रविवार, 3 मार्च 2024

पति पत्नी का रिश्ता- प्रेम की डोर

असहीं ना लड़ा अब जवनियाँ में रोज हो,

आई जब बुढ़ाई , मिली ना कहीं ठौर हो।।

नाहीं केहू लगे सटी,नाहीं बोली बतियाई हो
ओहि दिन साथ इहे राउरे काम आयी हो
जवनियाँ के जोश में ... होश जनि गँवाया
प्यार वाला बात सुना, ....प्यार से निभाया
बेटवा पतोह सब , अपना में भुलाय जाई
नाहीं केहू लगे आही,तोहैं दुवरा पठाय देई।
टुकुर टुकुर ताकत रहिबा नीदियो ना आई हो
बोलबा जे नीमन से, उहो बाऊर बुझाई हो।।
आई जब बुढ़ाई.....

घरवा के बहरे बइठल , पइवा भोजनवाँ। हो पइबा भोजनवाँ,
दिन भर ताकल करबा घर के अंगनवाँ हो। घर के अँगनवाँ,
अपने महलिया के मेहमान बनके रहिबा
नीक नाहीं लागी केहू के बुढ़ौती के बोलिया
ऊहे फिर याद अइहें , जे हौ राउर संघतिया,हो राउर संघतिया
सात फेरा साथेमें जेकरे ,घुमेला भंवरिया।
जेके पाके भइल घर में अजोर हो
ओसेआसहीं ना लड़ा रोजरोज हो
आई जब बूढ़ाई,नाहीं मिली कहीं ठोर हो।।

छूटीजब साथ जेहिया, वोहि दिन बुझाई
अँखियाँ से बही लोर, नाहीं रोकले रोकाई
सूखिजाई अँसुवन के धार ना देखाई
दिलवा के हाल नाहीं ,केहू बुझी बतियाई
बड़ा दुख होई अपार होई  रहिया
आई जब बुढ़ाई, विपत घेरी जेहिया
मालचन्द कहतारे सुनला बतिया मोर हो
असहीं ना लड़ा तूँ   जवनियाँ में रोज हो
आई जब बुढ़ाई मिली ना कहीं ठौर हो।।

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