रविवार, 26 नवंबर 2023

औरत तेरी यही कहानी * एक थी मालती

मालती चौहान
 


औरत तेरी यही कहानी --एक थी मालती चौहान


नमस्कार, प्रणाम, आदाब,सत् श्रीअकाल।
आज एक ऐसी कहानी लेकर आया हूँ जो शायद हर किसी को झिंझोड़ कर रख दे।मानवता को शर्मसार करती एक ऐसे युगल की कहानी जो आज किसी परिचय की मोहताज नहीं थी।उत्तर प्रदेश के गोरखपुर से सटे संतकबीरनगर जिले के बहुत ही मशहूर खलीलाबाद क्षेत्र के एक गांव की एक गरीब परिवार में जन्मी, पलीबढ़ी बेटी की दुखभरी कहानी,जब उसी की जुबानी एक वीडियो के माध्यम से सुनीऔर उसके कुछ ही दिन बाद उस मजबूर, बेबस और लाचार महिला ने अपने दो साल के बेटे को रोते बिलखते इस दुनियां को अलविदा कह कर एक ऐसी जगह चली गई जहाँ से कोई वापस नहीं आता।उजड़ गई उसकी दुनियाँ।

मालती चौहान एक यूट्यूबर


   जी हाँ, एक यूट्यूबर थी मालती चौहान।जिसने अपने घर में छोटे छोटे रील्स बनाकर यूट्यूब पर पोस्ट करती थी।उसके चैनल का नाम था 'मालती चौहान फन'और उसके साथ ही उसने बहुत ही कम समय में अपने नाच गाने और उलजुलूल वीडियो के माध्यम से बहुत ही शोहरत हासिल कर लिया।उसके लाखों में सब्सक्राइबर हो चुके थेऔर खूब व्यूज भी आते थे।जिससे होने वाली कमाई से उसका घर का खर्चा बड़े आराम से चलने लगा था।यूट्यूब चैनल पर वीडियो डालकर उससे उसने इतना पैसे कमालिये थे जिससे उसने अपना पक्का मकान भी बनाया था।अब उसके गाँव की पहचान उसके नाम से होने लगी थी।लेकिन यहाँ उसकी एक छोटीसी भूल या या यूँ कहें कि उसकी एक छोटीसी गलती उसके लिए इतनी बड़ी मुशीबत बन जायेगी, उसने कभी नहीं सोचा होगा।
उसने अपनी वीडियो में बताया था कि जब वह छोटी थी और अभी शादी भी नहीं हुईथी तब माता पिता के घर में भी उसे वह दर्जा हासिल नहीं हो सका जिसकी वो हकदार थी।घर में भी हमेशा उसपर मार पड़ती रहती थी।उसकी छोटीछोटी गलतियों पर घर के लोग उसे पीट दिया करते थे।उसके कहने के अनुसार हफ्ते दस दिन बीतते बीतते एकाध बार तो उसकी पिटाई होना निश्चित था।पता नहीं किस मिट्टी की बनी थी वो और कैसी किसमत लेकर पैदा हुई थी मालती चौहान।

सोहरत और पैसों के लिए बनी यूट्यूबर

चलिये समय बीता और एक दिन मालती शादीकरके ससुराल आ गई।तो उसे लगा कि चलो अब शायद उसे मार से छुटकारा मिल गया हो और यहाँ ससुराल में पति का खूब सारा प्यार मिलेगा और वह अपनी पुरानी यादों को भुलाकर एक नई जिंदगी की शुरुआत करेगी।उसने अपने पति के साथ मिलकर यूट्यूबर बन गई और इतनी शोहरत,लोगों की मोहब्बत और अपने चहेते बना कर इतनी मशहूर हो गई जिसका उसे अंदाजा नहीं था।लेकिन यह खुशी भी उसका साथ ज्यादा दिन तक नहीं दे सकी।पति के साथ अनबन शुरू हो गई।

पति की प्रताड़ना

     कम समय में ज्यादा शोहरत पाने के लिए उसने गलत रास्ते पर कदम बढ़ाया और अपने वीडियो में कुछ अश्लीलता से भरपूर मनोरंजन परोसने लगी।कुछ बेशर्मी से वीडियो बनाने और रील्स को सोसल मीडिया में चलाने से उसके इतने सारे सब्सक्रिप्शन आने लगेकि उसने और दिलचस्पी  के ऐसे ही वीडियो को बनाने लगी।खूब व्यूज भी आने लगे और कमाई भी होने लगी।उसके दीवानों की भी कोई कमी नहीं थी।आखिर एक दिन मालती चौहान के पति को भी यह बात समझ में आने लगी।मालती जब वीडियो/रील्स बनाती थी तो उसके कैमरामैन का दिल मालती को देखकर मचलने लगता था।जिसका नाम था -- अर्जुन वर्मा।उसका अपना खुद का धंधा था, जहाँ पन्द्रह सोलह लोग काम भी करते थे।लेकिन प्यार का नशा उसे भी नहीं छोड़ा।कभी मालती उसे भाई बोलती थी और उसे राखी भी बाँधती थी लेकिन वह उसका कोई सगा भाई तो था नहीं।इसलिये कब मालती उसके इश्क में फँस गई उसे पता ही नहीं चला।मन ही मन चाहने लगी तो मोबाइल पर चैटिंग शुरू हो गई।ऐसा नहीं था कि उसके पति विष्णु राज को यह सब पता नहीं था।उसे भी यह सब पता था और उसने अपने तरफ से मालती पर कोई रोकटोक नहीं लगाया।क्योंकि विष्णु राज खुद एक लड़की के प्रेम जाल में फँस चुका था। और उस लड़की का नाम था राधिका।कहीं न कहीं विष्णु राज राधिका से शादी करने के मूड में था और मालती रास्ते का रोड़ा बन रही थी।

पति ने पत्नी की बिना तलाक दिये दूसरे से शादी कराई

अब वह मालती को हमेशा प्रताड़ित किया करता था और मारपीट कर उससे अपनी बात मनवाने में कामयाब हो जाता है।इन लोगों के पास यूट्यूब से अच्छा खासा कमाई हो रहा था तो एक दिन रात में मालती चौहान का पति एक मन में योजना बनाकर अर्जुन वर्मा को फोन लगाकर उसे कहीं बुलाकर उसके साथ मालती का ब्याह रचाने का खेल खेलता है।मालती भी खुशी खुशी इस विवाह के लिए राजी हो जाती है।बकायदा पूरी घटना की वीडियोग्राफी विष्णु राज करता है ताकि लोगों को यह पूरी घटना एकदम रीयल लगे।अब अर्जुन वर्मा को यह बात मजाक लग रही थी और वो इसे टीआरपी का एक हिस्सा मान रहा था कि शायद यह विष्णु का कोई नया प्लान हो।क्योंकि मालती चौहान और विष्णु राज का कोई डिवोर्स या तलाक तो हुआ नहीं था।शायद मालती को यहसब कैसा लग रहा था, पता नहीं कि आखिर उसका पति बड़ी खुशी से अपनी पत्नी को भला कैसे किसी गैर मर्द को सौंप देगा।इसलिये मालती इस पूरे घटनाक्रम को हँसते हुए इंज्वॉय कर रही थी।मौके पर सिंदूर नहीं था तो पीले रंग के अबीर से अर्जुन वर्मा मालती की माँग भरते हुए वीडियो में देखा जाता है।

टीआरपी और व्यूज का नशा


यह कहानी किसी को समझ में नहीं आती है कि यहसब सिर्फ टीआरपी के लिए या ज्यादा से ज्यादा व्यूज के लिए किया गया या हकीकत में यह एक शादी थी।अब अगर यह एक हकीकत थी तो पहले विष्णु राज और मालती चौहान का तलाक होना चाहिये था और मालती की अर्जुन वर्मा के साथ शादी में मालती के माता पिता भाईबंधुओं को भी होना चाहिये था और यदि वे नहीं भी आते तो जानकारी तो होनी ही चाहिए थी।गांव के कुछ लोगों की उपस्थिति दर्ज होनी चाहिये थी या फिर पुलिस महकमे को खबर होनी चाहिए थी लेकिन किसी को कानों कान खबर नहीं होती है और मालती विष्णु राज से अलग होकर अर्जुन वर्मा की पत्नी बन जाती है और इतना ही नहीं उस रात होटल का खर्च भी अर्जुन को विष्णु राज ही देता है।और कहता है कि जाओ और मालती के साथ ऐश करो।
मालती भी दो साल के एक बेटे की माँ थी और अर्जुन वर्मा के भी एक बेटी है।

कितनी हकीकत और कितना फसाना

मैं यहाँ एक बात लिखना चाहता हूँ इस घटना को सुनकर कि *औरत तेरी यही कहानी,आँचल में दूध आँखों में पानी।*ये औरत और गाय दोनों की एक समान जिंदगी लगती है मुझे।जिस तरह लोग अपने पालतू पशुओं को अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए किसी के भी हाथ बेच देते हैं।और अब वह उसे चाहे मारे पीटे या काटकर खा जाये,उसकी मरजी।क्योंकि अब वह उसकी हो चुकी है।लेकिन आज जोकुछ मालती चौहान के साथ हुआ, क्या उसके साथ ऐसा होना चाहिये था?वह एक जीतीजागती इंसान थी।वह इतना कमा लेती थी कि अपने साथ अपने परिवार का खर्चा उठा रही थी लेकिन उसकी एक छोटी सी भूल उसे आत्महत्या के करने के लिए मजबूर कर दिया और वह न चाहते हुए भी अपनी जिंदगी से मुंह मोड़लिया।

मालती की मौत का राज* हत्या या आत्महत्या

   उसकी मौत हुई या हत्या ये किसी को पता नहीं है।सबने वही देखा जो दिखाया गया।फंदे पर झूलती हुई मालती चौहान की लाश।और यह वीडियो जो मालती ने मरने से कुछ समय पहले बनाया था।समय से पहले किसी ने उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरकर उसका हौसला बढ़ाया होता तो शायद उसकी जिंदगी बचायी जा सकती थी।पूरी तरह से निराश और हताश होकर जब उसने अपनी व्यथा बयां कर रही थी तो किसी ने उसपर ध्यान नहीं दिया।फिर वह वीडियो  भी खूब चला।लेकिन शायद ही किसी ने सोचा होगा कि अब उनकी चहेती हमेशा हमेशा के लिए इस दुनियां को अलविदा कहने वाली है।

मालती चौहान की यह वीडियो अपनी जिंदगी के उन पहलुओं को बयां करती है जिसे लोगों से छिपाये रखा


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जब यह खबर मीडिया में आती है तो  इनके फालोअर्स चौंक जाते हैं।लोगों के कमेंट आने लगे हैं।कोई भला बुरा बोलता है तो कुछ मजे लेते हैं तो कुछ उन्हें धिकारते हैं और कोसते भी हैं।और फिर दोचार रात अर्जुन के यहाँ बिताने के बाद मालती अपने मायके चली जाती है और फिर वहां से अपने पहले पति विष्णु राज के घर आ जाती है।लेकिन तबतक लोगों के कमेंट से इतनी टूट चुकी होती है कि उसे अपनी बसी बसाई जिंदगी में उसे बदनामी और किल्लत के सिवा कुछ भी दिखाई नहीं देता है और वह अपना एक रोरोकर वीडियो बनाती है।और अपने सभी दर्शकों से अपनी गलतियों पर माफी भी माँगती है।लेकिन इस जिंदगी से पूरी तरह वह टूट चुकी होती है और कहीं न कहीं उसे यह आभास हो रहा था कि वह अब और नहीं जीवित रहने वाली है।उसे मौत का खौफ साफ उसके वीडियो में देखा जा सकता है।उसे उसके पति के द्वारा हमेशा प्रताड़ित करने का दर्द, उसके मारने पीटने की पीड़ा अब उसके लिए असहनीय हो चुकी थी।इतने सारे दर्द को अपने सीने में दबा कर वह पता नहीं कैसे अपने चहेतों के लिए हर एक वीडियो हँसते हँसते शूट करती थी और उसकी यह पीड़ा शायद ही कभी किसी ने देखा और समझा हो।विगत 23नवंबर2023 की रात उसकी जिंदगी की आखिरी रात थी।उसका दो साल का बेटा दूसरे कमरे में विष्णु राज की मौसी के पास सोया था।मालती की लाश छत के पंखे से साड़ी के फंदे से झूलती हुई पायी गई।

जैसे ही मालती चौहान के मरने की खबर फैली मीडियाकर्मियों के साथ साथ ढेर सारे यूट्यूबर अपने अपने कैमरे और मोबाइल लेकर वहां पहुचने लगे।खूब हो हल्ला मचाया जाता है और आन द स्पाट वीडियो बनाने का जो सिलसिला जारी होता है वो रुकने का नाम नहीं लेता।जगह जगह चारछ लोग इकट्ठे हो होकर वीडियो बना बना कर खूब चला रहे थे।जिससे लोगों के व्यूज भी खूब आ रहे थे।यहाँ तक कि मालती चौहान के शवदाह तक के खूब वीडियो बनाकर शेयर किया गया।शायद ऐसा पहली बार हुआ कि किसी यूट्यूबर के इस तरह अचानक दुनियां से चले जाने के बाद इतने सारे यूट्यूबर अपने लिये मसाला तलाशने वहां पहुँचे हों।


