याय प्रणाली
दोषियों को निर्दोष और पीड़ित को फाँसी भी हो सकती है।
हम जिस संविधान की रट लगाते
जोरजोर चिल्लाते हैं
आखिर उसमें यह कब लिखा जायेगा
एक साल के अधिक समय
किसी को न्याय माँगने में नहीं लगेगा
चित या पट,कोई हारे या जीते
चाहे न्याय मिले या ना मिले
पर बरसों बरस झूठे इंसाफ की खातिर
तारीख देना लेना बंद करो।

अरे इसमें नाराज होने की क्या बात है।
ऐसा ही तो होता रहा है।
अपराधी अपराध करकरके छूट जाता जाता है
जेलों में दरबार लग जाता है
जेल से आडर होता है
बाहर लोगों का कत्ल हो जाता है
गलती से कहीं अपराधी को जुकाम हो जाता है
तो कोर्ट सवाल पूछने लगती है
चमचे धरने पर बैठ जाते हैं
सरकार को दोषी ठहराते  हैं।

ये कानून है
इसकी खिल्ली उड़ाई तो खैर नहीं है
अपराधी तो अपने होते हैं
ये हैं तो जेल की शोभा है
अपराध नहीं होंगे तो कोर्ट कचहरी
क्या होंगे
वकील और जज किसका न्याय करेंगे
वकीलों को फीस कौन भरेगा
उनकी झूठ की दुकान का क्या होगा?
न्याय के मंदिर में सदा
अन्याय ही होता आया है
आरोपी तो बार बार ,
हर बार बरी हो जाता है।
कभी कभी किसी भाग्यवान को ही
उचित न्याय मिल पाता है
वह भी उस समय,
जब उसका कोई मोल नहीं।
दस रूपये की मुर्गी
दौड़ाने और पकड़वाने में
सौ रूपये खर्च करने पड़ जातेहैं।
फिर भी लोग कहते हैं कि हमें पूरा भरोसा है हमें न्याय जरूर मिलेगा।
ले लो यही न्याय है,न्यायालय का

अपराधी हैं तो पुलिस है, वरना इन्हें
कौन पूछता है।

दिन भर जुबां पर गाली जिसके
कौन भला उनकी वर्दी से डरता
बेगुनाह गाली क्यों सुनता?

कानून की दुकान खुलती है,
सजती है, ग्राहक जब आता है
तो खरीदारी कुछ ऐसी होती
खुद तो कुछ नहीं खाता पर,
चाय हमेशा स्पेशल ही बनवाता है।

रुखासखा खाना खाकर
सुबह-सबेरे घरबार छोड़कर,
निकल जाता है इक आशा विश्वास को लेकर,
शायद आज कुछ हासिल हो जाय।
इसी आस में बिन खाये पीये
भागा दौड़ा जब कोर्ट में आये
पहले वकील की झोली में
अपनी जेब खाली करता है।
वकील साहब की प्यास
बुझाने बरफी पेड़ा खुद लाता है
फिर बिन कुछ अपने मूँह में डाले
सादा पानी से प्यास बुझाता है।

कहीं देर गर हो जाता है
तो ऊपर से खरीखोटीभी सुन लेता है
देकर फीस दूनी बेचारा
मुँह लटकाये घर आता है
फिर तारीख !!
तारीख पर तारीख पाता है।
टूट जाती है आस अचानक
न्याय की आशा मर जाती है।
घर की पूँजी लुट जाती है
तारीख पर तारीख बस याद आती है।

क्या हुआ था बरसों पहले
कुछ कुछ यादें रह जाती हैं
ज्यादातर तो भूल जाता है
वह पीड़ा, वह वेदना, कितने
गम को खा जाता है।
पर भरोसा नहीं छोड़ता
कहता मुझे भरोसा है।
कोर्ट कचहरी सब धोखा है,
जिसकी लाठी, भैंस है उसकी
पैसे से कलम फिसल जाती है।
न्याय की आशा मर जाती है।

बहुत समय  न्यायालय से मिलता है।
अपराधी को, अपराध मिटाने को
गवाह तोड़ने को,रास्ते से हटाने को।
जब कोई गवाही देने वाला नहीं बचेगा,
किसके बलबूते न्याय मिलेगा।
इसलिए निवेदन है मेरा
माननीय धर्म रक्षक, धर्मधीर धुरंधर
न्यायालय के भगवान हैं जो।
कर जोड़ प्रार्थना सुन लीजै
इतना विलम्ब कभी न कीजै
आपके फैसले सुनाने से
सुनने वाले धरातल पर मौजूद ही न रहें
मौजूद ही न रहें।
घाव सूखने के बाद
मरहमपट्टी का क्या करना
दवा भी खिलायेंगे रोगमुक्त होने के बाद
दवा भी जहर बन जायेगी
बिना मौत वो मार डालेगी।


एक समय करो निर्धारित ऐसा
जिसके भीतर हो होय फैसला।
हार मिले या जीत मिले, उतना
दुख नहीं होगा।
जितना दुख होता तब होता है
जब चप्पलें घिस जाती हैं,
लोटाथाली बिक जाती हैं
कर्जे में इंसान डूब जाता है
आत्मा उसकी मर जाती हैं
फिर भी एक छोटी सी आस लिए
उस कुर्सी को अपलक निहारते हुए
बूढ़ी आँखें, जिनसे साफ साफ
कुछ भी दिखता नहीं
अपने भगवान को बार बार
याद करता है और मिन्नतें माँगे
छोटी सी उम्मीद जागे।

लेकिन तुम अदालत हो
तुम तो बहरी भी हो, अंधी भी हो
तुम झूठ और सच दोनों सुनती हो
फिर भी आँखों पर बाँधकर पट्टी
हमेशा न्याय क्यों लिखती हो?
चलो ठीक है, तुम्हारी मर्जी
पर इतना समय तुम क्यों लेती हो
अपराधी कभी सुधर नहीं सकता
फिर भी उसको मौका देती हो
बाहर आते ही फिर वह तो
डराने धमकाने लग जाता है
दोचार और अपराध करने से
कभी नहीं उसे डर लगता है।

बड़े बड़े कानून की पोथी
लिख कर चाहे जितनी रख लो
समयबद्ध अमल करना होगा
पसीना सूखने से पहले फैसला लिखना होगा
रामराज्य की कल्पना करना
तबतक बेमानी होगा
तबतब बेमानी होगा
जबतक अगली सुबह की तारीख पर
फिर दरबार सजाना होगा।

ऐसे न्याय और अदालत से
अब कोई सरोकार नहीं रखना
हो सके अगर सक्षम हो
तो फैसला खुद करना होगा
झूठी आस में जीने से बढ़ियां
एक दिन का मरना ही अच्छा होगा।
   👍मालचन्द कन्नौजिया 'बेपनाह'

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