गुरुवार, 19 दिसंबर 2024

सरहद पार आनलाइन प्यार

ये तो फितरत है काँटों की, चुभेंगे ही चुभेंगे
गलती आपकी है, सम्हलकर नहीं चलते।।
उम्मीद रखते हो झूठी, साथ काँटों से है मेरा
मैने बचपन से साथ रहकर जीना है सीखा।

लोग यूं ही नहीं कहते,मोहब्बत अंधी होती है,
ये अंधीभी होती है और बहरी भी होती है।।
ये हमें पता तब चला, जब हमें बचपन में ही
बुखार इश्क का चढ़ा और दिल हार बैठे।।

मुहब्बत के जाल में इस कदर उलझ गए हम,
रातें गुजर जातीं, बातें खतम नहीं होती थीं।।
दो साल इश्क की दास्तां बतियाते ही रह गये
कभी उन्हें सुनते रहे तो कभी सुनाते ही रहे।।

बड़ा फर्क था, हमारी उम्र में वो फासला था
फिर भी कहूँ कसम से बड़ा लुत्फ़ था उसमें
हम कँवारे थे अभी लेकिन जो बेगम थी हमारी
एक दो नहीं, चार चार बच्चों की मां थीं बेचारी।।

बड़ी फुरसत में उसको तराशा गया था
साँचे में उसको ऐसा ढाला गया था।
जो नजरें मिलीं तो हटाये,हटती नहीं थीं
आँखों की दरिया में डूब जानेको जी चाहता था।।

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आँखें शराबी, मदहोश कर रही थीं
होठों की लाली जोश भर रही थीं
जुल्फें की काली घटाओं में चाँद चमकता था
कभी छुप जाता तो कभी बाहर निकलता था।।

मैं बेबस लाचार था ,मानों सपनों में जी रहा था
होंठ उसके लाल गुलाब की पंखुड़ियां मुझे लगते
मुझे बला की खूबसूरत वो लगने लगी थी
अब देखकर दूर से जी भरता नहीं था।

पास से बार बार छूने को जी चाहता था।
डूबकर आंखों में  कुछ नजारे देखना था।
मैं जा नहीं सकता, वो आ नहीं सकती थी
बीच धारे में मोहब्बतें हिचकोले खारही थीं।।

आनलाइन मुहब्बत हुई थी हमें यूं
स्क्रीन पर नजरें लड़ी थी कुछ यूं
मिलने मिलाने की बारी जब आयी
सरहदों की बंदिशें रोड़ा बनरही थीं।

सरहदें पार करना मेरे बस में नहीं था
मैंने शादी के लड्डू चखा भी नहीं था
मैंने उन्हीं से कहा कि तोड़कर सारे रिश्ते
चली आओ पास मेरे,वहाँ से अगर तुम।

तब उसने उस खादिम को अपने
छोड़कर भारत आने की ठानी,
जिसने कुछ साल पहले लोगों के सामने
निकाह करके  बनी थी उसकी दुल्हन।

पहले बीवी बनाया, बच्चे भी हो गये थे
घरभी बनाया,पैसे भी खूब दे रहे थे
फिर भी उस दिल में मोहब्बत के शायद
इतने सारे दिये एक साथ कभी ना जले थे।

कुछ ख्वाहिशें अधूरी रह गई थीं शायद
जिसे पूरा करने की तमन्ना लिए थी
एक दिन घरबार बेचकर पैसे जुटाई,
दुबई के रास्ते पहले वो नेपाल आयी।

कहा उसने मुझसे अब तो मेरी जान
आकर के मिललो, मैं बड़ी हूँ परेशाँन
माँग मेरी सजाकर अपनी दुल्हन बना लो
गोदी में भरकर आओ जी भरके खेल लो

जिसके लिए तुम , खुद तड़पते रहे,
उतना ही हमें भीरातदिन तड़पाते रहे
अब और बेचैनी दिल की सही नहीं जाती
तेरे बगैर कहीं भी अब मैं रह नहीं पाती।।