आखिर में मैं सिर्फ इतना ही कहना चाहूँगा कि किसी की मौत को अपने कमाई का जरिया न बनाया जाय।ये गमगीन माहौल है, उसका जश्न न मनाया जाय।आप उसके घर जायें तो हो सके तो आँसू पोंछकर आना उनके, धधकती हुई ज्वाला में घी डालकर मत आना।

इस समाज के लिए आज के उन कलाकारों के लिए भी दो शब्द मेरे पास बचे हैं तो मैं उन्हें भी कहना चाहता हूँ कि इतनी शोहरत और पैसे का क्या करना।जियो जी भर लेकिन अपनी इज्जत को कभी दाँव पर मत लगाना।इज्जत उछाल कर पैसे तो कमाये जा सकते हैं लेकिन उन पैसों से इज्ज़त कभी नहीं खरीद सकते।सुख के साधन खरीद सकते हैं लेकिन सुख नहीं।महल तो बना सकते हैं लेकिन सुकून देने वाली नींद खरीदी नहीं जाती।आजकल लोग गंदे गंदे अश्लील गीतों पर गंदे गंदे ऐक्ट करके सामान्य घरों की लड़कियाँ, बहुएँ रील्स बना रही हैं और उससे खूब पैसे भी कमा रही हैं लेकिन यह उचित नहीं है।उनके घरवाले पता नहीं किस स्वभाव के हैं जो कभी मना नहीं करते।इससे उनकी डाँस प्रतिभा तो सबको दिखती है लेकिन उनके कौनकौन से अंगों को लो निहारते हैं शायद उसे घरवाले अनदेखा कर देतेहैं।
आज अगर मालती चौहान लोगों के कमेंट को झेलने की क्षमता रखती,अपनी बदनामी की आग में न जलती तो उसकी लाश फांसी के फंदे पर नहीं देखने को मिलती।उसकी मौत का जिम्मेदार कौन है, यह जनता जो उसे नशीहत दे रही थी या उसका प्रेमी या उसका पति या फिर कोई और?यह प्रशासन के लोग तय करेंगे।मुकदमा चलेगा तारीख पड़ेगी और बहुत साल बाद या तो कानून मुजरिम को ढूंढ निकालेगा या सबूतों के अभाव में बाइज्जत बरी हो जायेगा।

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मंगलवार, 14 नवंबर 2023

दहेज उत्पीड़न की शिकार होती बेटियाँ

 दहेज उत्पीड़न की शिकार होती बेटियाँ



कुछ खबरों की ये तो सुर्खियां मात्र हैं,रोज खून के आँसू बहाती हैं बेटियाँ


आप सभी लोग जो इस समय हमारे लेख को पढ़ रहे हैं, सबने दहेज का नाम तो सुना होगा।दहेज प्रथा एक ऐसी प्रथा बनकर समाज को खोखला कर रही है जिसका कोई हिसाब नहीं है।दहेज को लेकर कईयों बार सरकार का ध्यान भी गया, कानून भी बने लेकिन दहेज एक छुआछूत का रोग बनते गया और समाज को सिर्फ देखादेखी मजबूर करता गया।जिसकी कोई कहीं शिकायत तबतक नहीं किया जाता है जबतक बेटियाँ जिंदा रहती हैं।दहेज उत्पीड़न का आरोप तब लगाया जाता है जब ससुराल वालों की प्रताड़ना से तंग आकर या तो बेटियाँ खुदकुशी कर लेती हैं या फिर उन्हें ससुराल वालों के द्वारा मौत के घाट उतार दिया जाता है।


दहेज किसे कहते हैं


  बेटियों के ब्याह के लिए वर पक्ष को रिश्ता जोड़ने से लेकर बेटियों की विदायी तक लड़की के माता - पिता, भाईबंधुओं, बहनों एवं सगे सम्बधियों द्वारा दिया जानेवाला रूपया-पैसा, सामान, गिफ्ट इत्यादि सभी दहेज का ही हिस्सा है। हर परिवार के लोग जब कहीं भी अपनी बेटी ब्याहते हैं तो अपनी सामर्थ्य के अनुसार जो कुछ भी वरपक्ष (लड़की जिस घर में ब्याही जाती है)को अपनी बेटी की खुशहाली के लिए दान स्वरूप देते हैं, उसे ही दहेज कहते हैं।लेकिन जब शादी के लिए शर्त रखकर रूपये पैसे और सामान जैसे गाड़ी मोटर,फ्रीज, कूलर, एसी इत्यादि एवं सोने(gold) की  माँग की जाती है तो यह एक कुप्रथा का रूप धारण कर लेती है और मजबूरी बस लोग बेटी की खुशी के लिए जैसेतैसे सारी व्यवस्था करने के लिए मजबूर हो जाते हैं।इसे दहेज कहते हैं।

जो जितना अमीर होता है, वह उतना ही बड़ा दहेज का लालची होता है।


     जी,बिल्कुल सही पढ़ रहे हैं आप।जो जितना अमीर आदमी होता है, उसे उतना अधिक दहेज चाहिए ही चाहिए।और इसे झुठलाया नहीं जा सकता।
   क्या कभी किसी गरीब बेटी के बाप को किसी बड़े और रईस आदमी के घर में अपनी बेटी ब्याहते देखा है?नहीं ना; जानते हैं क्यों?क्योंकि रिश्ता जोड़ने से पहले अपनी औकात आँकना पड़ता है।झोपड़ी में रहने वाले को महलों के सपने नहीं देखना चाहिए।यह कहावत भी आपने भी सुना होगा।बस, यहीं से औकात देखकर पता चलता है कि किसी के घर में क्या पकता है।बाहर से भोजन की गंध हवा में घुलकर लोगों को चीख-चीखकर बताती है कि किस घर की रसोई में कुछ खास है आज।
👉खबरों में आयी ये खबरभी पढ़ते चलें
https://youtu.be/PU5Z4fZoM3U?feature=shared

   अगर दहेज की बात नहीं होती तो भगवान की कृपा से जिनके पास अकूत संपत्ति पहले से है, वे किसी मजबूर बेटी के बाप को अपने रूपये खर्च कर ,अपने पैसों का सदुपयोग करके उस घर की बेटी को अपनी बहू बना सकते हैं, जिसके बाप के पास उतनी दौलत नहीं हो दहेज के लिए।लेकिन ऐसा कहीं नहीं होता।जो जितना अमीर आदमी होगा उसे उतना ही अमीर घर की बेटी चाहिए बहू बनाने के लिए।यही जीवन का सत्य है।

अमीरी आते ही गरीबों से रिश्ते टूट जाते हैं।


क्या आपने किसी अमीर आदमी के गरीब रिश्तेदार देखे हैं?ऐसा जरूर हुआ होगा कि पहले दोनों परिवार एक समान हैसियत रखते रहे हों तब रिश्ते बने थे।लेकिन जैसे ही एक आदमी दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करके आगे बढ़ने लगता है तो उसके गरीब रिश्तेदार छूट जाते हैं और किसी कार्यक्रम में अगर वे दिख जायेंगे तो लोगों की शान घट जायेगी।बस यही सोचकर लोग गरीबों से मूँह मोड़ने लगते हैं। बहुत से लोग बड़े होकर (पैसे वाले)होकर तो अपने माता पिता तक को भूल जाने लगे हैं।और उनके लिए वृद्धावस्था में वृद्धाश्रम की व्यवस्था भी कर देते हैं।क्योंकि अब वे ऊंची सोसायटी ज्वाइन कर चुके होते हैं तो उनके तालमेल बिगड़ जाने का भय उन्हें सताता है।

पढ़ेलिखे और सरकारी नौकरी वाले लड़के की लोग कीमत लगाते हैं।


   एक बहुत ही बड़ा कटु सत्य यह भी है कि आज जिनके बेटे सरकारी नौकरी में लग चुके हों और अभी उनकी शादी न हुई हो तो ऐसे में परिवार उनकी शादी की बकायदे से दहेज में उन्हें क्या चाहिए, एक लम्बी लिस्ट जबानी रटकर याद कर लेते हैं।कितना रूपये चाहिए, कौन सी गाड़ी चाहिए, कितने तोले का स्वर्ण आभूषण चाहिए,क्या खिलाना पिलाना होगा, कितने मँहगे होटल में रश्मअदायगी होगी,तमाम बातें।लेकिन सावधानी इतनी अधिक चतुराई से बात करते हैं लोग कि पूछो मत।सबसे पहले वे यही कहते हैं कि वे दहेज के शख्त विरोधी हैं और उन्हें दहेज में कुछ नहीं माँगना है।बस हमारी पोजीशन तो आप देख ही रहे हैं।हमारे बड़ेबड़े लोगों से साथ-बाथ है और शादी में बड़े-बड़े लोग आयेंगे तो हमारी भी शान है।वह फीकी नहीं होनी चाहिये।बिना माँगे ही सबकुछ माँग लेते हैं।
कुछ लोग तो ऐसे भी देखे गए हैं जो खुद पेट्रोल भरवाने की क्षमता नहीं रखते लेकिन शादी में चार पहिया ही चाहिए।अगर लड़का अकेले है और उसके कोई भाई नहीं हैं, यानी सम्पूर्ण सम्पत्ति का अकेला वारिस तो कीमत आसमान छूती है लेकिन वे भी दहेज नहीं माँगते, सिर्फ दहेज लेते हैं और बिना दहेज के शादी कहाँ होती है जनाब।
   एक अच्छे घर-वर की तलाश में एक बेटी के पिता को कितने घरों की चौखट पर माथा टेकने पड़ते हैं, यह किसी बेटी के बाप से पूछो।एक कहावत है कि 'जाके पाँव न फटी बेवाई,वो क्या जाने पीर पराई।'किसी की कहानी सुनने और सुनाने से कोई फर्क नहीं है लेकिन जिसके ऊपर बीतती है उसके दिल का हाल हम आप क्या समझेंगे।
      

एक शिक्षित बेटी दो घरों में एक साथ रोशनी करती है।

आज लोगों की सोच बदल रही है।लोग बेटे बेटियों में अंतर और भेदभाव नहीं करते हैं।बेटों के समान ही बेटियों को भी शिक्षित करने में लगे हैं।बल्कि बेटों से ज्यादा बेटियाँ पढ़लिख रही हैं।नम्बर भी अच्छे ला रही हैं।पुरुषों के बीच अपनी अस्मतें बचाते हुए नौकरी भी पकड़ रही हैं और अपनी ड्यूटी भी निभातीहै।घर में चुल्हा चौका से लगायत बाहर के कार्य तक बड़ी ही मेहनत से निभाने में कोई उन्हें ऊँगली उठाये तो यह गलत होगा।बच्चों की देखभाल करने से लेकर पति की सेवा, उनके लिए व्रत क्या नहीं करती हैं महिलाएं, लेकिन बदले में उन्हें क्या मिलता है?पति की डाँट,सास एवं ननद के तानें!फिर भी उफ तक नहीं करती हैं बेचारी।आखिर कबतक ये शिक्षित होते हुए भी अक्षित सा जुर्म सहती रहेंगी।
     लोग बेटी के ब्याह में क्षमता से भी अधिक मुँहमाँगी रकम जुटाकर, कर्जे लेकर मँहगे रिश्ते ढूंढते हैं कि शायद उनकी बेटी खुश रहेगी लेकिन जब बेटी को दहेज के नाम पर प्रताड़ित किया जाता है तो हर मां बाप, भाई की रूहें काँप जाती हैं।

दहेज के खिलाफ कोई आवाज क्यों नहीं उठाता

जब लोग रिश्ते ढूंढने जाते हैं और शादी तय करते हैं तो जब दहेज की बात आती है तो लोगों बिना माँगे बहुत कुछ माँग जाते हैं और हर लड़की पक्ष उसे सामर्थ्य न होते हुए भी देने को राजी हो जाता है और शायद यह सोचते हैं कि चलो किसी तरह बेटी का घर बस जाय।बस बेटी का घर बसाने की चाहत में बाप बिक जाते हैं और जीवन भर की जुटाई गई रकम दिल खोलकर खर्च करने का उत्साह भरे दिल से बरात का स्वागत करते हैं।
सरकार ने दहेज के खिलाफ कानून तो बनाया है लेकिन उसपर आजतक अभी भी कोई ठोस पहल नहीं हुई।

दहेज के लिए प्रताड़ित करने या जान जाने के बाद केस दर्ज होता है और तबतक बहुत देर हो चुकी होती है।मुकदमा दर्ज होने के बाद न्याय में अत्यधिक देरी का होना और आरोपियों को कड़ी सजा न देना ही अपराध का सबसे बड़ा कारण है।अगर समय से न्याय मिलता तो दहेज प्रथा ही क्या बड़ेबड़े अपराध भी खत्म हो सकता है।लेकिन भारत सरकार की कानूनी प्रक्रिया ही बहुत घटिया है।

