आजमगढ़ उत्तर प्रदेश के प्रमुख ऐतिहासिक स्थल
आजमगढ़ ( उत्तर प्रदेश ) के प्रमुख ऐतिहासिक स्थल
१. महराजगंज (भैरोबाबा मंदिर)
छोटी सरयू नदी के तट पर बसा महराजगंज जिला मुख्यालय से लगभग 23 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। आज़मगढ़ में राजाओं की नामावली अधिक लम्बी है यही वजह है कि इस जगह को महराजगंज के नाम से जाना जाता है। यहां एक काफी पुराना भैरोबाबा का मंदिर है।इसके अतिरिक्त ऐसी मान्यता है कि यह वही स्थान है जहां भगवान शिव की पत्नी सतीजी जो कि दक्ष प्रजापति की पुत्री थीं पिता द्वारा करवाये जा रहे यज्ञशाला में शिव-सती को आमंत्रित न किये जाने से दुखी होकर बिना बुलाये ही उपस्थित होकर अपने पति की अपने पिताजी के द्वारा ही निंदनीय टिप्पणी करने और उसे सहन न कर पाने के कारण यज्ञवेदी में सती हुई थीं। लेकिन यह पूरी तरह से गलत है और यह भ्रांतियां कुछ ब्लागिंग करनेवाले लोगों द्वारा फैलाई गई हैं।मैं आप सभी को यह बताना चाहूँगा कि यह स्थान सिर्फ और सिर्फ भैरोबाबा के मंदिर के कारण ही प्रसिद्ध है।किसी सती ने यहाँ कभी कोई ऐसा कुछ नहीं किया था।और यहाँ कभी दक्षप्रजापति ने यज्ञ भी नहीं किया कराया था।लेकिन कुछ लोगों ने ऐसी भ्रांतियां फैला दिया था जिससे कम पढ़ेलिखे ,कम जानकर लोग सत्य मानते हैं।और जानकारी के लिए सत्य तो यह है कि हरिद्वार में कनखल नामक स्थान है जहाँ पर दक्ष प्रजापति द्वारा वह यज्ञ किया गया था जहाँ सती ने हवनकुंड में अपने प्राणों की आहुति दी थी।
प्रत्येक माह पूर्णिमा के दिन यहां मेले का आयोजन किया जाता है। वैसे तो हर मंगलवार को भी यहाँ छोटा सा मेला लगता रहता है और लोग अपने बच्चों के मुंडन और कड़ाही आदि चढ़ाने के लिए आते रहते हैं।लेकिन जेठ,असाढ़ और सावन में यहाँ अच्छी खासी भीड़ होती है।मंदिर के सामने एक पोखरा है जिसमें श्रद्धालु स्नान करते हैं और मंदिर में भैरोबाबा का दर्शनपुजनकरतेहैं।
२- मुबारकपुर (रेशमी नगरी)
मुबारकपुर जिला मुख्यालय के उत्तर-पूर्व से 13 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। ऐसा कुछ लोग बताते थे कि पहले इस जगह को कासिमाबाद के नाम से जाना जाता था। कुछ समय बाद इस जगह का पुर्ननिर्माण करवाया गया। इस जगह को दुबारा राजा मुबारक ने बसाया था। लेकिन इस नामकरण के पीछे कितनी सच्चाई है यह बताना थोड़ा मुश्किल है।क्योंकि ऐसा कहीं कोई लिखित प्रमाण किसी संग्रहालय में नहीं देखने को मिला है।यह स्थान बनारसी साड़ियों के लिए काफी प्रसिद्ध है। इन बनारसी साड़ियों का निर्यात पूरे विश्व में होता है। और जो असली बनारसी साड़ी होती है वह यहीं के कारीगरों द्वारा हाथ से हथकरघे पर रेशमी धागे से बुनकर बनाया करते थे।लेकिन आधुनिकता के दौर में सूरत अहमदाबाद आदि शहरों से आधुनिक मशीनों द्वारा भी तैयार किया जा रहा है।और उसे बनारसी साड़ी के नाम से बेचा जा रहा है।अब तो सिर्फ बनारसी साड़ी का नाम रह गया है।बनारसी साड़ी के बेलबूटे से महिलाएं बहुत आकर्षित होती थीं और बड़ेबड़े घरों की महिलाओं को ही यह नसीब में होता था।तब की बात कुछ और हुआ करती थी लेकिन आजकी बात कुछ और है। इसके अलावा यहां ठाकुरजी का एक पुराना मंदिर भी हैऔर राजा साहिब की मस्जिद भी स्थित है। मुबारकपुर में मुस्लिम विश्वविद्यालय भी है जहाँ पर विदेशी मुस्लिम समुदाय अपने बच्चों को पढ़ाई के लिए भेजते हैं।यह मुबारकपुर शहर के बारह सठियांव जानेवाली सड़क के किनारे पर स्थित है।
