सोमवार, 8 जनवरी 2024

मंदिरों पर मनौती के नाम पर पशुबलि!आखिर क्यों?

 


मेरे सभी पाठकों को दिल से नमन, बंदन एवं अभिनंदन। 

हम भी अस्थावान हिंदू ही हैं। यह लेख  किसी को दुखी करने के लिए नहीं हैं या किसी को सिखाने के लिए नहीं बल्कि दिल से आने वाली उस अनसुनी करुण वेदना को कलमबद्ध करते हैं जिसे दिल ने कहा दिल ने सुना और फिर दिल ने उसे महसूस भी किया ।।

     हमारे अंदर ऐसी भावना बचपन से ही मन बैठ जाती है कि अगर हममें से जो भी लोग मांस,मछली या अंडे का सेवन करते हैं तो उस दिन कम से कम मन्दिर में नहीं जा सकते। उस दिन मंदिरों में प्रवेश न करने की सीख घर में रहते हुए सीख जाते हैं। घरपरिवार या अन्य लोगों के साथ रहते हुए भी सीखते हैं।

यहां तक ​​तो ठीक है। हमारे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री योगीआदित्यनाथ जी ने तो गोहत्या पर रोक लगाने के लिए कठोर कानून भी लागू किया है। और बाकी लोगों को भी निर्देश दिए गए हैं कि वे खुले में मांस की बिक्री न करें। हमारे देश में गाय को गौ माता तो प्राचीन काल से ही कहते आ रहे हैं।तो यह भी ठीक है। लेकिन अब सवाल यह है किसिर्फ और सिर्फ गाय के प्रति ही इतनी दया क्यों?


    क्या भेंड़, बकरी, कुत्ता, भैंस, सूअर, मछली आदि के शरीर में जान नहीं है,जो उन जीवों के प्रति हमें कोई दया नहीं दिखाई देती और उसके वध के लिए हम पूरी तरह से स्वतंत्र माने जाते हैं?आखिर ऐसा क्यों है? हमारी इंसानियत कहाँ मर गई?

जबसे यह गोहत्या को रोकने के लिए कठोर रूख सरकार ने अपनाया  है तबसे गोहत्या तो कम हो गयी है लेकिन बाकी पशुओं, जानवरों की हत्या काफी बढ़ गई है। जैसे मछली पालन के लिए सरकारी अनुदान एवं ब्याज दरों में छूट और प्रोत्साहन सरकार खुद देकर इन निरीह पशुओं और पक्षियों आदि  की हत्या करवा रही हैं।विशेष तौरपर इनमें मुर्गियाँ शामिल हैं जिसको सरकार खुद मरवा रही है।
जीव तो जीव है, चाहे मुर्गी हो या बत्तख, भेंड़ हो या बकरी।सबके भीतर वही आत्मा विद्यमान होती है जो हमारे भीतर है।जीव छोटा हो या बड़ा, क्या फर्क पड़ता है।

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