दहेज उत्पीड़न का शिकार सिर्फ महिलाएं ही नहीं होतीं

जैसा कि अगर देखा जाय तो दहेज एक ऐसा राक्षस है जो सिर्फ महिलाओं को ही नहीं अपितु उन सभी लोगों को सताता रहता है जो उस परिवार से जुड़े लोग होते हैं।शादी तय होने से पहले बेटी के माता पिता एवं भाई जो भी घर के खर्च सम्हालने में लगे होते हैं, उनकी जिम्मेदारी  होती है कि वे अपनी मान मर्यादा को ध्यान में रखते हुए घर में जवान हो चुकी बहन-बेटियों को उनके हाथ पीलेकर उनकी शादी ब्याह करके उनके घर बसाने की अपनी जिम्मेदारी निभायें।अब जिम्मेदारी को निभाने के लिए उन्हें इस दहेज रूपी दानव से समझौता करना पड़ता है।शादी के पहले कोई मां बाप नहीं चाहते कि जिस घर में वे अपनी बेटी को ब्याहना चाह रहे हैं उनके साथ किसी तरह का मतभेद बने।इस लिए सिफारिशों के द्वारा उन्हें मनाने की भरपूर कोशिश करते हैं और उसके बाद अगर दूसरा पक्ष राजी हो गया तो ठीक है।शादी के दिन रखकर सारी शर्तों को पूरा कर ब्याह सम्पन्न कर दिया जाता है।लेकिन कुछ लोगों का पेट इतने से भी नहीं भरता।वे बार बार कम दहेज लाने की बात कहते हैं और लड़कियों को प्रताड़ित करने लगते हैं।कुछ लड़कियाँ चुपचाप सबकुछ सहन करती रही हैं लेकिन कभी कभी जब उनके सब्र का बाँध टूट जाता है और वे मजबूर हो जाती हैं तो मौत को गले लगाकर अपनी जिंदगी समाप्त कर लेती हैं।तब उस बच्ची के माता पिता अदालत का दरवाजा खटखटाते हैं लेकिन वहाँ भी अगर माता पिता गरीब हैं और वकील को फीस भरने एवं ज्यादा दिन तक मुकदमों को झेलने में सक्षम नहीं हैं तो न्याय की उम्मीद नहीं कर सकते।क्योंकि भारत जैसे महान देश की घटिया कानूनी दाँवपेंच में उलझकर रह जायेंगे लेकिन न्याय नहीं पा सकते।क्योंकि यहाँ कानून भी बिकता है अगर खरीदने वाला दमदार हो।यह बात पुलिस थाने में पहुँचते ही पता चल जाती है।
    ऐसा सिर्फ गरीबों के साथ ही नहीं होता है, बल्कि सभी छोटे बड़े,अमीर गरीब सबको इस दौर से गुजरना पड़ता है।ऐसा नहीं है कि दहेज सिर्फ गरीबों को ही सताता है।यह दहेज रूपी दानव अमीरों के घर से निकलता है और गरीबों को भी अमीरी के सब्जबाग दिखाते हुए ललचाता रहता है और यही कारण है कि बड़ोंकी भाँति छोटे और गरीब तबके के लोग भी बिना दहेज के शादी करने से कतराते हैं।जिसकी जितनी औकात रहतीहै उससे कहीं ज्यादा आगे उसके लालच सिर चढ़कर बोलते हैं।

शादियों में खर्च का कोई सीमित दायरा नहीं है।


अगर दहेज प्रथा को खत्म करना है तो सरकार को मजबूत और ठोस पहल करनी होगी।शादियों में होने वाली फिजूलखर्ची को नियंत्रित करना होगा।और हर शादियों के पहले वर एवं कन्या पक्ष के द्वारा शपथपत्र भरवाने और शादी के बाद उन्हें विवाह प्रमाण पत्र देने की व्यवस्था करनी चाहिए ।जिसमें शादी में होने वाले खर्च का ब्यौरा दर्ज किया जा सके।


कोई लिखित प्रमाण पत्र न होना


सामाजिक तौर पर तो हमेशा शादी ब्याह होते रहते हैं लेकिन क्या किसी के पास शादीशुदा होने का प्रमाणपत्र जारी किया जाता है,नहीं होता।समाज ने मान्यता दे रखा है।बारात निकाली , जान पहचान वाले लोगों को इकट्ठा किया और सबको खाना खिलाया ,दुल्हन की मांग में सिंदूर भरा गया, दहेज में मिले सामान उठाया और दुल्हन की विदायी कराया चल दिया।इससे बड़ा प्रमाण और क्या चाहिए।
वहीं दूसरी ओर देखा जाय तो कुछ  बच्चों के बहकते हुए कदम अपनी मनमर्जी से इश्क में पड़कर घर परिवार की इज्ज़त को मिट्टी में मिलाने के बाद क्षणिक सुख की खातिर समाज की नजरों में गिरने के बाद कोर्ट में जाकर शादी का सार्टिफिकेट बनवाते हैं।लेकिन समाज उन्हें जल्दी स्वीकार नहीं करता।क्योंकि यह सब समाज की दृष्टि में गलत होता है।
शादी का सर्टिफिकेट सबको बनाया जाना चाहिए और यह आधार कार्ड की तरह अनिवार्य भी किया जाना चाहिए।

शादीब्याह गुड्डे गुड़ियों का खेल नहीं है


मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।वह समाज में रहता है और उसके सबके साथ एक सम्बन्ध बनाकर जीना होता है।मनुष्य के लिए यह बहुत जरूरी होता है कि वह आपस में सामंजस्य बना कर जीवन के हर मार्ग पर चले।परिवार चलाने और वंश परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए विवाह नामक एक संस्कार की व्यवस्था समाज के द्वारा की गई है।अन्यथा मनुष्य और पशुओं में कोई अंतर नहीं रह जायेगा।समाज में भाई,बहन, माता पिता सबके अलग अलग सम्बन्ध बने हैं।शारीरिक सम्बन्ध होना सबके लिए एक आवश्यकता है लेकिन उसके लिए भी समाज में एक व्यवस्था की गई है।वह है परिणय संस्कार।अग्नि को साक्षी मानते हुए अपने हीतमीत ,बंधुवांधवों की उपस्थित में सात फेरों केसाथ सात बचन लेकर गंधर्व विवाह करने की व्यवस्था समाज में की गई।

दो दिलों को जोड़ता है एक रिश्ता


जब दो अनजान पथिक एक दूजे के साथ शादी के बंधन में बंध जातेहैं तो वे एक नया जीवन शुरू करते हैं एक साथ मिलकर।न कोई पहले की जान पहचान न कोई रिश्ता होता है फिर भी जब अपने लोग एक प्यार का रिश्ता ढूंढ कर लाते हैं और ब्याह रचा देते हैं तो एक साथ हर सुख दुख में मरने जीने की कसमें खाते हैं।और इस तरह से एक परिवार बनता है।लेकिन उसी परिवार में जब रिश्ते में कोई दरार पड़ जाती है तो यह रिश्ता नरक से बदतर जिंदगी जीने को मजबूर कर देता है।
   सम्बन्ध तबतक निराला होता है जब तक प्रेम बरकरार रहता है।इसलिए थोड़ी सी सावधानी बरतें और थोड़ी सूझबूझ से काम करें तो यह जीवन खुशियों से भर जायेगा।दौलत का क्या है;वो आज है, कल नहीं रहेगी।या आज नहीं है लेकिन हो सकता है कि कल भविष्य में एक नयी सुबह हो और झोली खुशियों से भर जाय।इसलिए कभी दौलत का घमंड नहीं किया जाना चाहिए।

दौलत से सिर्फ सामान मिल सकता है


आदमी जिंदगी भर दौलत के लिए रूपये के पीछे भागता रहता है।चाहे जैसे भी हो सके, बस पैसे आना चाहिए।ताकि उससे बड़ीबड़ी कोठी और महल बना सके।अपनी व्यवस्था मजबूत कर सके।लेकिन क्या कभी किसी ने सोचा है कि पैसों से वो महल तो बना सकता है लेकिन नींद तो सुकून से मिलती है।नींद का इंजेक्शन लिया तो जा सकता है लेकिन आँखों को सुकून तो चैन की नींद ही दे सकती है।पैसे से दौलत ,सुख के सभी साधन खरीद सकते हैं लेकिन सुख को खरीदा नहीं जा सकता।इसलिये  कभी दौलत के लिए किसीका दिल दुखाना नहीं चाहिए।

अखबार में बनती हैं सुर्खियां दहेज में मरने वाली बेटियाँ

 रोजाना कहीं न कहीं दहेज की बलि चढ़ती हैं बेटियाँ।मुकदमा दायर किया जाता है, गिरफ्तारी भी होती है और मुकदमा भी चलता है लेकिन तड़प तड़प कर जान देनेवाली वह बेटी किसी की भी हो सकती है।लेकिन लोगों को इससे कोई फर्क क्यों नहीं पड़ता।आज इंसान कितना गिर चुका है।क्या किसी की जान लेकर आपका मन भरता है।इतनी नीच हरकतों से लोग बाज नहीं आरहे हैं तो यह दोष किसका है।इसी समाज का न।अगर किसी की बेटी को सिर्फ दहेज के लिए जान से मारने या प्रताड़ित करने से पहले सिर्फ यही सोचलेते कि वेभी एक पिता हैं और अगर उनकी बेटी की ससुराल वाले उनकी बेटी के साथ भी  वैसा ही करने लगे तो कैसा लगेगा।क्योंकि कभी लोगों का पैसे से परिपूर्ण नहीं होता।हमेशा और पाने की लालसा लगी रहती है।

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सोमवार, 6 नवंबर 2023

संत कबीर दास

         संत कबीर दास

कबीर दास जी का जीवन परिचय

  आज के समय में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो कबीर दास जी के नाम से परिचित न हो।चाहे भले ही उनके जीवन और उनसे जुड़ी हुई घटनाओं से भलीभांति परिचित नहों,लेकिन नाम से जरूर परिचित हैं।

कबीर दास का जन्म


    संत कबीरदास का जन्म सन् 1398 ई. में माना जाता है।कुछ लोग पन्द्रहवीं शताब्दी में कबीर के जन्म की बात बताते हैं।लेकिन सही तिथि बताना सम्भव नहीं है।जन्म स्थान के बारे में ऐसा कहा जाता है कि तब के काशी कहे जाने वाले शहर के एक लहरतारा नामक तालाब के किनारे सुबह प्रातःकाल के समय उधर से जा रहे एक निःसंतान जुलाहा दम्पति नीरूऔर नीमा को वहीं पर सदाबहार (बेहया)की झाडियों में रोते हुए मिले थे।लहरतारा आजभी उसी नाम से जाना जाता है और कबीरपंथी लोग हमेशा यहाँ उनके जन्म स्थान पर आते रहते हैं। संत कबीरदास के जन्म की सही तारीख के बारे में कोई नहीं जानता।

कबीर दास जी का जन्मस्थान-


प्राचीन काल में बनारस को ही काशी कहा जाता था।काशी में बाबा विश्वनाथ आज भी विराजमान हैं। लहरतारा वाराणसी कैंट स्टेशन से मात्र कुछ ही दूरी पर पड़ता है और कबीर की जन्मस्थली  आज भी देख सकते हैं। कुछ लोगों का मानना हैं कि वे जन्म से मुसलमान थे। और अपनी युवावस्था में स्वामी रामानन्द के प्रभाव में आकर उन्हें हिन्दू धर्म का ज्ञान हुआ।

कबीर दास के माता-पिता कौन थे


कबीर की माता  पिता का नाम किसी को ज्ञात नहीं है।नीरू और नीमा नामक एक जुलाहे ने उन्हें लालनपालन किया था, इसलिए लोग उन्हें ही उनके माता पिता मानते हैं। कबीर दास जी का जन्म एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से हुआ था, लोकलाज के भय से उन्हें काशी के लहरतारा नामक तालाब में फेंक दिया गया था। वहाँ से नीरू और नीमा नाम के निःसंतान दंपत्ति ने उन्हें तालाब के पास से घर लाकर बचाया और उनका पालन-पोषण किया, इसलिए नीरू और नीमा को उनके माता-पिता के रूप में माना जाता है।

नीरू और नीमा के कबीर दास से क्या संबंध थे


     ऐसा सुनने में आता है कि नीरूऔर नीमा के कोई संतान नहीं थी और वे एक मात्र संतान के लिए बहुत लालायित रहते थे।एक दिन भोर में ही दोनों पतिपत्नी कहीं जा रहे थे तो उन्हें लहरतारा तालाब के किनारे पर किसी नवजात शिशु के रोने की आवाज सुनाई दी।आवाज को सुनते हुए तालाब के किनारे पहुँचे तो बेहया सदाबहार झाड़ियों के बीच एक नवजात शिशु को रोते देखा।शायद किसी महिला ने लोकलाज के भय से बच्चे को जन्म देकर झाड़ियों में फेंककर चली गई थी।नीमा ने अपने पति नीरू से कहा कि ईश्वर ने इसे शायद हमारे लिए ही भेजा है, इसलिये इस बच्चे को हम घर ले जाना चाहते हैं।हमारी कोई संतान भी नहीं है, इसलिये हम खूब मन लगाकर इसका पालन पोषण करेंगे।पत्नी की बात सुनकर नीरू भी राजी हो गये।देखते ही देखते वहाँ लोगों की भारी भीड़ इकट्ठा हो गई तब सबकी उपस्थिति में नीरूऔर नीमा ने सबके सामने बच्चे को अपने साथ ले जाकर उसे पालने की जिम्मेदारी स्वयं लेने की इच्छा जताई तो सभी लोग राजी हो गये।घर लाकर लोगों ने बच्चे का नाम कबीर रखा।
        बच्चे की परवरिश बहुत अच्छे से होने लगी।अब कबीर बड़े हो गये तो उनकी शादी कर दी गई।जिससे एक पुत्र का जन्म हुआ, घर में खुशहाली का आलम था।कबीर के बेटे का नाम कमाल रखा गया। कबीर के घर पर कपड़े बुनाई का काम होता था और जब भी कोई उनके पास आकर बैठ जाता तो कबीर काम छोड़कर बतियाने लगते थे।जिससे उनके माता पिता बहुत नाराज होजाते थे।लेकिन कबीर को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था।

कबीरदास जी की शिक्षा


    कबीर बेहद धार्मिक  स्वभाव वाले व्यक्ति थे और एक महान संत बन गये। उनकी शिक्षा किसी स्कूल या मदरसे में नहीं हो सकी।लोगों की संगत में रहते हुए जो कुछ सीखने को मिला वही सीखा।अपने प्रभावशाली परंपरा और संस्कृति से उन्हें विश्व प्रसिद्धि मिली। ऐसा माना जाता है कि अपने बचपन में उन्होंने अपनी सारी धार्मिक शिक्षा रामानंद नामक गुरु से ली। और एक दिन वो गुरु रामानंद के अच्छे शिष्य के रुप में जाने गये।

कबीर दास का वैवाहिक जीवन


      संत कबीरदास जी का विवाह लोई नाम की कन्या से हुआ था. विवाह के बाद कबीर और लोई को दो संतानें हुई, जिसमें एक लड़का व दूसरी लड़की. कबीर के लड़के का नाम कमाल तथा लड़की का नाम कमाली था.