3- मेंहनगर
यह जगह जिला मुख्यालय के पूर्व-दक्षिण में 36 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। पहले मेहनगर को मेहाँ के नाम से जाते थे जो कि मेहाँ एक हिंदू रियासत थी।उस समय चारों तरफ औरंगजेब का बर्चस्व स्थापित हो चुका था जिससे उसने मेहाँ को भी मुस्लिम साम्राज्य बनाकर अपने में मिलाना चाहता था । यहां एक प्रसिद्ध किला था जिसका निर्माण राजा हरिबंश राय ने करवाया था। हरिवंशराय एक हिन्दू राजा थे और मेहाँ उनकी राजधानी थी।उन्होंने एक मुस्लिम लड़की से विवाह करके अपने हिंदुत्व का परित्याग कर दिया और इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया था और अपने पूरे साम्राज्य में मुनादी करवा दिया था कि अब से वे इस्लाम धर्म का पालन करेंगे। इसके बाद उनकी पहली पत्नी ने उनके आचरण से दुखी होकर अपने को उनसे अलग कर लिया था और अपने देवर यदुवनराय के साथ अपना नगर छोड़ दिया था औरवहां से कुछ दूर एक जंगल को साफ करवा कर वहाँ अपनी एक सराय बसाया जिसे रानी की सराय कहा गया। आज भी रानी का पोखरा एवं रानी का कुँआ देखा जा सकता है। सरकार की उपेक्षा के चलते अपना अस्तित्व खोती जा रही हैं यहाँ की सभी धरोहरें।इसलिए सरकार को इस पर भी ध्यान रखना चाहिए और अपने पर्यटन स्थलों को विकसित किया जाता तो यहाँ पर्यटक भी आते ।
4- दुर्वासा धाम
यह स्थान फूलपुर तहसील मुख्यालय के उत्तर से 6 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह स्थान दुर्वासा ऋषि के आश्रम होने के कारण काफी प्रसिद्ध है।कहा जाता है कि महासती अनुसुइया और अत्रि मुनि के पुत्रों में एक महाक्रोधी दुर्वासा ऋषि कभी यहाँ तपस्या किया करते थे।उनका यहाँ पर आश्रम था।उनकी कुटी यहाँ पर थी, उसी स्थान को यादगार बनाने के साथ ही यहाँ पर साधना करनेवाले साधुसंतों का एक दल यहाँ रहता था।आजभी यहाँ कोई न कोई पुजारी रहते हैं और मंदिर की देखभाल एवं पूजा पाठ होता रहता है। प्रत्येक वर्ष कार्तिक पूर्णिमा के अवसर पर यहां बहुत बड़े मेले का आयोजन किया जाता है। यह स्थान तमसा नदी के किनारे पर संगम स्थल पर स्थिति है।
5- भँवरनाथ मंदिर
आजमगढ़ का यह एक प्रमुख मंदिर है।यहाँ प्रतिदिन भारी भीड़ लगी रहती है।भगवान भोलेनाथ का यह मंदिर आज आजमगढ़ की शान में शामिल है। आज़मगढ़ जिले के प्रमुख मंदिरों में से एक हैं। भँवरनाथ मंदिर शहर से दो किलोमीटर की दूरी पर खुले परिक्षेत्र में स्थित है। भगवान शिव को समर्पित यह मंदिर लगभग सौ वर्ष पुराना है। सावन के महीने में यहाँ दूरदराज से भी श्रद्धालुओं का जल चढ़ाने का सिलसिला लगातार बढ़ता ही जा रहा है।माना जाता है कि जो भी सच्चे मन से इस मंदिर में आता है उसकी मुराद जरूर पूरी होती है। महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां बहुत बड़े मेले का आयोजन किया जाता है। हजारों की संख्या में भक्त इस मेले में एकत्र होते हैं। आजकल तो अपने पुत्र और पुत्रियों की शादी के लिए देखादेखी करने भी काफी लोग इस स्थान को चुन रहे हैं।प्रत्येक दिन कोई न कोई परिवार अपनी कन्या दिखाने के लिए इस स्थान पर आते रहते हैं। कुछ परिवार तो इसी स्थान पर अपनी पुत्रियों की शादी भी रचाने का सारा कार्यक्रम यहीं सम्पन्न कराने लगे हैं।काफी बड़ा प्रांगण है ,कई कमरे हैं।