घरबार छोड़ा है, पति को भी छोड़ आयी
बच्चों की ममता ने, साथ उन्हें ले आयी।
जानूँ बड़े होनहार हैं बच्चे बेचारे सब
उन्हें भी सम्हालने की जिम्मेदारी निभानी है।।

चार चार बार मां मैं बेशक बनी हूँ
पर दिल में कभी इतनी चाहत नहीं थी।
जैसे तेरा प्यार मुझे खींचने लगा है
मिलन का नशा ऐसा चढ़ने लगा है।।

कौनसा जादू तेरा, मुझपर चढ़ा है
किताबों में किस्से कितना पढ़ा है।।
सीरी फरहाद को हमनें पढ़ा है
लैला और मजनूँ की दास्तां सुना है।।

सोहनी महिवाल को भी हमनें सुना है
दोनों के प्यार के सारे किस्से पढ़ा है
सोहनी के प्यार में महिवाल ऐसे फँसा था
सोहनी के घर पर वो नौकर बना था।।

बचपन में ब्याहकर गवना जब आयी थी
मिलने के लिए रात में महिवाल से वो आती थी
घड़े बाँधकर नौका रोज बनाती थी
नदी पार करके प्रेमी के पास आती थी

एक दिन शक की सूई उसे चुभ गई
बीचधारे में उसकी नैया है डूबी
इश्क करनेवालों का अंजाम बुरा होता है
बड़ा दर्द होता है मिलन भी अधूरा है।

इश्क का रोग हर रोग से बुरा होता है।
हमभी मोहब्बत की एक नई किताब बनेंगे
छपेंगे किस्से कहानियों में हम भी उन्हीं की तरह
हमारे भी चर्चे हमारी पहचान बनेंगे।।

पहली मोहब्बत की प्यास बस तुम्हीं हो
तुम्हें जी भरके पीने को जी चाहता है।
मानते हैं कि तुम कोई मदिरा नहीं हो
मधुशाला की कोई बाला नहीं हो
मधु की छलकती प्याला भी नहीं हो
बार में थिरकती बारबाला नहीं हो

फिर भी हमें लगता है कि जो जाम तुम हो
मधुशाला के हर जाम में तुम ही तुम हो।
ना मधुशाला में मिलेगा, ना पैमाने में मिलेगा
वो नशा किसी शाकी में ना ही शराब में मिलेगा।
सारी शराब की बोतलें उड़ेल दूँ
सारे मयखाने को जाम में बदल दूँ
फिर भी तेरे हुश्न के आगे वो कुछ भी नहीं हैं।
मेरे लबों को छूकर बस ,चली जा तूँ
कसम है मुहब्बत की मैं होश में नहीं हूँ।।


जाम का पैमाना तेरे लबों से यूं टपकता है
होठों से लगालूँ तो नशा छा जाता है।
मदहोशी का आलम है कुछ कहा नहीं जाता
समन्दर से गहरा इश्क का खुमार होता है।।
सरहदें दो मुल्कों की रोड़ा बन रही थीं
रिश्ते इन मुल्कों के कोई अच्छे नहीं थे
माँगती वीजा मगर मिलने की आश ना थी
तरकीब लगायी तो रास्ता दिखा कुछ ऐसा
पाकिस्तान से भारत सीधे नेपाल से आयी
सीमा पार की सीमा ने लाँघी मर्यादा की हर सीमा
कायम हुई मिसाल सचिन और सीमा के  प्यार की
कौन जानता है किसके नसीब में क्या है
लिखा है जो मुकद्दर में उसे स्वीकार किया है