कबीरदास जी के गुरु कौन थे


        कबीर दास जी को साधुसंतों की संगत बहुत पसंद थी।वे लोगों के पास बैठकर ज्ञान की बातें किया करते थे।जिसे सुनने के लिए लोग इनके पास आकर बैठ जाया करते थे।इन्होंने गुरु बनाने का मन बनाया तो सोचने लगे कि अपना गुरु किसे बनायें।उस समय रामानंद जी एक बहुत ही प्रसिद्ध वैष्णव भक्त के रूप में विख्यात थे।दूर दूर तक उनकी चर्चा थी।कबीर दास जी ने रामानंद जी को अपना गुरू बनाने की इच्छा लेकर उनके पास गये।उनसे दिक्षा लेने की इच्छा जताई तो रामानंद जी ने साफ इनकार कर दिया।कारण यह था कि कबीर का लालनपालन एक मुस्लिम समुदाय में हुआ था और रामानंद जी एक वैश्णव भक्त थे।बस इसीलिये वे कबीर को अपना शिष्य नहीं बनाना चाहते थे।

संत कबीर ने रामानंद जी को अपना गुरू कैसे बनाया

    जब रामानंद जी ने कबीर को अपना शिष्य बनाने से मना कर दिया तो कबीर लौट तो आये लेकिन उन्हें उनके जैसा महात्मा और भक्त कोई दूसरा नहीं दिखाई दिया।इसलिये कबीर ने भी निश्चय कर लिया कि वे गुरु बनायेंगे तो सिर्फ रामानंद को अन्यथा कोई दूसरे को नहीं।
    कबीर को पता था कि रामानंद जी प्रतिदिन सुबह तड़के ही काशी गंगा में स्नान करने जाते हैं।अतः एक दिन वे रात में ही गंगा घाट पर बनी सीड़ियों पर जाकर सो गये।भोर का समय था, साफ से अभी दिखाई भी नहीं पड़ रहा था कि रामानंद जी सीड़ियों से उतरते हुए गंगा में स्नान करने के लिए चले आ रहे थे।उनका पैर सीड़ियों पर लेटे हुए कबीर की छाती पर पड़ गये।तुरंत पैर को पीछे हटाते हुए बोले, "बच्चा ! रामराम कहो।"कबीर ने रामानंद जी के पाँव पकड़ लिए और कहे कि "अब तो आपने मुझे गुरुमंत्र दे ही दिया तो अब अपना शिष्य भी स्वीकार कर लीजिये।"
      रामानंद हतप्रभ रह गए।कबीर तूँ? तबसे कबीरजी कबीर दास कहलाने लगे।दिन - ब - दिन इनके शिष्य बढ़ते जा रहे थे।हिन्दू और मुसलमान दोनों संप्रदाय के लोग इनके शिष्य बन गये।

       कबीरदास जी की भाषा व प्रमुख रचनाएँ


       कबीर दास जी की भाषा व प्रमुख रचनाएँ सधुक्कड़ी एवं पंचमेल खिचड़ी हैं। इनकी भाषा में हिंदी भाषा की सभी बोलियों के शब्द सम्मिलित हैं।

      हिन्दी साहित्य के प्रसिद्ध कवि कबीरदास जी ने अपनी रचनाओं को बेहद सरल और आसान भाषा में लिखवाया करते थे।उन्होंने अपनी कृतियों में बेबाकी से धर्म, संस्कृति एवं जीवन से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपनी राय रखी है।

कबीरदास का भाव पक्ष
  कबीरदास(kabirdas) जी निर्गुण, निराकार ब्रह्म के उपासक थे । उनकी रचनाओं में राम शब्द का प्रयोग हुआ है । निर्गुण ईश्वर की आराधना करते हुए भी कबीरदास महान समाज सुधारक माने जाते है । इन्होंने हिन्दू और मुसलमान दोनों संप्रदाय के लोगों के कुरीतियों पर जमकर व्यंग किया।संत कबीर दास हिन्दी साहित्य के भक्ति काल के अंतर्गत ज्ञानमार्गी शाखा के कवि थे।

सधुक्कड़ी भाषा के कवि


     कबीर दास जी सांधु संतों की संगति में रहने के कारण उनकी भाषा में पंजाबी, फारसी, राजस्थानी, ब्रज, भोजपुरी तथा खड़ी बोली के शब्दों का प्रयोग किया है । इसलिए इनकी भाषा को साधुक्कड़ी तथा पंचमेल कहा जाता है । इनके काव्य में दोहा शैली तथा गेय पदों में पद शैली का प्रयोग हुआ है । इनकी रचनाओं में श्रृँगार, शांत तथा हास्य रस का भी प्रयोग देखने को मिलता है ।

कबीर दास का व्यक्तित्व


       कबीर परमात्मा को मित्र ,माता -पिता और पति के रूप में देखते थे । कबीर का जीवन सबके लिए था वे किसी जाति के या धर्म संप्रदाय विशेष के नहीं थे। वे अहिंसा,सत्य , सदाचार आदि गुणों के प्रशंसक थे । उनका सरल तथा साधु स्वभाव एवं संत प्रवृत्ति के कारण ही लोगों में उनका इतना आदर है ।

कबीर दास का साहित्यिक परिचय-

              कबीर सन्त कवि और समाज सुधारक थे। उनकी कविता का एक-एक शब्द पाखंडियों के पाखंडवाद और धर्म के नाम पर ढोंग व स्वार्थपूर्ति की निजी दुकानदारियों को ललकारता हुआ आया और सत्य भी ऐसा जो आज तक के परिवेश पर सवालिया निशान बन चोट भी करता है और खोट भी निकालता है।

कबीर जी की कविताएं-


       कबीर दास साहित्यिक दृष्टि से भक्तिकाल की निर्गुण शाखा जिसे “ज्ञानमर्गी उपशाखा” कहा जाता है जुडे रहे।  इनकी रचनाओं और गंभीर विचारों ने भक्तिकाल आंदोलन को गहरे स्तर तक प्रभावित किया था। इसके साथ ही उन्होंने उस समय समाज में फैली कुरीतियों, कर्मकांड, अंधविश्वास की निंदा की और सामाजिक बुराइयों की कड़ी आलोचना की। संत कबीर दास की रचनाओं के कुछ अंश सिक्खों के “आदि ग्रंथ” में भी सम्मिलित किए गए हैं। आइए जानते हैं संत कबीर दास का जीवन परिचय कैसा रहा।  

नामसंत कबीर दासजन्म स्थानवाराणसी, उत्तर प्रदेशपिता का नामनीरूमाता का नामनीमापत्नी का नामलोईसंतान कमाल (पुत्र), कमाली (पुत्री)शिक्षा निरक्षर मुख्य रचनाएं साखी, सबद, रमैनीकाल भक्तिकाल शाखा ज्ञानमर्गी उपशाखाभाषा अवधी, सुधक्कड़ी, पंचमेल खिचड़ी भाषा

कबीर दास का संक्षिप्त जीवन परिचय  

कबीर साहब का जन्म कब हुआ,

नीरू एवं नीमा नामक एक जुलाहा दंपति को यह नदी किनारे मिले और उन्होंने ही इनका पालन-पोषण किया। कबीर के गुरु का नाम ‘संत स्वामी रामानंद’ था। कबीर का विवाह ‘लोई’ नामक महिला से हुआ था जिससे इन्हें ‘कमाल’ एवं ‘कमाली’ के रूप में दो संतान प्राप्त हुई। अधिकांश विद्वानों के अनुसार संत कबीर का 1575 के आसपास मगहर में स्वर्गवास हुआ था। 

कबीर दास की साहित्यक रचनाएं 

कबीर पढ़े-लिखे नहीं थे। उन्होंने अपनी वाणी से स्वयं ही कहा है “मसि कागद छूयो नहीं, कलम गयो नहिं हाथ।” जिससे ज्ञात होता है कि उन्होंने अपनी रचनाओं को नहीं लिखा। इसके पश्चात भी उनकी वाणी से कहे गए अनमोल वचनों के संग्रह रूप का कई प्रमुख ग्रंथो में उल्लेख मिलता है। ऐसा माना जाता है कि बाद में उनके शिष्यों ने उनके वचनो का संग्रह ‘बीजक’ में किया। 

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने भी स्पष्ट कहा है कि, “कविता करना कबीर का लक्ष्य नहीं था, उनका लक्ष्य तो लोकहित था।” 
  कबीर की कुछ प्रसिद्ध रचनाएं इस प्रकार हैं:-

साखी, शबद और रमैनी यही इनकी कृतियाँ हैं।जिसमें इसके उपदेशों को इनके शिष्यों के द्वारा लिखकर एकत्र किया गया।

  

संत कबीर दास जी को कई भाषाओं का ज्ञान था। वे साधु-संतों के साथ कई जगह भ्रमण पर जाते रहते थे। इसलिए उन्हें कई भाषाओं का ज्ञान हो गया था। इसके साथ ही कबीरदास अपने विचारों और अनुभवों को व्यक्त करने के लिए स्थानीय भाषा के शब्दों का इस्तेमाल करते थे। जिसे स्थानीय लोग उनकी वचनों को भली भांति समझ जाते थे। बता दें कि कबीर दास जी की भाषा को ‘सधुक्कड़ी’ भी कहा जाता है।

कबीर दास जी के प्रसिद्ध दोहे 

यहाँ संत कबीर दास जी के जीवन परिचय के साथ ही उनके कुछ लोकप्रिय अनमोल विचारों के बारे में भी बताया जा रहा है। जिन्हें आप नीचे दिए गए बिंदुओं में देख सकते हैं:-



• साधो, देखो जग बौराना

• सहज मिले अविनासी

• काहे री नलिनी तू कुमिलानी

• मन मस्त हुआ तब क्यों बोलै

• रहना नहिं देस बिराना है

• कबीर की साखियाँ

• हमन है इश्क मस्ताना

• कबीर के पद

कबीर दास के जीवन का अंत (मृत्यु)


     कबीर दास जी के जीवन का अंत यानी मृत्यु कैसे हुई और उनका अंतिम संस्कार कैसे हुआ ?आइये जानते हैं।कहा जाता है कि कबीर दास की मृत्यु मगहर में हुईथी जो कि उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर जिलांतर्गत आता है।उस समय एक भ्रांति फैली हुई थी कि काशी में मरने वालों को मोक्ष मिलता है और मगहर में मरनेवालों को नरक में भटकना पड़ता है।अंतिम समय में कबीर दास मगहर चले गए थे जहाँ उन्होंने शरीर का त्याग किया।

कबीर दास के जन्म से जुड़ी हुई एक कथा और भी है।


      कबीर दास के जन्म से लेकर मृत्यु तक की एक और कहानी सुनने को मिलती है,जिसका वर्णन कुछ इस प्रकार है।

देवी लक्ष्मी एवं भगवान विष्णु जी की कहानी से जुड़ी संतकबीर की जीवनगाथा




    ऐसा कहा जाता है कि एकबार माता लक्ष्मी जी ने भगवान विष्णु जी से कुछ विनोद स्वरूप वार्ता कर रही थीं।माता लक्ष्मी जी ने भगवान विष्णु जी कहा कि आपके भक्त तो चोर हैं।भगवान विष्णु थोड़ा मुस्कुराये,बोले कि "कोई सुबूत भी है या सिर्फ लांछन लगा रही हैं देवी."
   इसपर लक्ष्मी जी ने विनोद वश मुस्कुराते हुए कहा कि "हमने अपनी इन आँखों से देखा है और हमारे पास सुबूत भी है।बस आप मौका देकर तो देखिये।"
भगवान विष्णु जी ने कहा कि ठीक है,दिखाइये क्या सुबूत है आपके पास जरा हमभी तो देखें।
  