6- अवन्तिकापुरी
आजमगढ़ का इतिहास बेशक किताबों में नहीं पढ़ाया जाता है लेकिन यहाँ की धरती ऋषि मुनियों के साथ बड़ेबड़े सुप्रसिद्ध राजाओं की भी कर्मभूमि रही है।मुहम्मदपुर ब्लॉक स्थित आँवक नामक एक गांव पड़ता है जिसे प्राचीन काल में अविन्कापुरी के नाम से जाना जाता रहा है।यहभी सरकारी उपेक्षा के चलते अपनी पहचान खोचुका था।और अवंतिका पुरी से सिमटकर आँवख गाँव बनकर रह गया।ऐतिहासिक दृष्टि से देखा जाय तो यह एक काफी प्रसिद्ध स्थान है। ऐसा माना जाता है कि राजा जन्मेजय ने एक बार पृथ्वी पर जितने भी सांप हैं उन्हें मारने के लिए यहां एक यज्ञ का आयोजन किया था। यहाँ विकास कार्यों के दौरान होने वाली खुदाई के दौरान यहाँ जब पोखरे की खुदाई की जा रही थी तो एक कुंड मिला जो पूरी तरह आग के धुएं से स सना हुआ था और उसमें जली हुई साँपों की हड्डियों के अवशेष भी मिले थे।तब उन्होंने इसे विशेष ध्यान देने और विकसित करने के लिए सरकार से इसपर रुचि रखने के लिए प्रस्ताव दिया था।सरकार की तरफ से कुछ बजट भी आया था लेकिन उसका सही ढंग से उपयोग नहीं किया गया।क्योंकि जो भी पौराणिक मान्यताओं के साथ जुड़े स्थान होते हैं उसे पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग को सुपुर्द करके उसके अनुसार उसपर काम होना चाहिए और उससे जुड़ी हर कहानी दर्साने के लिए पुरातत्व विभाग उसका वहीं एक संग्रहालय बनाता और उसे दुनियां के सामने लाता।लेकिन ऐसा कुछ नहीं किया जा रहा है।बजट आता है और अपने मनमर्जी तरीकों से लोग उसे खर्च कर देते हैं।ऐसा नहीं होना चाहिए।
यहां स्थित मंदिर व सरोवर भी काफी प्रसिद्ध है। यहाँ काफी संख्या में लोग इस सरोवर में डुबकी लगाते हैं।मंदिर भी है पुजारी भी हैं लेकिन व्यवस्था कुछ खास नहीं है।यहाँ जाने वाली सड़क भी ठीक नहीं है।और बाहर से आने वाले लोगों को इनसब स्थानों को बताने वाला कोई ऐसा नोटीफिकेशन भी कहीं नहीं दर्शाया जाता है।अगर बाहर से आनेवाले लोगों को बताया जाता तो हो सकता है कि यहाँ भी पर्यटकों का आना जाना शुरू हो जाता और लोगों को रोजगार भी बढ़ता।शहर की आमदनी बढ़ती।
7- निज़ामाबाद (पाटरी कला के लिए प्रसिद्ध)
यह आज़मगढ़ मुख्यालय से 10 किमी पश्चिम में स्थित है। मिट्टी के बर्तनों के लिए प्रसिद्ध यह स्थान हरिऔध, जैसे साहित्यकारों की जन्म स्थली भी है। यहाँ से मुबारकपुर से मंदुरी वाया तहबरपुर सड़क मार्ग से जुड़ा है। तहबरपुर निज़ामाबाद के उत्तर में स्थित बाज़ार है। तहबरपुर सीधे मुख्यालय ( आजमगढ़) से भी सीधा जुड़ा हुआ है। मंदुरी(आजमगढ़) हवाई अड्डा भी यहाँ से सीधे मार्ग पर ही है,मात्र कुछ ही किमी दूर पड़ता है।यहाँ पर शितला माता का मंदिर काफी प्रसिद्ध है।हर शुक्रवार को सुबह मेला लगता है और बड़ी भीड़ होती है।यह स्थान शितला माई के स्थान से भी काफी प्रसिद्ध है। यहाँ से लगभग दो तीन किलोमीटर की ही दूरी पर तमसा नदी के किनारे पर सतीअनुसुइया के मानस पुत्र दत्तात्रेय जी की तपोभूमि भी है जिसे दत्तात्रेय के नाम से लोग जानते हैं।
8-चंद्रमा ऋषि आश्रम