बहुत से घुसपैठिये भारत में घुसे हैं
नागरिकता भी उन्हें अपनी भारत ने दिये हैं
उन्हें कभी किसी ने उस नजर से क्यों नहीं देखा
जिस नजर से लोग मुझे लोग हर बार देखे हैं
कोई कहता जासूस मुझे, कोई आतंकी बतलाते थे
मेरी बोली भाषा को लेकर मुझपर उंगली उठाये थे
सच कहूँ तो ये दिल बेचारा कब किसपर आ जाये
दिल की कहना दिल ना जाने आँख लड़े दिल तड़पे।

      ✍️   ---  मालचन्द कन्नौजिया बेपनाह



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शुक्रवार, 3 नवंबर 2023

मौलवी और गदहा की कहानी


मौलवी साहब और उनका गदहा






किसी नगर में एक बहुत ही पढ़े लिखे मौलवी साहब थे। वे गाँव-गाँव घूम-घूमकर धार्मिक और आलिम की किताबें बेचने का काम काम करते थे।और उससे होने वाली आमदनी ही उनके कमाई का जरिया हुआ करती थी।उनके पास एक गदहा था, जिसकी पीठ पर वे किताबों का गट्ठर लादते और दूर तक बेचने चले जाते थे।ऐसा उनका रोज का काम था।सुबह निकलते तो देर रात लौटते थे।कभी कभी तो जब ज्यादा दूर होते तो उधर ही कहीं मदरसे में ठहर भी जाते थे।


     गर्मी और लू ने जब परेशान कर दिया


 गर्मी का महीना था।कड़ी धूप थी, ऊपर से लू भी चल रही थी।अब मौलवी साहब को गर्मी बरदाश्त नहीं हो रही थी तो एक बाग में सोचे कि चलो थोड़ा आराम फरमा लिया जाय।एक घनी बाग देखकर वे वहाँ पहुंचेऔर अपने गदहे की पीठ से गट्ठरों को उतारकर नीचे जमीन पर रख दिया।और गदहे को भी आराम करने को कहकर छोड़ दिया।गट्ठर उतारकर जब गदहा भी खाली हो गया तो पहले तो उसने जमीन पर लोट लोटकर अपनी गर्म हो चुकी पीठ को थोड़ा राहत महसूस किया।।फिर बगल में जाकर घास चरने लगा।


मौलवी साहब और गदहे की बातचीत


     कुछ देर आराम करने के बाद मौलवी साहब उठे और अपने गदहे को हाँककर लाये और फिर अपने किताबों की गठरी लादने लगे तो उनके गदहे ने उनसे सवाल किया कि आप दिन भर मेरी पीठ पर इतनी ढेरों किताबें लादकर गाँव गाँव घुमाते रहतेहैं।लोगों को उसे पढ़ने के लिए उकसाते भी हैं और तो क्या आप मुझे नहीं पढ़ा सकते हैं?अगर आप मुझे भी थोड़ा थोड़ा पढ़ाते रहते तो आपकी बड़ी मेहरबानी होती। मैं सारा दिन इतनी सारी मोटी मोटी किताबें ढोता रहता हूँ और मुझे खुद ही पढ़ना नहीं आता।मुझे बड़ी शर्मिंदगी महसूस होती है।आप मुझे आखिर क्यों नहीं पढ़ाना चाहते हैं? मौलवी साहब सोचने लगे।कुछ देर तक शांत रहे और नीचे जमीन पर एकटक निहारते रहे।उनके दिमाग में अब एक ही सवाल गूंज रहा था कि वे गदहे को कैसे समझायें, उसे क्या जवाब दिया जाय ताकि वो समझ सके।