   कहा जाता है भगवान अपने भक्तों की हमेशा रक्षा करते रहते हैं।उनकी आन-बान-शान में कभी आँच नहीं आने देते।बस भक्त सच्चा हो।
लक्ष्मी जी को पता था कि रामानंदजी विष्णु जी के परमभक्त हैं और वे प्रतिदिन प्रातःकाल गंगा स्नान के लिए जाते हैं।अतः उन्होंने अपनी माया से तरह तरह के खिले हुए फूलों से सुशोभित एक सुंदर फुलवारी तैयार कर दिया और खुद फुलवारी में एक किनारे बैठ गईं।  रामानंद जी ने खिले हुए फूलों को देखकर सोचा कि क्यों न आज अपने भगवान को इन प्यारे प्यारे फूलों से उनका श्रृंगार और पूजन किया जाय।आज तो हमारा सौभाग्य लगता है कि इतने सुन्दर सुंदर पुष्प खिले हुए हैं।जैसे ही उन्होंने फूलों को तोड़ना शुरू किया, लक्ष्मी जी चिल्लाते हुए सामने आकर खड़ी हो गईं और कहीं कि आपने हमारी बगिया से इसतरह चोरीछिपे फूल क्यों तोड़ा।क्या कभी आपने भी इस खाद पानी इत्यादि दिया है? तुम तो बड़े चोर लगते हो और झूठ में यह साधू बने फिरते हो।
रामानंद लज्जित होकर सिर झुका कर खड़े रहे और तोड़ा गया फूल हाथों से छूटकर नीचे जमीन पर गिर गया।खुद को कोसने लगे कि आजतो सबेरे सबेरे ही बड़ी भारी भूल कर दी।अब क्या होगा।
भगवान विष्णु जी को पता चल गया कि आज तो उनके शिष्य पर संकट छा गया,कुछ तो करना चाहिए।
लक्ष्मी जी उस फूल को पृथ्वी पर से उठाकर अपने आँचल में छुपा कर भगवान विष्णु को दिखाने निकल पड़ीं।जब वे कुछ ही दूर आगे बढ़ीं तो आश्चर्य चकित हो गईं।आँचल में छुपाया हुआ फूल बालक का रूप धारण कर रोने लगा।ध्यान लगाया तो विष्णु जी की यह लीला समझ गईं कि वे कभी भी अपने भक्तों की निंदा नहीं सुन सकते।इसलिये उन्होंने मेरे साथ यह खेल रच दिया।
बस फिर क्या था,वे वहीं पास में लहरतारा नामक तालाब के किनारे झाड़ियों के बीच बालक को सुलाकर भगवान विष्णुजी के पास पहुंच गईं।
विष्णु भगवान बोले , " क्या हुआ देवी, कोई सुबूत मिला?लक्ष्मी जी ने बुरा सा मुँह बना कर आगे बढ़ गईं।
विष्णु जी ने लक्ष्मी को समझाया कि बेचारे नीरू और नीमा को एक बच्चा चाहिए था, किन्तु उनके भाग्य में इस जन्म में कोई बच्चा नहीं था।इसलिए मुझे यह लीला करनी पड़ी।इस बच्चे को हम नीरु और नीमा को देकर उन्हें बच्चे का सुख प्रदान करने वाले हैं।
कहा जाता है कि तभी भोर में नीरू और नीमा उसी रास्ते से होकर कहीं जा रहे थे और नवजात शिशु की आवाज सुनकर वे उसके पास गये और उसे घर लाकर उसका पालन पोषण करने लगे।उनका नाम कबीर रखा गया और बड़े होकर कबीर ने रामानंद जी को ही अपना गुरु बनाया।कहा जाता है कि जब कबीर दास जी की मृत्यु हुई तो मृत्यु के कुछ ही देर बाद चादर से ढकी हुई उनकी लाश (मृतशरीर) गायब हो गया था और उसके स्थान पर कुछ फूल रखे मिले।उसी फूल को ले जाकर उनके शिष्यों ने अपने अपने धर्म के अनुसार उनके अंतिम संस्कार किये थे।
  ये रही कबीरदासजी के जीवन से जुड़ी हुई एक अन्य कहानी। आपको कैसा लगा,कमेंट करके जरूर लिखियेगा।



कबीर दास जी के मृत्यु के संदर्भ में भी ऐसा कहा जाता है कि जब उनकी मृत्यु हुई तो उनके अंतिम संस्कार करने को लेकर उनके शिष्यों में विवाद उत्पन्न हो गया।हिन्दू शिष्य उन्हें फूँकने(जलाने)की जिद पर अड़े थे तो मुसलमान शिष्य उन्हें दफनाना चाह रहे थे।सामने लाश को एक चादर ओढ़ाकर रखा गया था।अचानक वहाँ कोई आया और लोगों से पूछा कि आपलोग इस तरह क्यों लड़ रहे हो और यह चादर ओढ़कर लेटा कौन है?लोगों ने बताया कि ये कबीर दास जी की लाश है और उन्हीं के अंतिम संस्कार करने को लेकर यह विवाद हो रहा है।अब आप ही बताइये कि इनका अंतिम संस्कार कैसे किया जाय।
उस व्यक्ति के समक्ष जब चादर हटायी गई तो कबीर दास जी की लाश गायब थी और उसके स्थान पर कुछ पुष्प पड़े थे,जिसे उस व्यक्ति ने दोनों संप्रदाय के लोगों में आधा आधा बाँट दिया।और लोगों ने अपने अपने धर्म के रीति रिवाजों के अनुसार उनका अंतिम संस्कार किया।

रविवार, 5 नवंबर 2023

तंत्र, मंत्र , यंत्र विद्या

मंत्र साधना

      

मंत्र साधना
      

  मंत्र साधना भी एक विज्ञान की तरह ही होता है और अगर इसे सिद्ध कर लिया जाता है तो यह बहुत ही प्रभावशाली साबित होता है।

तंत्र- मंत्र - यंत्र
तंत्र का अर्थ तन से होता है, मंत्र का अर्थ मन से यंत्र का अर्थ होता यंत्रों या मशीनों से लगा हुआ होता है।

तंत्र-मंत्र  :-    मंत्र एवं तंत्र ये दोनों शब्द अलग अलग भाव और अर्थ लिए हैं।तंत्र विद्या के द्वारा तन को तनाव मुक्त भी किया जाता है और तनाव ग्रस्त भी ।मंत्र वह होता है जो मन के तंत्र को ताड़ दे,वह मंत्र होता है।

हिन्दू धर्मशास्त्रों में विस्तार पूर्वक इसका वर्णन ढूंढने से मिल सकता है।हम थोड़ा सा अंश यहां लिखकर समझते हैं।


मंत्र का अर्थ क्या है?


  'मंत्र' का अर्थ होता है , मन को एक तंत्र में बांधना।

   यदि अनावश्यक और अत्यधिक विचार उत्पन्न हो रहे हैं और जिनके कारण चिंता पैदा हो रही है, तो मंत्र सबसे कारगर औषधि है। आप जिस भी ईष्टदेव या देवी देवता भगवान की पूजा, प्रार्थना या ध्यान करते हैं, उसके नाम का जप सकते हैं।यह जपनाम ही वह मंत्र है जिससे आपके मन को शांति मिलती है।आब आप चाहे रामराम जपिये या राधेराधे कहिये।बात वही है,।वह हमारे जोभी ईष्ट देव हैं, हमारे मन की वह सब समझते हैं और इसलिए हमारी भाषा चाहे जोभी हो;उन्हें समझने में कोई भूल नहीं होती है।

मंत्र कितने प्रकार के होते हैं?

अब यहाँ मंत्र भी कई श्रेणियों में समझने के लिए आप बाँट सकते हैं।विद्वान लोगों के द्वारा बताया गया है कि
मंत्र 3 प्रकार के होते हैं।
1-सात्विक,
2- तांत्रिक और
3-साबर।
      सभी मंत्रों का अपना-अलग अलग महत्व समझाया गया है।
   1-सात्विक मंत्र :-   प्रतिदिन जपने वाले मंत्रों को सात्विक मंत्र माना जाता है। आओ जानते हैं कि ऐसे कौन से मंत्र हैं जिनमें से किसी एक को प्रतिदिन जपना चाहिए, जिससे मन की शक्ति ही नहीं बढ़ती, बल्कि सभी संकटों से मुक्ति भी मिलती है।

    इन मंत्रों के जप या स्मरण के वक्त सामान्य पवित्रता का ध्यान रखना होता है। जैसे घर में हो तो देवस्थान में बैठकर, कार्यालय में हो तो पैरों से जूते-चप्पल उतारकर इन मंत्र को पढ़ते हुए देवताओं का ध्यान करना चाहिए। बताया जाता है कि इससे मानसिक बल प्राप्त होता है
जो हमारे भीतर आत्मविश्वास बढ़ाने में मददगार साबित होता है।

कुछ मंत्र हमनें यहाँ लिया है तो यदि आप चाहते हैं तो इसे कंठस्थ करके जाप कर सकते हैं।

👉 क्लेशनाशक मंत्र : कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणत क्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नम:॥

मंत्र प्रभाव :
इस मंत्र का नित्य जप करने से कलह और क्लेशों का अंत होकर परिवार में खुशियां वापस लौट आती हैं।

दूसरा मंत्र :

👉 शांतिदायक मंत्र : श्री राम, जय राम, जय जय राम

मंत्र प्रभाव :
हनुमानजी भी राम नाम का ही जप करते रहते हैं। कहते हैं राम से भी बढ़कर श्रीराम का नाम है। इस मंत्र का निरंतर जप करते रहने से मन में शांति का प्रसार होता है, चिंताओं से छुटकारा मिलता है तथा दिमाग शांत रहता है। राम नाम के जप को सबसे उत्तम माना गया है। यह सभी तरह के नकारात्मक विचारों को समाप्त कर देता है और हृदय को निर्मल बनाकर भक्ति भाव का संचार करता है।

तीसरा मंत्र :

👉 चिंता मुक्ति मंत्र : ॐ नम: शिवाय।

मंत्र प्रभाव :
इस मंत्र का निरंतर जप करते रहने से चिंतामुक्त जीवन मिलता है। यह मंत्र जीवन में शांति और शीतलता प्रदान करता है। शिवलिंग पर जल व बिल्वपत्र चढ़ाते हुए यह शिव मंत्र बोलें व रुद्राक्ष की माला से जप भी करें। तीन शब्दों का यह मंत्र महामंत्र है।

चौथा मंत्र :

👉 संकटमोचन मंत्र : ॐ हं हनुमते नम:।

मंत्र प्रभाव :
यदि दिल में किसी भी प्रकार की घबराहट, डर या आशंका है तो निरंतर प्रतिदिन इस मंत्र का जप करें और फिर निश्चिंत हो जाएं। किसी भी कार्य की सफलता और विजयी होने के लिए इसका निरंतर जप करना चाहिए। यह मंत्र आत्मविश्वास बढ़ाता है।

हनुमानजी को सिंदूर, गुड़-चना चढ़ाकर इस मंत्र का नित्य स्मरण या जप सफलता व यश देने वाला माना गया है। यदि मृत्युतुल्य कष्ट हो रहा है, तो इस मंत्र का तुरंत ही जप करना चाहिए।

पांचवां मंत्र :

शांति, सुख और समृद्धि हेतु :

भगवान विष्णु के वैसे तो बहुत मंत्र हैं, लेकिन यहां कुछ प्रमुख प्रस्तुत हैं।

1. ॐ नमो नारायण। या श्रीमन नारायण नारायण हरि-हरि।

2. ॐ भूरिदा भूरि देहिनो, मा दभ्रं भूर्या भर। भूरि घेदिन्द्र दित्ससि।।

ॐ भूरिदा त्यसि श्रुत: पुरूत्रा शूर वृत्रहन्। आ नो भजस्व राधसि।।

3. ॐ नारायणाय विद्महे।

वासुदेवाय धीमहि।

तन्नो विष्णु प्रचोदयात्।।

4.

त्वमेव माता च पिता त्वमेव।

त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।।

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव।

त्वमेव सर्व मम देवदेव।।

5.

शांताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशम्।

विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।।

लक्ष्मीकान्तंकमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्।

वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।।

मंत्र प्रभाव :

भगवान विष्णु को जगतपालक माना जाता है। वे ही हम सभी के पालनहार हैं इसलिए पीले फूल व पीला वस्त्र चढ़ाकर उक्त किसी एक मंत्र से उनका स्मरण करते रहेंगे, तो जीवन में सकारात्मक विचारों और घटनाओं का विकास होकर जीवन खुशहाल बन जाएगा। विष्णु और लक्ष्मी की पूजा एवं प्रार्थना करते रहने से सुख और समृद्धि का विकास होता है।

छठा मंत्र :

मृत्यु पर विजय के लिए महामृंत्युजय मंत्र :

👉 ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिंपुष्टिवर्द्धनम्।

उर्वारुकमिव बन्धानान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्।।

मंत्र प्रभाव :
शिव का महामृंत्युजय मंत्र मृत्यु व काल को टालने वाला माना जाता है इसलिए शिवलिंग पर दूध मिला जल, धतूरा चढ़ाकर यह मंत्र हर रोज बोलना संकटमोचक होता है। यदि आपके घर का कोई सदस्य अस्पताल में भर्ती है या बहुत ज्यादा बीमार है तो नियमपूर्वक इस मंत्र का सहारा लें। बस शर्त यह है कि इसे जपने वाले को शुद्ध और पवित्र रहना जरूरी है अन्यथा यह मंत्र अपना असर छोड़ देता है।

यह होता है तंत्र विद्या

    हिन्दू धर्म के साथ ही बौद्ध और जैन धर्म में भी इस विद्या का प्रचलन है। 
आओ जानते हैं कि तंत्र विद्या के कुछ रहस्य...