जनपद मुख्यालय से लगभग 5 किलोमीटर पश्चिम तमसा एवं सिलानी नदी के संगम पर चंद्रमा ऋषि का आश्रम है। यह स्थान भँवरनाथ से तहबरपुर जाने वाले रास्ते पर पड़ता है,रामनवमी तथा कार्तिक पूर्णिमा पर मेला लगता है ऐतिहासिक और धार्मिक स्थल घूमने का स्थान है यह स्थान सती अनसूया के कहानी से संबंधित है।
9- दत्तात्रेय आश्रम
यह निज़ामाबाद से 4 किलोमीटर दूर पश्चिम तमसा और कुंवर नदी के संगम पर स्थित दत्तात्रेय का आश्रम है यहां पर पहले लोग ज्ञान प्राप्ति के लिए आया करते थे यहां शिवरात्रि के दिन मेले का आयोजन किया जाता है। चंद्रमा ऋषि,दत्तात्रेय और दुर्वासा ऋषि यह तीनों लोग सती अनुसूर्याऔर अत्रि मुनि के पुत्र थे।और इन तीनों ऋषियों ने यत्रतत्र आजमगढ़ के ही किसी न किसी स्थान पर जाकर अपनी तपोस्थली चुना और वहाँ रहते हुए अपनी सिद्धियों को प्राप्त किया।फिर देश और दुनियाँ के कल्याण के लिए यहाँ से आगे बढ़ कर भ्रमणकरते गये और सम्पूर्ण जगत का कल्याण किया।
10-पल्हमेश्वरी मन्दिर
यह लालगंज तहसील क्षेत्र में पड़ने वाला स्थान अपनी अलग ही पहचान बनाया हुआ है।लालगंज से पूर्व लगभग 13 किलोमीटर दूर पल्हना ब्लॉक में है ।यह मंदिर आज़मगढ़ के प्राचीन व प्रसिद्ध मंदिरों में से एक है यह माँ पल्हमेश्वरी का धाम है, जहां नवरात्र के दिनों में हजारों के संख्या में भक्त जाते हैं। यहां वर्ष में एक बार पूर्णिमा के दिन भारी मेला लगता है। यहां एक मंदिर तथा एक बड़ा सा पोखरा भी है।मंदिर के सामने पोखरा में लाल कमल जब खिलता है तो काफी सुन्दर लगता है और बहुत ही मनोहारी छटा बिखेर कर लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है।मंदिर के सामने छोटीछोटी दुकाने हमेशा सजी रहती हैं।यहाँ के स्थानीय लोग शादीव्याह के बाद आकर पूजा पाठ कराते हैं, महिलाएं कड़ाही चढ़ाती हैं।बच्चों के यहाँ मुंडन भी किया जाता है।
ऐसी मान्यता है कि माता सती के पार्थिव शरीर की यहाँ पाल्थी का अंगभष्म आकर गिराथा।इसलिए यह पाल्हमेश्वरी धाम के नाम से प्रसिद्ध है।यहाँ के स्थानीय लोग इसे बुढ़िया माई के स्थान के रूप में पूजते आये हैं।
सरकारी उपेक्षा
कोई भी शहर हो अगर सरकार उसके विकास को लेकर चिंतित नहीं है तो धीरे धीरे वह उपेक्षित हो जाता है और लोग उसके महत्व को भूलने लगते हैं।काशी, मथुरा अयोध्या येसभी जिले कुछ साल पहले काफी उपेक्षित हो चुके थे।बस लोग किताबों में अयोध्या को पढ़ते थे कि कभी यहाँ किसी दशरथ नामक राजा ने राज किया था उसके चार पुत्र थे।राम,लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न।राजा दशरथ के तीन रानियाँ थीं,बस।लेकिन आज उसी अयोध्या नगरी को रामजन्मभूमि के तौर पर विकसित किया गया और सरकार ने उसे विश्व के पटल पर दिखाने के लिए उसपर काम किया तो आज अयोध्या को लोग भारत में ही नहीं अपितु विश्व भर में जानने लगे।ठीक वही हाल बनारस के काशी का था।बाबा विश्वनाथ की नगरी काशी।गंगा यहाँ पर अर्धचन्द्राकार में होकर बहती है और यहाँ जब सायंकाल में गंगा आरती होती है तो यह दृष्य देखने योग्य होता है।काशी आज से नहीं है।यह यहभगवान भोलेनाथ की बसाई हुई नगरी है और इसकी सुन्दरता को एक यादगार बनाने के लिए इसपर सरकार ने खूब पैसा बहाया तब जाकर आज एक बार फिर से काशी को लोग याद करने लगे हैं।