मौलवी साहब ने गदहे से क्या कहा

      बेचारा गधा चुपचाप मौलवी साहब के पास ही खड़ा था।जब मौलवी साहब कुछ नहीं बोले तो उस गधे ने ही मौलवी साहब को फिर टोका।अरे आप चुप क्यों हो गये, अरे नहीं पढ़ा सकते तो मत पढ़ाइये।इसमें इतना सोचने की क्या बात है? अब मौलवी साहब को लगा कि यह इतनी आसानी से मानने वालों में नहीं है,इसलिये इसे समझाना पड़ेगा।तब वे अपने गदहे से कहे कि " दरअसल बात ये है, कि मैं तुम्हें क्यों नहीं पढ़ाता,जानते हो;मुझे डर है कि अगर तुम पढ़लिख लोगे तो मेरा यह गठरी नहीं ढोवोगे।" बस यही कारण है कि हमने कभी तुम्हारे बारे में नहीं सोचा।हम हमेशा अपने बारे में ही सोचते रहे। 


गदहे का ठहाका

       तब गदहा जोरदार ठहाका लगाकर हेंकने लगा। कहा कि वाह मालिक, आपतो बहुत धन्य हो।मैंने हमेशा आपको अपना हितैषी समझता रहा लेकिन आप तो मुझे सिर्फ अपने मकसद के लिए इस्तेमाल करते रहे। हम गदहा के गदहा ही रहे और आपके गठरी मार खाकर भी ढोते रहे।


कहानी से मिलने वाली शिक्षा

          कहानी से मिलने वाली शिक्षा

         इस कहानी से यह सीख मिलती है कि कुछ लोग हमेशा हमारा आपका सबका खूब शोषण करते हैं और वक्त आने पर किनारा कस लेते हैं।इसलिए हमें भी जागरूक होना चाहिये।आँखें बंद करके किसी पर भरोसा नहीं किया जा सकता।इस समाज में बहुत से लोग ऐसे हैं जो अपने नीजी स्वार्थ के लिए गरीबों का, अपने से कमजोर लोगों का खूब शोषण करते हैं।और कभी यह नहीं चाहते कि दूसरे लोग भी तरक्की करें और आगे बढ़ें।हमेशा दबाकर रखना चाहते हैं।उनकी सोच इतनी घटिया होती है कि वे अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर सिर्फ अपने बारे में ही सोचते हैं।अतः ऐसे लोगों से स्वयं सतर्क रहना चाहिए।हमें अपभी अपना लाभहानि समझना चाहिये।ऐसा नहीं कि हम अपना जीवन दूसरों की भलाई में ही बिता दें और जब हमारी बारी आये तो हम कहीं के न रहें।

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किसी नगर में एक बहुत ही पढ़े लिखे मौलवी साहब थे। वे गाँव-गाँव घूम-घूमकर धार्मिक और आलिम की किताबें बेचने का काम काम करते थे।और उससे होने वाली आमदनी ही उनके कमाई का जरिया हुआ करती थी।उनके पास एक गदहा था, जिसकी पीठ पर वे किताबों का गट्ठर लादते और दूर तक बेचने चले जाते थे।ऐसा उनका रोज का काम था।सुबह निकलते तो देर रात लौटते थे।कभी कभी तो जब ज्यादा दूर होते तो उधर ही कहीं मदरसे में ठहर भी जाते थे।


     गर्मी और लू ने जब परेशान कर दिया


 गर्मी का महीना था।कड़ी धूप थी, ऊपर से लू भी चल रही थी।अब मौलवी साहब को गर्मी बरदाश्त नहीं हो रही थी तो एक बाग में सोचे कि चलो थोड़ा आराम फरमा लिया जाय।एक घनी बाग देखकर वे वहाँ पहुंचेऔर अपने गदहे की पीठ से गट्ठरों को उतारकर नीचे जमीन पर रख दिया।और गदहे को भी आराम करने को कहकर छोड़ दिया।गट्ठर उतारकर जब गदहा भी खाली हो गया तो पहले तो उसने जमीन पर लोट लोटकर अपनी गर्म हो चुकी पीठ को थोड़ा राहत महसूस किया।।फिर बगल में जाकर घास चरने लगा।