1. तंत्र में शरीर है महत्वपूर्ण : साधारण अर्थ में कहा जाय तो तंत्र का अंर्थ तन से, मंत्र का अर्थ मन से और यंत्र का अर्थ किसी मशीन या वस्तु से होता है। तंत्र का एक दूसरा अर्थ होता है व्यवस्था। तंत्र मानता है कि हम शरीर में है यह एक वास्तविकता है। भौतिक शरीर ही हमारे सभी कार्यों का एक केंद्र है। अत: इस शरीर को हर तरह से तृप्त और स्वस्थ रखना अत्यंत जरूरी है। इस शरीर की क्षमता को बढ़ाना जरूरी है। इस शरीर से ही अध्यात्म को साधा जा सकता है। योग भी यही कहता है।



आजकल प्रायः मारण,उच्चाटन, वशीकरण आदि के लिए अनेकों प्रकार की सिद्धियों आदि के लिए तंत्र क्रियाओं को किया जाता है।यह शास्त्र मुख्यरूप से शाक्तों का ही रूप है।प्रायः अर्थहीन होकर एकाक्षरी हुआ करता है।जैसे ऐं,ह्रीं, क्लीं, श्रीं,शूं इत्यादि।
तांत्रिक मंत्र वह है जिसका उपयोग पूजा (पूजा) में और समस्याओं को हल करने में मदद के लिए किया जाता है । तांत्रिक मंत्रों की एक विस्तृत श्रृंखला है, प्रत्येक को किसी विशेष समस्या को हल करने के लिए डिज़ाइन किया गया यह विशेष महत्व का योगविद्या है।इसे बहुत आसान नहीं कहा जा सकता है।बिना किसी विद्वान गुरु की उपस्थित में कभी किसी भी तंत्र को नहीं सीखना चाहिए।इस दौरान बहुत बड़े संकट में पड़ सकते हैं।जबकि मंत्र के जाप करने के लिए आप स्वयं भी एकाग्रचित्त होकर मंत्र जाप कर सकते हैं।


मंत्र तीन प्रकार के होते हैं वैदिक मंत्र, तांत्रिक मंत्र और शाबर मंत्र. शाबर मंत्र से ज्ञान, मोक्ष ही नहीं बल्कि सांसारिक कार्य और सिद्धि प्राप्त की जा सकती है. शाबर मंत्र से तुरंत, विश्वसनीय, अच्छे और पूर्ण रूप से कार्य सिद्ध होते है.

भारत ही नहीं दुनियाभर में बहुत से लोग इस साबर मंत्र के नाम से अनभिज्ञ होते हैं।लेकिन जो इसके साधक हैं वे इसके बलबूते दुनियाँ को बदलने की ताकत रखते हैं।जैसे शंकर जी,हनुमानजी एवं इस कलयुग में बाबा गोरखनाथ जी ।
यह वह मंत्र होता है जो कि पारंपरिक योग भाषा संस्कृत से परे होती है।इसे किसी भाषा में लिखा व पढ़ा जा सकता है।या यूं कह लीजिये कि आम बोलचाल की गँवई भाषा में भी इसे सीखा तथा सिद्ध किया जा सकता है।




  मंत्र साधना भी एक विज्ञान की तरह ही होता है और अगर इसे सिद्ध कर लिया जाता है तो यह बहुत ही प्रभावशाली साबित होता है।

तंत्र- मंत्र - यंत्र

तंत्र का अर्थ तन से होता है, मंत्र का अर्थ मन से यंत्र का अर्थ होता यंत्रों या मशीनों से लगा हुआ होता है।

तंत्र-मंत्र  :-    

मंत्र एवं तंत्र ये दोनों शब्द अलग अलग भाव और अर्थ लिए हैं।तंत्र विद्या के द्वारा तन को तनाव मुक्त भी किया जाता है और तनाव ग्रस्त भी ।मंत्र वह होता है जो मन के तंत्र को ताड़ दे,वह मंत्र होता है।


हिन्दू धर्मशास्त्रों में विस्तार पूर्वक इसका वर्णन ढूंढने से मिल सकता है।हम थोड़ा सा अंश यहां लिखकर समझते हैं।


मंत्र का अर्थ क्या है?



  'मंत्र' का अर्थ होता है , मन को एक तंत्र में बांधना।

   यदि अनावश्यक और अत्यधिक विचार उत्पन्न हो रहे हैं और जिनके कारण चिंता पैदा हो रही है, तो मंत्र सबसे कारगर औषधि है। आप जिस भी ईष्टदेव या देवी देवता भगवान की पूजा, प्रार्थना या ध्यान करते हैं, उसके नाम का जप सकते हैं।यह जपनाम ही वह मंत्र है जिससे आपके मन को शांति मिलती है।आब आप चाहे रामराम जपिये या राधेराधे कहिये।बात वही है,।वह हमारे जोभी ईष्ट देव हैं, हमारे मन की वह सब समझते हैं और इसलिए हमारी भाषा चाहे जोभी हो;उन्हें समझने में कोई भूल नहीं होती है।

मंत्र कितने प्रकार के होते हैं?


अब यहाँ मंत्र भी कई श्रेणियों में समझने के लिए आप बाँट सकते हैं।विद्वान लोगों के द्वारा बताया गया है कि
मंत्र 3 प्रकार के होते हैं।

1-सात्विक,

2- तांत्रिक और

3-साबर।

      सभी मंत्रों का अपना-अलग अलग महत्व समझाया गया है।

   1-सात्विक मंत्र :-   

प्रतिदिन जपने वाले मंत्रों को सात्विक मंत्र माना जाता है। आओ जानते हैं कि ऐसे कौन से मंत्र हैं जिनमें से किसी एक को प्रतिदिन जपना चाहिए, जिससे मन की शक्ति ही नहीं बढ़ती, बल्कि सभी संकटों से मुक्ति भी मिलती है।


    इन मंत्रों के जप या स्मरण के वक्त सामान्य पवित्रता का ध्यान रखना होता है। जैसे घर में हो तो देवस्थान में बैठकर, कार्यालय में हो तो पैरों से जूते-चप्पल उतारकर इन मंत्र को पढ़ते हुए देवताओं का ध्यान करना चाहिए। बताया जाता है कि इससे मानसिक बल प्राप्त होता है
जो हमारे भीतर आत्मविश्वास बढ़ाने में मददगार साबित होता है।

कुछ मंत्र हमनें यहाँ लिया है तो यदि आप चाहते हैं तो इसे कंठस्थ करके जाप कर सकते हैं।

👉 क्लेशनाशक मंत्र : कृष्णाय वासुदेवाय हरये परमात्मने। प्रणत क्लेशनाशाय गोविन्दाय नमो नम:॥

मंत्र प्रभाव :

इस मंत्र का नित्य जप करने से कलह और क्लेशों का अंत होकर परिवार में खुशियां वापस लौट आती हैं।

दूसरा मंत्र :

👉 शांतिदायक मंत्र : श्री राम, जय राम, जय जय राम

मंत्र प्रभाव :
हनुमानजी भी राम नाम का ही जप करते रहते हैं। कहते हैं राम से भी बढ़कर श्रीराम का नाम है। इस मंत्र का निरंतर जप करते रहने से मन में शांति का प्रसार होता है, चिंताओं से छुटकारा मिलता है तथा दिमाग शांत रहता है। राम नाम के जप को सबसे उत्तम माना गया है। यह सभी तरह के नकारात्मक विचारों को समाप्त कर देता है और हृदय को निर्मल बनाकर भक्ति भाव का संचार करता है।

तीसरा मंत्र :

👉 चिंता मुक्ति मंत्र : ॐ नम: शिवाय।

मंत्र प्रभाव :

इस मंत्र का निरंतर जप करते रहने से चिंतामुक्त जीवन मिलता है। यह मंत्र जीवन में शांति और शीतलता प्रदान करता है। शिवलिंग पर जल व बिल्वपत्र चढ़ाते हुए यह शिव मंत्र बोलें व रुद्राक्ष की माला से जप भी करें। तीन शब्दों का यह मंत्र महामंत्र है।

चौथा मंत्र :

👉 संकटमोचन मंत्र : ॐ हं हनुमते नम:।

मंत्र प्रभाव :

यदि दिल में किसी भी प्रकार की घबराहट, डर या आशंका है तो निरंतर प्रतिदिन इस मंत्र का जप करें और फिर निश्चिंत हो जाएं। किसी भी कार्य की सफलता और विजयी होने के लिए इसका निरंतर जप करना चाहिए। यह मंत्र आत्मविश्वास बढ़ाता है।

हनुमानजी को सिंदूर, गुड़-चना चढ़ाकर इस मंत्र का नित्य स्मरण या जप सफलता व यश देने वाला माना गया है। यदि मृत्युतुल्य कष्ट हो रहा है, तो इस मंत्र का तुरंत ही जप करना चाहिए।

पांचवां मंत्र :

शांति, सुख और समृद्धि हेतु :

भगवान विष्णु के वैसे तो बहुत मंत्र हैं, लेकिन यहां कुछ प्रमुख प्रस्तुत हैं।

1. ॐ नमो नारायण। या श्रीमन नारायण नारायण हरि-हरि।

2. ॐ भूरिदा भूरि देहिनो, मा दभ्रं भूर्या भर। भूरि घेदिन्द्र दित्ससि।।

ॐ भूरिदा त्यसि श्रुत: पुरूत्रा शूर वृत्रहन्। आ नो भजस्व राधसि।।

3. ॐ नारायणाय विद्महे।

वासुदेवाय धीमहि।

तन्नो विष्णु प्रचोदयात्।।

4.

त्वमेव माता च पिता त्वमेव।

त्वमेव बन्धुश्च सखा त्वमेव।।

त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव।

त्वमेव सर्व मम देवदेव।।

5.

शांताकारं भुजगशयनं पद्मनाभं सुरेशम्।

विश्वाधारं गगनसदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम्।।

लक्ष्मीकान्तंकमलनयनं योगिभिर्ध्यानगम्यम्।

वन्दे विष्णुं भवभयहरं सर्वलोकैकनाथम्।।

मंत्र प्रभाव :


भगवान विष्णु को जगतपालक माना जाता है। वे ही हम सभी के पालनहार हैं इसलिए पीले फूल व पीला वस्त्र चढ़ाकर उक्त किसी एक मंत्र से उनका स्मरण करते रहेंगे, तो जीवन में सकारात्मक विचारों और घटनाओं का विकास होकर जीवन खुशहाल बन जाएगा। विष्णु और लक्ष्मी की पूजा एवं प्रार्थना करते रहने से सुख और समृद्धि का विकास होता है।

छठा मंत्र :

मृत्यु पर विजय के लिए महामृंत्युजय मंत्र :


👉 ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिंपुष्टिवर्द्धनम्।

उर्वारुकमिव बन्धानान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्।।

मंत्र प्रभाव :

शिव का महामृंत्युजय मंत्र मृत्यु व काल को टालने वाला माना जाता है इसलिए शिवलिंग पर दूध मिला जल, धतूरा चढ़ाकर यह मंत्र हर रोज बोलना संकटमोचक होता है। यदि आपके घर का कोई सदस्य अस्पताल में भर्ती है या बहुत ज्यादा बीमार है तो नियमपूर्वक इस मंत्र का सहारा लें। बस शर्त यह है कि इसे जपने वाले को शुद्ध और पवित्र रहना जरूरी है अन्यथा यह मंत्र अपना असर छोड़ देता है।

यह होता है तंत्र विद्या


    हिन्दू धर्म के साथ ही बौद्ध और जैन धर्म में भी इस विद्या का प्रचलन है। 
आओ जानते हैं कि तंत्र विद्या के कुछ रहस्य...