मथुरा की लोकप्रियता वहाँ के मंदिरों से होती है लेकिन असली लोकप्रियता तो भगवान श्रीकृष्ण की जन्मभूमि होने से है।लोग यहाँ आकर भगवान श्रीकृष्ण जी की पावन जन्मभूमि को नमन करते हैं और भगवान श्री कृष्ण जी को याद करते हैं।इसके विकास को लेकर भी सरकार ने योजनाएं बना लिया है।
सरकार से अपेक्षा
सरकार से अपेक्षा की जाती है कि हमारे जनप्रतिनिधि अपने अपने क्षेत्रों के विकास की योजनाओं को मूर्त रूप देनेके लिए जब भी कोई प्रस्ताव भेजते हैं तो चौमुखी विकास के मुद्दे शायद नहीं उठाते।इसलिए वह सभी प्रकार के विकास से बंचित हो जाता है।सरकार के पास पैसे होते हैं और जनता के लिए योजनाएं और जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि सरकार के आंगन में खड़े होकर अपने क्षेत्रों की समस्याओं को वहां रखते।अगर अपने क्षेत्र में कोई ऐसा ऐतिहासिक स्थल है जिसे लो भूल चुके हैं तो उसे एक पटल पर लाकर पुनःउसका जिर्णोद्धार करनेवाले प्रयास करते तो शायद हमारे वे ऐतिहासिक स्थल आज इस हालत में नहीं होते।लेकिन आजकल के सासंद विधायक अपने हिस्से का सभी साँसद या विधायक निधि का पैसा सिर्फ वहां खर्च कर देते हैं जहाँ से उन्हें भारी कमीशन खर्च करने के लिए मिल जाता है।सांसद एवं विधायक निधि का सम्पूर्ण पैसा नीजी स्कूलों को आधे कमीशन पर तय करके वहाँ दे दिया जाता है जहाँ से जनता को शिक्षा के नाम पर लूटने का खेल शुरू होता है।कहने को ये स्कूल कालेज तो शिक्षा का मंदिर होते हैं लेकिन यहाँ राज तो लक्ष्मी मइया का चलता है।यहां से शिक्षा माफियाओं का राज चलता है और पढ़ने वाले छात्र छात्राओं के परिवार को गाय भैस की तरह दूध की बजाय रूपये का दोहन किया जाता है।और शिक्षा तो ट्यूशन में मिलती है स्कूल तो सिर्फ सार्टिफिकेट देने के लिए बनाए जाने लगे हैं।सरकार इनसभी बातों से अनभिज्ञ नहीं है।उसे सारे खेल पता हैं लेकिन अगर कड़ाई हुई तो सरकार गिरने का भय सताने लगता है।सरकार है तो सब कुछ सम्भव है।हर विभाग मुट्ठी में होता है।
सरकार चाहे कोई भी चलाये हमारे जनप्रतिनिधियों को चाहिए कि अपने अपने क्षेत्रों के उन तमाम ऐतिहासिक स्थलों का एक खाका तैयार कर सदन में दिखायें और चर्चा करें कि उसे विकसित करने के साथ ही उसे जिला मुख्यालय पर स्थित रेलवे स्टेशनों एवं बसअड्डों पर बकायदे से उसे दिखाया जाना चाहिए।कि आपके जिले में कौनकौन से स्थान ऐसे हैं जहाँका ऐतिहासिक महत्व है।ऐसे स्थानों को चिन्हित करते हुए वहां की ब्यवस्था पुरातत्व विभाग को सौंपकर उसका विकास और रखरखाव की जिम्मेदारी सुनिश्चित किया जाना चाहिए।ऐसा नहीं करने से यदि कोई एक बार बजट दे दिया तो कुछ दिन के लिए वहां पर पैसे खर्च कर के लोग भूल जायेंगे और कुछ साल के बाद वह स्थान फिर अपने पुराने राग अलापने लगेगा।और इसपर खर्च किया गया सारा पैसा मिट्टी में मिल जायेगा।सार्वजनिक स्थानों, बस अड्डों एवं रेलवे स्टेशन पर वहाँ के सभी पर्यटन स्थलों को मानचित्र पर अंकित किया जाना चाहिए ताकि बाहर से आनेवाले लोगों को वहाँ के बारे में खास जानकारी होती रहे।
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___ मालचन्द कन्नौजिया बेपनाह।
लेबल: आजमगढ़ प्रमुख ऐतिहासिक स्थल, चंद्रमा ऋषि आश्रम, दुर्बासा ऋषि, भैरोबाबा मंदिर