मौलवी साहब और गदहे की बातचीत


     कुछ देर आराम करने के बाद मौलवी साहब उठे और अपने गदहे को हाँककर लाये और फिर अपने किताबों की गठरी लादने लगे तो उनके गदहे ने उनसे सवाल किया कि आप दिन भर मेरी पीठ पर इतनी ढेरों किताबें लादकर गाँव गाँव घुमाते रहतेहैं।लोगों को उसे पढ़ने के लिए उकसाते भी हैं और तो क्या आप मुझे नहीं पढ़ा सकते हैं?अगर आप मुझे भी थोड़ा थोड़ा पढ़ाते रहते तो आपकी बड़ी मेहरबानी होती। मैं सारा दिन इतनी सारी मोटी मोटी किताबें ढोता रहता हूँ और मुझे खुद ही पढ़ना नहीं आता।मुझे बड़ी शर्मिंदगी महसूस होती है।आप मुझे आखिर क्यों नहीं पढ़ाना चाहते हैं? मौलवी साहब सोचने लगे।कुछ देर तक शांत रहे और नीचे जमीन पर एकटक निहारते रहे।उनके दिमाग में अब एक ही सवाल गूंज रहा था कि वे गदहे को कैसे समझायें, उसे क्या जवाब दिया जाय ताकि वो समझ सके।

मौलवी साहब ने गदहे से क्या कहा

      बेचारा गधा चुपचाप मौलवी साहब के पास ही खड़ा था।जब मौलवी साहब कुछ नहीं बोले तो उस गधे ने ही मौलवी साहब को फिर टोका।अरे आप चुप क्यों हो गये, अरे नहीं पढ़ा सकते तो मत पढ़ाइये।इसमें इतना सोचने की क्या बात है? अब मौलवी साहब को लगा कि यह इतनी आसानी से मानने वालों में नहीं है,इसलिये इसे समझाना पड़ेगा।तब वे अपने गदहे से कहे कि " दरअसल बात ये है, कि मैं तुम्हें क्यों नहीं पढ़ाता,जानते हो;मुझे डर है कि अगर तुम पढ़लिख लोगे तो मेरा यह गठरी नहीं ढोवोगे।" बस यही कारण है कि हमने कभी तुम्हारे बारे में नहीं सोचा।हम हमेशा अपने बारे में ही सोचते रहे। 


गदहे का ठहाका

       तब गदहा जोरदार ठहाका लगाकर हेंकने लगा। कहा कि वाह मालिक, आपतो बहुत धन्य हो।मैंने हमेशा आपको अपना हितैषी समझता रहा लेकिन आप तो मुझे सिर्फ अपने मकसद के लिए इस्तेमाल करते रहे। हम गदहा के गदहा ही रहे और आपके गठरी मार खाकर भी ढोते रहे।


कहानी से मिलने वाली शिक्षा

          कहानी से मिलने वाली शिक्षा

         इस कहानी से यह सीख मिलती है कि कुछ लोग हमेशा हमारा आपका सबका खूब शोषण करते हैं और वक्त आने पर किनारा कस लेते हैं।इसलिए हमें भी जागरूक होना चाहिये।आँखें बंद करके किसी पर भरोसा नहीं किया जा सकता।इस समाज में बहुत से लोग ऐसे हैं जो अपने नीजी स्वार्थ के लिए गरीबों का, अपने से कमजोर लोगों का खूब शोषण करते हैं।और कभी यह नहीं चाहते कि दूसरे लोग भी तरक्की करें और आगे बढ़ें।हमेशा दबाकर रखना चाहते हैं।उनकी सोच इतनी घटिया होती है कि वे अपने स्वार्थ के वशीभूत होकर सिर्फ अपने बारे में ही सोचते हैं।अतः ऐसे लोगों से स्वयं सतर्क रहना चाहिए।हमें अपभी अपना लाभहानि समझना चाहिये।ऐसा नहीं कि हम अपना जीवन दूसरों की भलाई में ही बिता दें और जब हमारी बारी आये तो हम कहीं के न रहें।

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