1. तंत्र में शरीर है महत्वपूर्ण : 
       साधारण अर्थ में कहा जाय तो तंत्र का अंर्थ तन से, मंत्र का अर्थ मन से और यंत्र का अर्थ किसी मशीन या वस्तु से होता है। तंत्र का एक दूसरा अर्थ होता है व्यवस्था। तंत्र मानता है कि हम शरीर में है यह एक वास्तविकता है। भौतिक शरीर ही हमारे सभी कार्यों का एक केंद्र है। अत: इस शरीर को हर तरह से तृप्त और स्वस्थ रखना अत्यंत जरूरी है। इस शरीर की क्षमता को बढ़ाना जरूरी है। इस शरीर से ही अध्यात्म को साधा जा सकता है। योग भी यही कहता है।


तांत्रिक मंत्र साधना

       आजकल प्रायः मारण,उच्चाटन, वशीकरण आदि के लिए अनेकों प्रकार की सिद्धियों आदि के लिए तंत्र क्रियाओं को किया जाता है।यह शास्त्र मुख्यरूप से शाक्तों का ही रूप है।प्रायः अर्थहीन होकर एकाक्षरी हुआ करता है।जैसे ऐं,ह्रीं, क्लीं, श्रीं,शूं इत्यादि।
तांत्रिक मंत्र वह है जिसका उपयोग पूजा (पूजा) में और समस्याओं को हल करने में मदद के लिए किया जाता है । तांत्रिक मंत्रों की एक विस्तृत श्रृंखला है, प्रत्येक को किसी विशेष समस्या को हल करने के लिए डिज़ाइन किया गया यह विशेष महत्व का योगविद्या है।इसे बहुत आसान नहीं कहा जा सकता है।बिना किसी विद्वान गुरु की उपस्थित में कभी किसी भी तंत्र को नहीं सीखना चाहिए।इस दौरान बहुत बड़े संकट में पड़ सकते हैं।जबकि मंत्र के जाप करने के लिए आप स्वयं भी एकाग्रचित्त होकर मंत्र जाप कर सकते हैं।


       जैसा कि हमने पहले भी बताया है कि मंत्र तीन प्रकार के होते हैं वैदिक मंत्र (सात्विक), तांत्रिक मंत्र और शाबर मंत्र. शाबर मंत्र से ज्ञान, मोक्ष ही नहीं बल्कि सांसारिक कार्य और सिद्धि प्राप्त की जा सकती है. शाबर मंत्र से तुरंत, विश्वसनीय, अच्छे और पूर्ण रूप से कार्य सिद्ध होते है.

साबर मंत्र


          भारत ही नहीं दुनियाभर में बहुत से लोग इस साबर मंत्र के नाम से अनभिज्ञ होते हैं।लेकिन जो इसके साधक हैं वे इसके बलबूते दुनियाँ को बदलने की ताकत रखते हैं।जैसे शंकर जी,हनुमानजी एवं इस कलयुग में बाबा गोरखनाथ जी ।
यह वह मंत्र होता है जो कि पारंपरिक योग भाषा संस्कृत से परे होती है।इसे किसी भाषा में लिखा व पढ़ा जा सकता है।या यूं कह लीजिये कि आम बोलचाल की गँवई भाषा में भी इसे सीखा तथा सिद्ध किया जा सकता है।


शुक्रवार, 3 नवंबर 2023

मौलवी और गदहा की कहानी


मौलवी साहब और उनका गदहा






किसी नगर में एक बहुत ही पढ़े लिखे मौलवी साहब थे। वे गाँव-गाँव घूम-घूमकर धार्मिक और आलिम की किताबें बेचने का काम काम करते थे।और उससे होने वाली आमदनी ही उनके कमाई का जरिया हुआ करती थी।उनके पास एक गदहा था, जिसकी पीठ पर वे किताबों का गट्ठर लादते और दूर तक बेचने चले जाते थे।ऐसा उनका रोज का काम था।सुबह निकलते तो देर रात लौटते थे।कभी कभी तो जब ज्यादा दूर होते तो उधर ही कहीं मदरसे में ठहर भी जाते थे।


     गर्मी और लू ने जब परेशान कर दिया


 गर्मी का महीना था।कड़ी धूप थी, ऊपर से लू भी चल रही थी।अब मौलवी साहब को गर्मी बरदाश्त नहीं हो रही थी तो एक बाग में सोचे कि चलो थोड़ा आराम फरमा लिया जाय।एक घनी बाग देखकर वे वहाँ पहुंचेऔर अपने गदहे की पीठ से गट्ठरों को उतारकर नीचे जमीन पर रख दिया।और गदहे को भी आराम करने को कहकर छोड़ दिया।गट्ठर उतारकर जब गदहा भी खाली हो गया तो पहले तो उसने जमीन पर लोट लोटकर अपनी गर्म हो चुकी पीठ को थोड़ा राहत महसूस किया।।फिर बगल में जाकर घास चरने लगा।


मौलवी साहब और गदहे की बातचीत


     कुछ देर आराम करने के बाद मौलवी साहब उठे और अपने गदहे को हाँककर लाये और फिर अपने किताबों की गठरी लादने लगे तो उनके गदहे ने उनसे सवाल किया कि आप दिन भर मेरी पीठ पर इतनी ढेरों किताबें लादकर गाँव गाँव घुमाते रहतेहैं।लोगों को उसे पढ़ने के लिए उकसाते भी हैं और तो क्या आप मुझे नहीं पढ़ा सकते हैं?अगर आप मुझे भी थोड़ा थोड़ा पढ़ाते रहते तो आपकी बड़ी मेहरबानी होती। मैं सारा दिन इतनी सारी मोटी मोटी किताबें ढोता रहता हूँ और मुझे खुद ही पढ़ना नहीं आता।मुझे बड़ी शर्मिंदगी महसूस होती है।आप मुझे आखिर क्यों नहीं पढ़ाना चाहते हैं? मौलवी साहब सोचने लगे।कुछ देर तक शांत रहे और नीचे जमीन पर एकटक निहारते रहे।उनके दिमाग में अब एक ही सवाल गूंज रहा था कि वे गदहे को कैसे समझायें, उसे क्या जवाब दिया जाय ताकि वो समझ सके।

मौलवी साहब ने गदहे से क्या कहा

      बेचारा गधा चुपचाप मौलवी साहब के पास ही खड़ा था।जब मौलवी साहब कुछ नहीं बोले तो उस गधे ने ही मौलवी साहब को फिर टोका।अरे आप चुप क्यों हो गये, अरे नहीं पढ़ा सकते तो मत पढ़ाइये।इसमें इतना सोचने की क्या बात है? अब मौलवी साहब को लगा कि यह इतनी आसानी से मानने वालों में नहीं है,इसलिये इसे समझाना पड़ेगा।तब वे अपने गदहे से कहे कि " दरअसल बात ये है, कि मैं तुम्हें क्यों नहीं पढ़ाता,जानते हो;मुझे डर है कि अगर तुम पढ़लिख लोगे तो मेरा यह गठरी नहीं ढोवोगे।" बस यही कारण है कि हमने कभी तुम्हारे बारे में नहीं सोचा।हम हमेशा अपने बारे में ही सोचते रहे। 


गदहे का ठहाका

       तब गदहा जोरदार ठहाका लगाकर हेंकने लगा। कहा कि वाह मालिक, आपतो बहुत धन्य हो।मैंने हमेशा आपको अपना हितैषी समझता रहा लेकिन आप तो मुझे सिर्फ अपने मकसद के लिए इस्तेमाल करते रहे। हम गदहा के गदहा ही रहे और आपके गठरी मार खाकर भी ढोते रहे।


कहानी से मिलने वाली शिक्षा

          कहानी से मिलने वाली शिक्षा

         इस कहानी से यह सीख मिलती है कि कुछ लोग हमेशा हमारा आपका सबका खूब शोषण करते हैं और वक्त आने पर किनारा कस लेते हैं।इसलिए हमें भी जागरूक होना चाहिये।आँखें बंद करके किसी पर भरोसा नहीं किया जा सकता।इस समाज में बहुत से लोग ऐसे हैं जो अपने नीजी स्वार्थ के लिए गरीबों का, अपने से कमजोर लोगों का खूब शोषण करते हैं।और कभी यह नहीं चाहते कि दूसरे लोग भी तरक्की करें और आगे बढ़ें।हमेशा दबाकर रखना चाहते हैं।उनकी सोच इतनी घटिया होती है कि वे अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर सिर्फ अपने बारे में ही सोचते हैं।अतः ऐसे लोगों से स्वयं सतर्क रहना चाहिए।हमें अपभी अपना लाभहानि समझना चाहिये।ऐसा नहीं कि हम अपना जीवन दूसरों की भलाई में ही बिता दें और जब हमारी बारी आये तो हम कहीं के न रहें।

     यह कहानी आपको कैसी लगी कमेंट करके जरूर बतायें।





किसी नगर में एक बहुत ही पढ़े लिखे मौलवी साहब थे। वे गाँव-गाँव घूम-घूमकर धार्मिक और आलिम की किताबें बेचने का काम काम करते थे।और उससे होने वाली आमदनी ही उनके कमाई का जरिया हुआ करती थी।उनके पास एक गदहा था, जिसकी पीठ पर वे किताबों का गट्ठर लादते और दूर तक बेचने चले जाते थे।ऐसा उनका रोज का काम था।सुबह निकलते तो देर रात लौटते थे।कभी कभी तो जब ज्यादा दूर होते तो उधर ही कहीं मदरसे में ठहर भी जाते थे।


     गर्मी और लू ने जब परेशान कर दिया


 गर्मी का महीना था।कड़ी धूप थी, ऊपर से लू भी चल रही थी।अब मौलवी साहब को गर्मी बरदाश्त नहीं हो रही थी तो एक बाग में सोचे कि चलो थोड़ा आराम फरमा लिया जाय।एक घनी बाग देखकर वे वहाँ पहुंचेऔर अपने गदहे की पीठ से गट्ठरों को उतारकर नीचे जमीन पर रख दिया।और गदहे को भी आराम करने को कहकर छोड़ दिया।गट्ठर उतारकर जब गदहा भी खाली हो गया तो पहले तो उसने जमीन पर लोट लोटकर अपनी गर्म हो चुकी पीठ को थोड़ा राहत महसूस किया।।फिर बगल में जाकर घास चरने लगा।


मौलवी साहब और गदहे की बातचीत


     कुछ देर आराम करने के बाद मौलवी साहब उठे और अपने गदहे को हाँककर लाये और फिर अपने किताबों की गठरी लादने लगे तो उनके गदहे ने उनसे सवाल किया कि आप दिन भर मेरी पीठ पर इतनी ढेरों किताबें लादकर गाँव गाँव घुमाते रहतेहैं।लोगों को उसे पढ़ने के लिए उकसाते भी हैं और तो क्या आप मुझे नहीं पढ़ा सकते हैं?अगर आप मुझे भी थोड़ा थोड़ा पढ़ाते रहते तो आपकी बड़ी मेहरबानी होती। मैं सारा दिन इतनी सारी मोटी मोटी किताबें ढोता रहता हूँ और मुझे खुद ही पढ़ना नहीं आता।मुझे बड़ी शर्मिंदगी महसूस होती है।आप मुझे आखिर क्यों नहीं पढ़ाना चाहते हैं? मौलवी साहब सोचने लगे।कुछ देर तक शांत रहे और नीचे जमीन पर एकटक निहारते रहे।उनके दिमाग में अब एक ही सवाल गूंज रहा था कि वे गदहे को कैसे समझायें, उसे क्या जवाब दिया जाय ताकि वो समझ सके।

मौलवी साहब ने गदहे से क्या कहा

      बेचारा गधा चुपचाप मौलवी साहब के पास ही खड़ा था।जब मौलवी साहब कुछ नहीं बोले तो उस गधे ने ही मौलवी साहब को फिर टोका।अरे आप चुप क्यों हो गये, अरे नहीं पढ़ा सकते तो मत पढ़ाइये।इसमें इतना सोचने की क्या बात है? अब मौलवी साहब को लगा कि यह इतनी आसानी से मानने वालों में नहीं है,इसलिये इसे समझाना पड़ेगा।तब वे अपने गदहे से कहे कि " दरअसल बात ये है, कि मैं तुम्हें क्यों नहीं पढ़ाता,जानते हो;मुझे डर है कि अगर तुम पढ़लिख लोगे तो मेरा यह गठरी नहीं ढोवोगे।" बस यही कारण है कि हमने कभी तुम्हारे बारे में नहीं सोचा।हम हमेशा अपने बारे में ही सोचते रहे। 


गदहे का ठहाका

       तब गदहा जोरदार ठहाका लगाकर हेंकने लगा। कहा कि वाह मालिक, आपतो बहुत धन्य हो।मैंने हमेशा आपको अपना हितैषी समझता रहा लेकिन आप तो मुझे सिर्फ अपने मकसद के लिए इस्तेमाल करते रहे। हम गदहा के गदहा ही रहे और आपके गठरी मार खाकर भी ढोते रहे।


कहानी से मिलने वाली शिक्षा

          कहानी से मिलने वाली शिक्षा

         इस कहानी से यह सीख मिलती है कि कुछ लोग हमेशा हमारा आपका सबका खूब शोषण करते हैं और वक्त आने पर किनारा कस लेते हैं।इसलिए हमें भी जागरूक होना चाहिये।आँखें बंद करके किसी पर भरोसा नहीं किया जा सकता।इस समाज में बहुत से लोग ऐसे हैं जो अपने नीजी स्वार्थ के लिए गरीबों का, अपने से कमजोर लोगों का खूब शोषण करते हैं।और कभी यह नहीं चाहते कि दूसरे लोग भी तरक्की करें और आगे बढ़ें।हमेशा दबाकर रखना चाहते हैं।उनकी सोच इतनी घटिया होती है कि वे अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर सिर्फ अपने बारे में ही सोचते हैं।अतः ऐसे लोगों से स्वयं सतर्क रहना चाहिए।हमें अपभी अपना लाभहानि समझना चाहिये।ऐसा नहीं कि हम अपना जीवन दूसरों की भलाई में ही बिता दें और जब हमारी बारी आये तो हम कहीं के न रहें।

     यह कहानी आपको कैसी लगी कमेंट करके जरूर बतायें।


लेबल:

तुलसीदास का जीवन परिचय

 तुलसीदास जी का जीवन परिचय

भगवान राम की भक्ति में अपना जीवन लगादेने वाले एक भक्त की कहानी है, जिन्होंने अपनी भक्ति और शक्ति के बलबूते इस कलयुग में हनुमानजी की कृपा से भगवान श्रीराम और लक्ष्मण के उस रूप में दर्शन पाये जिस रुप में वे हाथों में धनुष बाण लिए  दर्शन करने की इच्छा प्रकट किया।


जन्म


पालन पोषण

  


शिक्षा


विवाह


पत्नी से अथाह प्रेम


रामभक्ति के लिए घरबार छोड़ दिया


हनुमानजी के दर्शन हुये


भगवान भोलेनाथ की इच्छा से काशी में ही रहकर श्री राम चरित मानस लिख दिया


चित्रकूट में भगवान श्रीराम के दर्शन

बुधवार, 1 नवंबर 2023

करवा चौथ व्रतकथा

 करवा चौथ मनाने की असली कहानी।

 



जयसियाराम।
सज्जनों हम भारत में रहते हैं तो भारत की ही एक ऐसी  कथा सुनाते हैं,जिसका आजकल बहुत ज्यादा महत्व बढ़ता जा रहा है।पिछले कुछ सालों से यहाँ कुछ विशेष व्रत और त्योहार मनाया जाने लगा है।जैसा कि आप सभी को मालूम है कि भारत देश एक बहुत बड़े भूभाग पर फैला हुआ है और उसके कई छोटे छोटे राज्य हैं तो हर राज्य की कुछ अलग अलग धारणाएं भी हैं।कहीं कोई त्योहार मनाया जाता है तो कहीं कोई दूसरा।कहीं होलिका दहन करके उसके अगले दिन रंगों से होली खेलते हैं तो कहीं ऐसा कोई त्योहार होता ही नहीं। कुछ साल पहले हमारे यहाँ गाँव में यह करवा चौथ या छठ पर्व ये सब नहीं मनाया जाता था और यहाँ पर महिलाओं के इस पर्व के बारे में कुछ पता भी नहीं था।लेकिन धीरे धीरे यहाँ वहाँ पर-परदेश में आने जाने वाले लोग जब अपनी बीवी बच्चे लेकर रहने लगे तो वहाँ की कुछ परंपराओं को देखकर वे महिलाएं जब अपने गाँव आती हैं तो उस पर्व या त्योहार के बारे में अपने आसपास की महिलाओं के साथ बैठकर बतियाती हैं।देखो जहाँ हम लोग रहते थे वहाँ फलां तिथि को फलां त्योहार ऐसे ढंग से मनाया जाता है और उसकी विधि ऐसे ऐसे की जाती है।और ये कथा है उसकी।तो इस तरह से ये परंपरा लगभग पूरे देश में ऐसे ही प्रचलित होते हुए लगभग हर जगह कमबेस मनाते हैं।
अब महिलाओं में एक खास गुण होता है कि वे बेशक किसी पर्व को या त्योहार को लेकर पूरी जानकारी उनके पास न हो,लेकिन अगर उन्हें पता चल गया कि इस दिन इस व्रत को करने से उन्हें अच्छा पति मिलेगा, उसका अच्छा स्वभाव रहेगा, वह अपने पत्नी से बहुत प्रेम करनेवाला होगा।इस दिन इस व्रत को करने से उसका सुहाग दिर्घायु प्राप्त कर लेगा, बस वे  शुरू हो जाती हैं।
आपने देखा होगा महिलाओं का सारा व्रत सारा उपवास या तो पति के लिए या पुत्र के लिए ही होती है लेकिन पत्नी के लिए कोई भी पति कभी कोई व्रत नहीं रखता।
हर भारतीय नारी सदा सुहागिन ही मरना चाहती है और इसीलिए उसके सारे व्रत की दीर्घायु के लिए ही होते हैं।कहानियां थोड़ा बदल बदल कर लोग सुनते सुनाते रहती हैं।आजकल जबसे सबके हाथ में मोबाइल और इंटरनेट आया है तब से महिलाओं के अंदर भक्ति भाव कुछ ज्यादा ही बढ़ने लगा है।

करवा चौथ व्रत कथा

अब सुनते हैं करवा चौथ से जुड़ी हुई वह कहानी जो हम सुनाने वाले थे।तो आइये सुनते हैं कहानी करवा चौथ की।


अखंड सौभाग्य का व्रत करवा चौथ सुहागिन महिलाओं के लिए सबसे महत्वपूर्ण दिन होता है। पति की दीर्घायु एवं अखण्ड सौभाग्य की प्राप्ति के लिए इस दिन गणेश भगवान की पूजा अर्चना सुहागिन महिलाओं द्वारा की जाती है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को  सुहागिन स्त्रियों द्वारा अपने पति के जीवन रक्षा के लिए और उनके अमर प्रेम को बने रहने के लिए यह व्रत रखती हैं।

करवा चौथ मनाने की असली कहानी

पौराणिक कथा के अनुसार, कहीं किसी नगर में करवा नाम की एक पतिव्रता स्त्री थी। उनका पति एक दिन नदी में स्नान करने गया तो नहाते समय एक मगरमच्छ ने उसका पैर पकड़ा लिया। उसने अपनी पत्नी करवा को सहायता के लिए बुलाया करवा के सतीत्व में काफी बल था। नदी के तट पर अपने पति के पास पहुंचकर अपने तपोबल से उस मगरमच्छ को बांध दिया। फिर करवा मगरमच्छ को लेकर यमराज के पास पहुंची।

अखंड सौभाग्यवती पतिव्रता नारी की जिद

     यमराज ने करवा से पूछा कि हे देवी आप यहां क्या कर रही हैं और आप चाहती क्या हैं। करवा ने यमराज से कहा कि इस मगरमच्छ ने मेरे पति के पैर को नदी में स्नान करते समय पकड़ लिया था इसलिए आप अपनी शक्ति से इसको मृत्युदंड दें और उसको नरक में ले जाएं। यमराज ने करवा से कहा कि अभी इस मगर की आयु शेष हैं , इसलिए वह समय से पहले इस मगरमच्छ को मृत्यु नहीं दे सकते।इस पर करवा ने कहा कि  " अगर आप इस दुष्ट मगरमच्छ को मारकर मेरे पति को चिरायु होने का वरदान नहीं देंगे तो मैं अपने तपोबल के माध्यम से आपको ही नष्ट कर दूंगी।" करवा माता की बात को सुनकर यमराज के पास खड़े चित्रगुप्त सोच में पड़ गए। क्योंकि करवा के सतीत्व के कारण ना तो वह उसको शाप दे सकते थे और ना ही उसके वचन को अनदेखा कर सकते थे। तब उन्होंने मगरमच्छ को यमलोक भेज दिया और उसके पति को चिरायु का आशीर्वाद दे दिया। साथ ही चित्रगुप्त ने उस सती करवा को आशीर्वाद दिया कि  "हे सती, जाओ, मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूँ । तुम्हारा पारिवारिक जीवन सुख-समृद्धि से भर जायेगा।अब तुम घर जाओ।"

चित्रगुप्त ने आगे कहा कि "जिस तरह तुमने अपने तपोबल से अपने पति के प्राणों की रक्षा की है, उससे मैं बहुत प्रसन्न हूं। मैं तुम्हें वरदान देता हूं कि आज की तिथि के दिन जो भी महिला पूर्ण विश्वास के साथ तुम्हारा व्रत और पूजन करेगी, उसके सौभाग्य की रक्षा मैं करूंगा।"

        उसदिन कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि होने के कारण करवा और चौथ मिलने से इसका नाम करवा चौथ पड़ा। इस तरह मां करवा पहली महिला हैं, जिन्होंने अपने सुहाग की रक्षा के लिए न केवल व्रत किया बल्कि करवा चौथ की शुरुआत भी उनके ही नाम से शुरू की गई।
कहा जाता है कि इसके बाद भगवान श्रीकृष्ण के कहने पर द्रौपदी ने भी इस व्रत को किया था, जिसका उल्लेख वारह पुराण में मिलता है।

क्या है करवा चौथ का व्रत विधि

प्रातः स्नान करके अपने सुहाग (पतिदेव)की लंबी आयु, आरोग्य एवं सौभाग्य का संकल्प लेकर दिनभर निराहार रहें। करवा चौथ के व्रत को करने के बाद शाम को पूजा करते समय माता करवा चौथ  व्रतकथा पढ़ना  या सुनना चाहिए। साथ ही माता करवा से विनती करनी चाहिए कि हे मां, जिस प्रकार आपने अपने सुहाग और सौभाग्य की रक्षा की, उसी तरह हमारे सुहाग की भी रक्षा करें। साथ ही यमराज और चित्रगुप्त से विनति करें कि वह अपना व्रत निभाते हुए हमारे व्रत को स्वीकार करें और हमारे सौभाग्य की रक्षा करें।

     पति अपने हाथ से पानी पिलाकर पत्नियों के व्रत खुलवाते हैं।



 
जो सुहागिन महिलायें इस व्रत को रखती हैं ,सारा दिन निर्जला रहकर रात्रि में चाँद देखकर अपना व्रत उपवास तोड़ती हैं।पति को सामने खड़ा कर उन्हें चलनी से देखकर पुनः अपने सम्पूर्ण श्रृंगार से सजधजकर उनकी आरती उतारने के पश्चात उनके पति अपने हाथों से जल पिलाकर पत्नी का व्रत तुड़वाते हैं।  फिर वह रात्रि उनके लिए बहुत खास हो जाती है।यूं कहें तो करवा चौथ के पारन वाली वह रात सुहागरात से कुछ कम नहीं होती।

करवा चौथ को मनाने के लिए एक दूसरी कथा भी है जो कुछ इस प्रकार है।


साहूकार की बेटी की व्रत तोड़ने की कथा

जैसा कि हर त्योहार के पीछे कोई न कोई कहानी जुड़ी रहती है और उसके अनेकों तर्क वितर्क भी होते रहते हैं।कुछ लोग करवा चौथ की एक दूसरी कथा सुनाते हैं जो कुछ इस प्रकार से है।
   किसी नगर में एक साहुकार रहते थे उनके सात पुत्र और एक पुत्री थी।सातों भाई अपनी बहन को बहुत लाड़प्यार करते थे।कथा के अनुसार बहन अपनी ससुराल से मायके यानी अपने नइहर भाइयों के घर आयी हुई थी।उस दिन अपनी भउजाइयों (भाभीजी) के देखादेखी यह भी अपने पति की लम्बी उम्र के लिए व्रत की हुई थी।शाम होने के पश्चात जब सातो भाई भोजन करने बैठे तो बहन से भी साथ में बैठकर भोजन करने के लिए कहने लगे तो बहन ने कहा कि भइया आपलोग भोजन कर लीजिये मैं बाद में चाँद देखने के पश्चात भोजन कर लूँगी।आपलोग मेरी चिंता छोड़कर भोजन कर लीजिए।
   भाई नहीं माने और घर से कुछ ही दूरी पर जाकर  छिपकरआग जलाकर उजाला कर दिया और आकर अपनी बहन से बोले कि बहन देख चाँद उग चुका है और उसका प्रकाश धीरे धीरे आने लगा है तो चलकर अपना व्रत तोड़कर साथ में बैठकर भोजन करतेहैं।
बहन भाइयों के झाँसे में आकर व्रत को तोड़ दिया और भोजन करने बैठ गई।भौजाइयों ने तब अपनी ननद को रोकना चाहा और उनके भाइयों की करतूतें बयां कर दिया कि अभी चाँद नहीं निकला है और यह प्रकाश तुम्हारे भाइयों ने छल से लकड़ी जलाकर तुम्हें भ्रमित करने के लिए ऐसा किया है लेकिन वह अनसुनी कर भोजन कर व्रत तोड़ दिया।

पति की मृत्यु के पश्चात उसे जीवन दान मिला

  कहा जाता है कि इससे गणेश जी नाराज हो गए और उसका पति मर गया।इसपर उस स्त्री ने करवा माता से विनती किया कि हे करवा माता मुझसे भूल हो गई थी आप मेरे पति को जिंदा कर दो।
करवाचौथ माता बोली कि तुम तो बड़ी भुक्खड़ हो,और थोड़ी देर भी भूख बरदाश्त नहीं कर सकी।अब तुम तो अपने सात सात भाइयों की प्यारी इकलौती बहन हो तुम्हें पति की क्या आवश्यकता है।वह सात भाइयों वाली इकलौती बहन ने चौथ माता के पाँव पकड़ लिया और खूब रोई तब चौथ माता की कृपा से उसका पति पुनः जीवित हो गया।और जब यह समाचार लोगों को पता चला तो चारों ओर करवा चौथ माता की जयजयकार होने लगी।




      करवा चौथ का व्रत  आते ही बाजार मिट्टी के करवा एवं महिलाओं के सोलह श्रिंगार के सामान से सज जाते हैं। इसके लिए साड़ी शोरूम, चूड़ी बाजार, पार्लर, मेहंदी के साथ ही सजकर तैयार हो जाते हैं। बाजार में महिलाओं में खासा उत्साह भी दिखने लगता है। हर वर्ग करवा चौथ मना सके इसके लिए बाजार में उसकी बजट में सामान उपलब्ध हो जाता है


करवा चौथ मनाने की कोई कथा किसी वेद,शास्त्र, उपनिषद या किसी धार्मिक ग्रंथ में नहीं है।

 




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